Sunday, September 25, 2016

गया में श्राद्ध व पिंडदान करना सर्वोपरि क्यों माना जाता है?

इन दिनों आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा से दुर्गा पूजा की पहली पूजा तक समाप्त होने वाले पितृपक्ष यानि पितरों (पूर्वजों) का पखवारा चल रहा है। मरने के बाद हम हमारे पूर्वजों के प्रति  श्रद्धा स्वरूप श्राद्धकर्म कर उन्हें याद करते हैं। हमारे धार्मिक कर्मकांडों अथवा त्यौहारों के पीछे कोई न कोई कथा सहज रूप में देखने-सुनने को मिलती है। इसी कड़ी में पितृपक्ष में गयाधाम (बिहार) में ही पूर्वजों का श्राद्ध करने के पीछे विभिन्न धर्म ग्रंथों में मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार गयासुर नामक राक्षस के राक्षसी कार्यों से धरती बहुत आक्रांत थी। उसके दुष्क्रमों से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु को स्वयं आना पड़ा। भगवान विष्णु ने अपने पैर से उसे इसी स्थान पर दबा दिया था। वह जब भगवान विष्णु के पैरों तले दबकर मोक्ष प्राप्त कर रहा था, उस समय उसने विष्णु भगवान से यह वरदान मांगा कि इस क्षेत्र की प्रतिष्ठा उससे हो। भगवान विष्णु के वरदान से यह क्षेत्र गयाधाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां भगवान विष्णु के पैरों के चिन्ह आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं, इसलिए इस क्षेत्र का नाम विष्णुपद कहलाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति स्वयं या अपने पूर्वजों का नाम लेकर यहां आकर श्राद्ध व पिण्डदान करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वायुपुराण में कहा गया है:  "न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ। अधिमासे सिंह-गुरावस्ते च गुरु-शुक्रयोः।  तीर्थयात्रा न कर्तव्या गयां गोदावरीं विना। "
          सम्पूर्ण संसार में भगवान विष्णु के चरण चिन्ह का गयाधाम का मंदिर इकलौता है। पितृपक्ष में श्राद्ध के दौरान पिण्डदान की प्रक्रिया यहीं से शुरू होती है। धार्मिक शास्त्र वायुपुराण के अनुसार- "पंचकोश गया क्षेत्र कोशमेकं गयाशिरः" अथार्थ- गया के पांच कोस क्षेत्र में जिसकी मौत होती है, उसका गया में श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि इसे गयासुर का साम्राज्य क्षेत्र और मोक्षदायिनी क्षेत्र माना गया है। पहले यहां 365 वेदियां थी, मगर वर्तमान में 45 वेदियां ही शेष बची हैं। धर्मशास्त्रों के मुताबिक श्राद्ध प्रतिदिन होना चाहिए, इसलिए पहले वेदियों की संख्या 365 थी।
         गयासुर के शरीर पर स्थापित गयाधाम में परमपिता ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने की बात भी धर्मशास्त्रों में लिखी है। यज्ञ के बाद यहां ब्रह्म सरोवर में यज्ञ स्तंभ आरोपित किया गया था। धर्मशास्त्रों के अनुसार किसी भी मृत व्यक्ति का जब तक पितृपक्ष में विष्णुचरम पर पिंडदान नहीं किया जाता, तब तक उसकी आत्मा प्रेतयोनि में भटकती रहती है। श्राद्धकर्म के बाद वे पितृलोक में चले जाते हैं। श्राद्ध करने में यज्ञ जरूरी है। श्राद्ध के लिए समय को भी ध्यान में रखना जरूरी है। समय से किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। पितृश्राद्ध पूर्वाद्ध में, पूर्वज श्राद्ध अपरान्ह में, एक दो दृष्टि श्राद्ध मध्यान्ह और नित्य नैमित्तिक श्राद्ध प्रातःकाल किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के आस्थाओं के अनुसार जो व्यक्ति पितरों को तर्पण और श्राद्ध नहीं करता वह पुत्र कहलाने का अधिकारी नहीं होता है।
          मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद अपने अनुज लक्ष्मण और अर्द्धागिनी सीता के साथ गया में पिण्डदान का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रीराम के पिण्डदान करने की एक कथा प्रचलित है कि जब वे यहां पिण्डदान करने आये, तब वे सीता को फल्गु नदी के किनारे छोड़कर आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए निकल गये। पिण्डदान का समय होने पर महाराजा दशरथ की आत्मा की आवाज जनकनंदनी सीता के कानों में गूंजी कि उन्हें भोजन (पिंड) चाहिए, जिसे सुनकर सीता सोच में पड़ गई कि उन्हें तो श्राद्ध का अधिकार है ही नहीं। और अगर उन्होंने पिण्डदान कर भी दिया तो उनके पति श्रीराम उन पर विश्वास नहीं करेंगे। इसी तरह के कई सवालों मन में उत्पन्न हुए लेकिन सीता ने फल्गू नदी, केतकी का फूल,  गाय और वट का पेड को साक्षी बनाकर बालू का पिण्डदान कर दिया। पिण्डदान देने से दशरथ की आत्मा तृप्त हो गई और उन्हें मोक्ष मिल गया। बाद में श्रीराम जब सामग्री लेकर लौटे तब जनक नंदनी ने सारा वृतान्त सुनाया, लेकिन श्रीराम को विश्वास नहीं हुआ। तब सीता ने एक-एक कर चारों साक्ष्यों को प्रस्तुत किया, लेकिन उनमें से फल्गू नदी, केतकी का फूल और गाय मुकर गये। कुपित होकर सीता ने फल्गू नदी को सूखी रहने और बालू के नीचे दबे रहने, केतकी फूल को पूजा के अयोग्य रहने और गाय को उसके मुंह से छुए हुए वस्तु को पूजा के अयोग्य होने का श्राप दिया। वट वृक्ष ने ही गवाही दी, जिसे सीता जी ने उसे दीर्घायु का वरदान दिया। इसीलिए सुहागन स्त्रियां भी अपने पति की लम्बी उम्र की कामना हेतु वट वृक्ष की पूजा करते हैं।
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Monday, September 19, 2016

अति से सब जगह बचना चाहिए

प्रत्येक अति बुराई का रूप धारण कर लेती है।
उचित की अति अनुचित हो जाती है।।

अति मीठे को कीड़ा खा जाता है।
अति स्नेह मति बिगाड़ देता है।।

अति परिचय से अवज्ञा होने लगती है।
बहुत तेज हवा से आग भड़क उठती है।।

कानून का अति प्रयोग अत्याचार को जन्म देता है।
अमृत की अति होने पर वह विष बन जाता है।।

अत्यधिक रगड़ने पर चंदन से भी आग पैदा हो जाती है।
एक जगह पहुंचकर गुण-अवगुण में बहुत कम दूरी रह पाती है।।

अति नम्रता में अति कपट छिपा रहता है।
अत्यधिक कसने से धागा टूट जाता है।।

अति कहीं नहीं करनी चाहिए।
अति से सब जगह बचना चाहिए।

.. कविता रावत 
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Monday, September 5, 2016

राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक

शिक्षक को राष्ट्र का निर्माता और उसकी संस्कृति का संरक्षक माना जाता है। वे शिक्षा द्वारा  छात्र-छात्राओं को सुसंस्कृतवान बनाकर उनके अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर देश को श्रेष्ठ नागरिक प्रदान करने में अहम् दायित्व निर्वहन करते हैं। वे केवल बच्चों को न केवल साक्षर बनाते हैं, बल्कि अपने उपदेश के माध्यम से उनके ज्ञान का तीसरा नेत्र भी खोलते हैं, जिससे उनमें भला-बुरा, हित-अहित सोचने की शक्ति उत्पन्न होती हैं और वे राष्ट्र की समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का अध्यापन कार्य महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहा बावजूद इसके उन्होंने अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाये जाना का संकल्प किया। इसका कारण स्पष्ट है कि वे भलीभांति जानते थे कि माध्यमिक शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राओं में जो संस्कार अंकुरित होते हैं, वे ही आगे चलकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में पल्लवित होते हैं।
           'मालविकाग्रिमित्रम' नाटक में महाकवि कालिदास ने कहा हैं-
 “लब्धास्पदोऽस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।
 यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "
          - अर्थात जो अध्यापक नौकरी पा लेने पर शास्त्रार्थ से भागता है, दूसरों के अंगुली उठाने पर चुप रह जाता है और केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाता है, ऐसा व्यक्ति पंडित (शिक्षक) नहीं वरन् ज्ञान बेचने वाला बनिया कहलाता है। लेकिन दुःखद पहलू है कि आज ज्ञान से पेट भरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा नजर आती है। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तीव्र गति से विद्यालयों की संख्या बढ़ी उस अनुपात में शिक्षा का स्तर ऊँचा होने के बजाय नीचे गिरना गंभीर चिन्ता का विषय है। आज शासकीय और शासकीय अनुदान प्राप्त विद्यालयों में अध्यापन और अनुशासन का बुरा हाल जब-तब जगजाहिर होना आम बात है। बावजूद इसके जब कोई शिक्षक या प्राचार्य राजनीतिक दांव-पेंच के माध्यम से सम्मानित होता है तो यह एक निराशाजनक स्थिति निर्मित करता है। जिस प्रकार दाल-चावल में कंकर देखकर उसे अनुपयोगी न मानकर उसमें से कंकर चुनकर उन्हें बाहर कर उसका सदुपयोग किया जाता है, उसी प्रकार यदि शासन-प्रशासन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के प्रति समर्पित अध्यापकों को ही सम्मानित करें तो ‘शिक्षक दिवस‘ और भी गौरवान्वित होकर  सार्थकता को प्राप्त होगा। 

शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित..... कविता रावत 
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Thursday, September 1, 2016

एक दिन दुनिया वाले भी खबर लेते हैं

हर आदमी किसी न किसी के काम का जरूर होता है
लेकिन  ...............
                         
कुछ लोग कहते हैं कि कुछ लोग किसी काम के नहीं होते
फिर भी बहुत लोग जाने क्यों उन्हें हरदम घेरे रहते हैं ?
मैं कहती हूँ कि कुछ न कुछ छुपी कला तो है उनमें
वर्ना यूँ ही लोग कहाँ किसी की पूछ-परख करते हैं
(सनद रहे कि  64 कलाओं में से कम से कम एक कला का हर इंसान स्वामी होता है, जो पर्याप्त है जीने के लिए।  ये बात और  है कि उसे कौन सी कला में महारत हासिल है )

(2)
वे छुपाते हैं राज-ए-कारनामे दुनिया वालों से
जो हरदम दुनिया वालों की नजरों में रहते हैं
माना कि वे रखते हैं दुनिया वालों पर नज़र
पर एक दिन दुनिया वाले भी उनकी खबर लेते हैं
(कच्चे-चिट्ठों की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती है)

(3)

कुछ न कुछ बात रहती है जब
तभी वह बाहर तक फैलती है
जहाँ धुंआ उठ रहा होता है
वहाँ आग जरूर  मिलती है
(न अकारण कोई बात और न धुंआ उठता है)

(4)
वे हारकर भी कहाँ हारे
जो रंग दे सबको अपने रंग में
कुशल घुड़सवार भी गिरते हैं
मैदान-ए-जंग में
(कौन कितना कुशल है इसकी असली परीक्षा मैदाने-ए -जंग में ही होती है)\



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Wednesday, August 24, 2016

तीन लोक से मथुरा न्यारी यामें जन्में कृष्णमुरारी

मथुरा प्राचीनकाल से एक प्रसिद्ध नगर के साथ ही आर्यों का पुण्यतम नगर है, जो दीर्घकाल से प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का केन्द्र रहा है। भारतीय धर्म, कला एवं साहित्य के निर्माण तथा विकास में मथुरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मथुरा चौसठ कलासम्पन्न तथा भगवद्गीता के गायक  योगीश्वर आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। इस भूमि में भगवान श्रीकृष्ण ईश्वर के पूर्णावतार के रूप में अवतरित हुए, जिन्होंने कुलक्षय की आशंका से महाभारत के युद्ध में अर्जुन के व्यामोह को भंग कर ’हृदयदौर्बल्यं व्यक्त्वोतिष्ठ परतंप’ का उपदेश दिया। इसके साथ ही उन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय कर भागवत-धर्म का प्रवर्तन किया, जिसके कारण वे जगद्गुरु रूप में प्रतिष्ठित हुए।   
 मथुरा प्राचीन काल में भारत के प्रबल-प्रतापी यदुवंशियों के ‘शूरसेन’ नामक गणराज्य की राजधानी थी, जो तत्कालीन राजनीति का एक प्रमुख केन्द्र थी। मनुस्मृति, वृहत्संहिता महाभारत, ब्रह्मपुराण, वाराहपुराण, अग्निपुराण, हरवंशपुराण, वाल्मीकि रामायण आदि अनेक प्रमुख ग्रन्थों में इसका मथुरा, मधुपुरी, महुरा, मधुपुर नाम से उल्लेख मिलता है तथा प्राचीन अभिलेखों में ‘मथुरा’ तथा ‘मथुला’ भी देखने में मिलता है।  भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में से इसे भी मोक्षदायिका माना जाता है, इसके बारे में जनश्रुति है- तीन लोक से मथुरा न्यारी यामें जन्में कृष्णमुरारी।

मथुरा को पहले मधुपुरी भी कहा जाता था। कहते हैं, इसे मधु नामक दैत्य ने बसाया था। कालांतर में यह शूरसेन राज्य की राजधानी बनी और उसी वंशानुक्रम में उग्रसेन के आधिपत्य में आयी। राजा उग्रसेन का कंस नामक क्रूर पुत्र था, जिससे मगध के घोर आततायी राजा जरासंध की अस्ति-नस्ति नामक दो कन्याएं ब्याही थी। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया था और स्वयं स्वेच्छाधारी राजा के रूप में मथुरा के सिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसी क्रूर अत्याचारी कंस ने अपनी चचेरी बहिन देवकी तथा उसके पति वसुदेव को एक आकाशवाणी के कारण स्वयं को निर्भय रखने के विचार से जेल में डाल दिया था। कंस तथा उसके क्रूर शासन को समाप्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से कारागृह में जन्म लिया और अद्भुत लीलाओं के क्रमों का विकास करते हुए अपने मामा कंस का वध करके ब्रजवासियों के कष्टों को दूर किया। उन्होंने अपने माता-पिता तथा नाना उग्रसेन को कारागृह से मुक्त करके उन्हें पुनः सिंहासन पर बिठाया।  अपने जामाता कंस के मारे जाने पर जरासंध श्रीकृष्ण से बार-बार युद्ध करता रहा, लेकिन वह अंत में श्रीकृष्ण की कूटनीति के जाल में फंसकर भीम द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुआ। 
जिस प्रकार राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं, उसी प्रकार वृन्दावन के बिना मथुरा अधूरी है। भले ही मथुरा भगवान् श्रीकृष्ण की जन्मस्थली है, लेकिन उनकी दिव्य लीलाओं के नाम के लिए वृन्दावन प्रसिद्ध है। वृन्दावन ब्रज का हृदय है, जहां श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस पावन भूमि को पृथ्वी का अति उत्तम तथा परम गुप्त भाग कहा गया है। पदम् पुराण में इसे भगवान का साक्षात् शरीर, पूर्ण ब्रह्म से संपर्क का स्थान तथा सुख का आश्रय बताया गया है। इसी कारण यह अनादि काल से भक्तजनों का श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी दयानन्द के गुरु स्वामी विराजानन्द, कवि रसखान आदि महान आत्माओं ने इसके वैभव को सजाया-निखारा है। यहां आनन्दकंद युगल किशोर श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा की अद्भुद नित्य विहार लीला होती रहती है।
वृन्दावन की प्राकृतिक छटा दर्शनीय है। यमुना इसको तीन ओर से घेरे हुए है। यहां सघन कुंजों में भांति-भांति के पुष्पों से शोभित लताएं और ऊंचे-ऊंचे घने वृक्ष मन में उल्लास भरते हैं। बसंत ऋतु के आगमन की छटा और सावन-भादों की हरियाली आंखो को जो शीतलता प्रदान करती है, वह श्रीराधा-माधव के प्रतिबिम्बों के दर्शनों का ही प्रतिफल है।  
वृन्दावन का कण-कण रसमय है। यहां प्रेम-भक्ति का ही साम्राज्य है। इसे गोलोक धाम से अधिक बढ़कर माना गया है। यही कारण है कि हजारों धर्म-परायण लोग यहां अपने-अपने कामों से अवकाश प्राप्त कर अपने शेष जीवन को बिताने के लिए निवास स्थान बनाकर यहां रहते हैं, जहां वे नित्य प्रति रास लीलाओं, साधु-संगतों, हरिनाम-संकीर्तन, भागवत आदि ग्रन्थों के होने वाले पाठों में सम्मिलित होकर धर्म-लाभ करते हैं।
                                     श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें!

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Saturday, August 13, 2016

स्वतंत्रता खोने वाले के पास कुछ नहीं बचता है

जो अपना स्वामी स्वयं नहीं,
उसे  स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता है ।
जिसे अत्यधिक स्वतंत्रता मिल जाय,
वह सबकुछ चौपट करने लगता है 

फरिश्तों की गुलामी करने से,
शैतानों पर हुकूमत करना भला 
पिंजरे में बंद शेर की तरह जीने से,
आवारा पशु की तरह रहना  भला 

दासता की हालत में कोई नियम लागू नहीं होता है 
स्वतंत्रता खोने वाले के पास कुछ नहीं बचता है

दूसरों की गुलामी के निवाले से हृष्ट-पुष्ट हो जाने से,
स्वतंत्रता के साथ दुर्बल बने रहना भला 
झूठ-फरेब, भ्रष्टाचार, दुराचार-अनाचार भरी शान से
गरीब रहकर घर की रुखी-सूखी खाकर जीना भला 

                      .........कविता रावत
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Monday, August 8, 2016

हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है

एक पक्ष की नम्रता बहुत दिन तक नहीं चल पाती है।
एक बार शालीनता छोड़ने पर वह लौटकर नहीं आती है।।

दूध में उफान आने पर वह चूल्हे पर जा गिरता है।
नम्र व्यक्ति अपनी नम्रता धृष्ट व्यक्ति से सीखता है।।

नम्र बनने के लिए कोई मोल नहीं लगता है।
सदा तराजू का वजनदार पलड़ा ही झुकता है।।

जो झुक जाता है उसे काटा नहीं जाता है।
वह कभी टूटता नहीं जो लचकदार होता है।।

शीलनता से अपमान सहन नहीं करना पड़ता है।
हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है।।

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Monday, July 18, 2016

प्रेम नगर की हसीन वादियों में

बच्चों ने स्कूल की किताब में ताजमहल के बारे में क्या पढ़ा कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में उसे देखने की जिद्द पकड़ ली। गर्मी के तीखे तेवर देखकर घर से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था, इसलिए आजकल-आजकल करते-करते जब बच्चों की छुट्टियां खत्म होने को आयी तो वे बहुत गुस्सियाने लगे, हड़काने लगे, तो हमने भी सोचा चलो इसी बहाने हम भी ताजमहल के दीदार कर लेंगे, क्योंकि अभी तक हमने भी ताजमहल को स्कूल की किताब और इंटरनेट में ही देखा-पढ़ा था।  आॅफिस से चार दिन की छुट्टी लेकर हम आगरा के साथ ही मथुरा और फिर दिल्ली घूमने का कार्यक्रम निर्धारित कर सबसे पहले आगरा पहुंचे। आगरा पहुंचकर एक होटल में सामान रखकर सुबह-सुबह जब हम ताजमहल पहुंचे तो एक पल तो यकीन नहीं हुआ कि जिस ताजमहल को हमने स्कूल की किताब और इंटरनेट में देखा-पढ़ा और लोगों की जुबानी सुना है, वह सचमुच हमारी आंखों के सामने है। ताजमहल देखना वास्तव में किसी सुनहरे सपने का साकार होने जैसा लगा। 
ताजमहल के आस-पास फोटो खींचते-खांचते, घूमते-घामते कब तीन घंटे बीत गए, इसका तब अहसास हुआ जब बच्चों ने भोजन करने का प्रस्ताव रखा। ताजमहल से बाहर निकलकर वहीं पास के एक होटल में हल्का-फुल्का नाश्ता करने के बाद हम भारत के सबसे महत्वपूर्ण किला देखने पहुंचे। आगरा के लालकिले की भव्यता देखकर यह सहज रूप में समझ आया कि विलासितापूर्ण सुरक्षित जीवन जीने के लिए ही अधिकाशं राजा-महाराजा इस तरह के अभेद किलों का निर्माण कराते रहे होंगे।
आगरा का लालकिला देखने के बाद हमने सीधे होटल की राह पकड़ी और दोपहर में थोड़ा आराम के करने के बाद बस द्वारा योगीश्वर आनन्दकंद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा पहुंचे। मथुरा बस अड्डे से एक आॅटो वाले के माध्यम से होटल पहुंचे और वहां सामान रखकर जल्दी से हाथ मुंह धोकर उसी आॅटोरिक्शा से रात्रि आठ बजे के लगभग गोकुलधाम पहुंचे। वहीं ऑटो वाले ने हमें एक पंडित जी मिलवाया जिनसे हमें गोकुल के बारे में बहुत सी बातों की जानकारी मिली। एक ख़ास बात तो उन्होंने हमें बताया कि आज भी गोकुलवासियों की लड़कियां गोकुल से बाहर नहीं ब्याही जाती है, उनका ब्याह गोकुल में ही होता है और इसी तरह वहां की कोई गाय गोकुल से बाहर नहीं भेजी जाती है, सुनकर थोड़ा अचरज हुआ कि आज के समय में भी यह सब कैसे संभव होता होगा। लगभग आधे-पौने घंटे बाद भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जी दर्शन कर हम वापस होटल लौट आये।
मथुरा नगरी को को यूं ही “तीन लोक से मथुरा न्यारी, यामें जन्में कृष्णमुरारी“ नहीं कहा जाता है। यहाँ आसपास भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के अनगिनत मंदिर है, जिन्हें देखने के लिए एक सप्ताह का समय भी कम है। इसलिए हमने समयाभाव के कारण मुख्य-मुख्य मंदिर देखने का कार्यक्रम निर्धारित किया और सुबह-सुबह श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर दर्शन को निकल पड़े। यह मंदिर भले ही अत्यन्त प्राचीन है लेकिन इसकी सुन्दरता अनुपम है। इसके बाद द्वारकाधीश मंदिर सहित और कई मंदिरों के चलते-चलते दर्शन करते हुए हम सीधे वृन्दावन स्थित वास्तुकला के माध्यम जगद्गुरु कृपालुजी महाराज द्वारा बनवाये गये दिव्य प्रेम को साकार करते प्रेम मंदिर पहुंचे। यहाँ एक ओर जहाँ राधा-कृष्ण की मनोहर झांकियां, गोवर्धन लीला, कालिया नाग दमन लीला, उद्यान में झूलन लीला की झांकियां देखकर मन अभिभूत हुआ वहीं दूसरी ओर मंदिर के भीतरी दीवारों पर राधाकृष्ण और कृपालु महाराज की विविध झांकियों के अंकन के साथ अधिकांश स्तम्भों पर गोपियों की सजीव जान पड़ती मूर्तियां देखकर सुखद अनुभूति हुई। 
प्रेम मंदिर से निकलकर हम गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए निकले। वृन्दावन स्थित गोवर्धन पर्वत के बारे में बहुत पढ़ा-सुना था, इसलिए इसका करीब से सुखद अनुभव प्राप्ति हेतु मन पुलकिल हो उठा। गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर की परिक्रमा बहुत से श्रद्धालु जन  पैदल चलकर पूरी करते हैं, जिसमें बहुत समय लगता है, समयाभाव के कारण भले ही हमने परिक्रमा आॅटोरिक्शा से पूरी की, लेकिन ऐसा करने पर भी मन को असीम शांति मिली।   
रात्रि वृन्दावन से वापस मथुरा लौटकर सुबह-सुबह हमने अपने अगले पड़ाव दिल्ली के लिए बस द्वारा कूच किया। गर्मी की अधिकता और समयभाव के कारण हमने दिल्ली भ्रमण का स्थगित किया। वैसे भी दिल्ली मेरी ससुराल है, जहाँ अक्सर आना-जाना और घूमना-फिरना लगा ही रहता है। इसलिए दिल्ली छोड़ बस में बैठे-ठाले दिल्ली पहुंचने तक ब्रजभूमि की यादों में मन डूबता-उतरता रहा। भले ही भौगोलिक संरचना में यद्यपि ब्रज नाम का कोई प्रदेश या स्थल नहीं है तथापि ब्रज का अपना विशिष्ट अस्तित्व है। इसकी अपनी विशेष संस्कृति है। अपनी भाषा है, अपना अनुपम साहित्य है। इसी आधार पर कदाचित समय-समय पर यहां के रहवासियों की मांग ब्रज प्रदेश के निर्माण हेतु उठाई जाती रही है। प्राचीन ब्रज में 12 वन, 24 उपवन तथा 5 पर्वतों का समावेश बताया गया है। इस विषय में सूरदास जी ने भी- ’चौरासी ब्रज कोस निरंतर खेलत है वन मोहन’ कहते हुए ब्रजधाम का विस्तार चौरासी कोस बताया है। हालांकि ब्रज से संबंधित भूमि तथा संस्कृति का विस्तार मथुरा को केन्द्र मानकर आगरा, ग्वालियर, भरतपुर, अलीगढ़, एटा, गुड़गांव, मेरठ आदि जिलों तक जहां-जहां ब्रजभाषा बोली व समझी जाती है, माना जाता है। यह भी माना जाता है कि महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री चैतन्य महाप्रभु आदि ने संपूर्ण ब्रज चौरासी कोस की यात्राएं की थी। इस तरह ब्रज के गौरव का इतिहास बहुत प्राचीन है।  स्कंद पुराण में भी भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र श्री ब्रजनाभ ने महाराज परीक्षत के सहयोग से श्रीकृष्ण लीला स्थलियों का प्राकट्य करने, अनेक मंदिरों, कुण्ड, बावड़ियों आदि का निर्माण कराने का उल्लेख होना बताया जाता है। 
ब्रज के महात्म्य को कहां तक कहा जाय? सभी संप्रदायों के आचार्यों ने ब्रज की महिमा का गुणगान किया है। इसकी समता का कोई अन्य भूखण्ड नहीं है। यहां स्वयं परमात्मा परमेश्वर नर रूप धारण कर “नन्द-नन्दन“ के रूप में निराकार से साकार हो गये हैं। ब्रज को ऐसी ही विचित्र महिमा है कि यहाँ जितने भी स्थान हैं वे प्रायः सभी श्रीकृष्ण की लीला स्थली हैं। इन सभी में भगवदीय पुनीत भाव व्याप्त है। यहां ब्रजराज कहलाए जाने वाले सर्वेश्वर प्रभु को गोप-ग्वालों और गोपिकाओं के साथ मनोहारी अदभुत लीलाएं करते देखकर स्वयं ब्रह्मा जी को भी शंका उत्पन्न हुई थी कि यह कैसा भगवत् अवतार बताया जा रहा है। लेकिन अंत में वे भी हार मानकर कहते हैं- अहो भाग्यम्! अहो भाग्यम्!! नन्दगोप ब्रजो कसाम।“ कहा जाता है इसी ब्रज भूमि पर चरण रखते ही ब्रह्मज्ञानी उद्धव का सब ज्ञान लुप्त हो गया तो उन्हें कहना पड़ा-
“ब्रज समुद्र मथुरा कमल, वृंदावन मकरन्द। 
ब्रज-बनिता से पुष्प हैं, मधुकर गोकुल चन्द।“ 
ब्रज को भुलाना आसान नहीं है,स्वयं ब्रज छोड़कर द्वारिका पहुंचकर द्वारिकाधीश बनने वाले भगवान श्रीकृष्ण ब्रज से आए अपने मित्र उद्धव से कुशलक्षेम पूछते समय भावविभोर होकर अश्रु ढुलकाते कहते हैं-
’उधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं, 
वृंदावन गोकुल की स्मृति, सघन तृनन की छाही। 
हंस सुता की सुन्दर कगरी अरु कुंजन की छाही, 
वे सुरभि वे बच्छ दोहिनी खरिक दुहावन जाही। 
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल 
नाचत गहि गहि बाही, 
जबही सुरति आवति वा सुख की 
जिय में उमगत तन माही।“ 


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Tuesday, July 12, 2016

अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है

अच्छाई सीखने का मतलब बुराई को भूल जाना होता है।
प्रत्येक सद्‌गुण किन्हीं दो अवगुणों के मध्य पाया जाता है।।

बहुत बेशर्म बुराई को भी देर तक अपना चेहरा छुपाने में शर्म आती है।
जिस बुराई को छिपाकर नहीं रखा जाता वह कम खतरनाक होती है।।

धन-सम्पदा, घर और सद्‌गुण मनुष्य की शोभा बढ़ाता है।
सद्‌गुण प्राप्ति का कोई बना-बनाया रास्ता नहीं होता है।।

बड़ी-बड़ी योग्यताएँ बड़े-बड़े सद्‌गुण मनुष्य की शोभा बढ़ाता है।
बुराई बदसूरत है वह मुखौटे से अपना चेहरा ढककर रखता है।।

नेक इंसान नेकी कर उसका ढोल नहीं पीटता है।
अवगुण की उपस्थिति में सद्‌गुण निखर उठता है।।

कोई बुराई अपनी सीमा के भीतर नहीं रह पाती है।
अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है।।




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Tuesday, June 21, 2016

वर्तमान परिदृश्य में योग की आवश्यकता

आज के भौतिकवादी युग में एक ओर जहां हम विज्ञान द्वारा विकास की दृष्टि से उन्नति के शिखर पर पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक रूप से हमारा पतन परिलक्षित हो रहा है। आज  मनुष्य के खान-पान, आचार-व्यवहार सभी में परिवर्तन होने से उसका स्वास्थ्य दिन -ब-दिन गिरता जा रहा है। यही कारण है कि आज हमें ऋषि-मुनियों की शिक्षा को जानने के लिए, उनके द्वारा बनाये उत्तम स्वास्थ्य के रास्ते पर चलने के लिए योग की परम आवश्यकता है, जिससे हम “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय“ की सुखद कल्पना को साकार कर सकें।    
         प्राचीनकाल में योगी समाज से बहुत दूर पर्वतों और जंगलों की गुफा-कंदराओं के एकांत में तपस्या किया करते थे। वे प्रकृति पर आश्रित सादा व सरल जीवन व्यतीत किया करते थे। जीव-जन्तु ही उनके महान शिक्षक थे, क्योंकि जीव-जन्तु सांसारिक समस्याओं और रोगों से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं। प्रकृति उनकी सहायक है। योगी, ऋषि और मुनियों ने पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर बड़े ध्यान से विचार कर उनका अनुकरण किया। इस प्रकार वन के जीव-जन्तुओं के अध्ययन से योग की अनेक विधियों का विकास हुआ। इसीलिए अधिकांश योगासनों के नाम जीव-जन्तुओं के नाम पर आधारित हैं। 
           कहा जाता है कि जब योग का प्रचार दुनिया में शुरू हुआ तो इसका पहला प्रचार पश्चिमी देशों में उन लोगों में हुआ जो लोग वैज्ञानिक और ईसाई धर्म को मानने वाले थे। शुरूआत में जब भारत में रहकर ये लोग विदेश वापस गए तो अपने साथ आसन, प्राणायाम लेकर गए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब ये लोग कैदी हो जाते थे तब इनकी कैदखाने में हालत खस्ता रहती थी। भोजन, पानी, दूषित हवा के कारण किसी को कोलाइटिस, किसी को पेचिश तो किसी को खड़े-खड़े सोने के कारण पीठ की हड्डी में दर्द हो जाया करता था। जब उन्हें वहाँ डाॅक्टरी इलाज से फायदा नहीं मिलता था तो वे उन कैदियों के शरण में जाते थे जो योग जानते थे।  ऐसे में योग के जानकार अपने साथ ही अन्य कैदियों को भी शीर्षासन, सूर्य नमस्कार और उड्डियान बंध अादि द्वारा स्वस्थ रखने का काम करते थे।   कहा जाता है कि दूसरे महायुद्ध में कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने जेल खाने में बंदी कैम्पों में योग द्वारा अपने शरीर को सुधारा। इनमें एक डाॅक्टर पोल्डर मैन हाॅलैंड के रहने वाले और दूसरी अॉस्ट्रेलिया की एक महिला रोमाब्लेयर भी थी। यह महिला 15 महीने से अधिक युद्ध बंदियों के बीच रही, जब उसको वहां पीलिया हुअा, तब उसने वहां एक अफ्रीकन व्यक्ति से कुछ आसनों को सीखा और उनका अभ्यास करने से रोगमुक्त  हुई। इस प्रकार अनेक लोगों ने योगाभ्यास द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।
          ऐसे ही अनेक लोगों के द्वारा जब योग का पता चला तो पश्चिम के लोग चौकें और उन्होंने इस पर अनुसंधान करना शुरू किया। सबसे पहला अनुसंधान बंगाल के प्रख्यात डाॅक्टर दास ने फ्रांस में किया। वे वहां अस्थि रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने लोगों को अनुसंधान करके बताया कि योग की क्रिया करने से उसका असर न केवल मांसपेशियों पर, बल्कि इसका असर हड्डियों पर भी पड़ता है। इसका सीधा अर्थ हुआ कि योग में आसन केवल शारीरिक व्यायाम भर नहीं है।  आज विज्ञान ने मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में अनेक तरह की सुख-सुविधाएं प्रदान की हैं, जिससे आज मनुष्य सुविधा भोगी होने से निष्क्रिय और आलसी बनता जा रहा है।  परिणामस्वरूप मनुष्य की जीवन-शैली अप्राकृतिक होने से वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है। इस कारण वह अनेक तरह के कष्टों, दुःखों, कठिनाईयों से घिरता जा रहा है। इन शारीरिक व्याधियों  के अलावा वह मानसिक और आत्मिक रूप से भी रूग्ण होता जा रहा है। उसे शांति नहीं है। अत्यन्त अशांति एवं तनाव में रहने के कारण वह मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। कमोवेश यह स्थिति युवाओं और वृद्धों की ही नहीं बल्कि बच्चों की भी है। बच्चों के ऊपर टेलीविजन और कम्प्यूटर, मोबाईल आदि इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों का जबरदस्त प्रभाव है। इस कारण मुख्य रूप से उनकी दृष्टि प्रभावित होने से अनेक तरह के आंखों की व्याधियों से बच्चे ग्रस्त हो जा रहे हैं। 
          मनुष्य कितना ही महत्वाकांक्षी क्यों न हो मगर स्वस्थ मन व शरीर के अभाव में कुछ भी नहीं कर सकता। चाहे खेल का मैदान हो या नौकरी में तरक्की, कुछ कर दिखाने के लिए स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता है। सिद्ध योगियों ने इसका अनुभव किया और आसनों के महत्व पर प्रकाश डाला। पूर्व के मानव मस्तिष्क तथा आधुनिक मानव मस्तिष्क में भले ही थोड़ा-बहुत अंतर क्यों न हो, लेकिन आसन आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने हजारों वर्ष पूर्व, उनके जानने वालों के लिए थे। आज इसकी जागृति हो रही है, क्योंकि थोड़े ही समय में आधुनिक मस्तिष्क भी अपने आधुनिक उपकरणों के प्रयोग को असफल होते देख रहे हैं, जिससे वे योग को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित माध्यम मानने लगे हैं। 
           योग का मुख्य लक्ष्य हमें परम चेतना मार्ग पर ले जाना है, जिससे हमेें अपने अस्तिस्व का ज्ञान हो सके। यदि शरीर रोग ग्रस्त है तो हमें परम चेतना की ओर जाने की इच्छा भी नहीं होगी, क्योंकि शरीर रोग होने से मन पर असर पड़ता है। शरीर में खुजली-दर्द हो तो बेचैन शरीर से बेचैन मन पकड़ में नहीं आता। इसलिए योग द्वारा शरीर को रोग मुक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। भारत में योग दर्शन के द्वारा शारीरिक और मानसिक रोगों का निदान बताया गया है। इसमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग दर्शन को अपनाने पर बहुत बल दिया गया है। योग दर्शन दैहिक, मानसिक और आत्मिक दुःखों को दूर कर मनुष्य को अरोग्यता प्रदान करता है। सच्चे अर्थ में योगशास्त्र को देह, मन तथा आत्मा का चिकित्सा शास्त्र कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने समस्त दुःखों पर विजय पा सकता है।
          प्रायः देखा गया है कि बहुत हिम्मत वाले व्यक्ति भी रोगग्रस्त होने पर हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि शारीरिक स्वास्थ्य की गिरावट से मन कमजोर हो जाता है, लेकिन वही व्यक्ति स्वास्थ्य प्राप्त करने पर पुनः मजबूत बन जाता है।  योग शरीर को चुस्त, स्वस्थ रखने का सबसे आसान माध्यम है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक संस्कृति के रूप में योगासनों का इतिहास समय की अनंत गहराईयों में छिपा है। मानव जाति के प्राचीनतम साहित्य वेदों में इनका उल्लेख मिलता है। वेद आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार हैं। उनके रचयिता अपने समय के महान आध्यात्मिक व्यक्ति थे। कुछ लोगों का ऐसा भी विश्वास है कि योग विज्ञान वेदों से भी प्राचीन हैं।
         आधुनिक युग में योग सारे संसार में जिस तीव्र गति से फैल रहा है वह प्रशंसनीय व स्वागत योग्य है। योग का ज्ञान हर एक की संपत्ति बनता जा रहा है। आज डाॅक्टर और वैज्ञानिक भी योग के माध्यम से स्वस्थ रहने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि भारत ही नहीं, अपितु दुनिया भर के लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि स्वस्थ जीवन और निरोग रहने के लिए योग सर्वोत्तम माध्यम है।

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