कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

जब कोई हमारी प्रकृति की सुरम्य पहाड़ियों की गोद में बसे देवता, ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों की निवास स्थली देवभूमि उत्तराखंड की चर्चाएं मद्यपान के फलते-फूलते कारोबारी के रूप में करता है, तब ऐसी बातें सुनकर मन खट्टा होने लगता है। विश्वास नहीं होता कि सच में क्या यह हमारी वही देवभूमि है जिसके नाममात्र से हम उत्तराखंडी लोग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं? अफसोस! आज जिस तरह से नशे का व्यापार हमारी देवभूमि में अपनी पैठ बनाकर उसकी जड़ों को खोखला करने में लगी है, उससे यह स्पष्ट होता है एक के बाद एक चोला बदलती हमारी सरकारें नींद के झौंके में विकास के नाम पर आम जनता को सुनहरे सपने दिखाकर केवल अपना उल्लू सीधा करने की फिराक भर में हैं।
आज शराब की सुगमता के कारण हमारे शांति प्रिय पहाड़ी गांव विकास के नाम पर ’सूरज अस्त, उत्तराखंड मस्त’ की पहचान बनाने में रमे हुए हैं, जिसमें बड़े-बुजुर्ग, युवा पीढ़ी से लेकर नौनिहाल तक नशे में धुत होकर हमारी पहाड़ी संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डालकर खोखला करने में तुले हुए हैं। वे नशे में मग्न होकर भूल रहे हैं कि धीरे-धीरे वे मानसिक विकृति के शिकार हो रहे हैं, जिससे उनके घर-परिवार में जब-तब गाली-गलौज़, लड़ाई-झगड़े का माहौल निर्मित होने से अशांति के बादल मंडरा रहे हैं।  यद्यपि पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत पहले से ही बीड़ी-तम्बाकू पीना आम बात है, लेकिन जब से यहाँं शराब रूपी दानव ने अपने पांव पसारे हैं, अधिकांश लोगों को इसकी लत लग चुकी है, जो तेजी से उनके तन-मन को खोखला करती जा रही है। शराब के सेवन से न केवल उनकी आंते सूख रहीं है, अपितु किडनी और लिवर सम्बन्धी बीमारियां बिन मांगे शरीर को दुर्बल और असहाय बना रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप समाज और घर-परिवार बडे़ पैमाने पर बिखराव की कगार पर खड़े नजर आ रहेे हैं।
नशा नाश का दूसरा पहलू है। नशा करने या मद्यपान करने के अनेक दुर्गुण हैं। नशे में धुत होकर नशेड़ी अपना होश और विवेक खोकर अपने बच्चों और पत्नी की दुर्दशा करता है। अपना घर-परिवार भूलकर ऊल-जलूल बकते हुए लड़खड़ाते कदमों से गली-कूचों में बेदम पड़ा रहता है। जब कोई वाहन चालक शराब पीकर गाड़ी चलाता है तो वह न केवल अपनी, अपितु दूसरों की जान के लिए भी खतरनाक सिद्ध होता है। ऐसी हालात में कई  घर-परिवार असमय उजड़ते हैं, बर्बाद होते हैं। शराब मानव जाति के लिए किसी भी दृष्टिकोण से लाभदायक नहीं है, इस बात को समय-समय पर ज्ञानी, बुद्धिजीवी, लेखक, चिन्तक एवं विभिन्न समाज सेवी मनीषियों ने भी समझाया है। मिल्टन कहते हैं- ‘संसार की सारी सेनाएं मिलकर इतने मानवों और इतनी सम्पत्ति को नष्ट नहीं करतीं, जितनी शराब पीने की आदत।’ वाल्मीकि ने मद्यपान की बुराई करते हुए कहा है- ’पानादर्थश्च धर्मश्च कामश्च परिहीयते।’ अर्थात् मद्य पीने से अर्थ, धर्म और काम, तीनों नष्ट हो जाते हैं।’ दीर्घनिकाय का वचन है- ’मदिरा तत्काल धन की हानि करती है, कलह को बढ़ाती है, रोगों का घर है, अपयश की जननी है, लज्जा का नाश करती है और बुद्धि को दुर्बल बनाती है।’ मुंशी प्रेमचंद कहते हैं- ’जहां सौ में से अस्सी आदमी भूूखों मरते हों, वहांँ दारू पीना गरीबों का रक्त पीने के बराबर है।’ भगवतीप्रसाद वाजपेयी जी कहते हैं- ’शराब भी क्षय (टीबी) जैसा एक रोग है, जिसका दामन पकड़ती है, उसे समाप्त करके ही छोड़ती है।’ अकबर इलाहाबादी ने चुटकी ली है कि- "उसकी बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर। खैरियत गुजरी कि अंगूर के बेटा न हुआ।।"
शराबबंदी को लेकर देवभूमि की जनता में इन तीनों तीव्र आक्रोश है, जिसमें महिलाओं की भूमिका मुख्य है; क्योंकि शराब पीने वाले तो पुरुष ही होते हैं, जिनका मुख्य काम खाना-पीना और, मारपीट के साथ लड़ाई-झगड़ा कर घर-परिवार और समाज के माहौल को बिगाड़ना भर रह गया है। घर-परिवार को संभालने का काम केवल महिलाओं के जिम्मे ही होता है, जिसे निभाना उन्हें भली-भांति आता है। यही कारण है कि आज महिलाएं शराबबंदी के लिए बढ़-चढ़कर जगह-जगह एक होकर आंदोलनरत हैं। शराब विरोधी  आंदोलन पहले भी हुए हैं लेकिन इस बार विरोध सम्पूर्ण देवभूमि से शराब रूपी  दानव के सदा के खात्मे के लिए है। जब से सुप्रीम कोर्ट के के एक फैसले के तहत् राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे वाली शराब की दुकानों को बंद कर दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने का निर्णय हुआ है, तब से पीड़ित और जागरूक महिलाओं में तीव्र आक्रोश भरा हुआ है। इसी बात को लेकर वे जहां एक तरफ कई जगह शराब की दुकानें खोले जाने के विरोधस्वरूप उग्र प्रदर्शन कर तोड़-फोड़ कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाझाईश देकर शराबबंदी के लिए आन्दोलनरत हैं। आंदोलनकारी अपनी भूख-प्यास, नींद, चैन सबकुछ भूलकर शराबबंदी के लिए एकजुट हो विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैंैं, लेकिन बिडम्बना देखिए अभी तक सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग पायी है। आखिर क्यों सरकार फैसला लेने में असमर्थ है? यह समझना अब आम जनता के लिए भी कोई टेढ़ी खीर नहीं रही है। इसका सीधा सा गणित उनकी भी समझ में आ रहा है शराब के कारोबार से सरकार जो सालाना लगभग 1900 करोड़ की आमदनी होती है, उसके आगे वे उनका दुःख-दर्द, सुख-चैन समझने में अपने आप को असमर्थ पा रहा है। उन्हें आम जनता की नहीं, अपितु इस बात की चिन्ता है कि अगर कहीं शराबबंदी हुई और उनकी आमदनी चली गई तो फिर वे कैसे राज्य के विकास की योजनाओं का खाका खींचने वाले सरकारी महकमों में तैनात अधिकारी/कर्मचारियों के वेतन-भत्ते निकालेंगे, मोटर मार्ग बनायेंगे, स्कूल खुलवायेंगे और बिजली-पानी का बन्दोबस्त करेंगे? इतनी बड़ी राशि का विकल्प न ढूंढ पाने में राज्य सरकार शराबबंदी हेतु असमर्थ और असहाय बनी हुई है। लेकिन आम जनता अब यह भी बखूबी समझने लगी है कि शराबबंदी के लिए सिर्फ यही कारण पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि शराब कारोबारियों की राजनीति के गलियारों तक गहरी पहुंच होने एवं उनकी काॅकटेल पार्टियों के खर्च आदि वहन करने और उन्हें मालामाल करना भी है। 
          कुछ भी हो लेकिन अब सम्पूर्ण उत्तराखंड में हो रहे शराबबंदी के आंदोलनकारियों के इरादों से स्पष्ट है कि अब वे किसी भी प्रकार से सरकार के झांसे में नहीं आने वाले हैं। इसके लिए उन्होंने कमर कस ली है कि अब वे तभी मैदान से हटेंगे, जब उत्तराखंड सरकार पूर्ण शराबबंदी की घोषणा करने के लिए मजबूर न हो जाय। वे दृढ़ संकल्पित हैं कि इस बार वे ‘कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरी छोड़ि अब होब कि रानी।“ की तर्ज पर सरकारों के चोलाबदली और जड़ राजनेताओं के झूठे आश्वासनों के दम पर नहीं, अपितु दुर्गा-काली बनकर देवभूमि से दानव रूपी शराब का खात्मा कर नशा मुक्त देवभूमि का सपना करेंगे।
नशा हटाओ देवभूमि बचाओ ...  कविता रावत 


हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

 22 मार्च पानी बचाने  का संकल्प, उसके महत्व को जानने  और संरक्षण के लिए सचेत होने का दिन है।   अनुसंधानों से पता चला है  कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है। इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं। जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल-आपूर्ति आज के युग की गंभीर समस्या बन गयी है।   बिना एकजुट होकर जागरूक न होने से इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती है।  यदि जल संकट के प्रति हम सचेत और दृढ संकल्पित होकर आगे नहीं आये तो वैज्ञानिक आइन्स्टीन की कही बात सच न हो जाय, जिसमें उन्होंने कहा था की तीसरा महायुद्ध चाहे परमाणु अस्त्रों से लड़ लिया जाय पर चौथा महायुद्ध यदि होगा तो पत्थरों से लड़ा जायेगा और इससे एक कदम आगे बढ़कर नास्त्रेदम ने भविष्यवाणी की थी कि चौथा महायुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा?  यदि इस भविष्यवाणी को झुठलाना है तो पानी की एक-एक बूँद बचाने के लिए हर व्यक्ति को संकल्पित होकर अपने-अपने स्तर  से पहल करते हुए आगे आना होगा।  
ढूंढा राक्षसी : होली कथा

ढूंढा राक्षसी : होली कथा

होली पर्व से सम्बन्धित अनेक कहानियों में से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा ढूंढा नामक राक्षसी की कहानी का वर्णन भी मिलता है, जो बड़ी रोचक है।  कहते हैं कि सतयुग में रघु नामक राजा का सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार था। वह विद्वान, मधुरभाषी होने के साथ ही प्रजा की सेवा में तत्पर रहता था। एक दिन उसके राज्य के नागरिकों ने दरबार में आकर प्रार्थना कि नगर में ढू़ंढा नाम की राक्षसी ने अनेक गांवों और नगरों में उत्पात मचाया हुआ है। वह बड़ी मायाविनी है और अपनी इच्छानुसार रूप बदलने में शातिर है। वह बच्चों का मांस खाने की आदी है। उनके द्वारा अनेक उपाय किए गए हैं, लेकिन उस पर किसी तंत्र-मंत्र अथवा शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आप अतिशीघ्र कोई उपाय कीजिए वर्ना नगर से बालकों की किलकारियाँ सदा के लिए बंद हो जाएगी। नगरवासियों के करुण पुकार सुनकर रघु बहुत चिन्तित हुए। उन्होंने नगरवासियों को आश्वस्त करते हुए अपने-अपने घर जाने को कहा।
   नगरवासियों के जाने के बाद राजा रघु बहुत विचार कर अपने गुरु वशिष्ठ के पास गये। गुरु के पास पहुंचकर उन्होंने विनम्रतापूर्व उनसे ढूंढा राक्षसी के बारे में समस्या का समाधान जानने के लिए बड़ी नम्रता से चरण स्पर्श किए और वहीं गुरु वशिष्ट के समीप बिछे कुशासन पर बैठकर और अपने आने का कारण बताया। उन्होंने गुरु वशिष्ट से पूछा कि कि यह राक्षसी कौन है? इसके अत्याचारों को निवारण का उपाय बताइये? वशिष्ट थोड़ी देर चुप रहकर बोले- राजन! यह माली नाम के राक्षस की कन्या है। एक समय की बात है। इसने शिव की आराधना में बड़ा उग्र तप किया। भगवान भोलेनाथ ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसको वर मांगने को कहा। इस पर वह कुछ भी न बोली तो फिर शिव जी ने कहा- “संकोच मत करो बालिके! जो कुछ तुम्हारे मन में हो वह मांग डालो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगा।
    महादेव के ऐसे वचन सुनकर उसका रहा सहा संकोच भी जाता रहा और वह हाथ जोड़कर बोले- हे भोलेनाथ मुझे देवता, दैत्य और शस्त्रों से अवध्य कर दीजिए। मुझे गर्मी-सर्दी, बरसात, दिन-रात, घर-बाहर सभी स्थानों से अभय प्राप्त हो। उसकी इस बात को सुनकर शिव सोच में पड़ गये। इतनी शक्तियों के प्राप्त हो जाने से यह उनका अवश्य दुरुपयोग करेगी और सर्वत्र आतंक फैलाती रहेगी, लेकिन मैं तो वचन दे चुका हूं फिर ........... शिवजी बोले- अरे, तुमने सब कुछ कहा लेकिन पागल और बालकों का नाम क्यों नहीं लिया?
ढूंढा हंसते हुए बोली- पागल तो पागल होता है। वह भला किसी का क्या बिगाड़ सकता है और रही बालकों की बात, भला उन्हें मैं क्यों सताने लगी, वे तो मुझे बहुत प्रिय है। शिव तथास्तु कहकर वहां से अन्तर्ध्यान हो गये। शिव के चले जाने पर उसने अपने कथन पर विचार किया- वह बालकों को लेकर चिन्ताग्रस्त हो गई। इसीलिए वह तब से बालकों को परेशान करती रहती है- सोचती है न कोई जीवित बचेगा और न मेरा अहित होगा। ऐसा वशिष्ट ने रघु को कह सुनाया।
गुरुदेव की समस्त बातें ध्यानपूर्वक सुनकर रघु बोले- इससे मुक्ति को भी तो कोई उपाय होगा। उपाय क्यों नहीं है, उपाय तो है- कोई भी देवता कोई तपस्वी को ऐसे ही वरदान थोड़े ही दे दिया जाता है। बहुत आगा-पीछा सोचकर, उसी के कथन में से सार निकालकर उसकी मौत का कारण समझ वरदान दिया जाता है। यदि वह तपस्वी का वरदान न दें तो व्यक्ति का ईश्वर पर से आस्था ही समाप्त हो जाए। इसलिए देवताओं को उनकी तपस्या को सार्थक करने के लिए वरदान तो देना ही पड़ता है। यदि उसने पाई हुई सिद्धि का दुरुपयोग किया तो उसी के मांगे हुए वरदान में से उसकी मौत का उपाय भी खोज लेते हैं। इसलिए हे राजन, आप चिन्तित न हो और जैसा मैं कहूं वैसा ही कृत्य करें।
          फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को राज्य के बालकों को बुलाकर उनसे सूखे उपले (गोबर के कंडे) मंगाकर एक जगह इकट्ठे करवाएं और उसमें सूखे पत्तां, टहनियां, लकड़ियां मंगाकर एक ढूंढ बनवाएं । उसके बीचों बीच एक लकड़ी का लम्बा डंडा लगवाएं क्योंकि उसने (ढूंढा) वरदान मांगते समय जंगली वस्तुओं और पशुओं का नाम नहीं लिया था। बालकों के हाथ में लकड़ी की तलवारें दें और उनसे कहें कि अपनी अपनी तलवारों को इस प्रकार चलाएं जिस प्रकार युद्ध में योद्धा अपने शत्रु पर वार करने के लिए प्रहार करता है। बड़े लोगों से कहें कि वे पागलों की तरह व्यवहार करें, क्रूर हास्य, अनर्गल प्रलाप और हंसी-मजाक करें। निःशंक होकर जिसके मन में जो आये वही करें फिर आप राक्षसों के नाश वाला मंत्र बोलकर अग्नि को प्रज्जवति करें। तत्काल रघु क्षमायाचना सहित बोल उठे- लेकिन गुरूदेव, इस सबसे ढूंढा का कैसे नाश होगा। नाश ....नाशम ही तो होगा। वह इतने बालकों के समूह को देखकर लार टपकाती हुई वहां आयेगी और अपने को सबों की दृष्टि से ओझल रखने की लिए उसी ढूंढ में छुप जाएगी। राक्षसों के नाश करने वाले मंत्र से ज्यों ही अग्नि प्रज्जवलित होगी, वह उसी में जल मरेगी। राजन, ऐसा अवश्य होगा क्योकि उसकी मृत्यु इसी प्रकार लिखी हुई है।
  राजा रघु ने गुरूदेव की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। ढूंढा नाम की राक्षसी अपने प्रलोभन के कारण सचमुच वहां आई और ढूंढा को अग्नि के चारों तरफ से घेर लिया तो वह निकल भागने का उपाय खोजने लगी लेकिन वशिष्ट के मंत्रों ने उस अग्नि के चारों ओर से एक गोलाकार रेखा से बांध जो दिया था। मंत्रों के प्रभाव से वह न तो एक इंच वहां से सरक सकी न ही मायावी रूप धारण कर पाई। अपनी मृत्यु को देख वह चीख-चीखकर शिव को पुकारने लगी। शिवजी वहां आये और उन्हें धिक्कारते हुए कहा कि तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया इसीलिए परिणाम भुगतो। उसकी अनुनय-विनय सब बेकार गई और वह जल मरी।  तब से आज तक होली जलाने, अनाप-शनाप बोलने  और होली की राख को तांंत्रिक लोगों द्वारा उपयोग आदि की प्रथा चल निकली। 

सभी को होली की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

एक अभियान नारी आधारित गालियों के विरुद्ध भी चले

एक अभियान नारी आधारित गालियों के विरुद्ध भी चले

भले ही हम "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" वाली बात सुनकर खुशफहमी में जीते आ रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इसके उलट नज़र आता  है।  जहाँ एक ओर नारी के सम्मान की बात की जाती है, वही दूसरी ओर इसकी वास्तविकता की तस्वीर जब आए-दिन समाचार पत्रों और टीवी आदि के जरिये सबके सामने देखने-सुनने को मिलती है, तब यह बात अच्छी नहीं दिल में चुभती है।  आधुनिक कहलाने वाले समाज के बावजूद  आज भी नारी के प्रति कोई बहुत बड़ा मूलभूत परिवर्तन नहीं आ पाना गंभीर चिंतन का विषय है, यह परिवर्तन कैसे होगा, इस पर सबको विचार करने की सख्त आवश्यकता  है।  
इसी तारतम्य में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक सामाजिक बुराई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगी कि जहाँ एक ओर हमारा समाज औरत को सम्मान देने की बात करता है, वहीँ दूसरी ओर  उसके लिए माँ-बहिन जैसी गालियों को बौछार सरेआम होते देख ऐसा मौन धारण किये रहता है,जैसे कुछ हुआ ही न हो।  कितनी बिडम्बना है यह!  आज अधिकांश लोगों ने गालियों को इतनी सहजता से अपने स्वभाव में ढाल लिया है कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि वे खुद की माँ, बहिन को गाली दे रहे हैं या दूसरे की?  भले ही स्त्री से जोड़कर गालियाँ देने कि प्रथा बहुत पहले से है लेकिन आज जब हम इतने शिक्षित और सभ्य हो चुके हैं तब आखिर क्यों  इस आदत को छोड़ नहीं पा रहे हैं।
           आज जगह-जगह बेशर्म की तरह उग रही गालियों की अमरबेल को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए नारी-पुरुष मानसिकता से ऊपर उठकर एकजुट होकर स्वच्छता अभियान चलाने की जरुरत है। सबको गम्भीरता से सोचने की जरुरत है कि इस तरह की नारी संबोधनकारी गालियां सभ्य कहलाने वाले  समाज के नाम पर बदनुमा दाग हैं, अतः इसे अपने-अपने स्तर से जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर एक स्वच्छता अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए जिससे ऐसे लोगों को सबक मिले जो अपनी माँ-बहन और नारी का सम्मान करना भूल चुकें हों।
....कविता रावत   


शिव-पार्वती बारात

शिव-पार्वती बारात



महाशिवरात्रि को त्यौहारों का राजा कहा जाता है। यह पर्व भगवान शंकर की पूजा तथा भक्त की श्रद्धा और आस्था का पर्व है। शिवरात्रि व्रत ’सर्व पाप प्रणाशनम्’ अर्थात् सभी पापों को नष्ट करने वाला तथा ’भुक्ति भुक्ति प्रदायकम्’ अर्थात्  भोगों तथा मोक्ष का प्रदाता है। मान्यता है कि जो लोग शिवरात्रि का व्रत रखते हैं, उन्हें कामधेनु, कल्पवृक्ष और चिंतामणि के सदृश मनोवांछित फल प्राप्त होता है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि ‘जो मनुष्य महाशिवरात्रि के दिन व्रत कर जागरण करता है और विधिवत शिव पूजा करता है, उसे फिर कभी अपनी माता का दूध नहीं पीना पड़ता, वह मुक्त हो जाता है, अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्ति होती है। ज्योतिष के अनुसार अमावस्या में चंद्रमा सूर्य के समीप होता है, अतः उस समय जीवन रूपी चंद्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ संयोग होने से इष्ट सिद्धि की प्राप्ति होती है।
        शिवरात्रि शिव-पार्वती के विवाह का दिन है। शिव-पार्वती के मिलन की रात है, शिव शक्ति पूर्ण समरस होने की रात है। इसलिए शिव ने पार्वती को वरदान दिया कि आज शिवरात्रि के दिन जहाँ कहीं तुम्हारे साथ मेरा स्मरण होगा, वहाँ उपस्थित रहूँगा। 
         महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिर में पूजा अर्चना के बाद जब दोपहर में शिव-पार्वती बारात में शामिल होने का अवसर मिला तो आत्मीय शांति का अनुभव हुआ। यूट्यूब पर विडियो लोड हुआ तो उसमें ब्लॉग पर शेयर करने का बटन भी सामने आ गया तो क्लिक करने पर ब्लॉग पर आ गया तो सोचा इसके साथ ही दो-चार शब्द लिखती चलूँ।
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
 
भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल स्थित नार्थ टी.टी.नगर में न्यू मार्केट के पास एक विशाल मैदान है, जिसे दशहरा मैदान के नाम से जाना जाता है। इस मैदान में दशहरा के दिन हजारों की संख्या में शहरवासी एकत्रित होकर रावण के साथ कुम्भकरण और मेघनाथ का पुतला दहन कर दशहरा मनाते हैं। यहाँ हर वर्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक भोपाल उत्सव मेला लगता है। अभी जब मेले की गूँज बच्चों के कानों तक सुनाई दी तो उन्होंने भी 25 जनवरी 2017 को पूर्व घोषणा कर दी कि वे भी 26 जनवरी को भोपाल उत्सव मेला देखने जाएंगे। यद्यपि मैंने मेले से पहले ही कुछ आवश्यक खरीददारी कर ली थी, फिर भी बच्चों की जिद्द के चलते यही सोचकर कि चलिए मुख्य परीक्षा के पहले घूम-फिरकर उनका मन हल्का हो जायेगा, निश्चित किया। तयशुदा कार्यक्रम के तहत् 26 जनवरी के दिन सुबह जल्दी उठकर ऑफिस में झंडा वंदन के बाद घर लौटकर जल्दी से चाय-नाश्ता तैयार करते-करते टेलीविजन पर गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय समारोह देखकर गणतंत्र दिवस मनाया गया।
         गांव में भले ही दिन में मेले लगते हैं, लेकिन शहर में अधिकांश मेले रात को ही लगते हैं, क्योंकि रात को बिजली की आकर्षक साज-सज्जा से मेले की रौनक दोगुनी बढ़ जाती है। हमारे घर से दशहरा मैदान की दूरी लगभग 1 कि.मी. होगी, इसलिए हम सायं 7 बजे घर से पैदल मार्च करते हुए रंग-बिरंगी रोशनी में नहाये दशहरा मैदान पहुंचे तो लगा शहर में जैसे वसंत आ गया हो।
          मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने मां शारदा भवानी के जगमगाते दरबार की सुंदर झाँकी के साथ उनकी गाथा के गूंजते गीत कानों में पड़े, तो रास्ते की थकान पल भर में काफूर हो गई। मेला लोगों से ठसाठस भरा पड़ा था। हम भी चींटी की चाल से धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले गए। मेले में जिधर नजर घुमाओ उधर लोग ही लोग नजर आ रहे थे। मेला कार्यालय से लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से कभी किसी बच्चे के गुम होने की सूचना तो कभी जेबकतरों से सावधान रहने और अपने-अपने सामान की सुरक्षा की उद्घोषणा की जा रही थी।
मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के साथ छोटे मध्यम हर तरह की दुकानों के बीच-बीच छोटी-छोटी दुकान जैसे-पानी पूरी वाला, बच्चों के रंग-बिरंगे खेल-खिलौने बेचने वाला, इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाला, गुब्बारे वाला, लाइलप्पा वाला, जो व्यक्ति कम अपने आप में दुकान ज्यादा थे, भरे-पटे थे। मेले में घरेलू उपयोग में आने वाले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक, साज-सज्जा एवं विभिन्न प्रकार के फर्नीचर भी अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे।  मेले में इस बार प्रॉपर्टी फेयर का भव्य व आकर्षक डोम भी देखने को मिला, जिसमें कई लोग बिल्डर्स के प्रोजेक्ट में फ्लैट, डुप्लेक्स, प्लॉट, बंगले, ऑफिस व दुकान की जानकारी एवं बुकिंग करते हुए मिले। दो एवं चार पहिए वाहनों के शोरूम में भी अच्छी खासी भीड़ थी। मेले में कुछ लोग घरेलू सामान की खरीददारी कर रहे थे तो कुछ लोग कई प्रकार के अचार और चूरन की गोलियां बेचने वाली दुकान पर मुफ्त स्वाद चखने वालों की कतार में बड़े ही अनुशासित ढंग से अपनी बारी का इंतजार करते नज़र आ रहे थे। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से एक स्टॉल पर शासकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय द्वारा शिविर लगाकर निःशुल्क जांच की जा रही थी।         
मेला जाकर झूले न झूले तो लगता है, कुछ छूट सा गया है। नए-पुराने कई प्रकार के झूले हमारा इंतजार कर रहे थे। दो-तीन अत्याधुनिक झूला झूलने के बाद लगा मजा नहीं आया तो अपने पुराने ऊंचे डिब्बे वाले झूले की टिकट खरीदी और उसमें जा बैठे। कुछ देर बाद धीरे-धीरे घूमने के बाद हम आसमान से बातें करने लगे। जब-जब झूला तेजी से ऊपर से नीचे आता, तब-तब बच्चे और दूसरे लोग चिल्लाने लगते, उन्हें डर के साथ मजा भी खूब आ रहा था। लगभग 10 चक्कर लगाने के बाद जब धीरे-धीरे झूला रूका तो एक-एक करके लोग उससे उतरने लगे तब सुअवसर जानकर मैंने झट से पूरे मेले की 4-5 तस्वीरें धड़ाघड़ खींच मारी।
          मेले में बच्चों की फरमाईश करतब देखने की हुई तो मौत का कुंआ और जासूसी कुत्तों के कारनामे देखे। पेट की खातिर इंसान क्या-क्या नहीं करता है। एक तरफ मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर 2 मोटर सायकिल और 2 कारों को एक साथ घूं-घूं की जोरदार आवाज के साथ करतब दिखाते आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सरपट भागते देखते हुए रोंगटे खड़े हो गए तो दूसरी ओर एक बड़े से पांडाल में रिंग मास्टर के इशारों पर दर्शकों की वाहवाही और तालियों के बीच जासूसी कुत्तों के अजब-गजब कारनामे देखकर सुखद आश्चर्य हुआ।
         मेले में गए और वहां कुछ चटपटा खाने का मन न होता हो, ऐसा कैसे हो सकता है! उसके बिना तो मेले सैर अधूरी रहती है। यहां भी खाने-पीने की छोटी-बड़ी कई दुकानें सजी मिली, जिनमें लोग जाने क्या-क्या और कितना-कितना खाए जा रहे थे। लेकिन इस बीच एक जो अच्छी बात थी कि बाहर गंदगी देखने को नहीं मिली। लोगों को खाते देख और खाने-खजाने के स्टॉलों से आती सुंगध से पेट में चूहे कूदने लगे तो हमने भी जलेबी, चाट, मसाला डोसा और पनीर कुलच्छा खाया फिर गरमागर्म कॉफी पीने के बाद मेले के सांस्कृतिक मंच की ओर रूखसत किया। मंच पर राजस्थानी लोक संगीत की जुगलबंदी में मन काफी देर तक रमा रहा।
        मेले में बड़े-छोटे, रईस-गरीब सभी तरह के लोग घूम-फिर रहे थे। जैसा कि हर मेले में देखने को मिलता है कि गरीब लोग अपेक्षाकृत ज्यादा खुश नजर आते हैं, यहां भी देखने को मिला। कई युवक बेमतलब इधर-उधर से मटरगस्ती कर रहे थे। दुनिया फैशन की मारी है यह बात कुछ मॉडर्न टाईप लोगों को देख सच होते दिखा, जो काफी ठंड के बावजूद भी बिना गर्म कपड़े पहने, महीन वस्त्र धारण किए थे, लेकिन उनकी स्फूर्ति देखते ही बन रही थी। मेला कई वर्षों से अपने भूले-बिसरे लोगों से मिलने का भी एक सुलभ माध्यम भी है। इसका अहसास मेले में इधर-उधर घूमते-घामते, बीच-बीच में अपने कई भूले-बिसरे लोगों से मिलकर, उनसे दो-चार बातें करके सहज रूप में देखने को  मिला। यह अलग बात है कि बच्चों को मेला घूमना था, इसलिए बीच-बीच में उनकी टोकाटाकी चलती रही।
          भोपाल मेले का यह प्रशंसनीय बात है कि आयोजकों द्वारा प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें भजन संध्या, किसी फिल्म स्टार या विख्यात पार्श्व गायक के नाम से नाईट, मिक्स बॉलीबुड नाइट, अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, संगीतमय संध्या, नाट्य प्रस्तुति, मैजिक शो, लाफ्टर शो, कव्वाली, देशभक्ति गीत शामिल होते हैं। इसके अलावा भी चित्रकला, नृत्य प्रतियोगिता आदि आयोजन भी मेले की रौनक बढ़ाते हैं।
...कविता रावत

मकर-संक्रांति पर्व

मकर-संक्रांति पर्व

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। सूर्य के चक्रण मार्ग में कुल 27 नक्षत्र तथा उनकी 12 राशियां क्रमशः मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन आती हैं। किसी मास की जिस तिथि को सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रान्ति कहा जाता है। संक्रांति का अर्थ ही सूर्य का एक राशि से अन्य राशि में जाना होता है। सूर्य 12 मास में 12 राशियों में चक्कर लगाता है, जिस दिन सूर्य मेष आदि राशियों का भ्रमण करता हुआ मकर राशि में प्रवेश करता है, उस दिन को मकर-संक्रांति कहा जाता है।
         उत्तरायण और दक्षिणायन सूर्य के संक्रमण में दो महत्वूपर्ण संयोग हैं। सूर्य 6 मास उत्तरायण और 6 माह दक्षिणायन में रहता है। उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर तथा दक्षिणायन-काल में दक्षिण की ओर मुड़ता-सा दिखाई देता है। इसीलिए उत्तरायण काल की दशा में दिन बड़ा और रात छोटी तथा दक्षिणायन की दशा में रात बड़ी और दिन छोटा होता है। मकर-संक्रांति में सूर्य उत्तरायण एवं कर्क-संक्रांति में दक्षिणायन की ओर गमन करता है।  मकर संक्रांति सूर्य उपासना का पर्व है। सूर्य को कृषि का देवता माना जाता है। सूर्य का तेज ताप अन्न को पकाता है, समृद्ध करता है, इसीलिए उसका एक नाम ’पूपा’ अर्थात पुष्ट करने वाला भी है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पूजा करके किसान सूर्य देव के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं।
तमिलनाडु में मकर-संक्रांति को पोंगल पर्व रूप में मनाया जाता है। इसे वे द्रविड़ सभ्यता की उपज मानते हैं। यही कारण है कि द्रविड़ लोग इसे धूम-धाम से मनाते हैं। मद्रास में पोंगल ही ऐसा पर्व है जिसे सभी वर्ग के लोग मनाते हैं। पंजाब में लोहड़ी पर्व मकर-संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है। यह हंसी-खुशी और उल्लास का विशिष्ट पर्व है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर लकड़ियां एकत्रित कर जलाई जाती हैं। तिलों, मक्की की खीलों से अग्नि-पूजन की परम्परा है। अग्नि के चारों ओर नाचना-गाना पर्व के उल्लास का प्रतीक है। प्रत्येक पंजाबी परिवार में नव-वधू या नव-शिशु की पहली लोहड़ी को विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। 
उत्तर-भारत में इस पर्व पर गंगा, यमुना अथवा पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान तथा तिल, गुड़, खिचड़ी आदि दान देने का महत्व है। तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर (कलकत्ता) में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है, जहां देश के अन्य प्रांतों से भी हजारों तीर्थयात्री पहुंचते हैं। शीत ऋतु के लिए तिल, गुड़, मेवा आदि बलबर्द्धक पदार्थ हैं। इनके सेवन से शरीर पुष्ट होता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस शीत ऋतु में तिल, गुड़ और गर्म भोजन का सेवन नहीं करता, वह मंद भागी होता है। संक्रांति पर्व पर तिल, गुड़, मेवा दान की प्रथा शायद इसीलिए रही है कि कोई मंद भागी न रहे।

सभी ब्लॉगर्स साथियों और सुधि पाठकों को मकर संक्रांति, पोंगल,माघी,बिहू पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

नववर्ष में महक उठे......

नववर्ष में महक उठे......

तन-मन में रहे सदा, माटी की सौंधी गंध
कर्मों में गूंजे सदा, भारतीयता के छंद
जन-जन से हो उल्लास, प्रेम के अनुबंध
नववर्ष में महक उठे, घर-घर ये मकरंद
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कविता रावत की ओर से आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!


अपने-पराये का भेद

अपने-पराये का भेद

लाठी मारने से पानी जुदा नहीं होता है।
हर पंछी को अपना घोंसला सुन्दर लगता है।।

शुभ कार्य की शुरुआत अपने घर से की जाती है।
पहले अपने फिर दूसरे घर की आग बुझाई जाती है।।

दूसरे के भरे बटुए से अपनी जेब के थोड़े पैसे भले होते हैं।
समझदार पराया महल देख अपनी झोंपड़ी नहीं गिराते हैं।।

पड़ोसी की फसल अपनी फसल से बढ़िया दिखाई देती है।
बहुधा पराई चीज़ अपनी से ज्यादा आकर्षक नजर आती है।।

जूते में पड़े कंकर की चुभन को कोई दूसरा नहीं जानता है।
कांटा जिसे भी चुभा हो वही उसकी चुभन समझ सकता है।।

अपना सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता है।
जो दूसरों का भाग्य सराहता है अपने भाग्य को कोसता है।।


 कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

आजाद हिन्द फौज के सिपाही और संगीतकार रहे कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने ही भारत के राष्ट्र गान “जन गण  मन” की धुन बनाई थी। वे मूलतः पिथौरागढ़ जनपद के मूनाकोट गांव के मूल निवासी थे, उनके दादा जमनी चंद जी १८९० के आस-पास हिमाचल प्रदेश में जाकर बस गये थे।
प्रस्तुत है एक पोस्टर के माध्यम से हमारे राष्ट्रगान के धुन निर्माता के बारे में .......




भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

बिना साहस कोई ऊँचा पद प्राप्त नहीं कर पाता है।
निराश होने पर कायर में भी साहस आ जाता है।।

मुर्गा अपने दड़बे पर बड़ा दिलेर होता है।
कुत्ता अपनी गली में शेर बन जाता है।।

शेर की मांद में घुसने पर ही उसका बच्चा पकड़ा जा सकता है।
स्वयं को सुरक्षित देखकर कायर अपने दुश्मन को ललकारता है।।

साहस के बल पर बहुत बड़े डर को भी छिपा सकते हैं।
कायर अपनी मौत से पहले कई बार मरते हैं।।

लज्जित होकर जीने से सम्मानपूर्वक मरना भला होता है।
भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है।।

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
जीने से बेजार था दिल
तुम बहार बन के आ गए

ख़ुशी होती है क्या जिंदगी में
न थी इसकी खबर मन को
जब से तुम मिले प्यार से
लगता पा लिया गगन को
सूनी फुलवारी में तुम
तुम बहार बन के आ गए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए

दिल की बस्ती में राज तेरा
तुम मुस्कान बन होंठों पर छाए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
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आज वैवाहिक जीवन की 21वीं वर्षगांठ है तो सोचा कुछ लिखती चलूँ .. ऐसे में प्रेम पातियाँ बड़े काम आती हैं  ......कविता रावत
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल

यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल


विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

गिरि शिखरों से घिरा हुआ है
तृण कुसुमों से हरा हुआ है
विविध वृक्षों से भरा हुआ है
जैसे शीशम, सेब और साल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
 
गिरी गर्त से भानु चमकता
मानो अग्निवृत दहकता
बहुरंगी पुष्पाहार महकता
ऐसा मनोहर प्रात:काल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

शीतल हवा यहां है चलती
निर्मल, निश्चल नदियां बहती
सबको सहज बनने को कहती
शीत विमल की ये हैं मिसाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

शुभ्र हिमालय झांक रहा है
विश्व सत्य को आंक रहा है
शांति प्रियता मांग रहा है
जो भारत का ताज विशाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

बद्री केदार के मंदिर पावन
उपवन यहां के हैं मनभावन
मानो वर्ष पर्यंत हो सावन
यह प्रकृति की सुंदर चाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

नहीं कलह और शोर यहां है
नहीं लुटेरे चोर यहां हैं
लगता निशदिन भोर यहां है
शांति एकता का यह हाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

जगह जगह खुलते औषधालय
नवनिर्मित हो रहे विद्यालय
जागरूक गढ़वाली की लय
भौतिक विकास करता गढ़वाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

हो रहा अविद्या का जड़मर्दन
फैले नव विहान का वर्जन
नव शैलों का हो रहा सृजन
गिरि चलें विकास की ले मशाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल।।

विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

       -जितेंद्र मोहन पंत 

       -जितेंद्र मोहन पंत का 31 दिसंबर 1961 को गढ़वाल के स्योली गांव में जन्म हुआ । 11 मई 1999 को 37 वर्ष की  अल्पायु में उनका देहावसान हो गया।  उनकी उपर्युक्त कविता 1978 में लिखी गयी। 

9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड की स्थापना हुई।   

                     
बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है

बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है


बड़े मुर्गे की तर्ज पर छोटा भी बांग लगाता है।
एक खरबूजे को देख दूसरा भी रंग बदलता है।।

एक कुत्ता कोई चीज देखे तो सौ कुत्ते उसे ही देखते हैं।
बड़े पंछी के जैसे ही छोटे-छोटे पंछी भी गाने लगते हैं।।

जिधर एक भेड़ चली उधर सारी भेड़ चल पड़ती है।
एक अंगूर को देख दूजे पर जामुनी रंगत चढ़ती है।।

जिसे कभी दर्द न हुआ वह भी सहनशीलता का पाठ पढ़ा लेता है।
अपना पेट भरा हो तो भूखे को उपदेश देना बहुत सरल होता है।।।

नेक सलाह जब भी मिले वही उसका सही समय होता है।
बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है।।

...कविता रावत 

आई दिवाली आई

आई दिवाली आई

दशहरा गया दिवाली आई
हो गई घर की साफ-सफाई
व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर
लोग देने लगे बधाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

देखकर दुकानें दुल्हन सी सजी-धजी
मैं भी सरपट दौड़ी-भागी बाजार गई
खरीद लाई नये लत्ते-कपड़े घर भर के
अब कैसे कहूँ बड़ी कमरतोड़ है महंगाई
देख खुश हुई मुरझाये चेहरों की रौनक
बेरौनक बाजार में रंगत छाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

लगी है घर-दफ्तर की भागम-भाग
पर लक्ष्मी पूजन सामग्री भी लाना है
दीए, खील-बताशे, मिठाई, बम-पटाखे
उफ! लंबी सूची, पकवान भी बनाना है
दीपक बन उजियारा फैलाओ जग में
बात ये बड़े-बुजुर्गो ने है बताई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

सबकी अपनी-अपनी दिवाली
सबके अपने-अपने ढँग हैं
धूम-धड़ाका देख तमाशा
जाने छिपे कितने रंग हैं
सबका अपना हिसाब-किताब यहाँ
सीधा हो या जुआड़ी-नशेड़ी भाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई


ज्योति पर्व का प्रकाश आप सभी के जीवन को सुख, समृद्धि  एवं वैभव से आलोकित करे, इसी शुभकामना के साथ...... कविता रावत



कारगर है डेंगू का एलोपैथिक के साथ आयुर्वेदिक उपाय

कारगर है डेंगू का एलोपैथिक के साथ आयुर्वेदिक उपाय

घर के आसपास पानी जमा न होने, शरीर ढंककर सोने, मच्छरदानी और मास्क्यूटो क्वायल  लगाने, टंकियों व कूलर में जमा पानी हर दिन बदलने से लेकर हर दिन बगीचे में रखे गमलों में पानी जमा न होने देने और उन्हें सड़ने से बचाए रखने के उपरांत भी जाने कैसे मेरे शिवा को पिछले सप्ताह डेंगू हुआ तो उसे एक निजी अस्पताल में 5 दिन तक भर्ती रहना पड़ा। इस दौरान अस्पताल में यदि मुझे कोई मच्छर नजर आता तो मेरे दोनों हाथ यंत्रवत् खड़े हो उठते और उसका खात्मा करके ही जब वापस आते तब मुझे चैन मिलता। सुना था कि डेंगू के मच्छर सामान्यतः दिन में काटते हैं, इसलिए दिन में कुछ ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ी। वैसे भी दिन में एक मिनट की भी फुर्सत नहीं मिली। एक तरफ एलोपैथिक इलाज जिसमें मेरे शिवा पर ग्लूकोज के साथ एक दिन में लगभग 12 इंजेक्शन लगाए जा रहे थे तो दूसरी ओर हमारा शहद के साथ पपीते के पत्तों और गिलोय के तने का रस, नारियल पानी, मौसम्बी और अनार का रस, बकरी का दूध और कीवी फल आदि द्वारा आयुर्वेदिक उपचार लगातार चलता रहा। इस दौरान बच्चे को इतने कडुवे घूँट पिलाना बड़ा कटु अनुभव रहा। खैर अब जबकि मेरा शिवा पूर्ण रूप से स्वस्थ है तो सोचा क्यों न ब्लॉग पर डेंगू के विषय में लिखूं।          
         बरसात के बाद नमी के कारण वायरस और बैक्टीरिया के साथ ही मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने का उपयुक्त समय होता है। इसके साथ-साथ प्रदूषण, धूल मिट्टी का स्तर बढ़ने और प्रदूषित खाना व पानी से भी संक्रमण जैसे कि सर्दी, खांसी, जुकाम या बुखार, सांस से जुड़ी बीमारियां या एलर्जी होने की आशंका बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।  माना जाता है कि डेंगू मादा मच्छर के काटने से होता है क्योंकि इन्हें अंडे देने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है, जो वे इंसान के शरीर से पूरी करते हैं। जबकि नर मच्छर प्रोटीन पौधों से लेते हैं। डेंगू को क्लासिकल बुखार और हेमरेजिक बुखार इन दो लक्षणों से पहचाना जाता है। क्लासिकल बुखार को सामान्य बुखार माना जाता है। इसमें शरीर गर्म होने लगता है तथा जोड़ों में दर्द और उल्टी करने जैसा जी करता है। तीन दिन तक यदि यही स्थिति बनी रहती है तो इसे घातक माना जाता है। हेमरेजिक बुखार डेंगू का खतरनाक पड़ाव माना जाता है। इसमें शरीर में लाल और गुलाबी निशान पड़ जाते हैं। नाक से खून बहना और खून की उल्टी होना इसके मुख्य लक्षण माने जाते हैं। इसमें मच्छर के काटने पर शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और शरीर ठंडा हो जाता है एवं प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिरने लगती है। 
         कहा जाता है कि डेंगू फीवर शब्द पहले डेंडी फीवर था, जिसे वेस्टइंडीज में गुलाम बनाए गए लोगों के नाम दिया था। इसका मतलब हड्डियों में उठने वाले दर्द से है। डेंगू का पहला प्रकरण चीन की मेडिकल इनसाइक्लोपीडिया ‘जिन डायनेस्टी’ (265-420 एडी) में मिलता है। वर्ष 1980 के लगभग अफ्रीका, उत्तर अमेरिका और एशिया में लोगों में एक जैसी बीमारी के लक्षण देखे गए। इसके बाद कई मेडिकल रिसर्च हाने के बाद अंततः वर्ष 1779 में इसे एक बीमारी माना गया।
         वर्तमान में एलोपैथी में अन्य खतरनाक बीमारियों की तरह ही समय पर पता चलने पर डेंगू का इलाज उपलब्ध है। लेकिन यदि इसके साथ-साथ आयुर्वेदिक इलाज भी किया जाता है तो निश्चित ही बड़ी जल्दी इस बीमारी से व्यक्ति को निजात मिलते देर नहीं लगती है। डेंगू का आयुर्वेदिक उपचार के तहत् पहले कब्जी दूर करने के लिए हरड़े का चूर्ण एक चम्मच रात को गर्म पानी में लेने और मुनक्का भिगोकर खाने को दिया जाता है। शरीर में बाहरी त्वचा पर कर्पूर, पानी में मिलाकर लगाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही तुलसी के पांच पत्ते, नीम के पांच पत्ते पीसकर उसकी तीन गोली बनाकर एक-एक गोली दिन में तीन बार लगातार 5 दिन तक पानी से लेने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही हल्दी आधा चम्मच, दो काली मिर्च, तुलसी के दो पत्तों को 250 ग्राम पानी में उबालकर आधा पानी शेष रहने पर नींबू के रस या चीनी के साथ मिलाकर पीने, बिना दूध की नींबू की चाय पीने, एक कप गर्म दूध में हल्दी दो ग्राम, तुलसी के तीन पत्ते पीसकर मिलाकर दिन में दो बार लेने से लाभ होता है।
          इसके अतिरिक्त तुलसी के पत्तों का रस पाव चम्मच, शहद पाव चम्मच, एक चुटकी सौंठ के मिश्रण को दिन में तीन बार लेने, नींम की सात कोंपल, पांच काली मिर्च पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाकर दिन में तीन बार लेने और सौंठ, काली मिर्च, पीपल, अजवायन, तुलसी के पत्ते, नीम के तीन-तीन पत्तों को लेकर उन्हें पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाते हुए थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर तीन बार लेने से विशेष लाभ होता है।
           डेंगू ग्रसित व्यक्ति को खान-पान में परहेज करना बहुत जरूरी है। इसमें बीमार व्यक्ति को खिचड़ी, गेहूं का दलिया, पतली रोटी, मूंग और मसूर की दाल, बकरी का दूध, मुनक्का, नींबू की चाय, मौसम्बी, सेब, पपीता, अनार आदि खाना चाहिए एवं कुछ दिन चावल, तली चीजें, मिठाई, फ्रिज में रखी हुई चीजें, आमचूर, इमली, गरिष्ठ भोजन, बाजार की तली व अशुद्ध चीजें नहीं खानी चाहिए।
          डेंगू मच्छरों द्वारा फैलाया जाने वाला रोग है। इसलिए इलाज से बेहतर है कि इसकी रोकथाम के उपाय कर लिए जायें, जिससे इन्हें पनपने का अवसर न मिलें। इसके लिए हमारे प्राचीन आयुर्वेद के जानकारों ने मच्छरों को दूर भगाने के लिए घर में तुलसी, गेंदा, हार्समिंट, लेमन बाल्म, लेवेंडर, रोजमेरी और लौंग के पौधे लगाने की सलाह दी है, क्योंकि इनकी गंध मच्छरों को नहीं सुहाती है। अकेले विडालपर्णास के पौधे में मच्छरों को भगाने वाले क्वाइल  और स्प्रे से कहीं ज्यादा रसायन होना बताया गया है, जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं होता है।