ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Saturday, September 14, 2019

राष्ट्रभाषा स्वतंत्र देश की संपत्ति होती है


किसी राष्ट्र की संस्कृति उस राष्ट्र की आत्मा है। राष्ट्र की जनता उस राष्ट्र का शरीर है। उस जनता की वाणी राष्ट्र की भाषा है। डाॅ. जानसन की धारणा है, ’भाषा विचार की पोषक है।’ भाषा सभ्यता और संस्कृति की वाहक है और उसका अंग भी। माँ के दूध के साथ जो संस्कार मिलते हैं और जो मीठे शब्द सुनाई देते हैं, उनके और विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के बीच जो मेल होना चाहिए वह अपनी भाषा द्वारा ही संभव है। विदेशी भाषा द्वारा संस्कार-रोपण असम्भव है।
         महावीर प्रसाद द्विवेदी जी लिखते हैं कि, ’अपने देश, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से ही हो सकता है।’ महात्मा गांधी जी कहते हैं, ’अपनी भाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देशभक्त नहीं बन सकता। समाज का सुधार अपनी भाषा से ही हो सकता है। हमारे व्यवहार में सफलता और उत्कृष्टता भरी हमारी अपनी भाषा से ही आएगी।’ कविवर बल्लतोल कहते हैं, ’आपका मस्तक यदि अपनी भाषा के सामने भक्ति से झुक न जाए तो फिर वह कैसे उठ सकता है।’ अज्ञेय जी कहते हैं, ’किसी भी समाज को अनिवार्यतः अपनी भाषा में ही जीना होगा। नहीं तो उसकी अस्मिता कुण्ठित होगी ही होगी और उसमें आत्म-बहिष्कार के विचार प्रकट होंगे।’ कालरिज का कहना हैं, ’भाषा मानव-मस्तिष्क की वह प्रयोगशाला है, जिसमें अतीत ही सफलताओं के जय-स्मारक और भावी सफलताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र एक सिक्के दो पहलुओं की तरह साथ रहते हैं।’ इसका अर्थ है कि भाषा के द्वारा ही प्राचीन गौरव अक्षुण्ण रहता है और उज्ज्वल भविष्य के बीज उसमें निहित रहते हैं। भारत के प्राचीन गौरव की महिमा को जीवित रखने के लिए विश्व में उसकी विजय-पताका फहराने के लिए हिन्दी की उन्नति अनिवार्य है। 
      राष्ट्रभाषा स्वतंत्र देश की संपत्ति होती है और हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, लेकिन अधिकांश देशवासी हिन्दी को महत्व न देकर अंग्रेजी के मोहपाश में फंसे हैं। संविधान की धारा 351 के अंतर्गत हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन सरकारी स्तर पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का महत्व अभी तक प्राप्त न हो सका है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ करने की अंतिम शर्त कि,'भारत का एक भी राज्य जब तक हिन्दी को नहीं चाहेगा, वह राज्यभाषा नहीं बन सकती’ गले की फांस बनी है। वस्तुतः यह शर्त हमारे नीति-नियंताओं द्वारा अनंतकाल तक अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखने के लिए एक षड्यंत्र था, जिसे उन्होंने अंग्रेजों द्वारा ’फूट डालो, राज्य करो’ के सिद्धांत से सीखा, जिसे शासन-संचालन की अचूक औषधि समझा जाता है। भाषा के प्रश्न पर उत्तर-दक्षिण की बात खड़ी करके भारतीय समाज को विघटित कर दिया गया। हिन्दी कहने को राष्ट्रभाषा है, किन्तु प्रांतीय भाषाएं भी उसके इस अधिकार की अधिकारिणी बना दी गई है। अंग्रेजी साम्राज्य की देन अंग्रेजी आज भी प्रमुख भाषा बनकर भारत पर राज्य कर रही है। आज भी अच्छी नौकरी चाहिए या नौकरी में तरक्की या व्यापार को बढ़ाना हो या फिर ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों से काम निकलवाना हो, इन सभी के लिए अंग्रेजी बोलनी-लिखनी बहुत जरूरी है। आईसीए, पीसीए, पीएससी हो या यूपीएससी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम अंग्रेजी है, यही उदरपूर्ति का साधन और उन्नति का माध्यम बना हुआ है।  
         हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और जापान दोनों को अपनी-अपनी भाषा पर गर्व है। ये अपनी-अपनी भाषा द्वारा राष्ट्र को यश प्रदान करने में गौरव अनुभव करते हैं। यही कारण है कि आज वैज्ञानिक दृष्टि से अमेरिका और औद्योगिक प्रगति की दृष्टि से जापान विश्व में सर्वोच्च शिखर पर आसीन हैं, किन्तु हमारी बिडम्बना देखिए हम आज भी अपनी राष्ट्रभाषा को वह सम्मान नहीं दे पाएं हैं, जिसकी वह अधिकारिणी है। आज इसके लिए हमें ऐसे चाणक्य चाहिए जो हिन्दी के विरुद्ध किए जाने वाले षड्यंत्रों का पर्दाफाश करके, हिन्दी की पताका फहराने वालों की हिन्दी विरोधी नीति को उजागर करके जन-मानस में हिन्दी-संस्कार का अमृत पहुंचा सके। लोभ, लालच, ममता, स्वार्थ के कंकटों को हटाकर मार्ग में पुष्प बिखेर दे, ताकि माँ-भारती का रथ सरलता से चलकर भारत-भारती का भाल विश्व-प्रांगण में उन्नत कर सके। जब जनता और सत्ता दोनों मिलकर हिन्दी को सच्चे हृदय से अपनाएंगे, राजनीति का छल-छद्म से दूर रखेंगे तो निश्चित ही हिन्दी का विकास द्रुतगति से संभव हो सकेगा।  

Monday, September 2, 2019

मेरे शिवा का इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव


बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। उनके अपने-अपने खेल-खिलौनें होते हैं, जिनमें वे दुनियादारी के तमाम झमेलों से कोसों दूर अपनी बनायी दुनिया में मस्त रहते हैं। इसीलिए तो उन्हें भगवान का रूप कहा जाता है। प्रायः सभी बच्चों को बचपन में खेल-खिलौनों से बड़ा लगाव रहता है, वे तरह-तरह के खिलौनों से खेलना पसंद करते हैं, लेकिन मेरे शिवा को बचपन में कोई खिलौना पसंद ही नहीं आता था; हम जब भी उसे बाजार ले जाकर किसी खिलौने की दुकान पर अपनी पसंद का खिलौना पसंद करने को कहते तो वह पूरी दुकान में इधर-उधर घुसते हुए ढूढ़ता-फिरता, लेकिन बहुत देर बाद जब उसे उसकी पसंद की कोई चीज नहीं मिलती तो वह मुंह फुलाकर बुत बनकर आकर सामने खड़ा हो जाता। पूछने पर कि क्या हुआ, क्या हुआ, तो कुछ भी नहीं बोलता बस हाथ पकड़कर एक दुकान से दूसरी दुकान के चक्कर कटवाता रहता। जैसे ही उसे किसी दुकान पर गणेश के खिलौने या मूर्ति नजर आती तो झट उंगुली से इशारा करते हुए हाथ खींचकर ले जाता। यदि उसे उसकी पसंद के गणपति जी मिल गए तो वह खुशी से उछल-कूद करते हुए घर की ओर चल देता और यदि नहीं तो फिर एक दुकान से दूसरी दुकान खंगालने की जिद्द कर अपनी मांग पूरी करके ही दम लेता।         
मेरा शिवा (अर्जित) अब बड़ा हो गया है, वह अभी आठवी कक्षा में पढ़ता है, लेकिन उसका गणपति से जो लगाव बचपन में था, वह कम नहीं हुआ है। हाँ थोड़ा सा जो उसमें बदलाव आया है, वह यह कि अब वह गणपति जी को दुकान से खरीदने के स्थान पर खुद अपने हाथों से कभी ड्राइंग तो कभी मिट्टी से सुन्दर व आकर्षक कलाकृतियाँ बनाता रहता है। मूर्ति बनाने के लिए कभी वह मिट्टी बाजार से तो कभी खुद कहीं से खोदकर ले आता है। खोदकर लायी मिट्टी को वह सबसे पहले कूट-कूट कर उनके कण-कण को अलग करता है। धूप में सुखाता है और फिर कूटता है। बिल्कुल बारीक होने पर उसे छलनी से छानकर सभी कंकड़ अलग कर देता है। फिर पानी डालकर उसे तब तक गूंथता रहता है, जब तक वह मैदे की तरह कोमल नहीं हो जाता। मुझे मेरे शिवा को इस तरह अपने हाथों से गणपति जी की प्रतिमाएँ बनाते देखना बहुत अच्छा लगता है। कई बार प्रतिमा बनाते समय जब उसमें कभी टूट-फूट हो जाती है, तो वह परेशान सा हो जाता है, लेकिन ऐसे क्षण में उसकी जो बात मुझे सबसे अच्छी लगती है, वह यह कि वह किसी भी कीमत पर हार नहीं मानता, जुनून की हद तक उसे पूरा करके ही दम लेता है। 
गणेशोत्सव के पूर्व पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने और झांकी डेकोरेशन की कार्यशालाएं शहर भर में जगह-जगह आयोजित की गई। ऐसी ही एक कार्यशाला जवाहर बाल भवन में मूर्तिकला प्रशिक्षक हर्षित तिवारी के मार्गदर्शन में मेरे शिवा ने भाग लिया, जहाँ उसने दूसरे बच्चों के साथ इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने की आसान विधि सीखकर अपने घर और कार्यशाला के लिए एक-एक सुंदर गणेश प्रतिमा बनायी, जो मुझे ही नहीं बल्कि उनके प्रशिक्षक को भी इसलिए बहुत अच्छे लगे, क्योंकि उसने मनमोहक गणेश प्रतिमा के साथ ही मूषकराज को उनकी गोद में बिठाकर नवाचार किया है। इस नवाचार के विषय में जब प्रशिक्षक ने उससे पूछा तो उसने बताया कि, "क्योंकि जो हमारे अपने सबसे प्रिय होते हैं, वे हमेशा हमारे दिल में रहा करते हैं, इसीलिए मैंने मूषक को गणेश जी की गोद में बिठाया है।" इसी कार्यशाला में उसने हस्तकला प्रशिक्षक अजय यादव से “इको-फ्रेंडली“ झांकी डेकोरेशन के गुर सीखकर गणेश जी को विराजमान करने के लिए एक आकर्षक झांकी भी बनायी है। कार्यशाला में यह एक बहुत ही अच्छी पहल है कि बच्चों को घर पर ही गणेश प्रतिमा विराजित करने और विसर्जित करने का संकल्प भी दिलाया गया है।
         भगवान गणेश हमारे विध्नहर्ता है, मंगलकर्ता है, उनकी पूजा बिना सब काम अधूरे हैं। गृह प्रवेश हो, व्यापार का शुभारम्भ हो, प्राणिग्रहण संस्कार की बेला हो या कोई भी मंगल कार्य, प्रथम पूज्य गणेश की ही सर्वप्रथम पूजा की जाती है।  अब यदि हम गणेशोत्सव में मिट्टी के गणेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अपने घर विराजमान कर उनका विसर्जन भी घर पर ही करते हैं तो वे घर में ऊर्जा के रूप में हमारे साथ हमेशा बने रहेंगे; सोचिए इससे अच्छी क्या कोई और बात हो सकती है! नहीं न, तो फिर इस बार ही नहीं, अपितु हर बार इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव मनाएँ। बोलो गणपति बप्पा मोरया !

... कविता रावत




सभी ब्लॉगर्स एवं पाठकों को गणेशोत्सव की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।

Saturday, August 24, 2019

एक लप्पड़ मार के तो देख


हर मुश्किल राह आसान हो जाएगी तेरी
धीरज रख  आगे कदम बढ़ा के तो देख

बहुत हुआ तेरा अब सुनहरे ख्वाब बुनना
नींद त्याग और बाहर निकल के तो देख

कैसे-कैसे   लोग वैतरणी तर  गए  सरपट
याद कर फिर उचक-दुबक चल के तो देख

कुछ भी हासिल न होगा बैठ किनारे तुझे
हिम्मत कर  गहरे पानी उतर के तो देख

छोड़ उदासी  मिलेगी  तुझे तेरी  मंजिल
कमर कस पूरे वेग दौड़ लगा के तो देख

सोये लोग भी जागकर साथ चल देंगे तेरे
विश्वास रख झिंझौड़-झिंझौड़ के तो देख

मुर्गे-बकरे काट तू भी बन मोटा आदमी
सोच मत लपड़- झपड़   कर के तो देख

बहुत हुआ गर गिड़गिड़ाना हाथ-पैर जोड़ना
चुप  मत  रह  एक  लप्पड़ मार के  तो देख

...कविता रावत

Wednesday, August 14, 2019

इस वास्ते पंद्रह अगस्त है हमें प्यारा


जब-जब 15  अगस्त को लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है
तब-तब स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु न्यौछावर हर शहीद सबको याद आने लगता है

प्रधानमंत्री जी पहले देश की कठिनाईयों, विपदाओं पर बहुत देर गंभीर रहते हैं
फिर भावी योजना पर प्रकाश डाल वर्षभर की उपलब्धियों का बखान करते हैं

राष्ट्रशक्ति को निर्बल करने वाले आंतरिक व बाह्य तत्वों पर तीव्र प्रहार करते हैं
फिर सभी 'राष्ट्रगान' गाकर 'जय हिंद' के घोष-संग अपनी राह पकड़ लेते हैं

इधर दिल्ली के प्रमुख नागरिक, राजदूत, कूटनीतिज्ञों का सरकारी भोज होता है
उधर हमारा मन भी 'आजादी का एक लड्डू' पाकर ख़ुशी से भर-भर आता है

चलो आज 'हम स्वतंत्र है और रहेंगे' यह भाव एक बार सबके मन तो आता है
जो मन में 'राष्ट्र और राष्ट्रीयता' की हलकी-सी हलचल उत्पन्न कर जाता है

आओ सभी फहरा कर तिरंगा, मिलकर गायें ये गीता न्यारा-
"इस वास्ते पंद्रह अगस्त है हमें प्यारा
आजाद हुआ आज के दिन देश हमारा"

इस दिन के लिए खून शहीदों ने दिया था
बापू ने भी इस दिन के लिए ज़हर पिया था
इस दिन के लिए नींद जवाहर ने तजी थी
नेताजी ने पोशाख सिपाही की सजी थी
गूंजा था आज देश में जय हिंद का नारा
आज़ाद हुआ आज के दिन देश हमारा
- - - - - - - - -
 
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
जय हिन्द! जय भारत!
... कविता रावत 

Sunday, August 11, 2019

अबकी बार राखी में


प्रस्तुत है- प्लीजेंट वैली राजपुर, देहरादून से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'हलन्त' के अंक अगस्त, 2019 में प्रकाशित मेरी रचना 'अबकी बार राखी में '



Wednesday, July 31, 2019

काठमांडू की वादियों में बिताए सुकून के पल


आज आपके लिए प्रस्तुत है - दैनिक भास्कर DB स्टार भोपाल, मंगलवार, 30-07-2019 travel में प्रकाशित यात्रा वृत्तांत "काठमांडू की वादियों में बिताए सुकून के पल"

Thursday, July 25, 2019

पेड़-पौधे प्रकृति की आत्मा और प्राकृतिक सुंदरता के घर होते हैं


हमारा घर चार मंजिला इमारत के भूतल पर स्थित है। प्रायः भूतल पर स्थित सरकारी मकानों की स्थिति ऊपरी मंजिलों में रहने वालों के जब-तब घर भर का कूड़ा-करकट फेंकते रहने की आदत के चलते किसी कूड़ेदान से कम नहीं रहती है, फिर भी एक अच्छी बात यह रहती है कि यहां थोड़ी-बहुत मेहनत मशक्कत कर पेड़-पौधे लगाने के लिए जगह निकल आती है, जिससे बागवानी का शौक और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने का काम एक साथ हो जाता है। बचपन में जब भी बरसात का मौसम आता तो हम बच्चे खेल-खेल में इधर-उधर उग आये छोटे-छोटे पौधे लाकर अपने घर के आस-पास रोपकर खुश हो लेते थे। तब हमें पता नहीं था कि पेड़-पौधे पर्यावरण के लिए कितना महत्व रखते हैं, किन्तु आज जब महानगरों के विकास के नाम पर पेड़-पौधों  की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संकट गहराया है तो यह बात अच्छे से समझ आयी है कि पेड़-पौधें होंगे तो हम सुरक्षित और स्वस्थ रह सकेंगे। बचपन से प्रकृति के साथ मेरा जो लगाव रहा है वह आज भी वैसा ही है। मैं आज न केवल अपने घर के आस-पास, बल्कि दूसरी जगह भी पेड़-पौधे लगाने और दूसरे लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करने में पीछे नहीं रहती हूँ। यह मेरा प्रकृति से जुड़ाव और पर्यावरण को बचाने का परिणाम है कि आज हमारा घर-आंगन ग्रीनलैंड बना हुआ है। एक तरफ मेरे घर की सीढ़ियों पर रखे गमलों में सदाबहार, गुलाब, सेवंती, गेंदा, गुलाब, मोगरा आदि की खुशबू फैली है तो दूसरी तरफ हमने घर के सामने जिस बंजर जमीन में बाड़ी लगाकर हमने आम, अमरूद, पपीता, आँवला, मौसम्बी,  मुनगा, नीबू, नीम, पारिजात इत्यादि पेड़ लगाये हैं, वह वर्षा की अमृत बूंदे पड़ते ही खिलखिला उठे हैं। इसके साथ ही बाड़ी में गिलोय के साथ-साथ लौकी, कद्दू, ककड़ी, गिलकी, सेम, करेले आदि की बेलों से बहार छायी हुई है, जिसे देख मन खुशी से झूम उठता है। इसके अलावा हम घर से थोड़ी दूर स्थित श्यामला हिल्स के पहाड़ी पर बने भगवान शंकर के मंदिर “जलेश्वर मंदिर“ में भी पेड़-पौधे लगाकर निरंतर उनकी देख-रेख करते हैं। मुझसे प्रेरित होकर कई लोग भी पेड़-पौधे लगाकर उनकी स्वयं रेखरेख का जिम्मा उठाना सीख गए हैं, यह  देख मुझे अपार प्रसन्नता होती है। 
आज सोचती हूँ पेड़-पौधों के प्रति प्रेम-भावना तो हमारे देश में बहुत प्राचीन काल से है। हम तो पेड-पौधों को लकड़ी की साधारण ठूंठ ही नहीं, बल्कि उन्हें देवता मानते आए हैं। भगवान शंकर का निवास मानकर हम वट की पूजा तो आमलकी एकादशी को आंवला की पूजा करते हैं। पीपल और तुलसी की पूजा तो प्रतिदिन होती है। फिर आखिर क्यों हमने लालच में ईश्वरीय सृष्टि की अलौकिक, अद्भुत, असीम एवं विलक्षण कलास्वरूप प्रकृति-सौंदर्य के कोश को लूटने के लिए उससे शत्रुता मोल लेकर उसके हरे-भरे खेत नष्ट किए, वन-उपवन काटे, हरियाली उजाडी, पहाड़ों को तोड़ा और नदियों को मरोड़ने का दुस्साहस किया? क्यों उसके हरे-भरे खेतों के स्थान पर बड़ी-बड़ी इमारतें तानकर, अमूल्य-बहुमूल्य पदार्थों के कोश वनों के स्थान पर बडे-बड़े औद्योगिक संस्थान खड़े करके सुगंधित वायुमंडल को दूषित कर और विषैली गैसों से पावन जल को अपवित्र कर विकसित होने का दंभ भर रहे हैं? हम क्यों भूल रहे हैं कि पेड़-पौधे तो प्राकृतिक सुंदरता के घर हैं,  हरियाली का स्रोत हैं, स्वास्थ्य वृद्धि की बूटी हैं, वर्षा के निमंत्रणदाता हैं, प्रकृति के रक्षक हैं, प्रदूषण के नाशक हैं, प्राणिमात्र के पोषक हैं। वे अपने पत्तों, फल-फूल, छाया, छाल, मूल, वल्कल, काष्ठ, गंध, दूध, भस्म, गुठली और कोमल अंकुर से प्राणि-मात्र को लाभ पहुंचाते हैं। बावजूद इसके आज यह गंभीर चिंतन का विषय बना है कि-  
“बरगद, पीपल, नीम को, काट ले गये लोग।
हवा भी जहरी हुई, फैला जहरी रोग।।“ 
पेड़-पौधे प्रकृति की आत्मा और प्राकृतिक सुंदरता के घर होते  हैं। प्रकृति इस भौतिक जगत् की उत्पत्ति का मूल कारण है तो मनुष्य को इसका एक महत्वपूर्ण प्राणी माना जाता है। प्रकृति माँ रूप में ऑक्सीजन रूपी आहार प्रदान कर पर्यावरण को स्वस्थ रखती है। विषैली गैसों तथा कार्बनडाइआक्साइड का भक्षण कर पर्यावरण को प्रदूषण से बचाती है। पेड़-पौधों की अंधाधुंध तथा बेरहमी से हो रही कटाई से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, जिससे तापमान बढ़ने से हिमखंड पिघलने लगे हैं, बाढ़ की स्थिति निर्मित हो रही है। पृथ्वी की ऊर्जा शक्ति बढ़ाने के चक्कर में उपज की पौष्टिक शक्ति क्षीण हो रही है। अब न अनाज में ताकत न फलों में पहले जैसा स्वाद मिल पा रहा है। खनिज पदार्थों की अत्यधिक खुदाई ने उसके कोष को खाली होने की नौबत तक पहुंचा दिया है।            
        विष्णु-धर्म-सूत्र के अनुसार, ‘एक व्यक्ति द्वारा पालित-पोषित वृक्ष एक पुत्र के समान या उससे भी कहीं अधिक महत्व रखता है क्योंकि संतान तो पथभ्रष्ट भी हो सकती है, लेकिन वृक्ष पथभ्रष्ट नहीं होते। वृक्ष यदि फलदार है तो वह अवश्य फल देगा और यदि नहीं है तो भी छाया और ऑक्सीजन के साथ ही बूटी, पत्ते और लकड़ी तो अवश्य देती ही है। मनुष्य और प्रकृति का संतुलन बना रहे, इसके लिए आज प्रत्येक देश के हर एक नागरिक को अपने आसपास के क्षेत्र में पेड़-पौधे लगाने की आवश्यकता है, ताकि शुद्ध वायु मिलने से आयु बढ़े। जब धरती पर पेड़-पौधे लगेंगे और हरियाली छायेगी तो पर्यावरण-संकट के बादल स्वतः ही छंट जायेंगे और मनुष्य स्वस्थ जीवन जी सकेगा। 
....कविता रावत

Friday, May 31, 2019

सुबह की सैर और तम्बाकू पसंद लोग


 गर्मियों में बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ  लगते ही सुबह-सुबह की खटरगी कम होती है, तो स्वास्थ्य लाभ के लिए सुबह की सैर करना आनंददायक बन जाता है। यूँ तो गर्मियों की सुबह-सुबह की हवा और उसके कारण आ रही प्यारी-प्यारी नींद के कारण बिस्तर छोड़ने में थोड़ा कष्ट जरूर होता है, लेकिन स्वास्थ्य लाभ के लिए इसका त्याग करना जरूरी हो जाता है। सुबह की सैर से शरीर में नई स्फूर्ति मिल जाती है। सुबह-सुबह पक्षियों का कलरव, मंद-मंद सुगंधित हवा, उगते सूरज को देखना और स्वच्छ आकाश को निहारने से मन को जो सुखद अनुभूति होती है, वह अप्रतिम है।
सुबह की सैर स्वास्थ्य निर्माण का सर्वोत्तम उपाय है। यह सस्ता भी है और मीठा भी, जिसके लिए न तो डाॅक्टरों को फीस देनी पड़ती है और न कड़वी दवाएं खानी पड़ती है। बावजूद इसके जब सुबह-सुबह सड़क किनारे कहीं किसी बुजुर्ग तो कहीं किसी मासूम बच्चे को तम्बाकू-गुटखा बेचते और लोगों को खरीदते हुए देखती हूँ तो मन खराब हो जाता है, जिससे सैर के आनंद को फुर्र होते देर नहीं लगती। सुबह-सुबह सैर को निकले कई लोग जब काका, बाबा, गुरू, विमल, रजनीगंधा, राजविलास, राजश्री जैसे शाही और दिलखुश नामों वाले गुटखों को मुँह में दबाये, स्मार्ट सड़क पर रंगीन पिचकारी मारते हुए देखती हूँ, तब यह बात समझ से परे होती है कि आखिर ये लोग सुबह-सुबह कैसा स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं?         
         आजकल तम्बाकू-गुटखा सबसे छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक सबसे फलते-फूलते कारोबार के रूप में स्थापित होता जा रहा है। कई लोग इसका एक जरूरी प्रमुख खाद्य पदार्थ की तरह उपभोग करने लगे हैं, जिससे हरतरफ इसकी मांग जोरों पर है। यह इतना सुलभ है कि आपको दस कदम पैदल चलने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। जगह-जगह छोटे-छोटे स्टाॅलों के अलावा यह पान की दुकान, किराने की दुकान, चाय की दुकान के साथ ही ढाबों, होटलों तक अलसुबह से लेकर देर रात तक बड़ी सुगमता से मिल रहा है। आज तमाम चेतावनी के बावजूद तम्बाकू खाने वालों की कोई कमी नहीं है। हर तीसरा व्यक्ति मुंह में तम्बाकू-गुटखा दबाए बड़ी सहजता से कहीं भी नजर आ जायेगा। आज विकट स्थिति यह बनती जा रही है कि घर-परिवार के सदस्यों से लेकर एक साधारण स्कूल, मेडिकल काॅलेज, इंजीनियरिंग काॅलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले कई बच्चे और उनके कतिपय शिक्षक, सरकारी और प्रायवेट दफ्तरों में काम करने वाले बहुसंख्य अधिकारी/कर्मचारी तमाम चेतावनियों को दरकिनार कर तम्बाकू का सेवन बड़े शौक से कर रहे हैं।
          यह गंभीर विचारणीय विषय है कि तम्बाकू का सेवन हमारे देश के नौनिहालों और बुजुर्गों से लेकर युवा वर्ग, जिन्हें राष्ट्र की दूसरी पंक्ति, कल के कर्णधार, देश के नेतृत्व करने वाले और अपनी शक्ति, सामर्थ्य  व  साहस से देश को परम-वैभव तक पहुंचाने का दायित्व स्वीकारने वाला समझा जाता है, की सर्वाधिक पंसद बन गई है, जो हमारे देश सेवा, समाज सेवा और विश्व कल्याण के स्वर्णााक्षरों में लिखे इतिहास को धूल-धूसरित करने के लिए अग्रसर हैं।
  ... कविता रावत


Saturday, May 11, 2019

हर दिन माँ के नाम


वह माँ जो ताउम्र हरपल, हरदिन अपने घर परिवार की बेहतरी के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर अपनों को समाज में एक पहचान  देकर खुद अपनी पहचान घर की चार दीवारी में सिमट कर रख देती है और निरंतर संघर्ष कर उफ तक नहीं करती, ऐसी माँ का एक दिन कैसे हो सकता है! घर-दफ्तर के जिम्मेदारी के बीच दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच अपने आप जब भी मैं कभी मायूस पाती हूँ तो मुझे अपनी माँ के संघर्ष के दिन जिसने अभी भी 60 साल गुजर जाने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा है और उन्होंने भी कभी कठिनइयों से मुहं नहीं मोड़ा और न कभी हार मानी, देखकर मुझे संबल ही नहीं बल्कि हर परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा मिलती है। गाँव से 17-18 साल के उम्र में शहर में आकर घर परिवार की जिम्मेदारी संभालना सरल काम कतई नहीं था। पिताजी जरुर सरकारी नौकरी करते थे, लेकिन वे नौकरी तक ही सीमित थे, घर परिवार की जिम्मेदारी से कोसों दूर रहते थे। ऐसे में हम 3 बहनों और 2 भाईयों की पढाई-लिखाई से लेकर सारी देख-रेख माँ ने खुद की। पढ़ी-लिखी न होने की बावजूद उन्हें पता था कि एक शिक्षा ही वह हथियार है, जिस पर मेरे बच्चों का भविष्य बन सकता है और उसी का नतीजा है कि आज हम सब पढ़-लिख कर घर से बाहर और अपनी घर-परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों को बहुत हद तक ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं ।
          माँ का संघर्ष आज भी जारी है भोपाल गैस त्रासदी से लेकर 5 शारीरिक ऑपरेशन के त्रासदी से जूझते हुए वह आज भी यूटरस कैंसर से पिछले 7 साल से बहुत ही हिम्मत और दिलेरी से लड़ रही है। पिताजी को गुजरे अभी 4 साल हुए हैं, उन्हें भी लंग्स कैंसर हुआ था, वे सिर्फ 2 माह इस बीमारी को नहीं झेल पाए थे, वहीँ माँ खुद कैंसर से जूझते हुए हमारे लाख मना करने पर भी घर पर नहीं रुकी और हॉस्पिटल में खुद पिताजी की देख-रेख करती रही। पिताजी नहीं रहे, लेकिन उन्होंने सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, हर दिन उनके साथ रही। आज जहाँ बहुत से लोग कैंसर का नाम सुनकर ही हाथ पैर छोड़ लेते हैं वहीँ मेरी माँ बड़ी हिम्मत और दिलेरी से खुद इसका डटकर सामना कर अपनी चिंता छोड़ आज भी खुद घर परिवार को संभाले हुए है।
        मेरा सौभाग्य है कि मेरी माँ हमेशा मेरे नजदीक ही रही है और मेरी शादी की बाद भी मैं उनके इतनी नजदीक हूँ कि मैं हर दिन उनके सामने होती हूँ। एक ओर जहाँ उनको देख-देख मुझे हरपल दुःख होता है कि उन्होंने बचपन से ही संघर्ष किया और उन्हें कभी सुख नसीब नहीं हुआ और हम भी उनके इस दुःख को कुछ कम नहीं कर पाए,  वहीँ दूसरी ओर वे आज भी हमें यही सिखा रही हैं कि हर हाल में जिंदगी से हार नहीं मानना।  मैंने माँ के संघर्ष में अपना संघर्ष जब भी जोड़कर देखने की कोशिश की तो यही पाया कि जिस इंसान की जिंदगी में बचपन से ही संघर्ष लिखा हो उसे संघर्ष से कभी नहीं घबराना चाहिए, क्योंकि शायद इसके बिना उसकी जिंदगी अधूरी ही कही जायेगी?
           माँ के साथ घर से बाहर घूमना सबकी तरह मुझे भी बहुत अच्छा लगता है, पर क्या करूँ? हर दिन एक से कहाँ रहते हैं. माँ आज घर से बाहर जाने में असमर्थ हैं।  कुछ वर्ष पूर्व जब उनके साथ भोजपुर जाना हुआ तो वहीँ एक फोटो मोबाइल से खींच ली थी, जिसे अपने ब्लॉग परिवार के साथ शेयर करना का मन हुआ तो सोचा थोडा- बहुत लिखती चलूँ, इसलिए लिखने बैठ गई। बहुत सोचती हूँ लेकिन उनके सबसे करीब जो हूँ, इसलिए  बहुत कुछ लिखने का मन होते हुए भी नहीं लिख पाती हूँ।
          आइए सभी हर माँ के दुःख-दर्द को अपना समझ इसे हरपल साझा करते हुए हर दिन माँ को समर्पित कर नमन करें !
         ..कविता रावत

Wednesday, May 1, 2019

मजदूर : सबके करीब सबसे दूर



मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!

कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

 
...कविता रावत