अबकी बार राखी में जरुर घर आना

अबकी बार राखी में जरुर घर आना


राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें हैं बुलाते
कभी खेले-कूदे अब क्यों हो भूले जाते
अपनी बारहखड़ी का स्कूल देखते जाना
बचपन के दिन की यादें साथ ले आना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का  है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब मन कम लगता
गाँव में रह शहर का सपना दिखता
सूने घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे
कब सुध लोगे देख बागवाँ बुला रहे
आकर अपनी आखों से  देख जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना


गाँव के बड़े-बुजुर्ग याद करते रहते हैं
अपने-पराये जब-तब पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर अनजान बने हुए हो
आकर सबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

                   ......कविता रावत



फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

सोने की बेड़ियां हों तो भी उसे कौन चाहता है?
स्वतंत्रता स्वर्ण से अधिक मूल्यवान होता है

बंदी  राजा  बनने से आजाद पंछी बनना भला
जेल के मेवे-मिठाई से रूखा-सूखा भोजन भला

स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ चौपट करती है

लोहा हो या रेशम दोनों बंधन एक जैसे होते हैं
फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं

स्वामिनारायण अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली

स्वामिनारायण अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली

स्वामिनारायण अक्षरधाम! भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के ज्योतिर्धर के रूप में अवतरित भगवान स्वामिनारायण का शाश्वत निवास-धाम है। दिल्ली के पावन यमुना-तट पर जहाँ ऊबड़-खाबड़ झाडि़यों से युक्त विशाल बंजर भूमि थी, वहां मात्र पांच वर्ष में पलक झपकते सम्पन्न हुआ कल्पनातीत स्वामिनारायण अक्षरधाम का सृजन, जो विश्व का महान आश्चर्य है।
गुरुदेव ब्रह्मस्वरूप योगीजी महाराज के संकल्प को साकार करने हेतु, प्रमुखस्वामी महाराज की प्रेरणा से इस अद्भुत स्मारक का सृजन हुआ है। वैसे तो मंदिर के लिए पिछले 32 वर्षों से गतिविधियां चल रही थीं, किन्तु आवश्यक 100 एकड़ का विशाल भू-खंड प्राप्त होते ही 8 नवम्बर 2000 को इस भव्य सांस्कृतिक संकुल का शिलान्यास मुहुर्त संपन्न हुआ और ठीक 5 वर्ष की अल्पावधि में निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। 6 नवम्बर 2005 को प्रमुखस्वामी महाराज, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे.कलाम, प्रधानमंत्री श्री मनमोहनसिंह तथा विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी की संयुक्त उपस्थिति में इस अक्षरधाम संकुल का भव्य उद्घाटन समारोह संम्पन्न किया गया।
इस सांस्कृतिक संकुल के विशाल परिसर के मध्य मे गुलाबी पत्थरों में पद्म पुष्प की भाँति प्रस्फुटित स्वामिनारायण अक्षरधाम एक दिव्य महालय जैसा विभूषित है। इसके सर्जन में जुटे 11000 से भी अधिक स्वयंसेवकों-संतो-शिल्पियों के 30 करोड़ मानव घंटों की भक्तिपूर्ण कार-सेवा का योगदान सदा अविस्मरणीय रहेगा।
भारत के प्रसिद्ध चित्रकार एवं आर्किटैक्ट सतीश गुजराज आस्थाशून्य हृदय से अक्षरधाम दर्शन के लिए उपस्थित हुए थे। बाहर निकलने पर अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “नास्तिक को भी आस्तिक बना दे, ऐसा दिव्य आयोजन है, यहाँ! इसकी भव्यता और शिल्प-कला शब्दातीत है! यहां आकर मैं दिग्मूढ़-सा हो गया हूँ। मेरा दृढ़ मत है कि इस प्रकार का निर्माण करने में कम से कम 50 वर्ष अवश्य लग जाते!“
इस अद्भुत चमत्कार का निर्माण मात्र 5 वर्ष में कैसे संभव हुआ? क्या इसके सृजन के लिए देव-शिल्पी भगवान विश्वकर्मा का अवतरण तो नहीं हुआ? इसका एकमात्र उत्तर है-श्रेष्ठतम आयोजन, उत्कृष्ट प्रबंधन और समर्पणपूर्ण प्रतिबद्धता।
दिल्ली से 400 कि.मी. दूर राजस्थान के बंसीपहाड़पुर की खानों से पत्थर लाकर, दिल्ली से 700 कि.मी. दूर पिंडवाड़ा, सिंकदरा तथा राजस्थान के दो दर्जन से अधिक कारखानों में विशाल पत्थरखंडों को पहुंचाना साधारण कार्य न था। 8 लाख घनफीट लाल-गुलाबी सेन्ड स्टोन और सफेद संगमरमर के पत्थरों को गढ़-तराश कर उन्हें अद्भुत शिल्पकला में संवारना और फिर ट्रांसपोर्ट द्वारा दिल्ली भेजना मनुष्य के लिए एक असंभव सी चुनौती थी। दिल्ली में इन कलात्मक शिल्पों को संयोजित करके निर्माणाधीन स्मारक में उचित स्थान पर जोड़ दिया जाता था। इस प्रकार 11000 स्वयंसेवकों और शिल्पियों के रात-दिन होते रहे अथक परिश्रम से विश्व का यह महान आश्चर्य भारत की राजधानी में साकार हुआ।
मुख्य स्मारक लाल-गुलाबी बलुई पत्थर तथा सफेद संगमरमर से निर्मित हुआ है, जो 141 फुट ऊंचा, 316 फुट चौड़ा तथा 356 फुट लम्बा है। अक्षरधाम में नक़्कासीदार 234 स्तंभ, 9 विशाल गुम्बद, 20 शिखर तथा 20,000 से भी अधिक तराशी हुई अत्यंत मनोहर कलाकृतियां हैं। स्मारक के मध्य में 11 फुट ऊंची भगवान स्वामिनारायण की स्वर्णिम प्रतिमा प्रतिष्ठित है तथा चारों ओर अवतार प्रतिमाएं दर्शनीय हैं। स्मारक तीन दिशाओं में पवित्र नारायण सरोवर से घिरा हुआ है, जिसमें भारत सहित विश्व के 151 पवित्र तीर्थो-नदियों-झीलों का जल भरा हुआ है। डेढ़ कि.मी. लम्बा दो मंजिला परिक्रमा पथ, स्मारक के चारों ओर रत्न-हार के समान सुशोभित है।
अक्षरधाम परिसर में दो विशाल प्रदर्शनकक्ष, भव्य आईमेक्स थिएटर, अद्भुत संगीतमय रंगीन फ़व्वारा, विशाल भारत उद्यान, अलंकारिक स्वागत द्वार तथा उच्च स्तरीय प्रेमवती आहार गृह आदि भारत के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक विरासत की रोमांचक अनुभूति कराते हैं। सहजानंद दर्शन कक्ष में भगवान स्वामिनारायण के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण घटनाओं को आधुनिक तकनीकी के माध्यम से जीवंत स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्तुति में फिल्म, ध्वनि, प्रकाश, रोबोटिक सिस्टम तथा अत्याधुनिक कम्प्यूटराइल्ड तकनीकी के संयुक्त संयोजन से रोबोटिक पुतलों और प्राकृतिक दृश्यों को देखकर सजीव वातावरण का आभास होता है।
प्रदर्शन का दूसरा महत्वपूर्ण भाग है- संस्कृति-विहार, जो अक्षरधाम की भूमि पर बना एक अजूबा संसार है। मात्र 14 मिनट में रोमांचक नौका-यात्रा करता हुआ यात्री, 10 हजार वर्ष पूर्व भारत की गौरवशाली संस्कृति को सरस्वती नदी के तट पर हूबहू सजीव-सा देखकर रोमांच की पराकाष्ठा का अनुभव करता है। 800 प्रतिमाएं सजीव-सी होकर भारत के प्राचीन इतिहास की अमरगाथा प्रस्तुत करती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। वेदकालीन बाजार, अर्थव्यवस्था, तक्षशिला विश्वविद्यालय, महर्षि चरक की औषधशाला तथा ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न आविष्कारों को देखते समय नौका-यात्री अपने वर्तमान को भूलकर स्वयं को वैदिक युग में खड़ा हुआ पाता है।
प्रदर्शनी का तीसरा भाग आई-मेक्स थिएटर है, जिसके 85 फुट × 65 फुट के महाकाय पर्दे पर 40 मिनट तक “नीलकंठ-दर्शन“ फिल्म देखकर दर्शक अभिभूत हो जाता है। भगवान स्वामिनारायण मात्र 11 वर्ष की बाल्यावस्था में गृह त्यागकर खुले शरीर, नंगे पांव भारत के तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। हिमालय की ऊंची-ब़र्फीली चोटियों पर चढ़ते, फिसलते, गिरते और पुनः उठकर आगे बढ़ते नीलकंठ को देखकर दर्शक रोमांचित हो उठता है। नीलकंठ के जीवन पर आधारित विश्व की इस प्रथम कथात्मक आई-मेक्स फिल्म का निर्माण बी.ए.पी.एस. स्वामिनारायण संस्था द्वारा किया गया है, जिसमें 45,000 कलाकारों ने भिन्न-भिन्न लोकेशन्स पर इस फिल्म की शूटिंग की गई है। हाॅलीवुड के विख्यात संगीतकार सेम कार्डन के प्रभावशाली संगीत के साथ इस फिल्म को देखकर दर्शक भाव-विह्वल हो उठता है।
22 एकड़ में फैले हुए विशाल “भारत उद्यान“ में 9 लाख से भी अधिक पेड़-पौधों-फूलों और लताओं की दुनिया ही अनूठी है। पर्यावरण की दृष्टि से दिल्लीवासियों के लिए यह एक महान् उपलब्धि है।
इस परिसर के उद्घाटन के अवसर पर इसके सर्जक-प्रेरक प्रमुखस्वामी महाराज ने कहा था, “अक्षरधाम भगवत् श्रद्धा और शान्ति का तीर्थधाम है, जो समूची मानवजाति को आत्मिक आनंद की ओर अग्रसर करके, उसे संस्कार-समृद्ध और दिव्य चेतना से परिपूर्ण करता रहेगा।“
अक्षरधाम परिसर भारत की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत का एक अभूतपूर्व संग्रहालय है, जो भारत के स्वर्णिम अतीत का अभिनंदन करता है, वर्तमान की व्याख्या करता है और भविष्य के लिए शुभाशीष प्रस्तुत करता है।
दस स्वागत द्वार
         विभिन्नता में एकता, विचारों की स्वतंत्रता और अनंत आविष्कार भारतीय संस्कृति की अनुपम विरात है। यह अमूल्य विरासत दस स्वागत द्वारों पर प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त हो रही है। अक्षरधाम के सुदीर्घ स्वागत-मार्ग में जलधाराओं के अभिवर्षण के साथ सुशोभित दस द्वार, दसों दिशाओं से ज्ञान प्राप्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। ये स्वागत द्वारा ऋग्वेद की विभावना ’प्रत्येक दिशाओं से हमें शुभ विचार प्राप्त हों’ इस परम सत्य का अभिनव दर्शन कराते हैं।
द्वारों से प्रवाहित जलधाराएं हमारे मानसिक संताप को मिटाती हैं और सांसारिक उत्तेजनाओं को शांत करती हैं। यह एक आध्यात्मिक आनंद की अवर्णनीय अनुभूति है।
दस प्रवेश द्वारों से होकर गुजरने वाला यात्री भारत की प्राचीन, किन्तु आधुनिक सांस्कृतिक उपलब्धियों का अवलोकन कर मंगलमय अनुभूति के साथ उद्यान की आनंदमयी हरीतिमा में निमग्न हो जाता है।  
भक्ति द्वार
भक्तिद्वार प्रस्तुत करता है भक्ति के उस पारंपरिक मार्ग को, जिसमें भगवान और उनके समर्पित भक्तों के 208 युगल रूवरूपों को अद्भुत शिल्पकला में तराशा गया है।
मयूर द्वार
दो मयूर द्वार कला और सौंदर्य से विभूषित हैं, जो यात्रियों को आनंद की सौगात लुटाते हैं। विविध आकार एवं मुद्राओं में शिल्पांकित 869 आकर्षक मयूर, द्वारों की सौंदर्य वृद्धि करते ऐसे सुशोभित हैं, मानो कि प्रकृति को चुनौती देते हों। 
जहां पत्थर भी भव्यता के गीत गाते हैं और जहां दिव्य चेतना के संस्पर्श से समय भी रूक जाता है। दिव्य तत्व का आशीर्वाद तथा स्वयंसेवकों की कल्पनातीत सेवा ही अक्षरधाम के सर्जन का रहस्य है, जो दर्शक को शान्ति  और भव्यता की अनुभूति में डुबो देता है। 
सहस्त्रों वर्ष पुरातनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है-अक्षरधाम स्मारक! जो विभिन्न मुद्राओं में पूर्ण कद के गजराजों की गजेन्द्रपीठ पर निर्मित है। यह पीठ शास्त्र-कथाओं के आधार पर मूल्यों का संदेश सुनाती है। मंडोवर की बाहरी दीवाल पर प्राचीन भारत के आचार्यों, ऋषियों और अवतारों के मनोहर शिल्प दृश्यमान होते हैं। मंडोवर के शीर्ष पर वितान की भांति फैले सामरण के ऊपर पारंपरिक शिखर और गुम्बद पर स्वर्णिम कलश पर लहराते ध्वज, दर्शकों को मानो किसी नये ब्रह्मांड की यात्रा की अनुभूति करा रहे हैं। मुख्य स्मारक की बाह्य दीवार को मंडोवर के रूप में जाना जाता है। मंडोवर की लम्बाई 610 फुट और ऊंचाई 25 फुट है। यह मंडोवर भारत में अब तक निर्मित मंडोवरों में सबसे लम्बा और ऊंचा है। इसमेमं भारत के महान ऋषियों, अवतारों, भक्तों आदि की 200 जीवंत कद की प्रतिमाएं, भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की गौरव गाथा का बयान करती हैं। 
स्मारक के मध्य खण्ड में भव्य काष्ठ सिंहान पर विराजमान 11 फुट ऊंची भगवान स्वामिनारायण की स्वर्णिम मूर्ति। श्रीचरणों में हाथ जोड़े हुए अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी, वचनामृत ग्रंथ लिए भगतजी महाराज, शास्त्रीजी महाराज, दिल्ली में “अक्षरधाम“ के स्वप्नद्रष्टा योगीराज महाराज और सर्जक प्रमुखस्वामी महाराज! यहां पर यात्री दिव्य शांति, आनंद और श्रद्धा के सागर में डूब जाता है।
भारतवर्ष की भूमि पर निवास करने वाला विशाल जन समुदाय, सांस्कृतिक, शारीरिक, भाषागत तथा अपनी मान्यताओं की भिन्नता के बावजूद पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक आध्यात्मिक रूप् से जुड़ा हुआ है। सनातन धर्म के अवतारों श्रीराम-सीता, श्रीराधा-कृष्ण, श्रीलक्ष्मी-नारायण तथा श्रीशिव-पार्वती की प्रतिमाएं भी भगवान श्री स्वामिनारायण के साथ अक्षरधाम में प्रतिष्ठित की गई हैं। इन प्रतिमाओं की दिव्य उपस्थिति श्रद्धालुजन दर्शकों को निष्ठा, समर्पण तथा नैतिक मूल्यों की प्रेरणा प्रदान करती है।
अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली से प्राप्त पुस्तिका से संकलित 

मौत नहीं पर कुछ तो अपने वश में होता ही है

मौत नहीं पर कुछ तो अपने वश में होता ही है

जरा इन मासूम बच्चों को अपनी संवेदनशील नजरों से देखिए, जिसमें 14 वर्ष की सपना और उसकी 11 वर्ष की बहिन साक्षी और 11 वर्ष के भैया जिन्हें अभी कुछ दिन पहले तक माँ-बाप का सहारा था, वे 1 जुलाई 2018 रविवार को भयानक सड़क दुर्घटना भौन-धुमाकोट मोटर मार्ग पर होने से बेसहारा हो चुके हैं। इस दर्दनाक हादसे से उत्तराखंड ही नहीं अपितु पूरा देश दहल उठा, जिसने भी सुना/ देखा उनकी आंखे नम हुए बिना नहीं रही। इस हादसे में इन तीनों बच्चों ने माँ-बाप को खो दिया, जिससे इनके सामने परवरिश की बड़ी विकट समस्या खड़ी हो गयी है। भले ही निकट रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी इनको अभी सहारा दें लेकिन मां-बाप जितना अपने बच्चों के लिए करते हैं, उतना और किसी के लिए करना कहाँ संभव हो पाता है, यह हम सभी जानते हैं। इन बच्चों ने पहले तो अपने दादा-दादी खोये और अब काल ने इनके माँ-बाप को भी लील लिया। प्रभु की इस लीला को, मृत्यु के तांडव-नृत्य के रहस्य को, प्रकृति के इस दंड-विधान को, जगनियन्ता की क्रीड़ा ही मान सकते हैं, जिसका भेद पाना मनुष्य के वश में नहीं है। हाँ कोई नचिकेता हो तो संभव है, मृत्यु के रहस्य को पा सके। कोई भी दुर्घटना न मनुष्य की उपयोगिता और महत्ता को देखती है और न समय और कुसमय को। कोई व्यक्ति किसी आवश्यक कार्य से जा रहा है, कितने उत्साह के साथ किसी स्वागत-समारोह या विवाहोत्सव की तैयारियां हो रही हों, इन बातों से दुर्घटना का  कोई वास्ता नहीं, जरा झटका लगने की देर है और मनुष्य की जीवन-लीला समाप्त। लगता है दुर्घटना को तो जैसे किसी की बलि चाहिए- चाहे वह कोई भी हो, उसे किसी का निहाज नहीं, किसी से प्यार नहीं। जब भी ऐसी किसी दुर्घटना के बारे में सुनती हूँ तो मेरा मन बड़ा व्यथित हो जाता है, क्योंकि 13 जून, 2010 को ऐसी ही एक सड़क दुर्घटना में मेरे ममेरे देवर  अपनी टाटा सूमो सहित एक गहरी खाई में गिर गये थे, जिसमें बैठे 9 लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई थी।
     "सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय, सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवै कोय।" अर्थात् इस संसार में न तो सदा-सदा के लिए सावन  है, न फल-फूल, न कोई स्थिर है और नहीं जीवित रहता है। बाबजूद इसके मनुष्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसके पास संवेदना है, सोच-विचार, अच्छे-बुरे को समझने की शक्ति है।  हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि मानवीय संवेदना और इंसानियत की लौ सबके दिलों में जलती रहती हैं, बस उसे जिन्दा रखने की जरुरत होती  है। मैंने एक छोटी सी पहल की है और आप से भी अनुरोध करती हूँ कि थोड़ा संवेदनशील होकर विचार-विमर्श करते हुए मानवीय आधार पर इन मासूमों को थोड़ा-थोड़ा सहारा देने के लिए आगे बढ़ें, आपका एक छोटे से छोटा सहयोग भी इन्हें इनके भविष्य गढ़ने में मददगार साबित होगा, जीने का आधार बनकर  इन्हें संबल प्रदान करेगा, और वे जीवन जीने की राह पर चलना सीख सकें।  इसलिए यथा सामर्थ्य सहायता करने में पीछे न रहे। बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। एक-एक रुपये करके भी लाखों आसानी से जमा हो सकते हैं, बस इसके लिए इच्छा शक्ति और संवेदनशीलता की जरुरत है। आजकल तो इंटरनेट बैंकिंग और ऐप से किसी के खाते में पैसे जमा करना बड़ा आसान काम हो गया है। अभी बच्चें अपने   मामा अरुण भदोला के पास है, जो भी व्यक्तिगत रूप से संवेदना अथवा आर्थिक सहयोग करना चाहें, वे उनके मोबाइल नम्बर 8650536735 से संपर्क कर सकते हैं।
            
सपना और साक्षी के निम्न बैंक खाते के माध्यम से आप सहयोग कर सकते हैं-
1. कु. सपना पुत्री स्व0 सुखदेव स्व0बबली देवी
कक्षा 9 ई0का0 अन्द्रोली
ग्राम अपोला पोस्ट अन्द्रोली नैनीडांडा
पौड़ी गड्वाल उतराखण्ड।
खाता संख्या. 35559265859
IFSC SBIN0004533
SBI DHUMAKOT

2. कु.  साक्षी पुत्री स्व0 सुखदेव स्व0 बबली देवी
कक्षा 7 ई0का0 अन्द्रोली
ग्राम अपोला पोस्ट अन्द्रोली नैनीडांडा
खाता संख्या. 31863809098
IFSC SBIN0004533
SBI DHUMAKOT
दशरथ मांझी की राह चला एक और मांझी

दशरथ मांझी की राह चला एक और मांझी


   माउंटेन मैन ‘दशरथ मांझी’ की तरह अपनी दयनीय स्थिति के बावजूद दृढ़ इच्छा शक्ति रखने वाला एक और मांझी जो कि मध्यप्रदेश के जिला होशंगाबाद का निवासी है, जो एक पिछड़े इलाके सोहागपुर जैसे एक छोटे से स्कूल का हिंदी माध्यम का औसत दर्जे के छात्र रहा है, बावजूद इसके जिसने भोपाल आकर 8 वर्ष की कठोर साधना के बाद वर्ष 2016 में MBBS की प्रवेश परीक्षा NEET पास करके भोपाल स्थित चिरायु मेडिकल काॅलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लेकर ही दम लिया है। यहाँ एक बात स्पष्ट है कि जहां बहुत से छात्र दो-तीन बार असफल होने पर आगे उसकी तैयारी छोड़कर दूसरी राह चल पड़ते हैं वहीं मांझी की दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिणाम है कि उसने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति और विकट परिस्थितियों के बाद भी कई बार असफल रहने के बाद हार नहीं मानी, मैदान नहीं छोड़ा, डटा रहा और कभी निराश नहीं हुआ। वह निरन्तर मेरिट में आने के लिए सरकारी काॅलेज मिलने की आस लगाये कठोर परिश्रम करता रहा, ताकि वह सरकारी काॅलेज में दाखिला लेकर सरकारी अनुदान से अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर सके। लेकिन इस दौरान मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में बदलाव किया गया तो नए नियमों के तहत जब उसने देखा कि अब वह आगे प्रवेश परीक्षा के लिए पात्र नहीं होगा तो फिर अन्य कोई विकल्प न होने से उसे प्रायवेट काॅलेज में प्रवेश लेना पड़ा। जहाँ उसे इस बात का मलाल जरूर है कि यदि वह आरक्षित श्रेणी का होता तो निश्चित ही अब तक वह अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर चुका होता और उसे अपनी फीस भरने के लिए इधर-उधर मारा-मारा नहीं भटकना पड़ता।
      मांझी के पिताजी फलों का हाथ ठेला लगाकर अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं, इसके बाद भी बेहद तंगहाली में उन्होंने धुन के पक्के अपने बेटे की दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर परिश्रम को पढ़ लिया तभी तो उन्होंने अपना जो कुछ थोड़ा बहुत था, उसे बेचकर और रिश्तेदारों से कर्जा लेकर प्रायवेट मेडिकल काॅलेज में प्रवेश दिलाने की हिम्मत दिखाई। वे पढ़े-लिखे भले ही नहीं है, लेकिन इस बात को अच्छे से समझ गए हैं कि जब उनके बेटे ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की है तो निश्चित ही वह आगे भी कठोर परिश्रम कर अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब रहेगा। वे अपने बेटे की लगन देखकर समझ गए हैं कि कठिन परिश्रम के लिए आदमी में जो सहनशीलता, साहस, निर्भीकता आदि गुण होने आवश्यक है, वे उसमें विद्यमान हैं। क्योंकि कठोर परिश्रम करने की प्रवृत्ति प्रत्येक व्यक्ति में नहीं होती, लेकिन अपनी धुन के पक्के व्यक्ति कठिन परिश्रम करके जैसे-तैसे एक दिन अपनी मंजिल पाकर ही दम लेते हैं।
     एक ओर जहाँ धर्मेंद्र मांझी को MBBS प्रथम वर्ष की परीक्षा पास करके पहली सीढ़ी पार करने की अपार प्रसन्नता हुई तो वहीँ दूसरी ओर जब फीस भरने की चिंता हुई तो उसने अपने कॉलेज के सहपाठियों, डॉक्टरों एवं जान पहचान निकाल कर घर-घर जाकर पैसा इकट्ठा किया और पूरी फीस भरकर ही दम लिया। उसे आगे की फीस भरने की चिंता आज भी है, जिससे उसकी पढाई बाधित हो रही है। वह आज भी पढाई के साथ-साथ ही व्यर्थ ही बड़े-बड़े एनजीओ, क्लब, एसोसिएशन और शासन-प्रशासन के चक्कर काटने में लगा है, बावजूद इसके वह एक-दूसरे से पहचान निकल कर घर-घर व्यक्तिगत संपर्क कर एक-एक पैसा इकट्ठा करने में जुटा है। 
      मांझी कठोर संघर्ष में जीने वाला जीव है, इसलिए उसे पूरी उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जो गरीबों के लिए मुफ्त शिक्षा की बड़ी-बड़ी बातें और घोषणा की हैं, वह केवल कोरी मुंहजुबानी और कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। उसे पूरी उम्मीद है कि एक दिन कोई न कोई  उसकी पुकार सुनने वाला जरूर मिलेगा।    
 मांझी के लिए इस समय १-१ रुपये की बहुत बड़ी कीमत है, आपके द्वारा दी जाने वाली एक छोटी से छोटी धनराशि भी उसे उसकी मंजिल के करीब लाएगी और उसका सपना पूरा होगा, इसके हेतु कृपया अपना आर्थिक योगदान उसके निम्न बैंक खाते, Paytm अथवा वर्तमान निवास के माध्यम से प्रदान करने की कृपा करें:-
नाम-  धर्मेन्द्र कुमार मांझी    
Mobile Number :  9340359567
बैंक का नाम - बैंक आॅफ बड़ौदा, शाखा हबीबगंज भोपाल
Account No.   18600100015544
IFSC Code  :   BARB0HABIBG    (Fifth character is Zero)
MICR Code :  462012005
Paytm No.      9340359567

 वर्तमान निवास का पता -
हनुमान मंदिर स्वर्गाश्रम,
बद्रीनारायण मंदिर के पास,
 साउथ टी.टी. नगर, भोपाल  

 पूर्व संदर्भित लिंक ...
http://www.kavitarawat.in/2018/05/blog-post_24.html

 समाचार पत्र दैनिक 'पत्रिका' में शीर्षक "दृढ इच्छा शक्ति के बूते सफलता' नाम से प्रकाशित, link
https://www.patrika.com/opinion/mountain-man-dashrath-manjhi-2899154/






       

डाॅक्टर बनने की राह आसान बनाने हेतु एक सार्वजनिक अपील

डाॅक्टर बनने की राह आसान बनाने हेतु एक सार्वजनिक अपील


माउंटेन मैन के नाम से विख्यात दशरथ मांझी को आज दुनिया भर के लोग जानते हैं। वे बिहार जिले के गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे, जिन्होंने अकेले अपनी दृ़ढ़ इच्छा शक्ति के बूते  अत्री व वजीरगंज की 55 किलोमीटर की लम्बी दूरी को 22 वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद गहलौर पहाड़ काटकर 15 किलोमीटर की दूरी में बदलकर ही दम लिया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि जब वे गहलौर पहाड़ के दूसरे छोर पर लकड़ी काट रहे थे तब उनकी पत्नी उनके लिए खाना ले जा रही थी और उसी दौरान वह पहाड़ के दर्रे में गिर गई, जिससे चिकित्सा के अभाव में उसकी मृत्यु हो गई, क्योंकि वहां से बाजार की दूरी बहुत थी। उनके मन में यह बात घर कर गई कि यदि समय पर उनकी पत्नी का उपचार हो गया होता तो वह जिन्दा होती। इसलिए उन्होंने उसी समय ठान लिया कि वे अकेले दम पर पहाड़ के बीचों-बीच से रास्ता निकालकर ही दम लेगें, जो उन्होंने तमाम तरह की कठिनाईयों के बावजूद कर दिखाया। यहां एक बात साफ है कि यदि गांव में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होती तो शायद उनकी पत्नी की जान बच गई होती। कमोवेश आज भी अधिकतर गांवों की स्थिति चिकित्सा के मामले में बड़ी सोचनीय व दयनीय है। गांव में एक ओर जहां चिकित्सा के अलावा गरीबी का आलम पसरा मिलता है वहीं दूसरी ओर गरीब बच्चों के लिए उच्च स्तर पर शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था न होने से गरीबी के चलते उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है। नगरीय क्षेत्रों की अपेक्षा देहातों में अशिक्षा का अभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिलता है, जिसका दुःखद पहलू यह भी है कि कई समझदार और पढ़े-लिखे लोग इनका फायदा उठाने से पीछे नहीं हटते। बेचारे गरीब आदमी अपने गुजर-बसर के बाद यदि अपना जीवन स्तर कुछ ऊपर उठने के लिए सोचते भी हैं तो उसके लिए जब वे इधर-उधर से कर्जा लेते हैं तो उसी में डूब जाते हैं और फिर वे कभी कुछ सोचने-समझने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते हैं। उनकी ऐसी ही दशा के बारे में किसी कवि ने बड़ा ही सटीक कहा है कि-
है जिसका सर पर कर्जे का बोझ
न मिलती जिसको रोटी रोज
करेगा वह क्या जीवन खोज-
लायेगा कहां से बोलो ओज?
मैंने यहां माउंटेन मैन ‘दशरथ मांझी’ का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि उनकी तरह जाने कितने ही गरीब लोग अपनी दयनीय स्थिति के कारण अपनी मंजिल की ओर दृढ़ निश्चय होकर कदम तो बढ़ा लेते हैं लेकिन उन्हें गरीबी की मार के चलते अपनी मंजिल बीच में ही अधूरी छोड़नी पड़ती है। दशरथ मांझी की तरह धर्मेन्द्र मांझी जो कि सोहागपुर, जिला होशंगाबाद का निवासी है, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से विगत 9 वर्ष से जानती हूँ, जिसने औसत दर्जे के छात्र होने के बावजूद एक पिछड़े इलाके से आकर भोपाल में मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए 8 वर्ष की कठोर साधना की और वर्ष 2016 में एम.बी.बी.एस. की प्रवेश परीक्षा पास करके भोपाल स्थित चिरायु मेडिकल काॅलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लेकर ही दम लिया। मैं यहाँ यह बात बताना जरुरी समझती हूँ कि जहां बहुत से छात्र दो-तीन बार असफल होने पर आगे तैयारी करना छोड़ देते हैं वहीं मांझी की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम ही है कि विकट परिस्थितियों के बाद भी कई बार असफल रहने के बाद उसने मैदान नहीं छोड़ा, डटा रहा और कभी निराश नहीं हुआ। वह निरन्तर मेरिट में आने के लिए सरकारी काॅलेज मिलने की आस लगाये कठोर परिश्रम करता रहा, ताकि वह सरकारी काॅलेज में दाखिला लेकर सरकारी अनुदान से अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर सके। लेकिन इस दौरान मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में बदलाव किया गया तो नए नियमों के तहत जब उसने देखा कि अब वह आगे प्रवेश परीक्षा के लिए पात्र नहीं होगा तो फिर अन्य कोई विकल्प न होने से उसे प्रायवेट काॅलेज में प्रवेश लेना पड़ा। जहाँ उसे इस बात का मलाल जरूर है कि यदि वह आरक्षित श्रेणी का होता तो निश्चित ही अब तक वह अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर चुका होता और उसे आज फीस की जुगत में मारा-मारा नहीं भटकना पड़ता। 
मांझी के पिताजी फलों का हाथ ठेला लगाकर अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं, इसके बाद भी बेहद तंगहाली में उन्होंने धुन के पक्के अपने बेटे की दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर परिश्रम को पढ़ लिया तभी तो उन्होंने अपना जो कुछ थोड़ा बहुत था, उसे बेचकर और रिश्तेदारों की मदद से प्रायवेट मेडिकल काॅलेज में प्रवेश दिलाने की हिम्मत दिखाई। वे पढ़े-लिखे भले ही नहीं है, लेकिन इस बात को अच्छे से समझ गए हैं कि जब उनके बेटे ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की है तो निश्चित ही वह आगे भी कठोर परिश्रम कर अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब रहेगा। वे अपने बेटे की लगन देखकर समझ गए हैं कि कठिन परिश्रम के लिए आदमी में जो सहनशीलता, साहस, निर्भीकता आदि गुण होने आवश्यक है, वे उसमें विद्यमान हैं। कठोर परिश्रम करने की प्रवृत्ति प्रत्येक व्यक्ति में नहीं होती, लेकिन अपनी धुन के पक्के व्यक्ति कठिन परिश्रम करके ही सौभाग्यशाली कहलाते हैं।
         धर्मेन्द्र कुमार मांझी की एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण हों और उसका डॉक्टर बनने का सपना साकार हो, इस हेतु मैं आप सभी पाठकों एवं सुधिजनों से यथासंभव आर्थिक सहायता की अपील करती हूँ।  

आर्थिक सहायता हेतु धर्मेन्द्र मांझी द्वारा लिखित सार्वजनिक निवेदन पत्र

मैं धर्मेन्द्र कुमार मांझी आत्मज श्री बेनीप्रसाद, निवासी-सोहागपुर, जिला होशंगाबाद मध्यप्रदेश आप सभी सम्मानीय पाठकों एवं सुधिजनों से करबद्ध निवेदन करता हूँ-
मैंने डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का एक सुनहरा सपना देखा है। इसी उद्देश्य पूर्ति के लिए 8 साल सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद वर्ष 2016 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर मैं चिरायु मेडिकल काॅलेज एण्ड हाॅस्पिटल, भोपाल में एम.बी.बी.एस. में दाखिला ले पाया हूँ। मैं पिछले एक वर्ष से लगातार काॅलेज में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा हूँ। मैंने प्रथम वर्ष की पढ़ाई करते हुए 62 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया है और वर्तमान में द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय है, फिर भी पहले साल की फीस मेरे घर वालों ने अपना जो कुछ भी था वह सब बेचकर एवं रिश्तेदारों की मदद् से भर दी थी। मेरे पास कोई प्रोपर्टी भी नहीं है, इसलिए मुझे पढ़ाई के लिए कोई भी बैंक लोन नहीं दे पा रहा है उनका कहना है कि प्रोपर्टी के मूल्यांकन के आधार पर ही लोन पास होता है। पिछले 2 माह से मैं स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित बहुत से जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के अलावा कलेक्टर कार्यालय एवं कई प्राइवेट संस्थानों के चक्कर काट चुका हूँ, लेकिन सभी का रवैया टालमटाल रहा है। एक गरीब की मदद् केवल इतनी ही हो पाई है कि सब जगह से औपचारिक रूप से बैंक को फोन लगाया गया, जिसके जवाब में बैंक यही कहता आ रहा है कि वे केवल अंतिम वर्ष की बची फीस ही लोन के रूप में दे सकते हैं।
मेरे घर की आय का एकमात्र जरिया मेरे पिताजी द्वारा फलों का हाथ ठेला लगाकर गुजारा भर है, फिर में मेरी डाॅक्टर बनने और समाज सेवा की धुन को देखते हुए उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पहले साल की फीस अपना सबकुछ बेचकर और बाकी निकट रिश्तेदारों की मदद् से भर ली। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि द्वितीय वर्ष की फीस मेरी अत्यन्त कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए मेरे सीनियर और सुपर सीनियर और डिपार्टमेंट के सभी लोगों ने मिलकर भर दी। अब चूंकि मुझे तृतीय वर्ष की फीस भरनी है, जिसके लिए मैं शहर में मारा-मारा फिरने के लिए मजबूर होकर अपने आप को असहाय महसूस कर रहा हूँ। मुझे इसकी दिन-रात भारी चिन्ता सता रही है, इस कारण मेरी पढ़ाई भी बाधित हो रही है। मुझे इसी साल की फीस की चिन्ता है, जो 5 लाख 72 हजार है, जिसे मुझे 12 जून, 2018 तक भरना है। अगले साल की ज्यादा चिंता नहीं है क्योंकि तब मुझे बैंक से लोन मिल जायेगा। 
मैं एक औसत दर्जे का छात्र रहा हूँ, फिर भी मैंने अपनी पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाई करते हुए मेडिकल की प्रवेश परीक्षा पास करते हुए यह मुकाम हासिल किया है, जिसे आगे भी हर हाल में मुझे आगे बढ़ाना है और डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का मैंने जो लक्ष्य निर्धारित किया हैै, उसे पूरा करना है, जिस हेतु आपके आशीर्वाद स्वरूप आप सभी से यथासंभव आर्थिक सहायता की उम्मीद कर रहा हूँ।
मैं मेधावी छात्र योजना के अंतर्गत भी नहीं आता हूँ क्योंकि मेरा प्रवेश वर्ष 2016 में हुआ जबकि यह योजना 2017 शुरू हुई है। मेरी घर की माली हालत किसी से छिपी नहीं है। घर में पिताजी फलों का हाथ ठेला कर जैसे-तैसे घर चला रहे हैं और मैं अपना थोड़ा-बहुत खर्च अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर बड़े ही संघर्षपूर्ण ढंग से निकाल पा रहा हूँ।  
         मैंने होश संभालते ही एक ही सपना देखता आया हूँ डाॅक्टर बनने का, क्योंकि मैंने अपने गांव और अपने निकट सम्बन्धियों में से किसी को डाॅक्टर बनते नहीं देखा है। मैं भलीभांति परिचित  हूँ कि कहीं पास डाॅक्टर न होने की दशा में हम जैसे गरीब गांव वालों को कितनी शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए मर-खपना पड़ता है। मेरा डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का लक्ष्य न छूटे इसके लिए मुझे आपके आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है लेकिन इसके लिए मेरी और मेरे परिवार वालों की हृदय से नेक दुआएं आपको मिलेगी क्योंकि कहते हैं कि जो लोग जरूरतमंद लोगों की समय पर मदद करते हैं, ईश्वर उनके भण्डार को हमेशा भरा रखता है।
मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि मानवीय संवेदना और मेरी उपरोक्त दयनीय स्थिति पर आप सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए यथा आर्थिक सहयोग करते हुए मेरे डाॅक्टर बनने के सपने को साकार करते हुए सहभागी बनेगें, इसके लिए मैं और मेरा परिवार आप सभी लोगों का जीवनपर्यन्त आभारी रहूँगा।
       कृपया अपना आर्थिक योगदान मुझे मेरे निम्न बैंक खाते,  Paytm अथवा वर्तमान निवास के माध्यम से प्रदान करने की कृपा करें:-
नाम- धर्मेन्द्र कुमार मांझी    
Mobile Number :  9340359567
बैंक का नाम - बैंक आॅफ बड़ौदा, शाखा हबीबगंज भोपाल
Account No.   18600100015544
IFSC Code  :   BARB0HABIBG    (Fifth character is Zero)
MICR Code :  462012005
Paytm No.      9340359567
वर्तमान निवास का पता -
हनुमान मंदिर स्वर्गाश्रम,
बद्रीनारायण मंदिर के पास,
 साउथ टी.टी. नगर, भोपाल

दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है

दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है


जब तक चूजे अंडे से बाहर न आ  जाएं
तब तक उनकी गिनती नहीं करनी चाहिए
जब तक ताजा पानी न मिल जाए
तब तक गंदे पानी को नहीं फेंकना चाहिए

भालू को मारने से पहले उसके खाल की कीमत नहीं लगानी चाहिए
मछली पकड़ने से पहले ही उसके तलने की बात नहीं करनी चाहिए

हाथ आई चिड़िया आसमान उड़ते गिद्द से कहीं अच्छी होती है
दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है

पास का खुरदरा पत्थर दूर चिकने पत्थर से अच्छा होता है
बहुत बार प्याला होठों तक आते-आते हाथ से छूट जाता है

एक छोटा उपहार किसी वचन से बड़ा होता है
कल की मुर्गी से आज का अंडा भला होता है


भेड़ाघाट (जबलपुर) नौका विहार  Bhedaghat Nauka Vihar

भेड़ाघाट (जबलपुर) नौका विहार Bhedaghat Nauka Vihar


ठण्ड अथवा बरसात के मौसम की अपेक्षा गर्मियों में सबसे ज्यादा शादी-ब्याह होते हैं। शादी-ब्याह अगर घर के आस-पास हो तो रात को घूमते-घामते एक के बाद एक शामिल होने में ज्यादा कष्ट की अनुभूति नहीं होती। लेकिन अगर शादी दूर किसी रिश्तेदार के घर हो, तो सौ बार सोचना पड़ता है। बावजूद इसके जब हमें जबलपुर रहने वाले एक निकट संबंधी का विवाह निमंत्रण पत्र मिला तो हमने फौरन गर्मी से हाल-बेहाल होते मन की सुनते हुए शादी में सम्मिलित होने एवं भेड़ाघाट में नौका-विहार का आनन्द उठाने का कार्यक्रम निश्चित कर लिया। गर्मियों में नौका-विहार करना अत्यन्त आनन्दप्रद होता है। नर्मदा का शान्त और शीतल वातावरण मन में अपूर्व आल्हाद उत्पन्न करता है। ऊंची-नीची विभिन्न रंग वाली संगमरमरी चट्टानों के अनोखे सौंदर्य में जब नौका मंथर गति से आगे बढ़ती है और उसमें सवार सभी ‘नर्मदा मैया की जै‘ का उद्घोष करते रहते हैं तो थका-हरा मन तरंगित होकर तरोताजगी से भर उठता है। भेड़ाघाट में धुआंधार जल प्रपात के बाद जब नौका-विहार को निकले तो नौका-विहार को मोबाईल में कैद कर लिया, जिसे यू-ट्यूब में पोस्ट किया तो सोचा ब्लाॅग में भी पोस्ट करती चलूँ।



हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला

हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला

गर्म पानी से झुलसा कुत्ता ठण्डे पानी से भी डरता है
चूने से मुँह जले वाले को दही देखकर डर लगता है

रीछ से डरा आदमी कंबल वाले को देख डर जाता है
दूध का जला छाछ को फूँक-फूँक कर पीता है

ईश्वर से न डरने वाले से सभी को डर लगता है
आग में झुलसा हुआ बच्चा आग से डरता है

जिससे बचना मुश्किल हो, उससे मूर्खता है डरना
कल क्या हो यह सोचकर आज क्यों डर के रहना

दुष्ट को क्षमा नहीं डर दिखाकर बस में करना भला
हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला
अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

गलत ढंग से कमाया धन गलत ढंग से खर्च हो जाता है
बड़ी आसानी से मिलने वाला आसानी से खो भी जाता है

दूध की कमाई दूध और पानी की पानी में जाती है
चोरी की ऊन ज्यादा दिन गर्माइश नहीं देती है

एक नुकसान होने पर नुकसान होते चले जाते हैं
लाभ की चाहत में बुद्धिमान भी मूर्ख बन जाते हैं

हर लाभ के साथ कोई न कोई हानि जुड़ी रहती है
बिना परिश्रम की कमाई लड़ाई में गंवाई जाती है

बाल्टी डूब जाने के बाद रस्सी को नहीं फेंका जाता है
आग जलाने वाले को धुआं भी सहन करना पड़ता है

अंधेरे घर में चांद का उजाला जितने दिन उतना भला
ठंड में ठिठुरने से आंखो में धुआं बर्दाश्त करना भला

कस्तूरी की व्यापार हानि से मिट्टी के व्यापार से लाभ कमाना भला
अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

....कविता रावत
होली पर उत्तराखंड में  गाए जाने वाले गीत

होली पर उत्तराखंड में गाए जाने वाले गीत

खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर,
दरसन दीज्यो माई आंबे, झुलसी रहो जी
तीलू को तेल कपास की बाती
जगमग जोत जले दिन राती, झुलसी रहो जी
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जल कैसे भरूं जमुना गहरी
जल कैसे भरूं जमुना गहरी
खड़े भरूं तो सास बुरी है
बैठे भरूं तो फूटे गगरी , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                   
ठाडे भरूं  तो कृष्ण जी  खड़े हैं
बैठे भरूं तो भीगे चुनरिया , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                       
भागे चलूँ तो छलके गगरी , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                       
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हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो जनम निवास,  जय देवी आदि भवानी
कांगड़ा जनम निवास , जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो जौंला निसाण , जय देवी आदि भवानी
कश्मीर जौंल़ा निसाण , जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो खड्ग ख़पर, जय देवी आदि भवानी
बंगाल खड्ग खपर, जय देवी आदि भवानी
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी
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चम्पा चमेली के नौ दस फूला ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
पार्वती ने गुंथी हार शिवजी के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
कमला ने गुंथी हार ब्रह्मा के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
लक्ष्मी ने गुंथी हार विष्णु के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
सीता ने गुंथी हार राम  के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
राधा ने गुंथी हार कृष्ण के गले में बिराजे
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मत मरो मोहनलाला  पिचकारी
काहे को तेरो रंग बनो है
काहे को तेरी पिचकारी बनी है,
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

लाल गुलाल को रंग बनी है
हरिया बांसा की पिचकारी
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

कौन जनों पर रंग सोहत है
कौन जनों पर पिचकारी
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

राजा जनों पर रंग सोहत है
रंक जनों पर पिचकारी ,
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी
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हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष ...........1
बामण जीवे   लाखों बरस
बामणि जीवें लाखों बरस...........2
जिनके  गोंदों में लड़का खिलौण्या
ह्व़े जयां उनका नाती खिलौण्या ...........3
जौंला द्याया होळी का दान
ऊँ थै द्याला श्री भगवान ...........4
एक लाख पुत्र सवा लाख नाती
जी रयाँ पुत्र अमर रयाँ नाती ...........5
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष

डॉ. शिवानंद नौटियाल जी द्वारा रचित पुस्तक  'गढवाल के नृत्य गीत' से साभार 

कैसे तुझको प्यार करूँ

कैसे तुझको प्यार करूँ

विवशता देखो इस पागल मन की
कहता दूर नहीं हरदम तेरे करीब रहूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

देख तेरी प्यार भरी निगाहें
दिल तुझमें डूबने लगता
इतना प्यार भरा है दिल में
बरबस ही खिंचा चला आता
चाहती हैं निगाहें तुझमें डूबी रहे
बेबस निगाहें कैसे रोक पाऊँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

एकपल की दूरी भी अखरती
जब दर्द प्यार का रह-रहकर उठता
जितनी भी दूरी बनानी चाही
उतना ही प्यार भरा दर्द बढ़ता
ये मीठा दर्द और ये ख्याल दूरी का
नासमझ दिल कैसे इसे समझाऊँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

तारे गिन-गिन कटती रातें
तुझे देख मन का सूरज उगता
दिनभर नाचे मन-मयूर इधर-उधर
शाम ढले जाने कहाँं छिपता 
न दिल न मन रहता पास
अब तुम्हीं बताओ कैसे खबरदार रहूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

सुखद अहसास तेरे मिलन का
अच्छा लगता प्यार में खो जाना
कैसा प्यार जो बना देता पागल
पागलपन में दिल का खुश होना
मिला प्यार बन गया तराना
फिर दुनिया से मैं क्यों  डरूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ
...........कविता रावत

कभी प्यार में ऐसे ही जाने कितने ही मन में ख्याल उमड़-घुमड़कर बरसते रहते। अब तो घर-परिवार के बीच बमुश्किल कुछ विशेष अवसरों पर ही कभी-कभार  उन दिनों की यादें ताज़ी कर खुश होने के दिन हाथ लगते  हैं। आज ऐसा ही एक अवसर है मेरे हमसफ़र के जन्मदिन का आया है तो, उन बीतें प्यार भरे लम्हों की यादें ताज़ी करने का मन हुआ है।  



सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार


राष्ट्रीय त्यौहारों में गणतंत्र दिवस का विशेष महत्व है। यह दिवस हमारा अत्यन्त लोकप्रिय राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष आकर हमें हमारी प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली का भान कराता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीयों के गौरव को स्थिर रखने के लिए डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में देश के गणमान्य नेताओं द्वारा निर्मित विधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। संविधान में देश के समस्त नागरिकों को समान अधिकार दिए गए। भारत को गणतंत्र घोषित किया गया। इसलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कहा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में यह समारोह विशेष उत्साह से मनाया जाता है। 
        विविधाओं से भरे हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता के बावजूद एक ऐसी मजबूत कड़ी है, जो हम सबको आपस में जोड़े रखती है, वह है हम सबके भारतवासी होनी की और इस भारतीय होने की खुशी को प्रकट करने के सबसे अच्छे अवसर हैं, हमारे राष्ट्रीय त्यौहार। बावजूद अन्य त्यौहार जैसे होली, दीवाली, विजयादशमी, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, पोंगल, ओणम आदि के अवसर पर जैसा हर्षोल्लास व अपनापन देखने को मिलता है, वैसा जब हमारे राष्ट्रीय त्यौहारों पर दिखाई नहीं देता है तब मन में मलाल रह जाता है। लगता है हमने हमारे राष्ट्रीय त्यौहार जैसे-गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस को केवल सरकारी आयोजन मान लिया है, जो हमारे लिए मात्र एक अवकाश भर से और अधिक कुछ भी नहीं? यदि ऐसा नहीं तो फिर जब हम अंग्रेजी न्यू ईयर, फ्रेंडस डे, वेलेन्टाईन डे यहाँ  तक कि शादी-ब्याह की वर्षगांठ को भी धूमधाम से मना सकते हैं तो फिर राष्ट्रीय त्यौहारों पर बेरूखी क्यों? आइए, इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम सभी राष्ट्रीय त्यौहारों को मात्र शासकीय आयोजन तक ही सीमित न रखते हुए अपने घर-आंगन व दिलों में उतारकर उसे  सम्पूर्ण देश को जोड़ने की एक उत्सवमयी शुरूआत करें।
       राष्ट्रीय त्यौहार हमें जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों से परे एक सूत्र में बांधने में सहायक हैं। सामूहिक स्तर पर प्रेमभाव से इन्हें मनाने से राष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक एकता को विशेष प्रेरणा और बल मिलता रहे इसके लिए हम सभी अपने-अपने घरों में वंदनवार लगायें, दीपों से सजायें, तिरंगा फहराये, रंगोली बनायें, पकवान बनायें, अपने-अपने कार्यस्थलों व मोहल्लों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें। अपने धार्मिक स्थलों मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि में देश की एकता, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। मातृ-भूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावार कर देने वाले अमर वीर सपूतों को सारे भेदभाव भुलाकर एक विशाल कुटुम्ब के सदस्य बनकर याद करें।
         आइए, समस्त भारतवासी इस गणतंत्र दिवस को संकल्प लें कि देश का हर घर और हर धार्मिक स्थल को सारे भेद-भावों से ऊपर उठकर दीप-मालाओं की रोशनी से जगमगायेंगे और दुनिया को गर्व से बतायेंगे कि हम सब कई भिन्नताओं के बावजूद भी एक हैं। हमारा यह दृढ़ संकल्प ही मातृ भूमि के लिए जाति, धर्म, वर्ण, भाषा एवं क्षेत्रीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर वीर सपूतों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
  
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित - जय हिन्द, जय भारत!!
भोपाल उत्सव मेले में झलकता शहर का वसंत

भोपाल उत्सव मेले में झलकता शहर का वसंत

इस बार तो २६ जनवरी से पहले ही वसंत पंचमी आ गयी। भला हो घर के बगीचे की छोटी सी क्यारी में खिली वासंती फूलों से लदी सरसों का! वसंत के आगमन की सूचना मुझ तक उसने ही पहुँचाई । गाँव में वसंत की सूचना तो प्रकृति के माध्यम से सहज रूप से मिल जाती हैं लेकिन शहर में वसंत को तलाशना कतई आसान काम नहीं है। इसी वासंती रंग की तलाश में जब हम घर से भोपाल स्थित नार्थ टी.टी. नगर में एक विशाल मैदान 'दशहरा मैदान' में लगे मेले में पहुंचे तो रात को बिजली की आकर्षक साज-सज्जा से सुसज्जित रंग-बिरंगी रौशनी में नहाये मेले को देखकर लगा शहर में वसंत आ गया है।  क्रमशः  .....................


एक हमारा प्यारा तोता

एक हमारा प्यारा तोता

एक हमारा प्यारा तोता
'ओरियो ' है वह कहलाता
बोली हमारी वह सीखता
फिर उसको है दोहराता

चोंच उसकी है लाल-लाल
ठुमक-ठुमक है उसकी चाल
घर-भर वह पूरे घूमता रहता
मिट्ठू-मिट्ठू   कहता  फिरता

सुबह पिंजरे से बाहर निकलता
ऊँगली छोड़ सीधे कंधे बैठता
टुकुर-टुकुर फिर मुँह देखता
बड़ा प्यारा-प्यारा वह लगता

दाने, बीज, आम, अमरूद खाता
लाल-हरी मिर्च उसे खूब है भाता
फलियाँ वह अपने पंजे से पकड़ता
चोंच से काटकर बड़े मजे से खाता

जो कोई भी उसको है देखता
वह उससे बहुत प्यार जताता
जैसे ही कोई अपना हाथ बढ़ाता
झट वह उसके कंधे चढ़ जाता
....कविता रावत

हमारे स्कूल के समय तो हमें प्रोजेक्ट बनाने को मिलते नहीं थे, लेकिन आजकल स्कूल से बच्चों को प्रोजेक्ट बनाने को मिलता है तो मां-बाप को भी उसके लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे ही बच्चों को स्कूल से प्रोजेक्ट के लिए एक ’पक्षी अथवा जानवर’ में कविता लिखने थी, तो बच्चों के साथ थोड़ी कोशिश करने के बाद अपने पालतू तोते ’ओरियो’ को देखकर यह कविता बन पड़ी। बहुत प्यारा है हमारा 'ओरियो' उसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।





एक ही थाल में 48 स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भरा है 'ख्याल' में

एक ही थाल में 48 स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भरा है 'ख्याल' में

'ख्याल' कविता संग्रह नाम से मेरी सहपाठी निवेदिता ने खूबसूरत ख्यालों का ताना-बना बुना है। भोपाल स्थित स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी में ‘ख्याल’ का लोकार्पण हुआ तो कविताओं को सुन-पढ़कर लगा जैसे मुझे अचानक मेरे ख्यालों का भूला-बिसरा पिटारा मिल गया हो। जहाँ पहले स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही कौन कहाँ चला गया, इसकी खबर तक नहीं हो पाती थी, वहीं आजकल इंटरनेट भूले-बिसरे रिश्तों के मेल-मिलाप का एक बड़ा सुलभ साधन बन बैठा है। इसी की सुखद अनुभूति है कि करीब 20 वर्ष तक जिसकी कोई खबर न थी, वही सखी एक दिन अचानक मिल जायेगी, कभी सोचा न था। भूली-बिसरी स्कूल की यादें फिर से ताजी हों, एक-दूजे की सुध ली जाए, इसी उद्देश्य से जब सहपाठियों ने व्हाट्सएप्प में बचपन ग्रुप  बनाया तो बहुत सहपाठी एक-एक कर आपस में जुड़ते चले गए, जिससे ज्ञात हुआ कि निवेदिता मध्यप्रदेश में ही बैतूल जिले में है और अपनी कविता संग्रह 'ख्याल' के लोकार्पण हेतु भोपाल आ रही हैं। निवेदिता ने दूरभाष पर जब मुझसे यह अनुरोध किया कि मेरी उसकी कविता संग्रह ’ख्याल’ के लोकार्पण के अवसर पर हाजिरी जरूरी है तो मन में कई भूली-बिसरी यादें ताजी हो चली और इसी बहाने मेल-मिलाप का ’खुल जा सिमसिम’ की तरह एक बंद दरवाजा खुला।        
        निवेदिता और मेरे ख्याल कितने कुछ मिलते-जुलते हैं, यह मैंने उसकी कविता संग्रह ’ख्याल’ पढ़ते हुए अनुभव किया। मुझे यह देख सुखद अनुभूति हुई कि उसने कविता संग्रह ’ख्याल’ में न सिर्फ अपना बल्कि दुनिया का भी बखूबी ख्याल रखा है। उसका मानना है कि- “उसकी कविताएं आस-पास के वातावरण, रोजमर्रा की घटनाएं, अनुभूतियों की उपज है। स्वान्तः सुखाय लेखन के लिए कोई निश्चित खांचा नहीं है, जहाँ गीत, गजल, छंद, तुकांत, अतुकांत का मिश्रण है। जैसा महसूस करना वैसा लिख देना बिना किसी काट-छांट के यही उचित है, यही सत्य है और मौलिक प्रतिक्रिया है।" इसमें मैं यह जोड़ना चाहूँगी कि भले ही एक रचनाकार पहले स्वान्तः सुखाय के लिए लिखता हो, लेकिन धीरे-धीरे जब वह लिखते-लिखते दीन-दुनिया को अपना समझ उनके सुख-दुःख को अपना लेता है तो फिर उसका लेखन स्वान्तः सुखाय न होकर सर्वजन हिताय बन जाता है।                  
निवेदिता के ’ख्याल’ कविता संग्रह को यदि मैं स्वादिष्ट व्यंजनों से परोसा गया एक थाल कहूँ तो यह अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि उसने अपनी कविता संग्रह किसी एक विधा में न रचते हुए उसमें विविधता का समावेश किया है, जहाँ न बनावट है न कृत्रिमता, जो हमें उसकी अपनी एक अलग पहचान कराती है। सीधे-साधे पदों में रची रचनाएं उसके लेखन की ताकत है, जो भाषा के अनावश्यक अलंकरण से दूर है। उसके लेखन में ताजगी और सरलता के साथ परिपक्वता है, जो उसकी पहली कविता से ही स्पष्ट देखने को मिलती है- 
“ये जो एक लफ्ज है ’हाँ’
ये अगर मुख्तसर नहीं होता
तो जरा सोचिये कि क्या होता? 
..................................................... 
इसलिए लम्बा और दुश्वार सा होना था इसे
कि कोई बीच में ही रूक जाये
‘हा’ कहते कहते ’“
          आपसी प्रेम जाने कब और कैसे कितने रूपों में हमारे सामने आकर खड़ा हो जाय, यह कोई नहीं जानता। इसका कोई पारखी नहीं मिलता। प्रेम की उड़ान सोच से भी ऊँची है। मुझे कुछ ऐसे ही ख्याल निवेदिता की 'अघटित’ कविता में देखने को मिली-
“मेरे कानों में गूँजती हैं वो बातें
जो तुमने कभी नहीं कही
और मैं सुनती हूँ एकांत में हवा की पत्तियों से छेड़खानी 
.................
और हो जाती हूँ सराबोर, उस प्रेम से
जो तुमने मुझसे कभी नहीं किया।“
        आपसी रिश्तों की निरंतरता के लिए संवाद जरूरी है। यदि थोड़ी सी खटपट से इनमें खटास आकर संवाद अवरुद्ध हो जाय तो फिर समझो उन्हें नदी के तट बनते देर नहीं लगती- 
"तुम कह देते तो क्या होता?
कह देने से क्या होता है, सारी दुनिया कहती है
कभी-कभी दो हृदय नदी के तट बन जाते हैं
..................................................... 
और नदी के तट रह जाते हैं
निर्जन, उजाड़"
         कुछ इसी तरह की झलक ’लकीर’ कविता में देखने को मिली- 
"कलम पकड़कर सबसे पहले सीखा था, 
लकीर बनाना, 
और लकीरें जोड़-जोड़कर 
सीखा बनाना अक्षर 
..................................................... 
हमारे बीच कौन सी लकीर सरहद बन गई? 
या फिर ऊपर वाला भूल गया, 
हम दोनों के हाथों में एक-दूसरे के नाम की, लकीर बनाना।"
          निवेदिता की कविताओं में कभी सीधा-सरल वृतांत नजर आता है तो कभी कहीं-कहीं व्यवस्था से उपजी गहन पीड़ा, जो कटाक्ष रूप में देखने को मिलती है-
"प्यार वफा अब मिलना मुश्किल, सबकुछ सौदेबाजी है।
सब लोक यहां पर मोहरे हैं, दुनिया शतरंज की बाजी है।
..................................................... 
चोरों का सरदार ही अक्सर काजी है ......
जिसका जैसा दांव लगे वैसा सौदा पट जाता है,
वक्त किसी के पास नहीं, बस खबरे बासी, ताजी है
और 
         एक अन्य कविता में वह दुनिया में फैले झूठ-फरेब की ओर इशारा करती है कि-
"एक ही किस्सा गांव-गांव और शहर-शहर है
चेहरों और मुखौटों में अब कम अंतर है
..................................................... 
चलते -चलते पांव जल गये इस सहरा में
झूठ कहा था सबने कदम-कदम पे शजर है।"
        वर्तमान परिस्थितियों में आस-पास की दुनिया में संरक्षण का खूब हो-हल्ला है। जबकि वास्तविक संरक्षण तो आदमी का होना चाहिए। इसी को निवेदिता ने ’संरक्षण’ कविता में चुटीले अंदाज में कहा है-
“आजकल सब तरह शोर है बचाओ बचाओ
जमीन को, जंगल को, हवा को, पानी को
बाघ को, इतिहास को, संस्कृति और साहित्य को
नारी और नानी को
बोली और बानी को
किससे?
आदमी से?
और फिर आदमी को भी आदमी से बचाओ।"
       कुछ कविताओ में निवेदिता ने नारी मन की उलझनों को बहुत सरल पर सटीक रूप से अभिव्यक्त किया है। स्वयं से किए गए प्रश्न, दूसरे व्यक्तियों से की गई अपूर्ण अपेक्षाएं और कभी परिस्थितिजन्य उलाहनाएं, यह सब उसकी कविताओं में नजर आती हैं। कहीं-कहीं इन्होंने मन की छटपटाहट को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप से व्यक्त किया है। 'दुनिया’ कविता में उसके समक्ष एक ऐसी ही चुनौती है। जहाँ मानो सारे दर्द एक जगह रखकर भी वह बहुत प्रयास करने के बाद भी जीवन की सुंदरता और कोमलता को शब्दों में संजोने में अपने को असमर्थ है। वे चाहती हैं कि सुंदरता और कोमलता दिखे, लेकिन जीवन के मन को समझने की वजह से वह विफल नजर आती हैं- 
“बहुत बार चाहा मैंने कि फूलों पर लिखूं कविता
लेकिन आंखों के आगे
सड़कों पर भीख मांगते बच्चे आ गए
और शब्द कहीं खो गये।"
         आम किताबी भाषा से दूर निवेदिता की कविताओं में वह जीवन है जो हमारे रोजमर्रा के अनगिनत अनकहे पहलुओं को दोहरता है। 48 स्वादिष्ट व्यंजनों को एक ही थाल में सुघड़ तरीके से परोसने वाली और हर व्यंजन में अलग-अलग स्वाद भरने वाली निवेदिता को कविता संग्रह 'ख्याल' के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मीय शुभकामनाएं।

सभी ब्लॉगर्स एवं पाठकों को कविता रावत की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!