डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

मुर्गा अपने दड़बे पर बड़ा दिलेर होता है
अपनी गली का कुत्ता भी शेर होता है

दुष्ट लोग क्षमा नहीं दंड के भागी होते हैं
लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं

हज़ार कौओं को भगाने हेतु एक पत्थर बहुत है
सैकड़ों गीदड़ों के लिए एक शेर ही ग़नीमत है

बुराई को सिर उठाते ही कुचल देना चाहिए
चोर को पकड़ने के लिए चोर लगाना चाहिए

कायर भेड़िए की खाल में मिलते हैं
डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

...कविता रावत


'दादी' के आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया ...

'दादी' के आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया ...

          हम चार मंजिला बिल्डिंग के सबसे निचले वाले माले में रहते हैं। यूँ तो सरकारी मकानों में सबसे निचले वाले घर की स्थिति ऊपरी मंजिलों में रहने वाले लागों के  जब-तब घर-भर का कूड़ा-करकट फेंकते रहने की आदत के चलते कूड़ेदान सी बनी रहती है, फिर भी यहाँ एक सुकून वाली बात जरूर है कि बागवानी  के लिए पर्याप्त जगह निकल आती है। बचपन में जब खेल-खेल में पेड़-पौधे लगाकर खुश हो लेते थे, तब उनके महत्व की समझ नहीं थी। अब जब पर्यावरण के लिए पेड़-पौधे कितने महत्व के हैं, इसकी समझ विकसित हुई तो उन्हें कटते-घटते देख  मन बड़ा विचलित हो उठता है।     
         
         बच्चों की धमाचौकड़ी और बुजुर्गों की चहल-कदमीे घर-आंगन की रौनक बढ़ाती है। इस बात को मैंने शिद्दत  से तब महसूस किया, जब हमारे पड़ोस में एक दादी का अपने भरे-पूरे परिवार के साथ आना हुआ। उनके आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि दादी भी मेरी तरह प्रकृति से जुडी हुई हैं। वे 75 वसंत से अधिक देख चुकी होंगी, फिर भी वह 'अपना हाथ जगन्नाथ' के तर्ज पर अपना सारा काम खुद करती है। यही नहीं सुबह-सुबह घर-आंगन को बुहारना, बाग-बगीचे में खाद-पानी देना और फिर चूल्हे पर आग सुलगा कर गरम पानी करना भी उनकी रोजमर्रा की आदत में शुमार है। वे सबके लिए एक आदर्श हैं। वे सबकी दादी है। उनका असली नाम तो मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की, बस इतना जानती हूँ कि जब से उनका आना हुआ, तब से घर-परिवार और मोहल्ले के सभी छोटे-बड़ों को एक दादी मिल गई है।
         दादी को दूसरे लोगों की तरह टेलीविजन से चिपककर किसी भी सीरियल में रूचि नहीं है, वे तो देश-दुनिया की खबर लेने का शौक रखती है। उनके पास अनुभव से भरी भारी तिजारी है। वे पर्यावरण के प्रति सजग और समर्पित हैं। वे अपने बगीचे में ही नहीं अपितु अपने आस-पास पेड़-पौधे लगाकर लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करती हैं। आज के हालातों को देख वे बड़े दुःखी मन से कहती है कि पहले जब बड़े-बड़े कारखाने, उद्योग नहीं थे, तब हमारा वातावरण शुद्ध हुआ करता था, जीवन में तब  न अधिक  भागदौड़ थी न हाय-हाय। शुद्ध अन्न के साथ-साथ  शुद्ध हवा और पानी मिलता था। लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी तो कारखाने, उद्योग और बड़ी-बड़ी इमारते तन गई, फलस्वरूप कारखानों से निकलने वाले धुएं ने हवा को प्रदूषित करने का काम किया और उद्योगों से निकलने वाले बहते रसायनों ने नदियों के पानी में जहर घोल दिया। यही नहीं पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने की रही-सही कसर पेड़-पौधे, खेत-खलियान काटकर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर पूरी कर दी गई, जो आज विश्व भर में  गंभीर चिन्ता का विषय बना हुआ है।
         दादी को मेरी तरह ही प्रकृति से बेहद लगाव है, इसलिए मैं अपने को हर समय दादी के सबसे करीब पाती हूँ। मैंने दादी से मिलकर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है और इसकी शुरूआत हमने पहले अपने घर के बाग-बगीचे से शुरू की और फिर घर के सामने पड़ी बंजर भूमि में पेड-पौधे लगाकर उसे आबाद करने से कर ली है। अब हमारा अपना बाग-बगीचा है और साथ ही है एक अपनी  हरी-भरी बाड़ी, जिसमें हम अलग-अलग तरह के पेड़, फूल और साग-सब्जी उगाते हैं। शहर में  पेड़-पौधे लगना उतना दुष्कर काम नहीं है, जितना उनको शरारती बच्चों, खुरापाती लोगों और आवारा जानवरों से बचाने की चुनौती होती है। लेकिन दादी को कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना करने में महारत हासिल है। आज उनकी निगरानी में पूरी तरह बाड़ी को महफूज देखकर मुझे बड़ी राहत मिलती है। आजकल घर-आंगन में रखे गमलों में सदाबहार, गुलाब, सेवंती, गेंदा आदि फूल खिले हुए है और साथ ही सड़क किनारे बनाई हमारी बाड़ी में पेड़-पौधों और साग-सब्जी के बीच पीली-पीली सरसों फूलने से वासंती रंगत छायी हुई है, जो मोहल्ले और सड़क पर आने जाने वाले शहरी लोगों को वसंत के आगमन की सूचना दे रही है।    
....कविता रावत

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार


राष्ट्रीय त्यौहारों में गणतंत्र दिवस का विशेष महत्व है। यह दिवस हमारा अत्यन्त लोकप्रिय राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष आकर हमें हमारी प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली का भान कराता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीयों के गौरव को स्थिर रखने के लिए डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में देश के गणमान्य नेताओं द्वारा निर्मित विधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। संविधान में देश के समस्त नागरिकों को समान अधिकार दिए गए। भारत को गणतंत्र घोषित किया गया। इसलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कहा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में यह समारोह विशेष उत्साह से मनाया जाता है। 
        विविधाओं से भरे हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता के बावजूद एक ऐसी मजबूत कड़ी है, जो हम सबको आपस में जोड़े रखती है, वह है हम सबके भारतवासी होनी की और इस भारतीय होने की खुशी को प्रकट करने के सबसे अच्छे अवसर हैं, हमारे राष्ट्रीय त्यौहार। बावजूद अन्य त्यौहार जैसे होली, दीवाली, विजयादशमी, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, पोंगल, ओणम आदि के अवसर पर जैसा हर्षोल्लास व अपनापन देखने को मिलता है, वैसा जब हमारे राष्ट्रीय त्यौहारों पर दिखाई नहीं देता है तब मन में मलाल रह जाता है। लगता है हमने हमारे राष्ट्रीय त्यौहार जैसे-गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस को केवल सरकारी आयोजन मान लिया है, जो हमारे लिए मात्र एक अवकाश भर से और अधिक कुछ भी नहीं? यदि ऐसा नहीं तो फिर जब हम अंग्रेजी न्यू ईयर, फ्रेंडस डे, वेलेन्टाईन डे यहाँ  तक कि शादी-ब्याह की वर्षगांठ को भी धूमधाम से मना सकते हैं तो फिर राष्ट्रीय त्यौहारों पर बेरूखी क्यों? आइए, इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम सभी राष्ट्रीय त्यौहारों को मात्र शासकीय आयोजन तक ही सीमित न रखते हुए अपने घर-आंगन व दिलों में उतारकर उसे  सम्पूर्ण देश को जोड़ने की एक उत्सवमयी शुरूआत करें।
       राष्ट्रीय त्यौहार हमें जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों से परे एक सूत्र में बांधने में सहायक हैं। सामूहिक स्तर पर प्रेमभाव से इन्हें मनाने से राष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक एकता को विशेष प्रेरणा और बल मिलता रहे इसके लिए हम सभी अपने-अपने घरों में वंदनवार लगायें, दीपों से सजायें, तिरंगा फहराये, रंगोली बनायें, पकवान बनायें, अपने-अपने कार्यस्थलों व मोहल्लों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें। अपने धार्मिक स्थलों मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि में देश की एकता, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। मातृ-भूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावार कर देने वाले अमर वीर सपूतों को सारे भेदभाव भुलाकर एक विशाल कुटुम्ब के सदस्य बनकर याद करें।
         आइए, समस्त भारतवासी इस गणतंत्र दिवस को संकल्प लें कि देश का हर घर और हर धार्मिक स्थल को सारे भेद-भावों से ऊपर उठकर दीप-मालाओं की रोशनी से जगमगायेंगे और दुनिया को गर्व से बतायेंगे कि हम सब कई भिन्नताओं के बावजूद भी एक हैं। हमारा यह दृढ़ संकल्प ही मातृ भूमि के लिए जाति, धर्म, वर्ण, भाषा एवं क्षेत्रीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर वीर सपूतों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
  
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित - जय हिन्द, जय भारत!!
चल पड़ी है गाड़ी आजकल  उनके प्यार की

चल पड़ी है गाड़ी आजकल उनके प्यार की

आज वैवाहिक जीवन की 23वीं वर्षगांठ पर पहले पहल प्यार में गुजरे प्रेम पातियों में से निकली एक पाती प्रस्तुत है-  

चल पड़ी है गाड़ी आजकल
उनके प्यार की
सुना है कन्हैया बना चितचोर
रहती उन्हें हर घड़ी अब
उनके इंतजार की

रोम-रोम पुलकित हो उठते
जब भी बजती घंटी
झनक उठते दिलतार
डूबे मन प्यार में सोच-सोच कर
आतुर धड़कने बढ़ती बार-बार
यूं कब दिन बीत जाता एक दूजे में
लगता हैं आई घड़ी बहार की
सुना है कन्हैया बना चितचोर
रहती उन्हें हर घड़ी अब
उनके इन्तजार की

कब परवाह प्यार में दुनिया की
जब चढ़ जाता जुनूं प्यार का
मिलकर ही सुकूं मिलता तब दिल को
बीते नहीं बीतता समय इंतजार का
छलक उठता सागर आंखों में
यदि गूंजा शब्द कभी इंकार का
सुना है कन्हैया बना चितचोर
रहती उन्हें हर घड़ी अब
उनके इन्तजार की
           .........कविता रावत
 उखड़े हुए पेड़ पर हर कोई कुल्हाड़ी मारता है

उखड़े हुए पेड़ पर हर कोई कुल्हाड़ी मारता है

मक्खन की हंड़िया सिर पर रखकर धूप में नहीं चलना चाहिए
बारूद के ढ़ेर पर बैठकर आग का खेल नहीं खेलना चाहिए

छोटा से पैबंद न लगाने पर बहुत बड़ा छिद्र बन जाता है
धारदार औजारोंं से खेलना खतरे से खाली नहीं होता है

काँटों पर चलने वाले नंगे पांव नहीं चला करते हैं
चूहों के कान होते हैं जो दीवारों में छिपे रहते हैं

नमक बिखरा तो पूरा बटोरा नहीं जा सकता है
उखड़े हुए पेड़ पर हर कोई कुल्हाड़ी मारता है
                                 .....कविता रावत 
यौवन गुलाबी फूलों का सेहरा तो बुढ़ापा कांटों का ताज होता है

यौवन गुलाबी फूलों का सेहरा तो बुढ़ापा कांटों का ताज होता है

लम्बी उम्र सब चाहते हैं पर बूढ़ा होना कोई नहीं चाहता है
यौवन गुलाबी फूलों का सेहरा तो बुढ़ापा कांटों का ताज होता है

छोटी उम्र या कोरे कागज पर कोई भी छाप छोड़ी जा सकती है
युवा के पास ज्ञान तो वृद्ध के पास सामर्थ्य की कमी रहती है

बूढ़ा भालू धीमें-धीमें करके ही नाचना सीख पाता है
चालीस पार आदमी मूर्ख अथवा हकीम बन जाता है

बूढ़ी लोमड़ी को किसी शिक्षक की जरूरत नहीं होती है
सीखने-सिखाने की कोई उम्र निर्धारित नहीं की जाती है

चिड़िया की जवानी से गरुड़ पक्षी का बुढ़ापा भला
युवा की दासी बनने से वृद्ध की प्रेयसी बनना भला
आओ  मिलकर   दीप  जलाएं

आओ मिलकर दीप जलाएं

आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं
रह न जाय अँधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना
सदा ऐसा कोई दीप जलाते रहना
हर घर -आँगन में रंगोली सजाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

भेदभाव, ऊँच -नीच की दीवार ढहाकर
आपस में सब मिलजुल पग बढायें
पर सेवा का संकल्प लेकर मन में
जहाँ से नफरत की दीवार ढहायें
सर्वहित संकल्प का थाल सजाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं.


Kavita Rawat
दीपावली का आरोग्य चिन्तन

दीपावली का आरोग्य चिन्तन

दीपावली जन-मन की प्रसन्नता, हर्षोल्लास एवं श्री-सम्पन्नता की कामना के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। कार्तिक की अमावस्या की काली रात्रि को जब घर-घर दीपकों की पंक्ति जल उठती है तो वह पूर्णिमा से अधिक उजियारी होकर 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' को साकार कर बैठती है। यह पर्व एक दिवसीय न होकर कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक बड़े हर्षोल्लास से सम्पन्न होता है। इसके साथ ही दीपावली को कई महान तथा पूज्य महापुरूषों के जीवन से सम्बद्ध प्रेरणाप्रद घटनाओं के स्मृति पर्व के रूप में भी याद किया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन महाराज युधिष्ठिर का राजसूय-यज्ञ भी सम्पन्न हुआ था। राजा विक्रमादित्य भी इसी दिन सिंहासन पर बैठे थे। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती, जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी तथा सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे का स्वर्गारोहरण का भी यही दिवस है। सिक्खों के छठवें गुरु हरगोविन्द जी को भी इसी दिन कारावास से मुक्ति मिली। वेदान्त के विद्वान स्वामी रामतीर्थ का जन्म, ज्ञान प्राप्ति तथा निर्वाण, तीनों इसी दिन हुए थे। 
भारत वर्ष में दीपावली को मनाने का सबसे प्रचलित जनश्रुति भगवान श्रीराम से जुड़ी है। जिसमें माना जाता है कि आदर्श पुरूष श्रीराम जब लंका विजय के बाद माता सीता सहित अयोध्या लौटे तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत के लिए अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर सजाया और अमावस्या की रात्रि में दीपों की पंक्ति जलाकर उसे पूर्णिमा में बदल दिया। जिससे यह प्रथा दीपों के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। 
दीपावली में साफ-सफाई का विशेष महत्व है। क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे शरीर को आरोग्य बनाए रखने से जुड़ा होता है। शरीर को सत्कर्म का सबसे पहला साधन माना गया है (शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्) और यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम स्वस्थ रहेंगे। क्योंकि पूर्ण स्वास्थ्य संपदा से बढ़कर होता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास हो सकता है। इसके लिए जरूरी है वर्षा ऋतु समाप्त होने पर घरों में छिपे मच्छरों, खटमलों, पिस्सुओं और अन्य दूसरे विषैले कीट-पतंगों को मार-भगाने का यचोचित उपचार जिससे मलेरिया, टाइफाइड जैसी घातक बीमारियों को फलने-फलने को अवसर न मिले। सभी लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार घरों की लिपाई-पुताई, रंग-रोगन कर घर की गन्दगी दूर कर आरोग्य होकर खुशियों की दीप जलायें। 
दीपावली में घर की साफ़-सफाई तो सभी कर लेते हैं लेकिन जरा गंभीर होकर क्यों न हम अपने -अपने आस-पास के वातावरण को भी देख लें, जिसमें हमें आरोग्य रहना है। आरोग्य रहने की पहली शर्त है ताजी हवा और शुद्ध पानी का सेवन। गांवों में ताजी हवा तो मिलती है लेकिन गंदगी के कारण वह दूषित हो जाती है। गांवों में जगह-जगह कूढ़े-करकट के ढेर लगे रहते हैं। कई लोग आज भी आस-पास ही दिशा-पानी के लिए बैठ जाते हैं, जिससे गंदगी फैलती है और मक्खी-मच्छर उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे कई रोग उत्पन्न होते हैं। जरा सोचिए, ऐसी हालत में कैसे स्वस्थ होकर खुशी मनाएंगे। गांवों को साफ-सुथरा रखा जाए तो वहाँ के निवासी ताजी हवा का सेवन कर हमेशा स्वस्थ रह सकेंगे। गाँव में पीने के पानी की भी बड़ी समस्या रहती है। कच्चे कुएं का पानी नुकसानदेह तो होता ही है साथ ही पोखर और तालाबों का पानी पीने से भी कई प्रकार की बीमारियां लग जाती है। सारा गांव उन्हीं में नहाता-धोता रहता है और उसी पानी को पीता है, जिससे कई बीमारियां उसे घेर लेती हैं। अब जरा शहर पर नजर दौड़ाइए- यहां न तो ताजी हवा ही मिलती है और न पानी। गाड़ी-मोटर, मिल और कारखानों के कार्बन-डाइआक्साइड उगलते धुएं से दूषित वातावरण स्वास्थ्य के लिए कितना नुकसानदेह है, इससे सभी जानते हुए भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। शहर की घनी आबादी के गली-कूंचों से यदि कोई सुबह-सुबह ताजी हवा के लिए निकल पड़े तो साक्षात नरक के दर्शन होना बड़ी बात नहीं हैं। नदियों का पानी हो या तालाबों का जब सारे गांव-शहर भर की गंदगी को समेटे नाले उसमें गिरते हैं तो वह कितना पीने लायक होता है यह किसी से छिपा नहीं। इससे पहले कि वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ समय बाद शहर का अर्थ होगा, मौत का घर’ वाली बात सच हो हम एकजुट होकर समय रहते जागें और स्वस्थ रहने के उपायों पर जोर दें ताकि स्वयं के साथ ही देश की खुशहाली में अपनी भागीदारी निभायें। शक्तिहीन रोगी इंसानों का देश न तो कभी खुशहाल और सुख से रह सकता है और न धरती का स्वर्ग बन सकता है। 
गांव में किसान हो या मजदूर दिन भर काम करके बुरी तरह थक जाते हैं। इस परिश्रम की थकान को मिटाने तथा प्रसन्न रहने के लिए समय-समय धूमधाम से मनाये जाने वाले त्यौहार उनमें नई उमंग-तरंग भरकर ऊर्जा संचरण का काम करते हैं, जो स्वस्थ रहने के लिए बहुत जरूरी हैं। यद्यपि शहर की अनियमित दिनचर्या के बीच जीते लोगों के लिए आरोग्य बने रहने के लिए कई साधन उपलब्ध हैं, जिसमें सबसे मुख्य व्यायाम कहा जा सकता हैं। तथापि शहरी भागमभाग में लगे रहने से उनका ध्यान इस ओर बहुत कम और जरा सी अस्वस्थता के चलते अंग्रेजी दवाएं गटकने में ज्यादा रहता है, जिसका दुष्परिणाम कई तरह की बीमारियों के रूप में आज हम सबके सबके सामने है। वे भूल जाते हैं कि नियमित व्यायाम स्वस्थ तन को आरोग्य बनाए रखने के लिए कितना आवश्यक है। इसके साथ ही उनके लिए यह त्यौहार भी थके-हारे, हैरान-परेशान मन में उमंग-तरंग भर आरोग्य बने रहने के लिए कम नहीं हैं। 

स्वस्थ और सार्थक जीवन हेतु दीपपर्व पर अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएं!

        -कविता रावत


 रावण ने सीताहरण को मुक्ति का मार्ग बनाया

रावण ने सीताहरण को मुक्ति का मार्ग बनाया

मुझे बचपन से ही रामलीला देखने का बड़ा शौक रहा है। आज भी आस-पास जहाँ भी रामलीला का मंचन होता है तो उसे देखने जरूर पहुंचती हूँ। बचपन में तो केवल एक स्वस्थ मनोरंजन के अलावा मन में बहुत कुछ समझ में आता न था, लेकिन आज रामलीला देखते हुए कई पात्रों पर मन विचार मग्न होने लगता है। रामलीला देखकर यह बात सुस्पष्ट है कि इस मृत्युलोक में जिस भी प्राणी ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है, चाहे वह भगवान ही क्यों न हो। एक निश्चित आयु उपरांत सबको इस लोक से गमन करना ही पड़ता है। रावण भी मृत्युलोक का वासी था, इसलिए उसने भी ब्रह्मा जी की तपस्या करके अभय रहने का वरदान तो मांगा ही साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मुक्ति का कारण भी बता दिया। वह ब्रह्मा जी से वरदान मांगते समय कहता है कि-
हम काहू कर मरहिं न मारे, वानर जात मनुज दोउ वारे
देव, दनुज, किन्नर अरु नागा, सबको हम जीतहिं भय त्यागा 
       यहां विचारणीय है कि रावण ने देव, दानव, किन्नर और नाग को निर्भय होकर जीतने का वरदान मांगा। किन्तु वानर और मनुष्य को कमजोर समझकर उसने छोड़ दिया, इसीलिए भगवान विष्णु मनुष्य रूप में अवतरित हुए। रावण में भले ही बहुत बुराईयां थी, लेकिन उसमें गुण भी कम न थे। वह महापराक्रमी योद्धा, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता और प्रकाण्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी होने के साथ ही भविष्यदृष्टा भी था तभी तो जब उसे शूर्पणखा ने बताया कि उसकी नाक कटने का बदला लेने पहुंचे खर-दूषण को राम ने मार डाला है तो वह गंभीर चिंतन में डूब गया-
होता प्रतीत महाबली वह, खर दूषण को जिसने मारा।
सामथ्र्य कहां ऐसे नर की, नारायण ने अवतार धारा।।
गर प्रेम नहीं तो बैर सही, ओ लग्न मजा दिखलाती है।
नारायण में मन लगने से, मुक्ति निश्चय हो जाती है।।
        वह सोचता है कि खर और दूषण तो उसके समान ही बलशाली थे, जिन्हें भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं मार सकता था, वे राम द्वारा मारे गए, तो क्या विष्णु भगवान का अवतार हो गया, चिन्ता नहीं, यदि राम एक साधारण मनुष्य हैं तो वह अवश्य मारा जाएगा और यदि विष्णु भगवान का अवतार हैं तो उनके हाथों से मुक्ति प्राप्त होगी-
रख बैर भाव जब हिरण्यकश्यप ने, भव से पाया छुटकारा था।
नृसिंह रूप से जब उसको, नारायण ने संहारा था।।
यह निश्चय होता है मन को, मुक्ति अब मुझसे दूर नहीं।
भव सागर में गोता खाना, हित बाधक है मंजूर नहीं।।
        जब रावण को पूर्ण विश्वास हो चला कि विष्णु भगवान का अवतार हो गया है, तो इसके लिए उसने सीता का हरण करके राम से बैर बढ़ाने और अंत में स्वर्ग प्राप्त करने का संकल्प कर लिया। इसके लिए वह मारीच, जो कपट विद्या का धनी था, उसके पास जाकर कहता है-
सुन मारीच निशाचर भाई, चल मोरे संग जहां रघुराई।
होहू कपट मृग तुम छलकारी, मैं हर लाऊं उनकी नारी।
       चूंकि मारीच का ताड़का वध के बाद जब राम से युद्ध हुआ तो वह राम के पराक्रम के आगे एक पल भी टिक नहीं पाया और उसे युद्धस्थल से भागना पड़ा, वह तभी समझ गया कि राम साधारण मानव नहीं, अवतारी पुरुष हैं, इसलिए वह रावण से कहता है-
सुनहुं दशानन बात हमारी, जिनको कहे तुम नर और नारी।
वे जगदीश चराचर स्वामी, राम रमण पितु अन्तरयामी।।
इसके आगे वह राम से युद्ध करते समय उसके पराक्रम के बारे में बताता है कि- 
वह विश्वमित्र के यज्ञ वाला, दिग्दर्शन सारा मन में है
जिसने सौ योजन पर डाला, वह तीर करारा मन में है।

        मारीच कपट मृग न बनने के लिए रावण से कई बहाने बनाता रहा और बहुत प्रकार से व्यर्थ ही समझाने का प्रयास करता रहा, लेकिन रावण ने जब म्यान से तलवार निकालकर अत्यन्त क्रोधित होकर यमपुरी पहुंचाने का फरमान सुनाया तो वह माया मृग बनने को तैयार हो गया-   
यदि तू नहीं साथ देगा मेरा, तो सारा ज्ञान भुला दूंगा।
सीता को हरने से पहले, यमपुरी तुझको पहुंचा दूंगा।
          क्योंकि रावण ने तो अपनी मुक्ति का मार्ग निश्चित कर लिया था, इसलिए उस पर मारीच की बातों का कोई असर नहीं हुआ। मारीच को भी जब लगा कि रावण मानने वालों में नहीं है तो उसे भी उसकी मुक्ति अपनी मुक्ति स्पष्ट दिखाई देने लगी और वह मायामृग बनने को तैयार हो गया। 
          दशहरा आते ही जगह-जगह सड़क किनारे छोटेे-बड़े रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के रंग-बिरंगे पुतलों की भरमार लग जाती है। काम, क्रोध, हिंसा, लोभ, मोह और द्वेष के प्रतीक स्वरूप बने इन पुतलों का सार्वजनिक स्थानों पर दहन का प्रचलन आदिकाल से चला आ रहा है। दशहरा को हम सांस्कृतिक पर्व के रूप में धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन बिडम्बना देखिए हर वर्ष इन पुतलों के बढ़े हुए कद के साथ ही इनमें विद्यमान बुराईयों का स्वरूप भी उतना ही बढ़ा हुआ दिखाई देने के बावजूद भी हम चुपचाप तमाशबीन बने रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। आज भले ही हमें लगता है कि रावण ने स्त्री हरण जैसा निकृष्ट कार्य किया है, लेकिन यहांँ गंभीर विचार योग्य बात है कि सीता लंका में रावण ही नहीं बल्कि दूसरे असुरों के बीच रहकर भी सुरक्षित रही, जो क्या वर्तमान सभ्य कहलाने वाले समाज में रहकर संभव हो पाता? आज भले ही दशहरा पर्व पर काम, क्रोध, हिंसा, लोभ, मोह और द्वेष के प्रतीक स्वरूप बनाये रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े-बड़े पुतलों का दहन करने में हम सभी लोग बहुत आगे हैं, लेकिन आज समाज में छिपे रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ रूपी पुतलों का दहन करने में बहुत पीछे हैं।
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित   ...कविता रावत   



नवरात्र के व्रत और बदलते मौसम के बीच सन्तुलन

नवरात्र के व्रत और बदलते मौसम के बीच सन्तुलन

जब प्रकृति हरी-भरी चुनरी ओढ़े द्वार खड़ी हो, वृक्षों, लताओं, वल्लरियों, पुष्पों एवं मंजरियों की आभा दीप्त हो रही हो, शीतल मंद सुगन्धित बयार बह रही हो, गली-मोहल्ले और चौराहे  माँ की जय-जयकारों के साथ चित्ताकर्षक प्रतिमाओं और झाँकियों से जगमगाते हुए भक्ति रस की गंगा बहा रही हो, ऐसे मनोहारी उत्सवी माहौल में भला कौन ऐसा होगा जो भक्ति और शक्ति साधना में डूबकर माँ जगदम्बे का आशीर्वाद नहीं लेना चाहेगा।
आज नवरात्र सिर्फ साधु-सन्यासियों की शक्ति साधना पर्व ही नहीं अपितु आम लोगों के लिए अपनी मनोकामना, अभिलाषा पूर्ति और समस्याओं के समाधान के लिए देवी साधना कर कुछ विशिष्ट उपलब्धि प्राप्ति का सौभाग्यदायक अवसर समझा जाता है। क्योंकि माँ दुर्गा को विश्व की सृजनात्मक शक्ति के रूप के साथ ही एक ऐसी परमाध्या, ब्रह्ममयी महाशक्ति के रूप में भी माना जाता है जो विश्व चेतना के रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं। माना जाता है कि कोई भी साधना शक्ति उपासना के बिना पूर्ण नहीं होती। शक्ति साधना साधक के लिए उतना ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए भोजन।नवरात्रि में आम लोग भी अपनी उपवास साधना के माध्यम से इन नौ दिन में माँ का ध्यान, पूजा-पाठ कर उन्हें प्रसन्न कर आशीर्वाद पाते हैं।  हमारे आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्रों में उपवास का विस्तृत उल्लेख मिलता है। नवरात्र में इसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बहुत  लाभदायक बताया गया है।  
आयुर्वेद में उपवास की व्याख्या इस प्रकार की गई है- ‘आहारं पचति शिखी दोषनाहारवर्जितः।‘ अर्थात् जीवनी-शक्ति भोजन को पचाती है। यदि भोजन न ग्रहण किया जाए तो भोजन के पचाने से मुक्त हुई जीवनी-शक्ति शरीर से विकारों को निकालने की प्रक्रिया में लग जाती है। श्री रामचरितमानस में भी कहा गया है- भोजन करिउ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।। 
नवरात्र-व्रत मौसम बदलने के अवसरों पर किए जाते हैं। एक बार जब ऋतु सर्दी से गर्मी की ओर और दूसरी बार तब जब ऋतु गर्मी से सर्दी की ओर बढ़ती है। साधारणतः यह देखा जाता है कि ऋतु परिवर्तन के इन मोड़ों पर अधिकतर लोग सर्दी जुकाम, बुखार, पेचिश, मल, अजीर्ण, चेचक, हैजा, इन्फ्लूएंजा आदि रोगों से पीडि़त हो जाते हैं। ऋतु-परिवर्तन मानव शरीर में छिपे हुए विकारों एवं ग्रंथि-विषों को उभार देता है। अतः उस समय उपवास द्वारा उनको बाहर निकाल देना न केवल अधिक सुविधाजनक होता है, बल्कि आवश्यक और लाभकारी भी। इस प्रकार नवरात्र में किया गया व्रत वर्ष के दूसरे अवसरों पर किए गए साधारण उपवासों से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। नवरात्र व्रतों के समय साधारणतया संयम, ध्यान और पूजा की त्रिवेणी बहा करती है। अतः यह व्रत शारीरिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक सभी स्तरों पर अपना प्रभाव छोड़ जाता है और उपवासकर्ता को कल्याणकारी मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा और क्षमता प्रदान करता है।
सभी धर्मावलम्बी, किसी न किसी रूप में वर्ष में कभी न कभी उपवास अवश्य रखते हैं। इससे भले ही उनकी जीवनी-शक्ति का जागरण न होता होगा किन्तु धार्मिक विश्वास के साथ वैज्ञानिक आधार पर विचार कर हम कह सकते हैं कि इससे लाभ ही मिलता है। उपवास का वास्तविक एवं आध्यात्मिक अभिप्राय भगवान की निकटता प्राप्त कर जीवन में रोग और थकावट का अंत कर अंग-प्रत्यंग में नया उत्साह भर मन की शिथिलता और कमजोरी को दूर करना होता है। 
श्री रामचरितमानस में राम को शक्ति, आनंद और ज्ञान का प्रतीक तथा रावण को मोह, अर्थात अंधकार का प्रतीक माना गया है। नवरात्र-व्रतों की सफल समाप्ति के बाद उपवासकर्ता के जीवन में क्रमशः मोह आदि दुर्गुणों का विनाश होकर उसे शक्ति, आनंद एवं ज्ञान की प्राप्ति हो, ऐसी अपेक्षा की जाती है। 

नवरात्र और दशहरा की शुभकामनाओं सहित!

...कविता रावत

गाँधी-शास्त्री जयंती पर दो कविताएँ

गाँधी-शास्त्री जयंती पर दो कविताएँ

                                          युगावतार गाँधी
चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, पड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!

तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि! हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की, खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा, तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर, युग कर्म जगा, युगधर्म तना।
युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक, युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें, युग-युग तक युग का नमस्कार!

तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़, रचते रहते नित नई सृष्टि
उठती नवजीवन की नीवें, ले नवचेतन की दिव्य दृष्टि।
धर्माडंबर के खंडहर पर, कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर, निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!

बढ़ते ही जाते दिग्विजयी, गढ़ते तुम अपना रामराज
आत्माहुति के मणिमाणिक से, मढ़ते जननी का स्वर्ण ताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने, दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़
मानव को दानव के मुँह से, ला रहे खींच बाहर बढ़-बढ़।

पिसती कराहती जगती के, प्राणों में भरते अभय दान
अधमरे देखते हैं तुमको, किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से, तुम कालचक्र की चाल रोक
नित महाकाल की छाती पर लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!

कँपता असत्य, कँपती मिथ्या, बर्बरता कँपती है थर-थर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट, कँपते खिसके आते भू पर!
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है, उड़ता है तेरा ध्वज निशान!

हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खंडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र
                  - सोहनलाल द्विवेदी                        


छोटा सा तन हिया हिया हिमालय लाल बहादुर लाल का।


छोटी काया, दूर गांव था, पैदल आते-जाते थे।
सावन-भादौ नदी पार कर, प्रतिदिन पढ़ने जाते थे।।
भारी बस्ता, हालत खस्ता, पग में छाले पड़ जाते थे।
खुद पानी में सिर पर बस्ता नदी पार कर जाते थे।

संघर्षों से रहा जूझता जीवन प्यारे लाल का।
छोटा सा तन हिया हिमालय,लाल बहादुर लाल का।

लाल बहादुर वीर बालक का भावी पथ प्रधान था।
संघर्षों ने पाला उसको, वह तपा हुआ इन्सान था।।
कर्त्तव्यनिष्ठ , कर्मठ, कर्मयोगी, निष्ठावान महान था।
मानवता, स्नेह का पुतला, सात्विक तपस्वी समान था।।

अमन चैन शान्ति का पुजारी, योगी लाल कमाल था।
छोटा-सा तन हिया हिया हिमालय, लाल बहादुर लाल का।।

युग निर्माता, भाग्य विधाता, राष्ट्र-निर्माता था।
शौर्य शक्ति का पुजारी साक्षात् दुर्गा समान था।।

शान्तिदूत अहिंसा-पूजक, नर शिरोमणि सुजान था।
सब धर्मां के मधुर मिलन का, ज्योतित दीप आह्वान था।

कोटि-कोटि वन्दन अर्चन, करूँ माँ भारती के लाल का।
छोटा-सा तन हिया हिमालय, लाल बहादुर लाल का।।
                                                           … अज्ञात 


महात्मा गाँधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जयंती की हार्दिक शुभकामनायें! 
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

आज आया है शिवा का जन्मदिन
पर नहीं है कोई मनाने की तैयारी
मेज पर केक बदले पसरी किताबें
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

अनमना बैठा है उसका मिट्ठू
टीवी-मोबाईल से छूटी है यारी
गुमसुम है घर का कोना-कोना
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

घर में लगा हुआ है अघोषित कर्फ्यू
बस दिन-रात पढ़ना-रटना है जारी
बेस्वाद लगे किचन की खटपट-चटपट
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

शांत घर में आता परीक्षा का भूत तो
फिर कहाँ आपस की बातें प्यारी-प्यारी?
सुख-चैन तो उड़ा ले जाता प्रश्न-पत्र
क्यों परीक्षा पड़ती है सब पर भारी!
                         ....कविता रावत 

        हर वर्ष 20 सितम्बर को मेरे बेटे शिवा के जन्मदिन के समय ही उसकी छःमाही परीक्षाएं चल रही होती हैं। अभी वह कक्षा ७वीं में है और समझदार भी हो गया है इसलिए तो वह खुद ही परीक्षा समाप्त होने के बाद एक दिन निश्चित कर जन्मदिन मनाता है।   

  
 सुख-शांति और ज्ञान-बुद्धि के दाता है गणपति जी

सुख-शांति और ज्ञान-बुद्धि के दाता है गणपति जी

हमारी भारतीय संस्कृति में गणेश जी के जन्मोत्सव की कई कथाएं प्रचलित हैं। हिन्दू संस्कृति (कल्याण) के अनुसार भगवान श्रीगणेश के जन्मकथा का इस प्रकार उल्लेख है- “जगदम्बिका लीलामयी है। कैलाश पर अपने अन्तःपुर में वे विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थी। शरीर से गिरे उबटन को उन आदि शक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु अचेतन तो होता नहीं, उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। उसे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वार से अंदर न आने पाए। बालक डंडा लेकर द्वारा पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंतःपुर में आने लगे तो उसने रोक दिया। भगवान भूतनाथ कम विनोदी नहीं हैं, उन्होंने देवताओं को आज्ञा दी- बालक को द्वार से हटा देनी की। इन्द्र, वरूण, कुबेर, यम आदि सब उसके डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए- वह महाशक्ति का पुत्र जो था। इसका इतना औद्धत्य उचित नहीं फलतः भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और बालक का मस्तक काट दिया।“ पार्वती ने जिस तपस्या से शिशु को प्राप्त किया उसके इस तरह जाने वे बहुत दुःखी हुई। उस समय भगवान विष्णु की सलाह से शिशु हाथी का सिर काटकर जोड़ दिया गया, जिससे वे जी उठे, लेकिन उनका शीश हाथी का होने से वे गणपति ‘गजानन‘ कहलाए। 
         भगवान गणेश के कई अवतारों की प्रचलित कथाओं सभी कथाओं पर यदि गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होती है, वह यह कि गणेश जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) 'असुरों' की आसुरी शक्तियों का दमन कर लोक कल्याणार्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो, तो उस बुराई का खात्मा करने के परियोजनार्थ जरुर कोई आगे बढ़कर उसे ख़त्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि कायम करता है।  हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि असुरी शक्तियों की समाप्ति की मंशा लेकर लिए शायद हम गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की स्थापना कर उनसे ज्ञान-बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाये रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपाकांक्षी बनना नहीं भूलते हैं।
       अगले वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक बोले : "गणपति बप्पा मोरया, पुरछिया वर्षी लौकरिया"।
सभी ब्लॉगर्स और सुधि पाठकों को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!
भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है

पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है

पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है
पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है

अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है
समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है

पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है
अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है

अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है
सीधा  आदमी  पराए  बोझ  से दबा रहता है

पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है
भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है

                                       ...कविता रावत 

अबकी बार राखी में जरुर घर आना

अबकी बार राखी में जरुर घर आना


राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें हैं बुलाते
कभी खेले-कूदे अब क्यों हो भूले जाते
अपनी बारहखड़ी का स्कूल देखते जाना
बचपन के दिन की यादें साथ ले आना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का  है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब मन कम लगता
गाँव में रह शहर का सपना दिखता
सूने घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे
कब सुध लोगे देख बागवाँ बुला रहे
आकर अपनी आखों से  देख जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना


गाँव के बड़े-बुजुर्ग याद करते रहते हैं
अपने-पराये जब-तब पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर अनजान बने हुए हो
आकर सबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

                   ......कविता रावत



फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

सोने की बेड़ियां हों तो भी उसे कौन चाहता है?
स्वतंत्रता स्वर्ण से अधिक मूल्यवान होता है

बंदी  राजा  बनने से आजाद पंछी बनना भला
जेल के मेवे-मिठाई से रूखा-सूखा भोजन भला

स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ चौपट करती है

लोहा हो या रेशम दोनों बंधन एक जैसे होते हैं
फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं