भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल स्थित नार्थ टी.टी.नगर में न्यू मार्केट के पास एक विशाल मैदान है, जिसे दशहरा मैदान के नाम से जाना जाता है। इस मैदान में दशहरा के दिन हजारों की संख्या में शहरवासी एकत्रित होकर रावण के साथ कुम्भकरण और मेघनाथ का पुतला दहन कर दशहरा मनाते हैं। यहाँ हर वर्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक भोपाल उत्सव मेला लगता है। अभी जब मेले की गूँज बच्चों के कानों तक सुनाई दी तो उन्होंने भी 25 जनवरी 2017 को पूर्व घोषणा कर दी कि वे भी 26 जनवरी को भोपाल उत्सव मेला देखने जाएंगे। यद्यपि मैंने मेले से पहले ही कुछ आवश्यक खरीददारी कर ली थी, फिर भी बच्चों की जिद्द के चलते यही सोचकर कि चलिए मुख्य परीक्षा के पहले घूम-फिरकर उनका मन हल्का हो जायेगा, निश्चित किया। तयशुदा कार्यक्रम के तहत् 26 जनवरी के दिन सुबह जल्दी उठकर ऑफिस में झंडा वंदन के बाद घर लौटकर जल्दी से चाय-नाश्ता तैयार करते-करते टेलीविजन पर गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय समारोह देखकर गणतंत्र दिवस मनाया गया।
         गांव में भले ही दिन में मेले लगते हैं, लेकिन शहर में अधिकांश मेले रात को ही लगते हैं, क्योंकि रात को बिजली की आकर्षक साज-सज्जा से मेले की रौनक दोगुनी बढ़ जाती है। हमारे घर से दशहरा मैदान की दूरी लगभग 1 कि.मी. होगी, इसलिए हम सायं 7 बजे घर से पैदल मार्च करते हुए रंग-बिरंगी रोशनी में नहाये दशहरा मैदान पहुंचे तो लगा शहर में जैसे वसंत आ गया हो।
          मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने मां शारदा भवानी के जगमगाते दरबार की सुंदर झाँकी के साथ उनकी गाथा के गूंजते गीत कानों में पड़े, तो रास्ते की थकान पल भर में काफूर हो गई। मेला लोगों से ठसाठस भरा पड़ा था। हम भी चींटी की चाल से धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले गए। मेले में जिधर नजर घुमाओ उधर लोग ही लोग नजर आ रहे थे। मेला कार्यालय से लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से कभी किसी बच्चे के गुम होने की सूचना तो कभी जेबकतरों से सावधान रहने और अपने-अपने सामान की सुरक्षा की उद्घोषणा की जा रही थी।
मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के साथ छोटे मध्यम हर तरह की दुकानों के बीच-बीच छोटी-छोटी दुकान जैसे-पानी पूरी वाला, बच्चों के रंग-बिरंगे खेल-खिलौने बेचने वाला, इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाला, गुब्बारे वाला, लाइलप्पा वाला, जो व्यक्ति कम अपने आप में दुकान ज्यादा थे, भरे-पटे थे। मेले में घरेलू उपयोग में आने वाले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक, साज-सज्जा एवं विभिन्न प्रकार के फर्नीचर भी अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे।  मेले में इस बार प्रॉपर्टी फेयर का भव्य व आकर्षक डोम भी देखने को मिला, जिसमें कई लोग बिल्डर्स के प्रोजेक्ट में फ्लैट, डुप्लेक्स, प्लॉट, बंगले, ऑफिस व दुकान की जानकारी एवं बुकिंग करते हुए मिले। दो एवं चार पहिए वाहनों के शोरूम में भी अच्छी खासी भीड़ थी। मेले में कुछ लोग घरेलू सामान की खरीददारी कर रहे थे तो कुछ लोग कई प्रकार के अचार और चूरन की गोलियां बेचने वाली दुकान पर मुफ्त स्वाद चखने वालों की कतार में बड़े ही अनुशासित ढंग से अपनी बारी का इंतजार करते नज़र आ रहे थे। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से एक स्टॉल पर शासकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय द्वारा शिविर लगाकर निःशुल्क जांच की जा रही थी।         
मेला जाकर झूले न झूले तो लगता है, कुछ छूट सा गया है। नए-पुराने कई प्रकार के झूले हमारा इंतजार कर रहे थे। दो-तीन अत्याधुनिक झूला झूलने के बाद लगा मजा नहीं आया तो अपने पुराने ऊंचे डिब्बे वाले झूले की टिकट खरीदी और उसमें जा बैठे। कुछ देर बाद धीरे-धीरे घूमने के बाद हम आसमान से बातें करने लगे। जब-जब झूला तेजी से ऊपर से नीचे आता, तब-तब बच्चे और दूसरे लोग चिल्लाने लगते, उन्हें डर के साथ मजा भी खूब आ रहा था। लगभग 10 चक्कर लगाने के बाद जब धीरे-धीरे झूला रूका तो एक-एक करके लोग उससे उतरने लगे तब सुअवसर जानकर मैंने झट से पूरे मेले की 4-5 तस्वीरें धड़ाघड़ खींच मारी।
          मेले में बच्चों की फरमाईश करतब देखने की हुई तो मौत का कुंआ और जासूसी कुत्तों के कारनामे देखे। पेट की खातिर इंसान क्या-क्या नहीं करता है। एक तरफ मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर 2 मोटर सायकिल और 2 कारों को एक साथ घूं-घूं की जोरदार आवाज के साथ करतब दिखाते आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सरपट भागते देखते हुए रोंगटे खड़े हो गए तो दूसरी ओर एक बड़े से पांडाल में रिंग मास्टर के इशारों पर दर्शकों की वाहवाही और तालियों के बीच जासूसी कुत्तों के अजब-गजब कारनामे देखकर सुखद आश्चर्य हुआ।
         मेले में गए और वहां कुछ चटपटा खाने का मन न होता हो, ऐसा कैसे हो सकता है! उसके बिना तो मेले सैर अधूरी रहती है। यहां भी खाने-पीने की छोटी-बड़ी कई दुकानें सजी मिली, जिनमें लोग जाने क्या-क्या और कितना-कितना खाए जा रहे थे। लेकिन इस बीच एक जो अच्छी बात थी कि बाहर गंदगी देखने को नहीं मिली। लोगों को खाते देख और खाने-खजाने के स्टॉलों से आती सुंगध से पेट में चूहे कूदने लगे तो हमने भी जलेबी, चाट, मसाला डोसा और पनीर कुलच्छा खाया फिर गरमागर्म कॉफी पीने के बाद मेले के सांस्कृतिक मंच की ओर रूखसत किया। मंच पर राजस्थानी लोक संगीत की जुगलबंदी में मन काफी देर तक रमा रहा।
        मेले में बड़े-छोटे, रईस-गरीब सभी तरह के लोग घूम-फिर रहे थे। जैसा कि हर मेले में देखने को मिलता है कि गरीब लोग अपेक्षाकृत ज्यादा खुश नजर आते हैं, यहां भी देखने को मिला। कई युवक बेमतलब इधर-उधर से मटरगस्ती कर रहे थे। दुनिया फैशन की मारी है यह बात कुछ मॉडर्न टाईप लोगों को देख सच होते दिखा, जो काफी ठंड के बावजूद भी बिना गर्म कपड़े पहने, महीन वस्त्र धारण किए थे, लेकिन उनकी स्फूर्ति देखते ही बन रही थी। मेला कई वर्षों से अपने भूले-बिसरे लोगों से मिलने का भी एक सुलभ माध्यम भी है। इसका अहसास मेले में इधर-उधर घूमते-घामते, बीच-बीच में अपने कई भूले-बिसरे लोगों से मिलकर, उनसे दो-चार बातें करके सहज रूप में देखने को  मिला। यह अलग बात है कि बच्चों को मेला घूमना था, इसलिए बीच-बीच में उनकी टोकाटाकी चलती रही।
          भोपाल मेले का यह प्रशंसनीय बात है कि आयोजकों द्वारा प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें भजन संध्या, किसी फिल्म स्टार या विख्यात पार्श्व गायक के नाम से नाईट, मिक्स बॉलीबुड नाइट, अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, संगीतमय संध्या, नाट्य प्रस्तुति, मैजिक शो, लाफ्टर शो, कव्वाली, देशभक्ति गीत शामिल होते हैं। इसके अलावा भी चित्रकला, नृत्य प्रतियोगिता आदि आयोजन भी मेले की रौनक बढ़ाते हैं।
...कविता रावत

मकर-संक्रांति पर्व

मकर-संक्रांति पर्व

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। सूर्य के चक्रण मार्ग में कुल 27 नक्षत्र तथा उनकी 12 राशियां क्रमशः मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन आती हैं। किसी मास की जिस तिथि को सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रान्ति कहा जाता है। संक्रांति का अर्थ ही सूर्य का एक राशि से अन्य राशि में जाना होता है। सूर्य 12 मास में 12 राशियों में चक्कर लगाता है, जिस दिन सूर्य मेष आदि राशियों का भ्रमण करता हुआ मकर राशि में प्रवेश करता है, उस दिन को मकर-संक्रांति कहा जाता है।
         उत्तरायण और दक्षिणायन सूर्य के संक्रमण में दो महत्वूपर्ण संयोग हैं। सूर्य 6 मास उत्तरायण और 6 माह दक्षिणायन में रहता है। उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर तथा दक्षिणायन-काल में दक्षिण की ओर मुड़ता-सा दिखाई देता है। इसीलिए उत्तरायण काल की दशा में दिन बड़ा और रात छोटी तथा दक्षिणायन की दशा में रात बड़ी और दिन छोटा होता है। मकर-संक्रांति में सूर्य उत्तरायण एवं कर्क-संक्रांति में दक्षिणायन की ओर गमन करता है।  मकर संक्रांति सूर्य उपासना का पर्व है। सूर्य को कृषि का देवता माना जाता है। सूर्य का तेज ताप अन्न को पकाता है, समृद्ध करता है, इसीलिए उसका एक नाम ’पूपा’ अर्थात पुष्ट करने वाला भी है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पूजा करके किसान सूर्य देव के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं।
तमिलनाडु में मकर-संक्रांति को पोंगल पर्व रूप में मनाया जाता है। इसे वे द्रविड़ सभ्यता की उपज मानते हैं। यही कारण है कि द्रविड़ लोग इसे धूम-धाम से मनाते हैं। मद्रास में पोंगल ही ऐसा पर्व है जिसे सभी वर्ग के लोग मनाते हैं। पंजाब में लोहड़ी पर्व मकर-संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है। यह हंसी-खुशी और उल्लास का विशिष्ट पर्व है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर लकड़ियां एकत्रित कर जलाई जाती हैं। तिलों, मक्की की खीलों से अग्नि-पूजन की परम्परा है। अग्नि के चारों ओर नाचना-गाना पर्व के उल्लास का प्रतीक है। प्रत्येक पंजाबी परिवार में नव-वधू या नव-शिशु की पहली लोहड़ी को विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। 
उत्तर-भारत में इस पर्व पर गंगा, यमुना अथवा पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान तथा तिल, गुड़, खिचड़ी आदि दान देने का महत्व है। तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर (कलकत्ता) में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है, जहां देश के अन्य प्रांतों से भी हजारों तीर्थयात्री पहुंचते हैं। शीत ऋतु के लिए तिल, गुड़, मेवा आदि बलबर्द्धक पदार्थ हैं। इनके सेवन से शरीर पुष्ट होता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस शीत ऋतु में तिल, गुड़ और गर्म भोजन का सेवन नहीं करता, वह मंद भागी होता है। संक्रांति पर्व पर तिल, गुड़, मेवा दान की प्रथा शायद इसीलिए रही है कि कोई मंद भागी न रहे।

सभी ब्लॉगर्स साथियों और सुधि पाठकों को मकर संक्रांति, पोंगल,माघी,बिहू पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

नववर्ष में महक उठे......

नववर्ष में महक उठे......

तन-मन में रहे सदा, माटी की सौंधी गंध
कर्मों में गूंजे सदा, भारतीयता के छंद
जन-जन से हो उल्लास, प्रेम के अनुबंध
नववर्ष में महक उठे, घर-घर ये मकरंद
......................
कविता रावत की ओर से आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!


अपने-पराये का भेद

अपने-पराये का भेद

लाठी मारने से पानी जुदा नहीं होता है।
हर पंछी को अपना घोंसला सुन्दर लगता है।।

शुभ कार्य की शुरुआत अपने घर से की जाती है।
पहले अपने फिर दूसरे घर की आग बुझाई जाती है।।

दूसरे के भरे बटुए से अपनी जेब के थोड़े पैसे भले होते हैं।
समझदार पराया महल देख अपनी झोंपड़ी नहीं गिराते हैं।।

पड़ोसी की फसल अपनी फसल से बढ़िया दिखाई देती है।
बहुधा पराई चीज़ अपनी से ज्यादा आकर्षक नजर आती है।।

जूते में पड़े कंकर की चुभन को कोई दूसरा नहीं जानता है।
कांटा जिसे भी चुभा हो वही उसकी चुभन समझ सकता है।।

अपना सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता है।
जो दूसरों का भाग्य सराहता है अपने भाग्य को कोसता है।।


 कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

आजाद हिन्द फौज के सिपाही और संगीतकार रहे कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने ही भारत के राष्ट्र गान “जन गण  मन” की धुन बनाई थी। वे मूलतः पिथौरागढ़ जनपद के मूनाकोट गांव के मूल निवासी थे, उनके दादा जमनी चंद जी १८९० के आस-पास हिमाचल प्रदेश में जाकर बस गये थे।
प्रस्तुत है एक पोस्टर के माध्यम से हमारे राष्ट्रगान के धुन निर्माता के बारे में .......




भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

बिना साहस कोई ऊँचा पद प्राप्त नहीं कर पाता है।
निराश होने पर कायर में भी साहस आ जाता है।।

मुर्गा अपने दड़बे पर बड़ा दिलेर होता है।
कुत्ता अपनी गली में शेर बन जाता है।।

शेर की मांद में घुसने पर ही उसका बच्चा पकड़ा जा सकता है।
स्वयं को सुरक्षित देखकर कायर अपने दुश्मन को ललकारता है।।

साहस के बल पर बहुत बड़े डर को भी छिपा सकते हैं।
कायर अपनी मौत से पहले कई बार मरते हैं।।

लज्जित होकर जीने से सम्मानपूर्वक मरना भला होता है।
भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है।।

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
जीने से बेजार था दिल
तुम बहार बन के आ गए

ख़ुशी होती है क्या जिंदगी में
न थी इसकी खबर मन को
जब से तुम मिले प्यार से
लगता पा लिया गगन को
सूनी फुलवारी में तुम
तुम बहार बन के आ गए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए

दिल की बस्ती में राज तेरा
तुम मुस्कान बन होंठों पर छाए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
..........................................................

आज वैवाहिक जीवन की 21वीं वर्षगांठ है तो सोचा कुछ लिखती चलूँ .. ऐसे में प्रेम पातियाँ बड़े काम आती हैं  ......कविता रावत
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल

यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल


विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

गिरि शिखरों से घिरा हुआ है
तृण कुसुमों से हरा हुआ है
विविध वृक्षों से भरा हुआ है
जैसे शीशम, सेब और साल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
 
गिरी गर्त से भानु चमकता
मानो अग्निवृत दहकता
बहुरंगी पुष्पाहार महकता
ऐसा मनोहर प्रात:काल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

शीतल हवा यहां है चलती
निर्मल, निश्चल नदियां बहती
सबको सहज बनने को कहती
शीत विमल की ये हैं मिसाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

शुभ्र हिमालय झांक रहा है
विश्व सत्य को आंक रहा है
शांति प्रियता मांग रहा है
जो भारत का ताज विशाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

बद्री केदार के मंदिर पावन
उपवन यहां के हैं मनभावन
मानो वर्ष पर्यंत हो सावन
यह प्रकृति की सुंदर चाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

नहीं कलह और शोर यहां है
नहीं लुटेरे चोर यहां हैं
लगता निशदिन भोर यहां है
शांति एकता का यह हाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

जगह जगह खुलते औषधालय
नवनिर्मित हो रहे विद्यालय
जागरूक गढ़वाली की लय
भौतिक विकास करता गढ़वाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

हो रहा अविद्या का जड़मर्दन
फैले नव विहान का वर्जन
नव शैलों का हो रहा सृजन
गिरि चलें विकास की ले मशाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल।।

विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल
यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

       -जितेंद्र मोहन पंत 

       -जितेंद्र मोहन पंत का 31 दिसंबर 1961 को गढ़वाल के स्योली गांव में जन्म हुआ । 11 मई 1999 को 37 वर्ष की  अल्पायु में उनका देहावसान हो गया।  उनकी उपर्युक्त कविता 1978 में लिखी गयी। 

9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड की स्थापना हुई।   

                     
बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है

बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है


बड़े मुर्गे की तर्ज पर छोटा भी बांग लगाता है।
एक खरबूजे को देख दूसरा भी रंग बदलता है।।

एक कुत्ता कोई चीज देखे तो सौ कुत्ते उसे ही देखते हैं।
बड़े पंछी के जैसे ही छोटे-छोटे पंछी भी गाने लगते हैं।।

जिधर एक भेड़ चली उधर सारी भेड़ चल पड़ती है।
एक अंगूर को देख दूजे पर जामुनी रंगत चढ़ती है।।

जिसे कभी दर्द न हुआ वह भी सहनशीलता का पाठ पढ़ा लेता है।
अपना पेट भरा हो तो भूखे को उपदेश देना बहुत सरल होता है।।।

नेक सलाह जब भी मिले वही उसका सही समय होता है।
बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है।।

...कविता रावत 

आई दिवाली आई

आई दिवाली आई

दशहरा गया दिवाली आई
हो गई घर की साफ-सफाई
व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर
लोग देने लगे बधाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

देखकर दुकानें दुल्हन सी सजी-धजी
मैं भी सरपट दौड़ी-भागी बाजार गई
खरीद लाई नये लत्ते-कपड़े घर भर के
अब कैसे कहूँ बड़ी कमरतोड़ है महंगाई
देख खुश हुई मुरझाये चेहरों की रौनक
बेरौनक बाजार में रंगत छाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

लगी है घर-दफ्तर की भागम-भाग
पर लक्ष्मी पूजन सामग्री भी लाना है
दीए, खील-बताशे, मिठाई, बम-पटाखे
उफ! लंबी सूची, पकवान भी बनाना है
दीपक बन उजियारा फैलाओ जग में
बात ये बड़े-बुजुर्गो ने है बताई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई

सबकी अपनी-अपनी दिवाली
सबके अपने-अपने ढँग हैं
धूम-धड़ाका देख तमाशा
जाने छिपे कितने रंग हैं
सबका अपना हिसाब-किताब यहाँ
सीधा हो या जुआड़ी-नशेड़ी भाई
आई दिवाली आई
खुशियों की सौगात लाई


ज्योति पर्व का प्रकाश आप सभी के जीवन को सुख, समृद्धि  एवं वैभव से आलोकित करे, इसी शुभकामना के साथ...... कविता रावत



कारगर है डेंगू का एलोपैथिक के साथ आयुर्वेदिक उपाय

कारगर है डेंगू का एलोपैथिक के साथ आयुर्वेदिक उपाय

घर के आसपास पानी जमा न होने, शरीर ढंककर सोने, मच्छरदानी और मास्क्यूटो क्वायल  लगाने, टंकियों व कूलर में जमा पानी हर दिन बदलने से लेकर हर दिन बगीचे में रखे गमलों में पानी जमा न होने देने और उन्हें सड़ने से बचाए रखने के उपरांत भी जाने कैसे मेरे शिवा को पिछले सप्ताह डेंगू हुआ तो उसे एक निजी अस्पताल में 5 दिन तक भर्ती रहना पड़ा। इस दौरान अस्पताल में यदि मुझे कोई मच्छर नजर आता तो मेरे दोनों हाथ यंत्रवत् खड़े हो उठते और उसका खात्मा करके ही जब वापस आते तब मुझे चैन मिलता। सुना था कि डेंगू के मच्छर सामान्यतः दिन में काटते हैं, इसलिए दिन में कुछ ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ी। वैसे भी दिन में एक मिनट की भी फुर्सत नहीं मिली। एक तरफ एलोपैथिक इलाज जिसमें मेरे शिवा पर ग्लूकोज के साथ एक दिन में लगभग 12 इंजेक्शन लगाए जा रहे थे तो दूसरी ओर हमारा शहद के साथ पपीते के पत्तों और गिलोय के तने का रस, नारियल पानी, मौसम्बी और अनार का रस, बकरी का दूध और कीवी फल आदि द्वारा आयुर्वेदिक उपचार लगातार चलता रहा। इस दौरान बच्चे को इतने कडुवे घूँट पिलाना बड़ा कटु अनुभव रहा। खैर अब जबकि मेरा शिवा पूर्ण रूप से स्वस्थ है तो सोचा क्यों न ब्लॉग पर डेंगू के विषय में लिखूं।          
         बरसात के बाद नमी के कारण वायरस और बैक्टीरिया के साथ ही मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने का उपयुक्त समय होता है। इसके साथ-साथ प्रदूषण, धूल मिट्टी का स्तर बढ़ने और प्रदूषित खाना व पानी से भी संक्रमण जैसे कि सर्दी, खांसी, जुकाम या बुखार, सांस से जुड़ी बीमारियां या एलर्जी होने की आशंका बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।  माना जाता है कि डेंगू मादा मच्छर के काटने से होता है क्योंकि इन्हें अंडे देने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है, जो वे इंसान के शरीर से पूरी करते हैं। जबकि नर मच्छर प्रोटीन पौधों से लेते हैं। डेंगू को क्लासिकल बुखार और हेमरेजिक बुखार इन दो लक्षणों से पहचाना जाता है। क्लासिकल बुखार को सामान्य बुखार माना जाता है। इसमें शरीर गर्म होने लगता है तथा जोड़ों में दर्द और उल्टी करने जैसा जी करता है। तीन दिन तक यदि यही स्थिति बनी रहती है तो इसे घातक माना जाता है। हेमरेजिक बुखार डेंगू का खतरनाक पड़ाव माना जाता है। इसमें शरीर में लाल और गुलाबी निशान पड़ जाते हैं। नाक से खून बहना और खून की उल्टी होना इसके मुख्य लक्षण माने जाते हैं। इसमें मच्छर के काटने पर शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और शरीर ठंडा हो जाता है एवं प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिरने लगती है। 
         कहा जाता है कि डेंगू फीवर शब्द पहले डेंडी फीवर था, जिसे वेस्टइंडीज में गुलाम बनाए गए लोगों के नाम दिया था। इसका मतलब हड्डियों में उठने वाले दर्द से है। डेंगू का पहला प्रकरण चीन की मेडिकल इनसाइक्लोपीडिया ‘जिन डायनेस्टी’ (265-420 एडी) में मिलता है। वर्ष 1980 के लगभग अफ्रीका, उत्तर अमेरिका और एशिया में लोगों में एक जैसी बीमारी के लक्षण देखे गए। इसके बाद कई मेडिकल रिसर्च हाने के बाद अंततः वर्ष 1779 में इसे एक बीमारी माना गया।
         वर्तमान में एलोपैथी में अन्य खतरनाक बीमारियों की तरह ही समय पर पता चलने पर डेंगू का इलाज उपलब्ध है। लेकिन यदि इसके साथ-साथ आयुर्वेदिक इलाज भी किया जाता है तो निश्चित ही बड़ी जल्दी इस बीमारी से व्यक्ति को निजात मिलते देर नहीं लगती है। डेंगू का आयुर्वेदिक उपचार के तहत् पहले कब्जी दूर करने के लिए हरड़े का चूर्ण एक चम्मच रात को गर्म पानी में लेने और मुनक्का भिगोकर खाने को दिया जाता है। शरीर में बाहरी त्वचा पर कर्पूर, पानी में मिलाकर लगाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही तुलसी के पांच पत्ते, नीम के पांच पत्ते पीसकर उसकी तीन गोली बनाकर एक-एक गोली दिन में तीन बार लगातार 5 दिन तक पानी से लेने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही हल्दी आधा चम्मच, दो काली मिर्च, तुलसी के दो पत्तों को 250 ग्राम पानी में उबालकर आधा पानी शेष रहने पर नींबू के रस या चीनी के साथ मिलाकर पीने, बिना दूध की नींबू की चाय पीने, एक कप गर्म दूध में हल्दी दो ग्राम, तुलसी के तीन पत्ते पीसकर मिलाकर दिन में दो बार लेने से लाभ होता है।
          इसके अतिरिक्त तुलसी के पत्तों का रस पाव चम्मच, शहद पाव चम्मच, एक चुटकी सौंठ के मिश्रण को दिन में तीन बार लेने, नींम की सात कोंपल, पांच काली मिर्च पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाकर दिन में तीन बार लेने और सौंठ, काली मिर्च, पीपल, अजवायन, तुलसी के पत्ते, नीम के तीन-तीन पत्तों को लेकर उन्हें पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाते हुए थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर तीन बार लेने से विशेष लाभ होता है।
           डेंगू ग्रसित व्यक्ति को खान-पान में परहेज करना बहुत जरूरी है। इसमें बीमार व्यक्ति को खिचड़ी, गेहूं का दलिया, पतली रोटी, मूंग और मसूर की दाल, बकरी का दूध, मुनक्का, नींबू की चाय, मौसम्बी, सेब, पपीता, अनार आदि खाना चाहिए एवं कुछ दिन चावल, तली चीजें, मिठाई, फ्रिज में रखी हुई चीजें, आमचूर, इमली, गरिष्ठ भोजन, बाजार की तली व अशुद्ध चीजें नहीं खानी चाहिए।
          डेंगू मच्छरों द्वारा फैलाया जाने वाला रोग है। इसलिए इलाज से बेहतर है कि इसकी रोकथाम के उपाय कर लिए जायें, जिससे इन्हें पनपने का अवसर न मिलें। इसके लिए हमारे प्राचीन आयुर्वेद के जानकारों ने मच्छरों को दूर भगाने के लिए घर में तुलसी, गेंदा, हार्समिंट, लेमन बाल्म, लेवेंडर, रोजमेरी और लौंग के पौधे लगाने की सलाह दी है, क्योंकि इनकी गंध मच्छरों को नहीं सुहाती है। अकेले विडालपर्णास के पौधे में मच्छरों को भगाने वाले क्वाइल  और स्प्रे से कहीं ज्यादा रसायन होना बताया गया है, जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं होता है।



भगवती दुर्गा संगठित शक्ति प्रतीक हैं

भगवती दुर्गा संगठित शक्ति प्रतीक हैं

मानव की प्रकृति हमेशा शक्ति की साधना ही रही है। महाशक्ति ही सर्व रूप प्रकृति की आधारभूत होने से महाकारक है, महाधीश्वरीय है, यही सृजन-संहार कारिणी नारायणी शक्ति है और यही प्रकृति के विस्तार के समय भर्ता तथा भोक्ता होती है। यही दस महाविद्या और नौ देवी हैं। यही मातृ-शक्ति, चाहे वह दुर्गा हो या काली, यही परमाराध्या, ब्रह्यमयी महाशक्ति है। मां शक्ति एकजुटता का प्रतीक हैं। इनके जन्म स्वरूप में ही देवत्व की विजय समायी है। 
           मार्कण्डेय पुराण में भगवती दुर्गा के एक व्याख्यान के अनुसार महिषासुर नाम का दैत्य महा अभिमानी था, जिसने अपनी सत्ता जमाने के लिए सूर्य, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, वरूण आदि सभी देवताओं को अधिकारच्युत कर दिया। तब जब सभी पराजित देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास गये और उनसे हार का कारण और जीत का उपाय पूछने लगे तो प्रजापति ने बताया कि दैवत्व कभी नहीं हारता, देवताओं की विश्रृंखलता ही हारती है। जीतने का एकमात्र उपाय संयुक्त शक्ति को अपनाना है। उस समय वहाँ भगवान विष्णु और शिवजी भी विराजमान थे। भगवान विष्णु ने महिषासुर के अत्याचारां से त्रस्त और हारे हुए देवताओं की संघ शक्ति जागृत करने के लिए तेज (शक्ति) का रूप धारण कर लिया। इसमें उन्होंने सभी देवताओं का थोड़ा-थोड़ा तेज (शक्ति) मिलाया और इस एकीकरण को अभिमंत्रित करके दुर्गा के रूप में विनिर्मित कर दिया।
          संगठन की महाशक्ति के रूप में भगवती दुर्गा का अवतरण हुआ, जिनके तीन नेत्र और आठ भुजाएं थी। सभी देवताओं ने अपने-अपने आयुध उन्हें प्रदान किए। साहस और पुरूषार्थ के प्रतीक सिंह पर आरूढ़ होकर शक्तिशाली भगवती दुर्गा ने महिषासुर को ललकारा और उसका उसके साथियो के साथ संहार किया। देवता और मुनियों ने देवी की जय जयकार की। देवी ने प्रसन्न होकर कहा कि वे सदैव उनके कल्याण के लिए तत्पर रहेंगी। इसी प्रकार जब मधुकैटभ, चंड-मुंड, और शुम्भ-निशुम्भ आदि असुरों का अत्याचार बढ़ा तो देवताओं को दिए गये आश्वासन के अनुरूप देवी प्रकट हुई और विकराल रूप धारण करके भगवती ने असुरों पर आक्रमण कर उन्हें देखते-देखते प्रचंड साधनों सहित भूमिसात कर दिया।          
 महाशक्ति दुर्गा अष्ट भुजा है। भगवती की आठ भुजाएं उनके पास आठ प्रकार की शक्तियाँं होने का प्रतीक है। शारीरिक बल, विद्या बल, चातुर्य बल, शौर्य बल, धन बल, शस्त्र बल, मनोबल और धर्म बल इन आठ प्रकार की शक्तियों का सामूहिक नाम ही दुर्गा है। मॉ इन्ही सामूहिक शक्तियों के माध्यम से हमेशा राक्षसों पर विजय पाती आयी हैं। 

नमक स्वादानुसार नहीं, सेहत अनुसार

नमक स्वादानुसार नहीं, सेहत अनुसार

नमक का स्वाद से जितना गहरा रिश्ता है, उतना ही बीमारियों से भी है। भोजन में इसकी अधिक मात्रा तमाम बीमारियों के लिए न्यौता देना है। एकेडमी ऑफ न्यूट्रीशन एंड डाइटेटिक्स और यूएस डिपार्टमेमेंट ऑफ एग्रीकल्चर 1500 से 2300 मिलीग्राम सोडियम प्रतिदिन लेने की सलाह देते हैं। बाहरी या सामान्य नमक पर निर्भरता कम करने के लिए प्राकृतिक नमक बेहतर विकल्प हो सकता है। करीब 25 तरह के प्राकृतिक नमक होते हैं। उदाहरणार्थ- कैल्शियम, फास्फोरस, क्लोरीन, चूना, गंधक आदि। यह नमक सब्जियों में प्राकृतिक रूप से होते हैं। सामान्य या बाहरी नमक में 40 फीसदी सोडियम और 60 फीसदी क्लोराइड होता है। विभिन्न अध्ययनों में सामने आया है कि मानव शरीर को सोडियम की जितनी मात्रा जरूरी होती है, उसकी लगभग दोगुनी मात्रा में लिया जा रहा है।
डायबिटीज में कितना जरूरी
जापान के जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म ने अपने एक सर्वे में 40 से 70 साल के उन लोगों को शामिल किया, जिन्हें आठ साल से डायबिटीज है। करीब 1588 लोगों पर हुए इस सर्वे में पाया गया कि उन लोगों में हृदय रोगों की आशंका दोगुनी है, जो एक दिन में औसतन 5900 मि.ग्रा. सोडियम लेते हैं। डायबिटीज के मरीज को 1500 मि.ग्रा. से अधिक सोडियम नहीं लेना चाहिए।
अधिक नमक
जिन सब्जियों में 140 मिलीग्राम से अधिक सोडियम होता है, उनमें पालक शामिल है। पालक पकने के बाद एक कप (करीब 128 ग्राम) में करीब 184 मिलीग्राम सोडियम होता है।
कम नमक
इस तरह की सब्जियों में वे शामिल हैं, जिनमें 35-140 मिलीग्राम के बीच सोडियम होता है। इनमें आलू, मूली, अजवाइन, गाजर, ब्रोकली व अन्य फलीदार सब्जियां शामिल होती हैं।
बहुत कम नमक
इस तरह की सब्जियों में लगभग 35 मिलीग्राम से कम सोडियम होता है। इसमें मशरूम, बंदगोभी, फूलगोभी, हरी प्याज, टमाटर और सलाद में अवयव शामिल होते हैं।
न के बराबर नमक
इनमें बहुत कम लगभग पांच मिलीग्राम सोडियम होता है। इनमें शतावरी, ग्रीन सेम, आलू, मक्का आदि शामिल हैं।
कितना नमक उचित
ज्यादातर स्वास्थ्य संगठन एक वयस्क व्यक्ति को 1500 से 2300 मिलीग्राम सोडियम प्रतिदिन लेने की सलाह देते हैं। 1500 मिलीग्राम सोडियम पाने के लिए 3.75 ग्राम या 75 फीसदी भरी छोटी चम्मच नमक लेना उचित रहेगा। इसी तरह 2300 मिलीग्राम सोडियम पाने के लिए 6 ग्राम नमक की जरूरत होती है।
0-12 माह के लिए 1 ग्राम से कम (400 मिलीग्राम सोडियम),
1-3 साल के लिए 2 ग्राम (800 मि.ग्रा.सोडियम),
4-6 साल के लिए 3 ग्राम (1200 मि.ग्रा. सोडियम),
7-10 साल के लिए 5 ग्राम (2000 मि.ग्रा. सोडियम) एवं
11 से ऊपर के लिए 3.75  -6 ग्राम (1500-2400 मि.ग्रा. सोडियम) की मात्रा उचित है।
किस पर कैसा असर
किडनी : मानव शरीर किडनी के जरिए रक्त को साफ कर अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकाल देता है। इस प्रक्रिया के लिए सोडियम और पोटेशियम का संतुलन जरूरी होता है। अधिक नमक से रक्त में सोडियम की मात्रा बढ़ जाती है। साथ ही किडनी की जल के निकास की क्षमता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप हाई ब्लड प्रेशर और किडनी फेल होने का खतरा अधिक बढ़ जाता है।
हृदयः  अधिक सोडियम के सेवन से धमनियां निष्क्रिय हो जाती हैं। साथ ही ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा धमनियां भी हृदय में रक्त संचार बंद कर देती हैं। हाई ब्लड प्रेशर के कारण हृदय को, जो कि शरीर में रक्त संचार करता है, पर्याप्त ऑक्सीजन और न्यूट्रीएन्ट्स भी नहीं मिलते। इससे हार्ट अटैक व अन्य हृदय संबंधी रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। नमक की मात्रा को कम कर इससे बचा जा सकता है।
मस्तिष्कः लम्बे समय तक अधिक सोडियम खाने से डेमेज हुई धमनियां मस्तिष्क पर भी असर डालती हैं। मस्तिष्क में रक्त की कमी हो जाती है। इस कारण कोशिकाएं काम करना बंद कर देती हैं। साथ ही मस्तिष्क को ऑक्सीजन और न्यूट्रीएन्ट्स मिलना बंद हो जाते हैं। सोडियम की अधिक मात्रा धमनियों पर धीरे-धीरे असर डालती हैं। अंततः डिमेंशिया जैसे रोगों का जोखिम बढ़ जाता है।
  • 10.5 हजार वर्ग कि.मी. में फैला ‘सालर डे टूनुपा’ (बोलिविया) दुनिया का सबसे बड़ा नमक का मैदान है। इसे करीब तीस हजार साल पुराना माना जाता है।
  • 01 कप (करीब 128 ग्राम) चुंकदर में 106 मिलीग्राम सोडियम होता है। यह प्राकृतिक सोडियम के अच्छे स्रोतों में से एक है।
आरोग्य सम्पदा से संकलित


गया में श्राद्ध व पिंडदान करना सर्वोपरि क्यों माना जाता है?

गया में श्राद्ध व पिंडदान करना सर्वोपरि क्यों माना जाता है?

इन दिनों आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा से दुर्गा पूजा की पहली पूजा तक समाप्त होने वाले पितृपक्ष यानि पितरों (पूर्वजों) का पखवारा चल रहा है। मरने के बाद हम हमारे पूर्वजों के प्रति  श्रद्धा स्वरूप श्राद्धकर्म कर उन्हें याद करते हैं। हमारे धार्मिक कर्मकांडों अथवा त्यौहारों के पीछे कोई न कोई कथा सहज रूप में देखने-सुनने को मिलती है। इसी कड़ी में पितृपक्ष में गयाधाम (बिहार) में ही पूर्वजों का श्राद्ध करने के पीछे विभिन्न धर्म ग्रंथों में मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार गयासुर नामक राक्षस के राक्षसी कार्यों से धरती बहुत आक्रांत थी। उसके दुष्क्रमों से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु को स्वयं आना पड़ा। भगवान विष्णु ने अपने पैर से उसे इसी स्थान पर दबा दिया था। वह जब भगवान विष्णु के पैरों तले दबकर मोक्ष प्राप्त कर रहा था, उस समय उसने विष्णु भगवान से यह वरदान मांगा कि इस क्षेत्र की प्रतिष्ठा उससे हो। भगवान विष्णु के वरदान से यह क्षेत्र गयाधाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां भगवान विष्णु के पैरों के चिन्ह आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसलिए इस क्षेत्र का नाम विष्णुपद कहलाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति स्वयं या अपने पूर्वजों का नाम लेकर यहां आकर श्राद्ध व पिण्डदान करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वायुपुराण में कहा गया है:  "न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ। अधिमासे सिंह-गुरावस्ते च गुरु-शुक्रयोः।  तीर्थयात्रा न कर्तव्या गयां गोदावरीं विना। "
          सम्पूर्ण संसार में भगवान विष्णु के चरण चिन्ह का गयाधाम का मंदिर इकलौता है। पितृपक्ष में श्राद्ध के दौरान पिण्डदान की प्रक्रिया यहीं से शुरू होती है। धार्मिक शास्त्र वायुपुराण के अनुसार- "पंचकोश गया क्षेत्र कोशमेकं गयाशिरः" अथार्थ- गया के पांच कोस क्षेत्र में जिसकी मौत होती है, उसका गया में श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि इसे गयासुर का साम्राज्य क्षेत्र और मोक्षदायिनी क्षेत्र माना गया है। पहले यहां 365 वेदियां थी, मगर वर्तमान में 45 वेदियां ही शेष बची हैं। धर्मशास्त्रों के मुताबिक श्राद्ध प्रतिदिन होना चाहिए, इसलिए पहले वेदियों की संख्या 365 थी।
         गयासुर के शरीर पर स्थापित गयाधाम में परमपिता ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने की बात भी धर्मशास्त्रों में लिखी है। यज्ञ के बाद यहां ब्रह्म सरोवर में यज्ञ स्तंभ आरोपित किया गया था। धर्मशास्त्रों के अनुसार किसी भी मृत व्यक्ति का जब तक पितृपक्ष में विष्णुचरम पर पिंडदान नहीं किया जाता, तब तक उसकी आत्मा प्रेतयोनि में भटकती रहती है। श्राद्धकर्म के बाद वे पितृलोक में चले जाते हैं। श्राद्ध करने में यज्ञ जरूरी है। श्राद्ध के लिए समय को भी ध्यान में रखना जरूरी है। समय से किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। पितृश्राद्ध पूर्वाद्ध में, पूर्वज श्राद्ध अपरान्ह में, एक दो दृष्टि श्राद्ध मध्यान्ह और नित्य नैमित्तिक श्राद्ध प्रातःकाल किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के आस्थाओं के अनुसार जो व्यक्ति पितरों को तर्पण और श्राद्ध नहीं करता वह पुत्र कहलाने का अधिकारी नहीं होता है।
          मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद अपने अनुज लक्ष्मण और अर्द्धागिनी सीता के साथ गया में पिण्डदान का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रीराम के पिण्डदान करने की एक कथा प्रचलित है कि जब वे यहां पिण्डदान करने आये, तब वे सीता को फल्गु नदी के किनारे छोड़कर आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए निकल गये। पिण्डदान का समय होने पर महाराजा दशरथ की आत्मा की आवाज जनकनंदनी सीता के कानों में गूंजी कि उन्हें भोजन (पिंड) चाहिए, जिसे सुनकर सीता सोच में पड़ गई कि उन्हें तो श्राद्ध का अधिकार है ही नहीं। और अगर उन्होंने पिण्डदान कर भी दिया तो उनके पति श्रीराम उन पर विश्वास नहीं करेंगे। इसी तरह के कई सवालों मन में उत्पन्न हुए लेकिन सीता ने फल्गू नदी, केतकी का फूल,  गाय और वट का पेड को साक्षी बनाकर बालू का पिण्डदान कर दिया। पिण्डदान देने से दशरथ की आत्मा तृप्त हो गई और उन्हें मोक्ष मिल गया। बाद में श्रीराम जब सामग्री लेकर लौटे तब जनक नंदनी ने सारा वृतान्त सुनाया, लेकिन श्रीराम को विश्वास नहीं हुआ। तब सीता ने एक-एक कर चारों साक्ष्यों को प्रस्तुत किया, लेकिन उनमें से फल्गू नदी, केतकी का फूल और गाय मुकर गये। कुपित होकर सीता ने फल्गू नदी को सूखी रहने और बालू के नीचे दबे रहने, केतकी फूल को पूजा के अयोग्य रहने और गाय को उसके मुंह से छुए हुए वस्तु को पूजा के अयोग्य होने का श्राप दिया। वट वृक्ष ने ही गवाही दी, जिसे सीता जी ने उसे दीर्घायु का वरदान दिया। इसीलिए सुहागन स्त्रियां भी अपने पति की लम्बी उम्र की कामना हेतु वट वृक्ष की पूजा करते हैं।

अति से सब जगह बचना चाहिए

अति से सब जगह बचना चाहिए

प्रत्येक अति बुराई का रूप धारण कर लेती है।
उचित की अति अनुचित हो जाती है।।

अति मीठे को कीड़ा खा जाता है।
अति स्नेह मति बिगाड़ देता है।।

अति परिचय से अवज्ञा होने लगती है।
बहुत तेज हवा से आग भड़क उठती है।।

कानून का अति प्रयोग अत्याचार को जन्म देता है।
अमृत की अति होने पर वह विष बन जाता है।।

अत्यधिक रगड़ने पर चंदन से भी आग पैदा हो जाती है।
एक जगह पहुंचकर गुण-अवगुण में बहुत कम दूरी रह पाती है।।

अति नम्रता में अति कपट छिपा रहता है।
अत्यधिक कसने से धागा टूट जाता है।।

अति कहीं नहीं करनी चाहिए।
अति से सब जगह बचना चाहिए।

.. कविता रावत 
राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक

राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक

शिक्षक को राष्ट्र का निर्माता और उसकी संस्कृति का संरक्षक माना जाता है। वे शिक्षा द्वारा  छात्र-छात्राओं को सुसंस्कृतवान बनाकर उनके अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर देश को श्रेष्ठ नागरिक प्रदान करने में अहम् दायित्व निर्वहन करते हैं। वे केवल बच्चों को न केवल साक्षर बनाते हैं, बल्कि अपने उपदेश के माध्यम से उनके ज्ञान का तीसरा नेत्र भी खोलते हैं, जिससे उनमें भला-बुरा, हित-अहित सोचने की शक्ति उत्पन्न होती हैं और वे राष्ट्र की समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का अध्यापन कार्य महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहा बावजूद इसके उन्होंने अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाये जाना का संकल्प किया। इसका कारण स्पष्ट है कि वे भलीभांति जानते थे कि माध्यमिक शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राओं में जो संस्कार अंकुरित होते हैं, वे ही आगे चलकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में पल्लवित होते हैं।
           'मालविकाग्रिमित्रम' नाटक में महाकवि कालिदास ने कहा हैं-
 “लब्धास्पदोऽस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।
 यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "
          - अर्थात जो अध्यापक नौकरी पा लेने पर शास्त्रार्थ से भागता है, दूसरों के अंगुली उठाने पर चुप रह जाता है और केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाता है, ऐसा व्यक्ति पंडित (शिक्षक) नहीं वरन् ज्ञान बेचने वाला बनिया कहलाता है। लेकिन दुःखद पहलू है कि आज ज्ञान से पेट भरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा नजर आती है। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तीव्र गति से विद्यालयों की संख्या बढ़ी उस अनुपात में शिक्षा का स्तर ऊँचा होने के बजाय नीचे गिरना गंभीर चिन्ता का विषय है। आज शासकीय और शासकीय अनुदान प्राप्त विद्यालयों में अध्यापन और अनुशासन का बुरा हाल जब-तब जगजाहिर होना आम बात है। बावजूद इसके जब कोई शिक्षक या प्राचार्य राजनीतिक दांव-पेंच के माध्यम से सम्मानित होता है तो यह एक निराशाजनक स्थिति निर्मित करता है। जिस प्रकार दाल-चावल में कंकर देखकर उसे अनुपयोगी न मानकर उसमें से कंकर चुनकर उन्हें बाहर कर उसका सदुपयोग किया जाता है, उसी प्रकार यदि शासन-प्रशासन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के प्रति समर्पित अध्यापकों को ही सम्मानित करें तो ‘शिक्षक दिवस‘ और भी गौरवान्वित होकर  सार्थकता को प्राप्त होगा। 

शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित..... कविता रावत