अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं :  रवीन्द्र प्रभात

अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं : रवीन्द्र प्रभात

           कहा गया है, कि साधना जब सरस्वती की अग्निवीणा पर सुर साधती है तो साहित्य की अमृतधारा प्रवाहित होती है, जिससे हित की भावनाएं हिलकोरें मारने लगती है । इन हिलकोरों में जब सृजन की अग्नि की धाह आंच मारती है तो वह कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। सही मायनों में इसी को कविता कहते हैं। मुझे खुशी है कि कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता' में ये सारे भाव मैंने महसूस किए हैं।
         कविता रावत अपनी कविताओं में कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। कविता रावत की कविता रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच कविता की कविता शाश्वत एवं चिरंतन है।
          कविता रावत की कुछ कवितायें मन-मस्तिष्क को आंदोलित करती है, जैसे संगति का प्रभाव,  दुर्जनता का भाव,  वह राष्ट्रगान क्या समझेगा,  भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है,  अभिमान ऐसा फूल है जो शैतान की बगिया में उगता है, बुरी आदत,  गरीब,कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है,  हाय पैसा! हाय पैसा.... आदि।
कविता रावत की कविताओं में शब्द-शब्द से दर्शन टपकता नज़र आता है। शायद उन्हें इस बात का भान होगा कि कविता में जीवन दर्शन नहीं हो तो वह निष्प्राण है। कुछ कवितायें तो पत्थरों में भी प्राण-प्रतिष्ठा करती नज़र आती है, जो इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। संग्रह की कुछ कवितायें जीवन के प्रति एक गहरी आसक्ति, ललक अर्थात रागधर्मी जीवनोंमुखता व रोमांटिक नवीनता का आभास कराती है । 
          यह संग्रह वास्तव में प्राणवान कविताओं की पुष्पांजलि है जिसे कविता रावत ने पूरे मनोयोग से सजाकर माँ सरस्वती की अग्निवीणा को समर्पित करने का प्रयास किया है। यह संग्रह पठनीय ही नहीं सहेजकर रखने योग्य भी है।
         अपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने की दक्षता के साथ ब्लॉग पर शब्दों,लोकोक्तियों व मुहावरों की सामर्थ्य एवं सीमा का सूक्ष्म संधान करने वाली कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता'  के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मिक शुभकामनायें।
रवीन्द्र प्रभात
प्रधान संपादक: परिकल्पना समय(मासिक)


1.   संगति का प्रभाव                                                           
2.   दुर्जनता का भाव       
3.   तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है                                 
4.   वह राष्ट्रगान क्या समझेगा          
5.   समय                                                                         
6.   भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है
11. उसी के हँसी सबको भली लगे जो अंत में हँसता है            
12. हाय पैसा ! हाय पैसा !  
13. दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है               
14. दिल को दिल से राह होती है
15. मित्र और मित्रता                                                       
16. दूर-पास का लगाव-अलगाव
17. आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है  
18. दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है
19. बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है         
20. अपने-पराये का भेद
21. भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है                     
22. अति से सब जगह बचना चाहिए
23. हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है                       
24. अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है
25. ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है                       
26. उद्यम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है
27. भोजन मीठा नहीं भूख मीठी होती है                               
28. विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है
29. हर मनुष्य की अपनी-अपनी जगह होती है                       
30. दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं
31. सच और झूठ का सम्बन्ध                                           
32. समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं
33. दो घरों का मेहमान भूखा मरता है

दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है

दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है

दो काम एक साथ हाथ में लेने पर एक भी नहीं हो पाता है।
बहुत ज्यादा सोच-विचार वाला कुछ भी नहीं कर पाता  है।।

जो कुछ नहीं जानता वह किसी बात में संदेह नहीं करता है।
जो अधिक जानता है वह काम पर भी विश्वास कर लेता है ।।

जो जल्दी विश्वास कर लेता है वह बाद में पछताता है ।
समझदार आदमी हर मामले में समझदार नहीं होता है ।।

कमजोर काठ को अक्सर कीड़ा जल्दी खा जाता है ।
दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है ।।  
क्या दीवाली लक्ष्मी जयन्ती है?

क्या दीवाली लक्ष्मी जयन्ती है?

एक मान्यता के अनुसार दीपावली ‘लक्ष्मी जयन्ती’ अर्थात् लक्ष्मी के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। निश्चित ही यह कल्पना अर्वाचीन है, क्योंकि प्राचीन देवताओं की जयन्ती या जन्मदिन की अवधारणा वैदिक काल में नहीं थी। लक्ष्मी एक वैदिक देवता है जो मूलतः भूदेवी या पृथ्वी का प्रतीक थी। इन्द्र और वरुण आदि वैदिक देवों की जयन्ती जिस प्रकार नहीं मनाई जाती उसी प्रकार लक्ष्मी के भी जन्मदिन का प्रश्न नहीं उठता। किन्तु बाद के समय में इस दिन लक्ष्मी के जन्म होने की कल्पना विकसित हुई हो सकती है। इसके आधार क्या रहे होंगे, इस पर विचार किया जाए तो कार्तिक कृष्ण अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी की उत्पत्ति की कल्पना के मूल में निम्नलिखित वैज्ञानिक तथ्य विचारणीय है-
           लक्ष्मी, चन्द्रमा आदि चतुर्दश रत्न समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए, ऐसा माना जाता है। समुद्र मंथन की तिथि क्या रही होगी, इसका उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाला ज्वार वर्ष भर के सबसे बड़े ज्वारों में से एक है। इस समय विशाल समुद्र के जल का विक्षुब्ध होना, कोलाहल सहित लहरों का उत्थान-पतन समुद्रमंथन का ही दृश्य उपस्थित करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने इसी आधार पर प्राचीन मान्यताओं का विश्वलेषण करते हुए बताया था कि संभव है, हमारे पौराणिक युग में समुद्र मंथन की कल्पना उन्हीं भयंकर ज्वारों को देखकर की गई हो। रूपकप्रिय वैदिक ऋषियों और पुराणकारों ने इसी रूपक के लेकर सूर्य आदि देवताओं द्वारा मथे जाने वाले समुद्र की कल्पना की हो और इस समुद्र मंथन के दूसरे ही दिन निकले वाले चन्द्रमा को (जो कार्तिक शुक्ल द्वितीया को निकलता है) समुद्र मंथन से उत्पन्न माना हो यह स्वाभाविक है। चन्द्रमा की बहिन लक्ष्मी भी (पृथ्वी का प्रतीक) समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई मानी जाती है, इसलिए कार्तिक कृष्ण अमावस्या को लक्ष्मी जयन्ती मानना भी इसी दृष्टि से सुसंगत लगता है।
          पुराणों में लक्ष्मीपूजा के अलावा दीवाली के दिन दीपक जलाने का जो विधान मिलता है उसका भी एक समाज-वैज्ञानिक पक्ष उन्होंने स्पष्ट किया है। जिस प्रकार बरसात में आई अस्वच्छता को दूर कर सफाई और घरों की लिपाई-पुताई का विधान मिलता है उसी प्रकार न केवल घरों में बल्कि देवालयों में ‘दीपवृक्ष’ समर्पित करने तथा बाजारों और सार्वजनिक स्थानों में दीप पंक्ति रखने के विधान का स्पष्ट आश्य यही है कि गृहस्वामी अपने घर को हर प्रकार से जगमगाने से भी अधिक महत्व सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश करने को दें। यमत्रयोदशी से लेकर दीवाली तक चौराहों, गलियों और रास्तों में दीप जलाने को विशेष महत्व दिया जाता है। सामान्यतः व्यक्ति जिन स्थानों पर दीपक नहीं जलाता, वहां भी इस दिन दिए जलाये जाएं, यही इस परम्परा का उद्देश्य प्रतीत होता है।      "पर्व पारिजात से साभार"
सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

प्यार की अजीब होती है दास्ताँ

प्यार की अजीब होती है दास्ताँ

कुछ हुई उनकी बात
कुछ  हुई मुलाकात
और वे प्यार समझ बैठे
दिल देने की भूल कर  बैठे
कहते सुनते आए से जिसे
वे भी करने लगे प्यार
बस इसी प्यार की खातिर
आगे बढ़ते चले गए
रोक न पाए अपने दिल को
दिन को भी  मधुर सपने देखने लगे
यादों की ताजगी में रातभर जगने लगे
दिखते न थे जो घर के बाहर कभी
वे बार-बार हर कहीं नजर आने लगे
'नींद कोई उड़ा ले गया उनकी'
'कोई उधार दो नींद' कहने लगे
पर कुछ समय बाद
जाने क्या बात
या  हुई तकरार
कि वे मान बैठे हार
फिर उजाड़ दिखा प्यार तो
सपने बिखर गए
नाजुक दिल क्या चटका
कि जीना छोड़ गए
अब क्या करें बात उनकी
प्यार की अजीब होती है दास्ताँ
बातें छेड़ देते हैं अक्सर वे भी
जिनका दूर-दूर तक नहीं वास्ताँ
...कविता रावत 
एक उम्मीद जरूरी है जीने के लिए

एक उम्मीद जरूरी है जीने के लिए

एक उम्मीद
जिसकी नाउम्मीदी पर
उठती है मन में खीज, झुंझलाहट
निराश मन कोसता बार-बार
उम्मीद उनसे जो खुद
उम्मीद में जीते-पलते हैं
उम्मीद उनसे लगा बैठते हैं
परिणाम वही पश्चाताप
दफ़न होती उम्मीदें
जहाँ से जुड़ने की उम्मीद
वहीं से टूटता मन
सुनता कौन है बात उनकी
जो दबा वक्त के क्रूर पंजों में
सुनाने को बहुतेरे मिलते हैं
मगर अपने कितने होते हैं?
इस स्वार्थभरी दुनिया में
अक्सर जहाँ आदमी हो जाता है
अपनों की ही भीड़ में
सबसे अलग-थलग
सोचो, फिर आसान कहाँ
उसके लिए जीना?
बावजूद इसके
एक उम्मीद की किरण
सदा जीवित रहती है
मन के किसी कोने में
जो जरूरी है जीने के लिए
......कविता रावत 
केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन

केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन

देश की स्वतंत्रता के लिए 1857 से लेकर 1947 तक क्रान्तिकारियों व आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका  निभाई।  उस समय खूब लिखा गया।  खूब पढ़ा गया।  आज की तरह तब सम्प्रेषण के संसाधन बिलकुल न होते हुए भी वह सृजन आम आदमी तक पहुँचता था।  हर देशवासी उस सृजन का सहयोग पाता था।  यह भी विचारणीय है कि उस समय का भारतीय भूगोल बहुत बड़ा था।  लाहौर से लेकर गुवाहाटी तक, कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक, यदि कहीं भी राष्ट्रचेतना शब्दांकित हुई तो चंद लम्हों में ही वह चेतना स्वर बनकर पूरे भारत में गूँजती थी।  देश तो संसाधनहीन था ही, जो लिख रहे थे वे खुद संसाधन से रहित सृजनकार थे, लेकिन उनकी शब्दों में इतनी क्षमता थी कि हर रचना पूरे भारत में प्रवाहित हो रही थी।  देश जाग रहा था।  अंग्रेजी हुकूमत परेशां हो रही थी।
          प्रेमचंद की 'रंगभूमि, कर्मभूमि' उपन्यास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का 'भारत -दर्शन' नाटक, जयशंकर प्रसाद का 'चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त' नाटक आज भी उठाकर पढि़ए देशप्रेम की भावना जगाने के लिए बड़े कारगर सिद्ध होंगे। वीर सावरकर की "1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम" हो या पंडित नेहरू की 'भारत एक खोज' या फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 'गीता रहस्य' या शरद बाबू का उपन्यास 'पथ के दावेदार' जिसने भी इन्हें पढ़ा, उसे घर-परिवार की चिन्ता छोड़ देश की खातिर अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए स्वतंत्रता के महासमर में कूदते देर नहीं लगी। राष्ट्रीयता के विकास के लिए जयशंकर प्रसाद ने अतीत की ओर दृष्टि दौड़ाई।  अपनी कविताओं तथा नाटकों में इन्होनें भारत के स्वर्णिम इतिहास को चित्रित किया। स्कंदगुप्त , चन्द्रगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी आदि नाटकों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक चुनौतियों के सामने अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। प्रादेशिक और विभिन्न विचारधाराओं के तनाव से गुजर रहे भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को इससे अधिक प्रेरक संदेश कौन दे सकता है, जो चन्द्रगुप्त नाटक के माध्यम से चाणक्य कहता है कि-
‘मालवा और मगघ को भूलकर जब तुम आर्यावर्त का नाम लोगे, तभी तो मिलेगा।’
अर्थात आर्यावर्त की स्थापना विभिन्नता को छोड़कर स्वाधीनता के केन्द्रीय लक्ष्य की ओर प्रयत्न करके ही मिलेगा। यहां आर्यावर्त अखंड भारत का प्रतीक है। इस नाटक में अनेक गीत प्राचीन भारत के गौरव से युक्त हैं। नारी जागरण से सशक्त स्वर लेकर संपूर्ण राष्ट्र के युवकों का ललकार भरा आह्वान करती है- 
हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्वला, स्वतंत्रता पुकारती।
अमर्त्यवीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञा सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है-बढ़े चलो, बढ़े चलो।।
निराला परंपरा के गहरे बोध के कवि हैं। उन्होंने सांस्कृतिक धरातल पर तुलसीदास कविता में नवजागरण के मूल आशय स्वतंत्रता को अभिव्यक्त किया है-
जागो जागो आया प्रभात, बीती वह बीता अंध रात, 
झरता भर ज्योतिर्मय प्रपात पूर्वांचल बांधो बांधो किरणें चेतन,
तेजस्वी, हे तम जिज्जीवन। आती भारत की ज्योतिर्धन महिमाबल।।
      यहां पराधीनता के अंधकार से स्वाधीनता का प्रभात है। जागरण का स्वर भारतेन्दु के प्रबोधनी शीर्षक कविता का आधुनिक संस्करण है। वहां भारतनाथ को जगाने की चेष्टा है यह भारत के महिमा, बल और सांस्कृतिक पंरम्परा के माध्यम से आत्मगौरव के प्रसार का प्रयत्न। लोगजागरण के दौर में तुलसी की कविता ने सामंती बंधनों को तोड़कर लोकमंगल का प्रकाश फैलाया था। नवजागरण के दौर में वही प्रकाश तुलसी की प्रेरणा से साम्राज्यवाद के बंधनों को झटककर स्वाधीन भारत के सूर्य के अवतरण का उत्सव बन जाता है।
 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्ता ने “भारत-भारती“ में देशप्रेम की भावना को सर्वोपरि मानते हुए आह्वान किया-
“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।।“
           देश पर मर मिटने वाले वीर शहीदों के कटे सिरों के बीच अपना सिर मिलाने की तीव्र चाहत लिए सोहन लाल द्विवेदी ने कहा-
                   “हो जहाँ बलि शीश अगणित, एक सिर मेरा मिला लो।“
          वहीं आगे उन्होंने “पुष्प की अभिलाषा“ में देश पर मर मिटने वाले सैनिकों के मार्ग में बिछ जाने की अदम्य इच्छा व्यक्त की-
“मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जायें वीर अनेक।।“
          सुभद्रा कुमारी चौहान की “झांसी की रानी" कविता को कौन भूल सकता है, जिसने अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दी। वीर सैनिकों में देशप्रेम का अगाध संचार कर जोश भरने वाली अनूठी कृति आज भी प्रासंगिक है-
“सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढे़ भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की, कीमत सबने पहिचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तनवार पुरानी थी,
बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी की रानी थी।“
          “पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं“ का मर्म स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रहे वीर सैनिक ही नहीं वफादार प्राणी भी जान गये तभी तो पं. श्याम नारायण पाण्डेय ने महाराणा प्रताप के घोड़े ‘चेतक’ के लिए "हल्दी घाटी" में लिखा-
“रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक  बन गया निराला था,
राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था,
गिरता न कभी चेतक  तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था,
वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।“
अपना भारत, हिंदी साप्ताहिक लखनऊ, शुक्रवार 11-17 अगस्त, 2017  पृष्ठ 25 में प्रकाशित  
भाई-बहिन का प्यारा बंधन रक्षाबंधन

भाई-बहिन का प्यारा बंधन रक्षाबंधन

रिमझिम सावनी फुहार-संग
पावन पर्व रक्षाबंधन आया है
घर-संसार खोई बहिना को
मायके वालों ने बुलाया है

मन में सबसे मिलने की उमंग
धमा-चैकड़ी मचाने का मन है
पता है जहाँ सुकूं भरी जिंदगी
वह बचपन का घर-आंगन है

याद है छोटी-छोटी बातों पर मुंह फुलाना
कभी हंसते-गाते, खुशी-खुशी स्कूल जाना
कभी मां के हाथों से खेल-खेल में खाना
कभी झूठ-मूठ कभी थपकी लेकर सोना

खूब याद वो नन्हा घर-संसार अपना
जहाँ खेलते-कूदते लड़-झगड़ बैठते थे
पर ज्यों ही बड़ों की डांट पड़ती तो
फट से फिर एक हो जाया करते थे

जहाँ मन में भला-बुरा न अपना-पराया
वही बचपन जीने का ख्याल आया है
भाई-बहिन का प्यारा बंधन रक्षाबंधन
बचपन के दिन अपने साथ लाया है।                               ...कविता रावत



बांध कलाई में राखी बहिना अपना प्यार जताती है

बांध कलाई में राखी बहिना अपना प्यार जताती है

बहिन विवाहित होकर अपना
अलग घर-संसार बसाती है।
पति-बच्चे, पारिवारिक दायित्व
दुनियादारी में उलझ जाती है।।
सतत स्नेह, प्रेम व प्यार की
निर्बाध आकांक्षा मन में वह रखती है।
पर विवशताएं चाहते हुए भी
उसके अंतर्मन को कुण्ठित करती है।।
रक्षाबंधन-भैया दूज पर बहिन-भैया
मिलन के दो पावन प्रसंग आते हैं।
बहिन के लिए जो अद्भुत, अमूल्य,
अनंत प्यार को सन्देश लाते हैं।।
रक्षा पर्व पर बीते दिनों की आप बीती
बताने का सुगम सुयोग बनता है।
जहाँ बहिन-भैया को एक-दूजे का
सुख-दुःख बांटने का अवसर मिलता है।।
महीनों पहले से बहिन इस
पावन पर्व की प्रतीक्षा करती है।
बांध कलाई में राखी बहिना
अपना प्यार जताती है।।
बरखा बहार आयी

बरखा बहार आयी

सूरज की तपन गई बरखा बहार आयी
झुलसी-मुरझाई धरा पर हरियाली छायी
बादल बरसे नदी-पोखर जलमग्न हो गए
खिले फूल, कमल मुकुलित बदन खड़े हुए
नदियां इतराती-इठलाती अठखेलियां करने लगी
तोड़ तट बंधन बिछुड़े पिय मिलन सागर को चली
गर्मी गई चहुंदिशा शीतल मधुर, सुगंधित हुआ
जनजीवन उल्लसित, सैर-सपाटा मौसम आया
वन-उपवन, बाग-बगीचों में देखो यौवन चमका
धुली धूल धूसरित डालियां मुखड़ा उनका दमका
पड़ी सावनी मंद फुहार मयूर चंदोवे दिखा नाचने चले
देख ताल-पोखर मेंढ़क टर्र-टर्र-टर्र गला फाड़ने लगे
हरी-भरी डालियां नील गगन छुअन को मचल उठी
पवन वेग गुंजित-कंपित वृक्षावली सिर उठाने लगी
घर-बाहर की किचकिच-पिटपिट किसके मन भायी?
पर बरसाती किचकिच भली लगे बरखा बहार आयी!
...कविता रावत

संत कबीर के गुरु विषयक बोल

संत कबीर के गुरु विषयक बोल

गु अँधियारी जानिये, रु कहिये परकाश ।
मिटि अज्ञाने ज्ञान दे, गुरु नाम है तास ॥

जो गुरु को तो गम नहीं, पाहन दिया बताय ।
शिष शोधे बिन सेइया, पार न पहुँचा जाए ॥

सोचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय ।
चंचल से निश्चल भया, नहिं आवै नहीं जाय ॥

गुरु नाम है गम्य का, शीष सीख ले सोय ।
बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरु शीष नहिं कोय ॥

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरन्ध ।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द ॥

गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं ।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि ॥

कबीर गुरु है घाट का, हाँटू बैठा चेल ।
मूड़ मुड़ाया साँझ कूँ गुरु सबेरे ठेल ॥

गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव ।
सोइ गुरु नित बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥

जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय ।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय ॥

सत्गुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय ।
धन्य शीष धन भाग तिहि जो ऐसी सुधि पाय ॥

सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज ।
जीव खोय सब जायेंगे काल तिहूँ पुर राज ॥

सतगुरु सम कोई नहीं सात दीप नौ खण्ड ।
तीन लोक न पाइये, अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड ॥

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय ।
भ्रम का भांड तोड़ि करि, रहै निराला होय ॥

सतगुरु मिले जु सब मिले, न तो मिला न कोय ।
माता-पिता सुत बाँधवा ये तो घर घर होय ॥

सतगुरु को माने नही, अपनी कहै बनाय ।
कहै कबीर क्या कीजिये, और मता मन जाय ॥

जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान ।
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लागा कान ॥

कबीर समूझा कहत है, पानी थाह बताय ।
ताकूँ सतगुरु का करे, जो औघट डूबे जाय ॥

बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे ।
ब्रह्मा-विष्णु, महेश और सकल जिव को गिनै ॥

केते पढ़ि गुनि पचि भुए, योग यज्ञ तप लाय ।
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय ॥

सतगुरु खोजो सन्त, जोव काज को चाहहु ।
मेटो भव को अंक, आवा गवन निवारहु ॥

करहु छोड़ कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है ।
होये सब जिव काज, निश्चय करि परतीत करू ॥

यह सतगुरु उपदेश है, जो मन माने परतीत ।
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जल जीत ॥

जग सब सागर मोहिं, कहु कैसे बूड़त तेरे ।
गहु सतगुरु की बाहिं जो जल थल रक्षा करै ॥

पूरा सतगुरु न मिला, सुनी अधूरी सीख ।
स्वाँग यती का पहिनि के, घर घर माँगी भीख ॥

झूठे गुरु के पक्ष की, तजत न कीजै वार ।
द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार ॥

सद्गुरु ऐसा कीजिये, लोभ मोह भ्रम नाहिं ।
दरिया सो न्यारा रहे, दीसे दरिया माहि ॥

कबीर बेड़ा सार का, ऊपर लादा सार ।
पापी का पापी गुरु, यो बूढ़ा संसार ॥

जाका गुरु है गीरही, गिरही चेला होय ।
कीच-कीच के धोवते, दाग न छूटे कोय ॥

गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप ।
हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥

यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥

गुरु बिचारा क्या करै, शब्द न लागै अंग ।
कहैं कबीर मैक्ली गजी, कैसे लागू रंग ॥

गुरु बिचारा क्या करे, ह्रदय भया कठोर ।
नौ नेजा पानी चढ़ा पथर न भीजी कोर ॥

कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला ।
गुरु की करनी गुरु जाने चेला की चेला ॥

शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध ।
कहैं कबीर गुरु शीष को, मत है अगम अगाध ॥

हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय ।
ताके सद्गुरु कहा करें, घनघसि कुल्हरन होय ॥

गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥

कबीर गुरु की भक्ति बिन, राजा ससभ होय ।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय ॥

जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात ।
सो तो होगी कूकरी, फिरै उघारे गात ॥

चौंसठ दीवा जोय के, चौदह चन्दा माहिं ।
तेहि घर किसका चाँदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं ॥

शुकदेव सरीखा फेरिया, तो को पावे पार ।
बिनु गुरु निगुरा जो रहे, पड़े चौरासी धार ॥

साकट मन का जेवरा, भजै सो करराय ।
दो अच्छर गुरु बहिरा, बाधा जमपुर जाय ॥

गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह ।
कै बूड़ौ कै ऊबरो, टका परदानी देह ॥

गुरुवा तो सस्ता भया, कौड़ी अर्थ पचास ।
अपने तन की सुधि नहीं, शिष्य करन की आस ॥

हेमलासत्ता (भाग-2)

हेमलासत्ता (भाग-2)

नाई की बात सुनकर खेतासर के लोग बोले- हेमला से हम हार गए, वह तो एक के बाद एक को मारे जा रहा है, बड़े गांव में भी हम लोगों को चैन से नहीं रहने दे रहा है। हम कुछ नहीं कर सकते। अब तो बड़े शहर जाकर वहाँ से मियां मौलवी को लाना होगा। सुना है वहां एक खलीफा जी बड़े सिद्धहस्त हैं, उनके आगे हाथ जोड़कर जो बेऔलाद औरतें भेंट चढ़ाती हैं उन्हें वह गंडे-ताबीज देते हैं, जिससे उनकी गोद भर जाती हैं। जिन्न, डाकिनी और देव सब उनसे डरते हैं, भूत, मसान, खबीस सभी उनसे कांपा करते हैं। उनके पास जाकर खेतासर के लोगों ने नगद भेंट निकालकर हाल सुनाया तो वे बोले- “मैं आप लोगों से पहले भेंट हरगिज नहीं लूँगा, पहले चलकर वहाँ उस भूत को दफन करके आऊँगा, उसके बाद ही भेंट स्वीकार करूँंगा।“  यह सुनकर सभी खुश होकर बोले- जैसी आपकी मर्जी, अब हमारी यही अर्जी है कि आप हमारे साथ चलें। विनती कर वे लोग उसे गांव लाये और उसकी खूब खातिरदारी की, जिसे देख खुश होकर खलीफा बोला- ’सुनो सब, सत्ता से डरने की कोई बात नहीं अब समझो वह भसम हो कर रहेगा।’  बड़े सवेरे शीघ्र खलीफा ने नहाकर साफ जगह में चतुष्कोण चौका लगवाया, लोबान सुलगाया, मन्त्र जप, जन्त्र जगाए और सवा पहर दिन चढ़े मियां जी बाहर आकर बोले- ’चलकर साथ मुझे वह जगह बताओ। किसी तरह की जरा न दिल में दहशत खाओ।’ ’डरते-डरते लोग हुए दस-बीस साथ में, पुस्तक लेकर चले खलीफा एक हाथ में।’ आधी दूर पहुंचे, ठिठक कर, रूके सब लोग, कहा खलीफा से- अब हम हम नहीं चलेंगे, सामने जो ताल दिखाई दे रहा वहीं पर खेतासर का विकट हेमला भूत रहता है। ’अच्छा ठहरो यहीं, मैं अकेला ही जाता हूँ और उसे अभी भसम कर लौटता हूँ।’ इतना कहकर मियां पुस्तक खोलकर विलक्षण बोली में पढ़ते-पढ़ते आगे बढ़ते रहे।  आज हेमला ताल के किनारे पर पड़ा हुआ था। जैसे ही मियां के शब्द उसके कानों में पड़े वह चौंककर खड़ा हो गया। मियां ने एकाएक भयंकर भूत सम्मुख देखा तो वह अवाक् खड़ा रह गया। लाखों भूत-पलीत उन्होंने झाड़ दिए थे, हजारों को भसम और सैकड़ों को गाड़ दिए थे, लेकिन प्रत्यक्ष देहधारी भूत देखने का मौका उन्हें पहली बार मिला। आगा-पीछा सोचते हुए खलीफा जोर-जोर से अपने बदन पर फूंक मारने लगा। इतने में दुडू-दुडू कर दौड़ते हुआ अलबेला सत्ता मियां के ऊपर कूद पड़ा। अपने को निपट अकेला समझ मियां का मुंह पीला पड़ गया और उसकी हवाई उड़ने लगी। आज उनकी करामात ने उनसे विदाई मांग ली है यह जानकर वह पीछे पांव लौटकर भागने लगे तो दुडू-दुडू कर सत्ता ने दौड़ लगाई और मियां की कमर में लात जमाई और आगे आकर तड़ातड़ आठ-दस हाथ दे मारे। जब ’हाय! मरा’ कहकर मियां वहीं बेहोश हो गए तब उसकी किताब को फाड़-फाड़कर उसके पन्ने-पन्ने उड़ाता सत्यानाशी सत्ता मरघट की ओर यह बड़बड़ाते हुए चला कि- मूढ़ यह गलबल-गलबल कर यहां क्यों मरने आया था। कुछ लोग आगे बढ़कर पीछे वालों को यह सब आंखों देखा हाल सुना रहे थे- ’क्या वस्तु खलीफा है बेचारा? लो, वह भागा, अरे, हाय! मारा, वह मारा।’ हेमला चला गया लेकिन मियां बहुत देर बाद भी नहीं लौटा तो चिन्ताकुल लोग मन में बहुत घबराये। भयातुर होकर धीरे-धीरे पास पहुंचे तो देखा मियां के प्राण पखेरू उड़ गए थे। लोगों ने बस, झटपट चुपचाप टांगकर उन्हें उठाया और भागकर गांव पहुंचकर हाल सुनाया- “भूत सहज का है क्या सत्ता? कर दी जिसने नष्ट मियां की सभी महत्ता। और साथ ही पटक मार भी उनको डाला;  हाय! पड़ा है दुष्ट दैत्य से अपना पाला। अब क्या शेष उपाय रहा, सब तो कर छोड़े; भूल न लेंगे नाम, हाथ अब हमने जोड़े।।“         
         इस घटना से हेमला का खूब डंका बजा। इधर-उधर के गांव वालों ने भी खेतासर की सीमा में पांव रखना बंद कर दिया। एक दिन एक ठाकुर अपने लाव लश्कर के साथ ऊंटों पर सवार होकर अपने ससुराल को निकले। चलते-चलते जब वे एक गांव पहुंचे तो लोगों ने उनसे कहा कि आगे रास्ता बंद है। आपको खेतासर छोड़कर तीन कोस का फेर लगाना होगा। पूछने पर उन्होंने हेमला का हाल सुनाया तो ठाकुर को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्हें विश्वास नहीं हुआ। वे बोले- ’वे अवश्य ही खेतासर होकर जायेंगे और आज हेमला भूत वहां जाकर देखेंगे।’ यह सुनकर उनके नौकर-चाकर और संगी साथियों ने उन्हें खेतासर से नहीं चलने की विनती की। उन्होंने समझाया कि तीन कोस को फेर ज्यादा नहीं है, ऊंट को चढ़ने में देर नहीं लगती है।सौ-सौ बात हुई लेकिन ठाकुर नहीं माना, उसने जहाँ हेमला है, वहीं चलने की ठान ली। आओ कहकर वह खेतासर की ओर चल पड़ा। खेतासर के सूने घर भायं-भायं कर रहे थे। ठाकुर बोले- यहीं बितायेंगे दोपहरी, यहाँ जल का बड़ा सुबास और गहरी छाया है। अनेक बार अनुनय-विनय के बाद सब हारे। ताल किनारे डेरा डाला गया। नौकर-चाकर सभी हेमला से डरते थे। उनमें से किसी में भी डेरे से दो कदम आगे बढ़ाने का साहस न था। हर कोई सोचता कि अब तो प्राण जाने वाले हैं, सत्ता भूत सदेह अभी आने वाला है। सब मन ही मन बुरी तरह से ठाकुर को कोस रहे थे। सभी आपस में खुसुर-फुसुर सुनी-सुनाई बातों को दोहराते कि भूत विकट है, वह खूब लाते जमाता है। सब डर से कांप रहे थे, अगर कहीं पत्ता भी खड़का तो चौंक पड़ते। सभी लोग आपस में सटकर बैठे हुए थे लेकिन ठाकुर निर्भय होकर अलग दरी बिछाकर उस पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बीच-बीच में ’डरना मत तुम लोग’ कहकर सबको दिलासा दे रहे थे। उसने अपने बगल में बंदूक रखी थी।          
       मटरगस्ती कर ज्यों ही हेमला ताल के किनारे आया एक ऊंट बल-बल बल्लाया। वह मरघट से बाहर आया तो उसने मनुष्यों की आवाज सुनी तो उसे अचम्भा हुआ। उसने देखा कि ताल पर कुछ लोग ठहरे हुए है। अरे, कौन ये मूढ़ आज मरने चले आये हैं। मेरे ताल पर डेरा जमाकर बैठे हैं। अभी हेमला यही सोच रहा था कि कैसे इन्हें यहाँ से भगाऊँ कि इतने में एक आदमी की नजर उस पर पड़ी तो वह चिल्लाया- ’ठाकुर साहब, हाय! वह देखो, हेमला सत्ता आया।’ ठाकुर बोला कहाँ? अरे, किस ओर? किधर है? उधर देखिए उधर, यहीं, यह, उधर, उधर है, सब एक साथ चिल्लाये। “देखा ठाकुर ने कि वेश विकराल बड़ा है, मरघट में से निकल सामने भूत खड़ा है। दुर्बल, दीर्घ शरीर, भील सा काला काला, सिर पर रूखे बाल, घुसी सी आंखों वाला। मुंह पर दाढ़ी-मूंछ बड़ी बेडौल बढ़ी है, नंगे तन पर बिना चढ़ाई भस्म चढ़ी है। दृष्टि रोप कर के देखने वे जैसे ही दुडू-दुडू कर कूद चला सन्मुख वैसे। चिल्लाये सब लोग- अरे आया, वह आया हाय! करें क्या? मरे, आज सत्ता ने खाया। ठाकुर ने ललकार उन्हें तब डांट लगाई भरी धरी थी निकट, विकट बन्दूक उठाई। सीधी कर दी कालरूप भयहरण भवानी, जिसे देख मर गई आज सत्ता की नानी। दुडू-दुडू भूलकर भागना चाहा जैसे- तनी देख बन्दूक डरा-भागूंगा कैसे? मर जाऊंगा, नहीं बचूंगा किसी तरह से, गरजा ठाकुर- अरे, चला आ इसी तरह से। खबरदार, जो उधर-उधर को कहीं हिला है, देखा सत्ता ने कि आज यह गुरू मिला है। हिला जहां बस, देह फोड़ दूंगा मैं तेरी, देख खोपड़ी अभी तोड़ दूंगा“  ऐसी विकट स्थिति देख हेमला दीनता से बोला- ’आदमी हूँ मत मारो; महाराज मैं भूत नहीं हूं, मुझ पर दया विचारो।’ ठाकुर बोला- ’भूत हो कि अवधूत या कि यमदूत बड़ा लेकिन आज तू काजी के सामने है। आज तुझे बचना है तो मेरा कहा मानना होगा, जहां धड़ाका हुआ तो तेरा फड़ाका हो जायेगा। बस, सीधा, चुपचाप चला आ यहां अभी, भगने की भूल न करना। आकर अपना सच्चा हाल सुना दे मुझे, मैं तुझ शैतान को प्राणदान दे दूँगा। कालमुखी को देख हेमला दीन हुआ, सुन ठाकुर के वचन वह बलहीन हुआ। उसने सोचा जो यह कहे आज उसे करना ही होगा नहीं तो बेमौत मारा जाऊंगा। उसने कहा- ’दुहाई अब मुझे गोली मत मारना, अब मैं कभी भूत नहीं बनूँगा, जो हो ली सो हो ली। हुक्म आपका मानकर आपके चरणों में हाजिर होकर अपना दुःखड़ा रोता हूँ, पर नंगा हूं, इसीलिए कुछ शरमाता हूँ, मारो मत मैं हाथ जोड़ता हूँ। तब ठाकुर ने एक दुपट्टा फेंक उधर को कहा- इसे पहन, चला आ शीघ्र इधर। उसे पहन कर पास हेमला उनके आया। कर प्रणाम, कुछ दूर बैठ, सब हाल सुनाया। सुनकर हाल ठाकुर बोला- अरे दुष्ट, पापी, हत्यारे, डरा-डराकर तूने क्यों इतने लोगों को मारा? तो हेमला ने बोला- ’कहां मैंने मारे हैं? वे तो अपने आप सारे डर कर मरे हैं। ’अच्छा तो दुडू-दुडू की बदमाशी क्यों करता था सत्यानाशी? जो डरते थे उन्हें और डरवा देता था, अरे मूर्ख तभी तो उनके प्राण निकल जाते थे।  तब हाथ जोड़कर हेमला ने विनती कि मुझे माफ करें, मेरा चोला बदलवा दीजे हुजूर।’ ठाकुर बोले- अभी चार दिन मेरे लौटने तक इसी ठौर पर जमा रह। जब ससुराल लौटकर आऊंगा तो तुझे बड़े गाँव ले जाऊंगा। यह मेरा कर्तव्य है मैं उससे मुंह नहीं मोडूंगा। तुझे भूत से आदमी बनाकर रहूँंगा।’ हेमला बोला- आपकी कृपा बड़ी है पर अब मेरे लिए एक घड़ी भी बरस के बराबर है। सर्वसुखी जो कभी हेमला जाट रहा था भूत योनि में पड़ा, कठिन दिन काट रहा था। उसका यों उद्धार आपने आज किया है, मरे हुए को जिला कर नया नर जन्म दिया है। मैं आपका कृतज्ञ हूं मैं आपका सेवक हूं और आप हैं मेरे स्वामी। बहुत रह लिया, नहीं यहां अब रह सकता हूं। भूतपने के कष्ट नहीं अब सह सकता हूँं। गांव नहीं तो साथ आपके रहूंगा। अपनी बीती आप कहानी वहां कहूंगा।’  ठाकुर को बात पसंद आई कि “इसका शोर इधर सब ओर बड़ा है, विकट भूत यमदूत हेमला नाम बड़ा है। मारे जिसने पटक खलीफा जी को ऐसे वह सत्ता फिर कहो, मनुज हो सकता कैसे। होगी किसको भला हेमला से यह आशा। होगा निस्संदेह विलक्षण बड़ा तमाशा। आयेंगे वे लोग मुझे मिलने जैसे ही भागेंगे सब देख हेमला को वैसे ही। हुल्लड़ होगा, एक बड़ी दिल्लगी रहेगी, इस प्रकार से वहां हास्य की नदी बहेगी।“  यही सोच ठाकुर ने अपने साथियों से कहा-“हेमला भूत हमारे साथ चलेगा।“ सुनकर हुक्म ठाकुर का हेमला बहुत खुश हुआ। हाथ जोड़कर बोला- कई दिनों से भूखा हूँ सरकार, खाना मिल जाता तो! ठाकुर ने नौकर से खाना देने को कहा तो वह डरकर दूर से उसे खाना देने लगा तो ठाकुर बोला- अरे, इतनी दूर, किसलिए खड़ा है, किस बात का डर है, यह भूत नहीं है। लेकिन नौकर के लिए उसके पास जाना सहज नहीं था उसने दूर से ही खाना फेंका तो ठाकुर ने हंसकर कहा- ’अरे यह भूत नहीं है, देखो यह खाना खा रहा है, जला नही है, मरा नहीं है, क्या तुमने अभी इसकी कथा नहीं सुनी है।“  लेकिन नौकर-चाकर सभी बडे़ भयभीत थे, वे यही सोच रहे थे कि “ठाकुर चकमे में हैं। भला हेमला भूत किसके बस में आया है? छल से आज यह मरघट का बना हुआ है हाऊ और ठाकुर बछिया का ताऊ।“ ठाकुर ने समझाया पर उन्हें पूरा विश्वास नहीं हुआ, किसी को पौंन तो किसी का पूरा अधूरा रहा।          
ठाकुर ने फिर हुक्म दिया- तैयारी हो अब। झट से ऊंट कसे गए और सभी तैयार हो गए। दो-दो कर प्रत्येक ऊंट पर चढ़े। केवल एक अकेला ऊंट पर नाई चढ़ा। उसे ठाकुर ने हुक्म दिया कि वह हेमला को अपने साथ बिठा ले। इस पर नाई बोला- अगर वह मुझे खा ले तो? यह सुनकर ठाकुर हँसने लगा तो उनके साथ सभी नौकर-चाकर हँसने लगे। नाई बोला-’भूत हो या आदमी की खाल चढ़ा भूत, मैं तो पैदल ही चलूंगा।’ यह सुनकर जब ठाकुर ने उसे फटकार लगाई तो उसने हेमला को पीठ पिछाड़ी बिठाया। नाई चलते-चलते सोच-विचार करने लगा- ’यों कि इसी ने गांव उजाड़ा, मारे आदमी मारे, मौलवी पटक पछाडा। सिवा भूत के कौन प्राण यों हर सकता है। क्या ऐसा अन्धेर आदमी कर सकता है। हाय! आज हो गया हमारा ठाकुर उल्लू, और साथ ही बना दिया मुझको भी भुल्लू। मैं बातों में भूल, फंसा हूं भूत-जाल में, अब है बचना कठिन, पड़ा है काल-गाल में।“  तमाम उल्टी-सीधी बातें सोचकर नाई का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, कलेजा कांप रहा था, वह भयभत होकर भूत को भांप रहा था। वह देख रहा था कि जाने कब यह सत्यानाशी अपने पैर बढ़ा देगा या फिर उसके शरीर में दांत गड़ा देगा। वह रह-रह कर इधर-उधर ताक-झांक कर रहा था। उसका ऊंट बोदा था इसलिए सभी से पिछड़कर दस हाथ पिछड़ गया। इतने में हेमला को छींक आई तो नाई ’हाय! मुझे खा लिया’ कहकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। ठाकुर को जोर की आवाज सुनाई दी तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा कि नाई सिर के बल गिरा हुआ है। ठाकुर चिल्लाया- अरे कैसे गिर पड़ा नाई? हेमला बोला- मुझे जोर की छींक आई थी, जैसे ही छींका, यह चिल्ला कर ऊँट से गिर पड़ा। ठाकुर ऊँट से उतर कर नाई के पास आया तो देखा सब लोग घबराये थे। नाई पत्थर पर गिरा था। उसकी नब्ज छूट गई थी, खोपड़ी फूट गई थी, गर्दन टूट गई थी, वह निष्प्राण पड़ा था। खेतासर से अभी आधा कोस भी नहीं बढ़े कि श्रीगणेश कर दिया हाय! इसी भांति कौन जानता है कि अभी किस-किस के प्राण लेगा? आप मानते ही नहीं? इसे साथ न लो यहीं रहने दो, यों सब साथी ठाकुर से विनती करने लगे। हेमला बोला- हाय! मेरी तकदीर अभागी है, निर्दोष होकर भी पाप का भागीदार बन रहा हूँं। ठाकुर बोले- चलो लौटकर अब खेतासर चलकर इस नाई का ताल किनारे दाह करो। दाह कर सभी ने ताल में नहाया। इतने में शाम हो गई। ठाकुर ने सोचा- यह व्यर्थ ही हँसी-हँसी में अनर्थ हो गया। इसी तरह से और लोग भी डर सकते हैं, बिना मौत ही मूर्ख मर सकते हैं। हेमला को साथ ले जाना उचित नहीं होगा। इसे पहले बड़े गांव पहुंचाना होगा। अब बड़े गांव की तैयारी हुई। हेमला आफतों का परकाला एकदम खाली ऊँट पर सवार होकर चला।       
          संध्या का समय था। जैसे ही ठाकुर अपने लाव-लश्कर के साथ गांव पहुंचा, अरे, हेमला भूत, हेमला भूत चिल्लाते हुए लोग इधर-उधर भागने लगे। यह देखकर ठाकुर ने सबको समझाया- ’मत भागो, मत डरो, हेमला भूत नहीं है, इसे पकड़ कर आज मैं अपने साथ लाया हूँ।’ फिर ठाकुर ने बीच गांव में डेरा डाला और खेतासर के सभी लोगों को बुलवाया। सभी लोग इकट्ठे हुए, सभी अचरज कर रहे थे, कुछ डर के मारे बहुत दूर से ही देख रहे थे। ठाकुर ने बैठकर पहले सबको स्वयं थोड़ा-बहुत हाल सुनाया फिर पूरा-पूरा हाल पुनः हेमला से सुनवाया। हाल सुनने के बाद ठाकुर बोला- ’सुन ली सत्य कहानी? यों लोगों ने भूत बनाकर नादानी की। तब लोग हेमला से बोले- ’हेमला, दादा, चाचा, तू मनुष्य है? फिर क्यों तू भूत बन नंगा नाचा, खूब सताया और गांव से हमें निकाला। तूने दुडू-दुडू कहकर कितनों को मार डाला।’  गांव वालों की बात सुनकर हेमला दुःखी होकर बोला- ’अब मैने दुडू-दुडू छोड़ दिया है। मैंने बड़ा अनर्थ किया, यह बात सही है, मुझे सब लोग क्षमा करो मेरी यही विनती है।’ इतना सुनकर भी गांव को पूरा विश्वास नहीं हुआ कि हेमला भूत नहीं है, इसलिए वे ठाकुर से बोले- ’प्रभुवर, इसे रात भर अपने पास रखिए, जैसी कृपा अब तक की, इतनी कृपा और कर दीजिए। रात बीतने और सवेरा होने दीजिए।’ यह प्रस्ताव जब ठाकुर के संगी-साथियों ने सुना तो वे डरे, मन में सोचने लगे कि यह बात तो बड़ी बेढ़ंगी है। वे चिन्ता करने लगे कि जाने हेमला भूत ठाकुर को जीवित छोड़ता है या मार डालेगा? लेकिन वे विवश थे, किसी को रात भर नींद नहीं आई, जाग कर किसी तरह सबने रात बिताई। इस तरह रात भर ठाकुर के पास हेमला रहा और जब सवेरा हुआ तो सभी लोग वहाँ एक इकट्ठा हुए।  
सभी लोगों ने ठाकुर को जीवित देखा तो ज्यादातर लोगों को विश्वास हो गया कि हेमला भूत नहीं है। तब ठाकुर ने कहा- एक नाई बुलवाओ और हेमला के बाल काटकर उसे नहलाओ। डरते-डरते बड़े गांव वाला नाई हेमला के पास आकर बैठा और उससे बोला- ’अरे हेमला तू भूत नहीं है, मरा नहीं है?’ हेमला बोला- अरे मरा कभी लौटता है क्या?’ ’तो उस दिन क्यों दुडू-दुडू कह मुझे डराया। कब का बदला लिया तूने मुझसे? क्यों तूने नाइन को खाया। मैंने भला कौन सी तेरी चोरी कर दी जो तूने मेरी गृहस्थी चौपट कर दी।’ यह सुनते ही हेमला बोला- ’याद है तुझको नाई, तूने ही तो उस दिन नाइन से मुझे आत्मघात कर विकट भूत बनकर घूमने वाला बताया था। तेरी बात सुनकर ही मुझे भूत बनने की सूझी।“ नाई बोला-“अरे, मैंने समझ-बूझकर थोड़े कहा था, मैंने तो नाइन से दिल्लगी की थी। वह डरती है या नहीं उसकी परीक्षा ली थी। मैं नहीं जानता था कि दैव मेरे साथ छल करेगा।“ यह बात सुनकर ठाकुर बोला- “झूठ हंसी में भी खलता है।“ सुनकर ठाकुर की बात नाई बहुत पछताया। हेमला की हजामत बनी और उसने खूब नहाया। कपड़े पहनकर ठाकुर से हाथ जोड़कर बोला- “आज भूत का चोला छोड़ मैं फिर से मनुष्य हुआ हूँ। इसके लिए मैं आपका ऋणी रहूंगा। सदा आपके गुण गाता रहूंगा। आप न मिलते तो मैं भूत बनकर ही किसी दिन मरकर पड़ा रहता।“  हेमला को कृपा दृष्टि से देख कर ठाकुर ने सबसे कहा- “सुनो, अब से भूलकर भी भूत से नहीं डरना। भूत-भाव के भय से देखो कैसे सबने हेमला को मनुष्य से भूत समझ लिया, यह प्रत्यक्ष उदाहरण तुम्हारे सामने है।“
(मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)

हेमलासत्ता   [भाग- 1]

हेमलासत्ता [भाग- 1]

एक छोटे से गांव खेतासर में हेमला जाट रहता था। उसके घर में दूध, पूत, धन, धान्य सभी था। सभी तरह से उसकी जिन्दगी सुखपूर्वक कट रही थी। उसकी अपनी प्रिय पत्नी से हमेशा प्रेमपूर्वक खूब पटती थी। वह हमेशा अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों से घिरा रहता था। सब कुछ होते हुए भी एक कसर बाकी थी कि वह अनपढ़-अज्ञानी ‘काला अच्छर भैंस बराबर’ था। एक बार अचानक उसकी घरवाली बीमार पड़ी और उसने खाट पकड़ ली। जाट पर इस बार भारी विपत्ति टूट पड़ी। उसने खूब दौड़-धूप की, किन्तु कोई चारा न चला, किसी देवता ने भी कोई सहारा न दिया। अंततः उसकी प्रिय पत्नी उसे छोड़ चल बसी। यह देख वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना सुनकर आस-पड़ौसी आए और उसे ढ़ांढ़स देने लगे, लेकिन हेमला की समझ में कुछ नहीं आया। उसने एक रट पकड़ ली कि वह भी सन्तो की मां के संग सत्ता होगा। उसकी ऐसी बात सुन सभी लोग आश्चर्यचकित हुए और उसे समझाने लगे- ‘क्यों व्यर्थ ही बक रहा है, रहने दे रहने, पति संग पत्नी को सती होते तो सुना है हमने, लेकिन कभी यह नहीं सुना कि पत्नी संग कोई पति सत्ता हुआ हो।’ लोगों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। वह लोगों से कहता अगर उसे किसी ने रोका तो उसे सत्ता का शाप लगेगा। उसके ऐसे बोल सुन लोग सोच विचारने लगे कि यदि वह अपने प्राण गंवाता है तो गवाएं, हम उसके शाप के भागीदार क्यों बने। विवश होकर सभी लोगों ने शव यात्रा की तैयारी की और चुपचाप श्मशान की ओर चलने में ही भला समझा। शव यात्रा में हेमला हाथ में श्रीफल लेकर संसार से हमेशा नाता त्यागने की प्रबल इच्छा से ’हर-हर’ कहता हुए आगे-आगे चलने लगा तो यह देख स्त्रियाँ मुक्तकंठ से उसकी प्रशंसा करने लगी, कहती- 'अद्भुत पत्नी प्रेम है हेमला का, धन्य है हेमला की पत्नी जिसे ऐसा पति मिला जो उसके साथ सत्ता होने जा रहा है।’ जब हेमला ने अपनी प्रशंसा सुनी तो उसका उत्साह चरम सीमा पर पहुंच गया। वह श्मशान घाट पहुंचने तक जोर-जोर से हर-हर की रट लगाता आया। श्मशान ताल से कुछ दूरी पर था, जहां कुछ ही दूरी पर पीलू का एक घना पेड़ था, उसी के पास चिता सजाई गई। एक बार फिर अंतिम बार बड़े बुजुर्गों ने हेमला को समझाना चाहा किन्तु सब व्यर्थ गया, वह न माना और सूर्य की ओर हाथ जोड़कर उछलकर हर-हर कहता हुए चिता में जा बैठा। संध्याकाल का समय था। सूर्य छिपने वाला था। हेमला तब तक 'हर हर’ की रट लगाता रहा जब तक उसके शरीर को लकड़ियों से पूरी तरह ढ़क न लिया गया। पूरी लकड़ी लगाने के बाद हेमला की आज्ञा लेकर जब चिता पर आग लगाई गई तब काले धुंए के साथ कुछ ही क्षण बाद उससे धू-धू कर भयंकर लपटें निकलने लगी। तेज लपट लगने से हेमला का जब तन झुलसने लगा तो उसका ज्ञान-विराग और पत्नी राग जाता रहा। असहनीय पीड़ा ने उसे भगने पर मजबूर कर दिया। अकुलाकर वह झट से चिता से बाहर उस ओर कूदा जहांँ अंधकार के कारण किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी। वह पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया।        
          आग की लपटों में जले-भुने हेमला के अंगों में भयंकर पीड़ा हो रही थी। वह व्याकुल, व्यथित, विहाल, रात भर सिसकता रहा। बड़े सवेरे उठकर घिसटता जब उसने गूलर खाकर पानी पिया तो उसे कुछ राहत मिली। गांववालों के जागने से पहले वह यह सब काम करके वापस पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया। वह सोचता रहा कि इतने कष्ट सहते हुए वह कब तक यहां छिपा पड़ा रहेगा। एक पल को उसने सोच विचार कर गांव जाकर अपना सच्चा हाल सुनाने का मन बनाया लेकिन दूसरे पल ही सोचने लगा कि वह किस मुंह बेशरम बनकर गांव लौटेगा, लाखों लानतें देंगे लोग। उससे यह बात हरगिज नहीं होगी। वह जीते-जी गांव नहीं जा सकता। इससे अच्छा तो वह जंगम-जोगी बनकर परदेश चला जाय। अगर वह गांव जायेगा तो शरम के मारे मर जायेगा। ऐसी बात मन में सोचकर हेमला उदास होने लगा और मरघट वासी बन गया। उसी जगह वह कभी बीन-बीन कर गूलर खाता कभी छिप-छिपाते बकरियां पकड़ उनका दूध लगाकर पी जाता। यूं ही छिपते-छिपते बारह दिन हो गये। उसके जलने के घाव भी अच्छे हो गये। तेरहवीं के दिन उसे याद आई कि आज तो उसके घर में खूब मालपुए, पूड़ी-साग बना होगा, लेकिन क्या करें अब कोई उसके लिए पीलू के पेड़ के नीचे तो पत्तल परोस के नहीं लाने वाला है, इसलिए वह मन मसोसकर रह गया।
            हर तेरहवीं की तरह ही इस बार भी खेतासर में बड़े गांव से नाई अपनी पत्नी सहित आया, किन्तु शाम तक काम पूरा न होने से उन्हें देर हो गई। मालपुओं की गठरी बांधे वे दोनों पहर रात आपस में बतियाते हुए मरघट से निकले। अचानक नाई को दिल्लगी सूझी वह नाइन से बोला- ’सुनो प्यारी! जाट हेमला यहीं सत्ता हुआ था।’ नाइन बोली- ’उसका प्रेम अलौकिक था।’ यह सुनकर नाई हंसकर बोला- ’नहीं रे, व्यर्थ ही मूढ़ मति हेमला ने आत्महत्या की, अब तो वह विकट भूत बनकर यहीं-कहीं भटक रहा होगा।’ इतना सुनते ही नाइन बिगड़कर बोली- ’ऐसी बात न करो जी, भला क्यों ठिठोली कर रहे हो, मुझे डर लगता है।’ पेड़ की आड़ से हेमला चुपचाप नाई-नाइन का कथन सुन रहा था। उसने सोचा- ’क्यों न इनका संशय सच में दूर कर दूं। विकट भूत का रूप धारण कर जीते-जी संसार के बीच मरकर देखूं।’ झट से हेमला पहले पेड़ में चढ़ा और उसे जोर-जोर से हिलाते हुए बम से नीचे कूदा तो यह देख नाई-नाइन थर-थर कांपने लगे। काले-काले बिखरे बाल, नंग-धड़ंग वह लमटंगा जैसे ही ’दुड़ू-दुडू़’ कर उनके सामने आया तो नाई-नाइन उल्टे पैर भागे, लेकिन नाइन गिरकर चिल्लाई तो फिर न उठ सकी, उसकी सांसे वहीं थम कर रह गई। मालपुए की टोकरी लेकर हेमला वापस आ गया और यह सोचकर हंसने लगा कि विकट भूत का वेश भला है और बोला- 'चलो आज का श्रीगणेश हो गया है।' बद्हवास नाई गांव वापस आकर चिल्लाया- ’अरे! हेमला भूत हाय! उसने नाइन को खा लिया। यह कहते-कहते बेहोश हो गया। उपचार करने पर जब उसकी चेतना वापस आई तो वह हेमला के बच्चों को रोते-रोते यों हाल सुनाने लगा-
"था पूरा पच्चीस हाथ, काला काला-सा,
बड़े बड़े थे दांत, हाथ में था भाला सा।।
’दुडू-दुडू़’ कह, कूद सामने आ ललकारा;
बोली से पहचान लिया, था बाप तुम्हारा।
मारी पटक, पछाड़ हाय रे! नाइन मारी,
भाग बचा मैं, भाग न पाई वह बेचारी।
अरे चलो झट, हाय! मार ही डाली होगी;
पड़ी धूल में देह प्राण से खाली होगी।"
इस प्रकार विकल, विलपता नाई मन ही मन और भी दुःखी हुआ कि उसकी दिल्लगी उसे भारी पड़ गई। यों रात को हल्ला-गुल्ला सुन पूरे गांव के लोग हेमला के घर इकट्ठा हुए और वहीं सबने रात बितायी। सुबह-सुबह मौके पर पहुंचे तो नाइन को मृत देख सभी डरे, चौंके और चकराये। उन्हें पूर्ण विश्वास हो चला कि यह काम हेमला भूत का ही है। जल्दी से लोगों ने नाइन की वहीं चिता बनाई और नाई को ढ़ांढ़स देकर क्रियाकर्म की विधि पूरी करवाई। यों ही श्मशान में बहुत देर तक लोग बातें करते रहे, लेकिन मालपुओं की किसी को याद नहीं आई।
            दिन चढ़ते ही पूरे गांव में हेमला की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। कोई कहता हेमला का अत्याचारी भूत प्रकट हुआ है, जिसने राह चलते रात को नाइन को मार दिया है। कोई कहता रात-विरात भूलकर भी उस राह नहीं जाना। हेमला बहुत बड़ा भूत है। कब किसको खा जाय कोई नहीं जानता। इन सब बातों से बेखबर हेमला मरघट में छिपा रहा। मालपुए खाकर उसका मन तृप्त हुआ तो उसे आत्मग्लानि हुई,सोचने लगा- ’हाय हेमला! यह तूने क्या किया एक निरपराधिनी को मार दिया, उसने तेरा क्या बिगाड़ा था। बहुत बुरा है हमेशा भूत-भड़ंग बनकर मरघट में छिपे रहना। कब तक यूं दुःख सहता रहूंगा।’ यह सोचते-सोचते जैसे ही हेमला पेड़ की आड़ से बाहर आया तो उसने कुछ दूरी पर मुखिया को अकेला खड़ा देखा तो मारे खुशी के उछल पड़ा। वह विचारने लगा कि अगर मुखिया के पास जाकर अपना हाल सुनाऊँ तो इस दुःखिया का बेड़ा पार हो जाय। फिर सोचता कहीं अगर वह मुझे देख डरकर भागने लगे तो जाकर एकदम से उनके पैर पकड़ लूंगा।’ यही सोच उसने दबे पांव, चुपचाप पीठ-पीछे से जाकर अचानक मुखिया के पैर पकड़ लिए। मुखिया 'कौन' कहकर चिल्लाया तो 'हेमला' का नाम सुना तो चिल्लाया- ’अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ कहते हुए गिर पड़ा, जिसे देख हेमला बहुत घबराया। खेतों में कुछ दूरी पर लोग काम रहे थे, मुखिया के शब्द सुनकर लोगों ने उस ओर देखा तो उन्हें हेमला के बड़े-बड़े बाल, नंग-धड़ंग शरीर दिखाई दिया। दिन-दोपहरी में भूत देखकर लोग घबराकर अनहोनी की बात से भयाकुल होकर चिल्लाने लगे- ‘अरे, हेमला भूत खड़ा है ताल-किनारे; देखो, उसने पटक हाय! मुखिया जी मारे’ मुखिया को बेहोश देख मरघटिया हेमला भागा और अभागा पीलू के पेड़ की आड़ में छिपते हुए सोचने लगा- अरे, चला था अच्छा करने, किन्तु बुरा हो गया। अब क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता क्यों विधाता मुझसे खपा हो गये हैं। जाने क्या लिखा है मेरे कपाल में, भूतपने से मुक्ति दीखते नजर नहीं आ रही है। उधर गांव के लोग मुखिया को उठा लाये। उन्हें बेदम बुखार चढ़ा, दस्त लग गये। वे बेहोशी में चौंककर चीख पुकार मचाते- ’वह आया-अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ रात भर यों ही मुखिया बेचारा पड़े रहे और सवेरे लोक छोड़ परलोक सिधार गए। जब मुखिया की चिता तैयार हुई तो सत्ता ने सोचा दो हो गए। जब से मुखिया मरा, हेमला की धाक जम गई। लोग रात क्या दिन में उस जीवित जमदूत, भूतों के ताऊ के इलाके में जाने से डरने लगे। मुखिया की तेरहवीं पर मालपुए और पूड़ी-साग की बात सोचकर उसके मुंह में पानी आया तो उसका मन विकल हो उठा। तन-मन में संग्राम मचा। जाय तो किधर जायें। तन पर मन की जीत हुई तो बुद्धि चलाई और इधर-उधर से जोड़कर लकड़ियां लेकर आग जलाई। वहीं चिता की आग के लिए लाई हुई काली-काली हांडिया दिखी तो उन्हीं में आग भरकर खुरापात करने गांव की ओर निकल पड़ा। गांव के नजदीक आते ही उसने एक हांडी से आग उछाली और भयंकर आवाज के साथ उसे जोर से पत्थर पर दे पटका तो ऐसा दृश्य देखकर गांव वाले भोजन की पत्तल छोड़कर भूत-भूत कर भागने लगे। उसने एक-एक कर भयंकर आवाज के साथ आग और हांडी से तमाशा किया, जिसे देख लोगों में भगदड़ मची तो मौका पाकर वह उछलता-कूदता उनके बीच गया और वहां पहुंचकर उसने कुछ को उछल-उछल कर दो-चार लाते जमाई और मालपुओं की डलिया लेकर भाग खड़ा हुआ। डरे-सहमे गांव वालों ने मिलकर जैसे-तैसे रात काटी और सवेरा होने पर गांव छोड़ने की ठान ली। अब वे बड़ा गांव रहेंगे। हद हो चुकी, कब तक त्रास सहेंगे। पापी हाथ धोकर पीछे पड़ गया है। भूत है कि यमदूत। कहीं नहीं सुना ऐसा। इसके मारे कोई काम नहीं कर पायेंगे, नाइन और मुखिया की तरह एक दिन सबको खा जायेगा। खेत भले ही बड़े हैं किन्तु प्राणों से प्यारे नहीं हैं। हमारी जमीन, धन, धान्य सभी बाद में हैं। सभी एकमत हुए कि गांव छोड़ने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। अपना-अपना सामान बैलगाड़ियों में लादकर सारे गांव वाले खेतासर खाली करके चल दिए। दुःखी मन राह सोचते कि इस पिचाश ने तो मां से मोह तोड़ा है और जन्मभूमि का वास छुडा दिया है।           
         इस प्रकार रोते-कलपते खेतासर गांव के वासी उदास होकर गांव छोड़कर उसे सूना छोड़ गए। इस घटना का शोर जब हेमला के कानों तक पहुंचा तो वह खेतासर गांव के घर-घर में घुसकर घूमने-फिरने लगा। देख-दाख कर फिर पीलू के पेड़ की आड़ में छिप जाता। वह अपना पूर्ण प्रताप देख फूला न समाता। अब उसे उजड़े गांव से नहीं मरघट से लगाव हो गया। उस पर भूतपने का रंग बहुत चढ़ चुका था, इसलिए उसका लौटना कठिन हो चुका था। वह कभी मरघट से चहल-कदमी करते हुए गांव निकल पड़ता, जहां सुनसान घरों में उसे कुछ न कुछ खाने को मिल जाता। खेतों से भी पेट भरने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता। यों दुःख को सुख जान हेमला जाट सुखी था, किन्तु पूर्व स्मृति के कारण उसका हृदय दुःखी था। खेतासर गांव वाले बड़े गांव जाकर बस गए। बेचारे प्रेत सत्ता के मारे करते भी क्या? बड़े गांव में एक दिन घोड़े पर चढ़कर शाही हुक्म लेकर एक रौबदार सिपाही आया। बना-ठना था ऊपरी पैसा खाकर। नाई पर उसकी नजर पड़ी तो बोला- ’चल बे! इधर आ, पहले मेरे घोड़े का पानी पिला, फिर मेरी हजामत बना और मुझको नहला भी दे। जल्दी कर हुक्म की तामील।’ नाई को उसकी अकड़ बुरी लगी, उसने उसे टरकाना चाहा, बोला- ’पानी का यहां बड़ा संकट है सरकार, लेकिन यहां से थोड़ी दूर एक लबालब ताल है, वहीं कृपा कर आप कष्ट करें तो खूब नहा लें आप और घोड़ा भी।’ नाई की बात सुन सिपाही बहुत खुश हुआ बोला- ’क्या खूब गहरी मनचाही छाया भी है वहां? नाई के हाँ कहने पर वह बोला अच्छा तो वहीं ले चल। वहाँ चलने की बात सुनकर नाई घबराकर मन में सोचने लगा- अरे मेरी चतुराई तो चौपट हो गई। मैंने तो अपनी बचत सोच आफत टाली थी। खेतासर की बला सिपाही पर डाली थी। वह यह न समझा था कि साथ में जाना होगा और मुझे वहां इसे नहलाना होगा। नाई को चुप देख सिपाही ने भौंह चढ़ाई- ’क्यों बे! चुप हो गया, क्या तेरी नानी मर गई।’ नाई चौंका, सोचने लगा लगता है अब तो नाइन के बाद उसी की बारी है। इसलिए वह विनती कर गिड़गिड़ाने लगा-’ महाराज! जब से नाइन और मुखिया मरे है और खेतासर उजड़ा है, तब से ताल पर मनुष्यों का नहीं केवल भूतराजा हेमला का राज है।’ उसकी बात सुनकर सिपाही बिगड़ते हुए बोला- ’अबे! उल्लू के पट्ठे, बदमाश, क्या मैं ही मिला तुझे ठट्ठा करने के लिए? सुन बे! हम कचहरी के पक्के जिन्दा भूत हैं, जिस पर लग जाते हैं उसके छक्के छुड़ा देते हैं। चल, आज दिखाई तो दें वह भूत, देखता हूँ उसे भी।’ सिपाही ने नाई को बहुत समझाया कि भूतवूत कुछ नहीं होता, वह उसे वहां ले चले, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो सिपाही ने जैसे ही चार तमाचे उसके आंखों के नीचे जड़े तो उनसे चिन्गारियां क्या निकली कि वह झट से मान गया। ’चलता है या नहीं कि खाएगा अब कोड़े?’ दोनों हाथ जोड़कर ’चलता हूँ सरकार’ कहते हुए सिर पर घास रखकर, घोड़े के आगे-आगे नाई गुमसुम चल दिया। देखने वाले भाग खड़े हुए। खेतासर का ताल सिपाही के मन भाया, उसमें स्वच्छ जल भरा हुआ था, पेड़-पौधों की घनी छाया देख वह खुश हुआ, लेकिन नाई का हृदय धुकुड़-पुकुड़ कर रहा था। घोड़े को खूंटे से बांध उसे घास डालकर नाई चौकन्ना होकर सिपाही की खोपड़ी घोंटने बैठ गया। वह कभी इधर कभी उधर देखता जा रहा था। अभी सिपाही की आधी खोपड़ी घुट पाई थी कि नाई को दूर से हेमला आता दिखाई दिया तो उसकी अकुलाहट बढ़ गई, वह थर-थर कांपने लगा। उसकी थर-थर्राहट से सिपाही चिल्लाया- ’क्यों बे क्या हुआ? क्या बिच्छू ने काट खाया तेरे को।’ इतना सुनते ही ‘जाता हूँ, ले देख, वह तेरा बाप आया‘ कहकर नाई नौ दो ग्यारह हो गया। झुंझलाते हुए सिपाही उठा और इधर-उधर देखने लगा। उसने देखा सचमुच भूत उसी की ओर आ रहा है। उसका दिल दहल गया, सोचने लगा- यह कौन बला है? उसने देखा कि उसके सिवा दूर-दूर तक कोई नहीं है। सब ओर सूना है तो उसका मन बहुत घबराया। इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता जैसे ही दुडू-दुडू का भयानक शब्द उसे सुनाई दिया उसकी देह थर-थर थराई, वह फुर्ती से घोड़े की खूंटी खोले बिना ही उस पर एड़ लगाकर सड़ा-सड़ कोड़े बरसाने लगा। घोड़ा हिनहिनाते हुए खूंटी उखाड़कर भाग खड़ा हुआ। जैसे ही घोड़े की चाल बढ़ी तड़ा तड़ पीछे से खूंटी सिपाही के सिर पड़ने लगी। भूत का डर उसकी खोपड़ी में बैठ गया। वह समझा कि मुझे और कोई नहीं भूत मार रहा है। पीछे तरफ घुटी-घुटाई साफ खोपड़ी में ज्यों-ज्यों मार पड़ी वह बड़बड़ाने लगा- ’अब मत मार, धरम की कसम है तुझे। तौबा-तौबा, अरे माफ कर, मुझे, न मार, मैं तेरी पूजा कराऊंगा, कभी ताल पर नहीं आऊंगा, सत्ते! तुझको पूजने के बाद ही शहर वापस जाऊंगा।’ इधर हेमला तालियाँ बजाकर खूब हंसा उधर सिपाही गांव के पास बेहाल होकर गिरा। घोड़ा पास ही घुप्पू बन खड़ा हुआ था। समाचार सुनकर बड़े गांव का मुखिया आया। सिपाही को बेहोश देख बहुतेरे उपाय किए लेकिन उसने मुंह नहीं खोला, पहर रात सिपाही चल बसा। यह देखकर नाई ने खूब नमक-मिर्च लगाकर बढ़ा-चढ़ाकर किस्सा सुनाया। 

निरंतर .........                                                                  (मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)
कई रोगों की जड़ है  तम्बाकू/धूम्रपान

कई रोगों की जड़ है तम्बाकू/धूम्रपान

तम्बाकू/धूम्रपान जनित कुछ प्रमुख रोगों के बारे में जानिए और आज ही छोड़ने का संकल्प कीजिए 
  • कैंसर: तम्बाकू के धुएं से उपस्थित बेंजपाएरीन कैंसर जनित रोग होता है। लगभग 95 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मरीज धूम्रपान के कारण होते हैं। विपरीत धूम्रपान मुख कैंसर का कारण होता है। विपरीत धूम्रपान में सिगार का जलता हुआ सिरा मुख में रखा जाता है। विपरीत धूम्रपान आंध्रप्रदेश के गांवों में सामान्य होता है। बीड़ी के धूम्रपान के कारण जीभ, फैरिंग्स (गला), लैरिंग्स, टांन्सिल एवं ग्रासनली के कैंसर हो जाता है। होंठ कैंसर सिगार एवं पाइप के द्वारा होता है। तम्बाकू चबाने से मुख कैंसर होता है
  • टी.बी. (तपेदिक): धूम्रपान से हमारे भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं। तपेदिक के जीवाणु संक्रमति व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं।
  • खांसी एवं ब्रोंकाइटिस : तम्बाकू के धूम्रपान से फैरिंग्स और ब्रोंकाई की म्यूकस झिल्ली उत्तेजित होने के कारण खांसी एवं ब्रोंकाइटिस हो जाता है।
  • हृदय संवहनी रोग : तम्बाकू के धूम्रपान के कारण एड्रीनील का स्त्रावण बढ़ जाता है जिससे धमनियों के संकुचन द्वारा रक्त दाब, हृदय स्पंदन की दर में वृद्धि हो जाती है। उच्च रक्त दाब हृदय संबंधी रोगों की संभावनाओं को बढ़ाता है। निकोटीन हृदय के द्विपट कपाट को नष्ट करता हैं
  • एम्फाइसिमा- तम्बाकू का धुआं फेफड़ों की एल्वियोलाई की भित्ति तोड़ सकता है। गैसीय विनिमय के लिए सतही क्षेत्रफल को कम कर देता है, जिससे एम्फाइसिमा हो जाता है।
  • प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव : यह प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है।
  • आॅक्सीजन वहन क्षमता में कमी : तम्बाकू के धुंए की कार्बनमोनोआॅक्साइड शीघ्रता से आरबीसी की होमोग्लोबिन को बांधती है एवं सह विषाक्तता का कारण होती है, जो हीमोग्लोबिन की आॅक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है


तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है

तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है

अनाड़ी कारीगर अपने औजारों में दोष निकालता है।
पकाने का सलीका नहीं जिसे वह देगची का कसूर बताता है।।

कातना न जाने जो वह चर्खे को दुत्कारने चला।
लुहार बूढ़ा हुआ तो लोहे को कड़ा बताने लगा।।

जिसका मुँह टेढ़ा वह आइने को तमाचा मारता है।
कायर सिपाही हमेशा हथियार को कोसता है।।

जो लिखना नहीं जानता वह कलम को खराब बताता है।
भेड़िए को मेमना पकड़ने का कारण अवश्य मिल जाता है।।

कायर अपने आप को सावधान कहता है।
कंजूस अपने आप को मितव्ययी बताता है।।

बहानेबाजों के पास कभी बहानों की कमी नहीं रहती है।
गुनाहगार को बहाना बनाने में दिक्कत पेश नहीं आती है।।

अनाड़ी निशानेबाज के पास हमेशा झूठ तैयार रहता है।।
तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है।।

....कविता रावत 


कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

जब कोई हमारी प्रकृति की सुरम्य पहाड़ियों की गोद में बसे देवता, ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों की निवास स्थली देवभूमि उत्तराखंड की चर्चाएं मद्यपान के फलते-फूलते कारोबारी के रूप में करता है, तब ऐसी बातें सुनकर मन खट्टा होने लगता है। विश्वास नहीं होता कि सच में क्या यह हमारी वही देवभूमि है जिसके नाममात्र से हम उत्तराखंडी लोग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं? अफसोस! आज जिस तरह से नशे का व्यापार हमारी देवभूमि में अपनी पैठ बनाकर उसकी जड़ों को खोखला करने में लगी है, उससे यह स्पष्ट होता है एक के बाद एक चोला बदलती हमारी सरकारें नींद के झौंके में विकास के नाम पर आम जनता को सुनहरे सपने दिखाकर केवल अपना उल्लू सीधा करने की फिराक भर में हैं।
आज शराब की सुगमता के कारण हमारे शांति प्रिय पहाड़ी गांव विकास के नाम पर ’सूरज अस्त, उत्तराखंड मस्त’ की पहचान बनाने में रमे हुए हैं, जिसमें बड़े-बुजुर्ग, युवा पीढ़ी से लेकर नौनिहाल तक नशे में धुत होकर हमारी पहाड़ी संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डालकर खोखला करने में तुले हुए हैं। वे नशे में मग्न होकर भूल रहे हैं कि धीरे-धीरे वे मानसिक विकृति के शिकार हो रहे हैं, जिससे उनके घर-परिवार में जब-तब गाली-गलौज़, लड़ाई-झगड़े का माहौल निर्मित होने से अशांति के बादल मंडरा रहे हैं।  यद्यपि पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत पहले से ही बीड़ी-तम्बाकू पीना आम बात है, लेकिन जब से यहाँं शराब रूपी दानव ने अपने पांव पसारे हैं, अधिकांश लोगों को इसकी लत लग चुकी है, जो तेजी से उनके तन-मन को खोखला करती जा रही है। शराब के सेवन से न केवल उनकी आंते सूख रहीं है, अपितु किडनी और लिवर सम्बन्धी बीमारियां बिन मांगे शरीर को दुर्बल और असहाय बना रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप समाज और घर-परिवार बडे़ पैमाने पर बिखराव की कगार पर खड़े नजर आ रहेे हैं।
नशा नाश का दूसरा पहलू है। नशा करने या मद्यपान करने के अनेक दुर्गुण हैं। नशे में धुत होकर नशेड़ी अपना होश और विवेक खोकर अपने बच्चों और पत्नी की दुर्दशा करता है। अपना घर-परिवार भूलकर ऊल-जलूल बकते हुए लड़खड़ाते कदमों से गली-कूचों में बेदम पड़ा रहता है। जब कोई वाहन चालक शराब पीकर गाड़ी चलाता है तो वह न केवल अपनी, अपितु दूसरों की जान के लिए भी खतरनाक सिद्ध होता है। ऐसी हालात में कई  घर-परिवार असमय उजड़ते हैं, बर्बाद होते हैं। शराब मानव जाति के लिए किसी भी दृष्टिकोण से लाभदायक नहीं है, इस बात को समय-समय पर ज्ञानी, बुद्धिजीवी, लेखक, चिन्तक एवं विभिन्न समाज सेवी मनीषियों ने भी समझाया है। मिल्टन कहते हैं- ‘संसार की सारी सेनाएं मिलकर इतने मानवों और इतनी सम्पत्ति को नष्ट नहीं करतीं, जितनी शराब पीने की आदत।’ वाल्मीकि ने मद्यपान की बुराई करते हुए कहा है- ’पानादर्थश्च धर्मश्च कामश्च परिहीयते।’ अर्थात् मद्य पीने से अर्थ, धर्म और काम, तीनों नष्ट हो जाते हैं।’ दीर्घनिकाय का वचन है- ’मदिरा तत्काल धन की हानि करती है, कलह को बढ़ाती है, रोगों का घर है, अपयश की जननी है, लज्जा का नाश करती है और बुद्धि को दुर्बल बनाती है।’ मुंशी प्रेमचंद कहते हैं- ’जहां सौ में से अस्सी आदमी भूूखों मरते हों, वहांँ दारू पीना गरीबों का रक्त पीने के बराबर है।’ भगवतीप्रसाद वाजपेयी जी कहते हैं- ’शराब भी क्षय (टीबी) जैसा एक रोग है, जिसका दामन पकड़ती है, उसे समाप्त करके ही छोड़ती है।’ अकबर इलाहाबादी ने चुटकी ली है कि- "उसकी बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर। खैरियत गुजरी कि अंगूर के बेटा न हुआ।।"
शराबबंदी को लेकर देवभूमि की जनता में इन तीनों तीव्र आक्रोश है, जिसमें महिलाओं की भूमिका मुख्य है; क्योंकि शराब पीने वाले तो पुरुष ही होते हैं, जिनका मुख्य काम खाना-पीना और, मारपीट के साथ लड़ाई-झगड़ा कर घर-परिवार और समाज के माहौल को बिगाड़ना भर रह गया है। घर-परिवार को संभालने का काम केवल महिलाओं के जिम्मे ही होता है, जिसे निभाना उन्हें भली-भांति आता है। यही कारण है कि आज महिलाएं शराबबंदी के लिए बढ़-चढ़कर जगह-जगह एक होकर आंदोलनरत हैं। शराब विरोधी  आंदोलन पहले भी हुए हैं लेकिन इस बार विरोध सम्पूर्ण देवभूमि से शराब रूपी  दानव के सदा के खात्मे के लिए है। जब से सुप्रीम कोर्ट के के एक फैसले के तहत् राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे वाली शराब की दुकानों को बंद कर दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने का निर्णय हुआ है, तब से पीड़ित और जागरूक महिलाओं में तीव्र आक्रोश भरा हुआ है। इसी बात को लेकर वे जहां एक तरफ कई जगह शराब की दुकानें खोले जाने के विरोधस्वरूप उग्र प्रदर्शन कर तोड़-फोड़ कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाझाईश देकर शराबबंदी के लिए आन्दोलनरत हैं। आंदोलनकारी अपनी भूख-प्यास, नींद, चैन सबकुछ भूलकर शराबबंदी के लिए एकजुट हो विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैंैं, लेकिन बिडम्बना देखिए अभी तक सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग पायी है। आखिर क्यों सरकार फैसला लेने में असमर्थ है? यह समझना अब आम जनता के लिए भी कोई टेढ़ी खीर नहीं रही है। इसका सीधा सा गणित उनकी भी समझ में आ रहा है शराब के कारोबार से सरकार जो सालाना लगभग 1900 करोड़ की आमदनी होती है, उसके आगे वे उनका दुःख-दर्द, सुख-चैन समझने में अपने आप को असमर्थ पा रहा है। उन्हें आम जनता की नहीं, अपितु इस बात की चिन्ता है कि अगर कहीं शराबबंदी हुई और उनकी आमदनी चली गई तो फिर वे कैसे राज्य के विकास की योजनाओं का खाका खींचने वाले सरकारी महकमों में तैनात अधिकारी/कर्मचारियों के वेतन-भत्ते निकालेंगे, मोटर मार्ग बनायेंगे, स्कूल खुलवायेंगे और बिजली-पानी का बन्दोबस्त करेंगे? इतनी बड़ी राशि का विकल्प न ढूंढ पाने में राज्य सरकार शराबबंदी हेतु असमर्थ और असहाय बनी हुई है। लेकिन आम जनता अब यह भी बखूबी समझने लगी है कि शराबबंदी के लिए सिर्फ यही कारण पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि शराब कारोबारियों की राजनीति के गलियारों तक गहरी पहुंच होने एवं उनकी काॅकटेल पार्टियों के खर्च आदि वहन करने और उन्हें मालामाल करना भी है। 
          कुछ भी हो लेकिन अब सम्पूर्ण उत्तराखंड में हो रहे शराबबंदी के आंदोलनकारियों के इरादों से स्पष्ट है कि अब वे किसी भी प्रकार से सरकार के झांसे में नहीं आने वाले हैं। इसके लिए उन्होंने कमर कस ली है कि अब वे तभी मैदान से हटेंगे, जब उत्तराखंड सरकार पूर्ण शराबबंदी की घोषणा करने के लिए मजबूर न हो जाय। वे दृढ़ संकल्पित हैं कि इस बार वे ‘कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरी छोड़ि अब होब कि रानी।“ की तर्ज पर सरकारों के चोलाबदली और जड़ राजनेताओं के झूठे आश्वासनों के दम पर नहीं, अपितु दुर्गा-काली बनकर देवभूमि से दानव रूपी शराब का खात्मा कर नशा मुक्त देवभूमि का सपना करेंगे।
नशा हटाओ देवभूमि बचाओ ...  कविता रावत 


हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

 22 मार्च पानी बचाने  का संकल्प, उसके महत्व को जानने  और संरक्षण के लिए सचेत होने का दिन है।   अनुसंधानों से पता चला है  कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है। इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं। जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल-आपूर्ति आज के युग की गंभीर समस्या बन गयी है।   बिना एकजुट होकर जागरूक न होने से इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती है।  यदि जल संकट के प्रति हम सचेत और दृढ संकल्पित होकर आगे नहीं आये तो वैज्ञानिक आइन्स्टीन की कही बात सच न हो जाय, जिसमें उन्होंने कहा था की तीसरा महायुद्ध चाहे परमाणु अस्त्रों से लड़ लिया जाय पर चौथा महायुद्ध यदि होगा तो पत्थरों से लड़ा जायेगा और इससे एक कदम आगे बढ़कर नास्त्रेदम ने भविष्यवाणी की थी कि चौथा महायुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा?  यदि इस भविष्यवाणी को झुठलाना है तो पानी की एक-एक बूँद बचाने के लिए हर व्यक्ति को संकल्पित होकर अपने-अपने स्तर  से पहल करते हुए आगे आना होगा।