हेमलासत्ता (भाग-2)

हेमलासत्ता (भाग-2)

नाई की बात सुनकर खेतासर के लोग बोले- हेमला से हम हार गए, वह तो एक के बाद एक को मारे जा रहा है, बड़े गांव में भी हम लोगों को चैन से नहीं रहने दे रहा है। हम कुछ नहीं कर सकते। अब तो बड़े शहर जाकर वहाँ से मियां मौलवी को लाना होगा। सुना है वहां एक खलीफा जी बड़े सिद्धहस्त हैं, उनके आगे हाथ जोड़कर जो बेऔलाद औरतें भेंट चढ़ाती हैं उन्हें वह गंडे-ताबीज देते हैं, जिससे उनकी गोद भर जाती हैं। जिन्न, डाकिनी और देव सब उनसे डरते हैं, भूत, मसान, खबीस सभी उनसे कांपा करते हैं। उनके पास जाकर खेतासर के लोगों ने नगद भेंट निकालकर हाल सुनाया तो वे बोले- “मैं आप लोगों से पहले भेंट हरगिज नहीं लूँगा, पहले चलकर वहाँ उस भूत को दफन करके आऊँगा, उसके बाद ही भेंट स्वीकार करूँंगा।“  यह सुनकर सभी खुश होकर बोले- जैसी आपकी मर्जी, अब हमारी यही अर्जी है कि आप हमारे साथ चलें। विनती कर वे लोग उसे गांव लाये और उसकी खूब खातिरदारी की, जिसे देख खुश होकर खलीफा बोला- ’सुनो सब, सत्ता से डरने की कोई बात नहीं अब समझो वह भसम हो कर रहेगा।’  बड़े सवेरे शीघ्र खलीफा ने नहाकर साफ जगह में चतुष्कोण चौका लगवाया, लोबान सुलगाया, मन्त्र जप, जन्त्र जगाए और सवा पहर दिन चढ़े मियां जी बाहर आकर बोले- ’चलकर साथ मुझे वह जगह बताओ। किसी तरह की जरा न दिल में दहशत खाओ।’ ’डरते-डरते लोग हुए दस-बीस साथ में, पुस्तक लेकर चले खलीफा एक हाथ में।’ आधी दूर पहुंचे, ठिठक कर, रूके सब लोग, कहा खलीफा से- अब हम हम नहीं चलेंगे, सामने जो ताल दिखाई दे रहा वहीं पर खेतासर का विकट हेमला भूत रहता है। ’अच्छा ठहरो यहीं, मैं अकेला ही जाता हूँ और उसे अभी भसम कर लौटता हूँ।’ इतना कहकर मियां पुस्तक खोलकर विलक्षण बोली में पढ़ते-पढ़ते आगे बढ़ते रहे।  आज हेमला ताल के किनारे पर पड़ा हुआ था। जैसे ही मियां के शब्द उसके कानों में पड़े वह चौंककर खड़ा हो गया। मियां ने एकाएक भयंकर भूत सम्मुख देखा तो वह अवाक् खड़ा रह गया। लाखों भूत-पलीत उन्होंने झाड़ दिए थे, हजारों को भसम और सैकड़ों को गाड़ दिए थे, लेकिन प्रत्यक्ष देहधारी भूत देखने का मौका उन्हें पहली बार मिला। आगा-पीछा सोचते हुए खलीफा जोर-जोर से अपने बदन पर फूंक मारने लगा। इतने में दुडू-दुडू कर दौड़ते हुआ अलबेला सत्ता मियां के ऊपर कूद पड़ा। अपने को निपट अकेला समझ मियां का मुंह पीला पड़ गया और उसकी हवाई उड़ने लगी। आज उनकी करामात ने उनसे विदाई मांग ली है यह जानकर वह पीछे पांव लौटकर भागने लगे तो दुडू-दुडू कर सत्ता ने दौड़ लगाई और मियां की कमर में लात जमाई और आगे आकर तड़ातड़ आठ-दस हाथ दे मारे। जब ’हाय! मरा’ कहकर मियां वहीं बेहोश हो गए तब उसकी किताब को फाड़-फाड़कर उसके पन्ने-पन्ने उड़ाता सत्यानाशी सत्ता मरघट की ओर यह बड़बड़ाते हुए चला कि- मूढ़ यह गलबल-गलबल कर यहां क्यों मरने आया था। कुछ लोग आगे बढ़कर पीछे वालों को यह सब आंखों देखा हाल सुना रहे थे- ’क्या वस्तु खलीफा है बेचारा? लो, वह भागा, अरे, हाय! मारा, वह मारा।’ हेमला चला गया लेकिन मियां बहुत देर बाद भी नहीं लौटा तो चिन्ताकुल लोग मन में बहुत घबराये। भयातुर होकर धीरे-धीरे पास पहुंचे तो देखा मियां के प्राण पखेरू उड़ गए थे। लोगों ने बस, झटपट चुपचाप टांगकर उन्हें उठाया और भागकर गांव पहुंचकर हाल सुनाया- “भूत सहज का है क्या सत्ता? कर दी जिसने नष्ट मियां की सभी महत्ता। और साथ ही पटक मार भी उनको डाला;  हाय! पड़ा है दुष्ट दैत्य से अपना पाला। अब क्या शेष उपाय रहा, सब तो कर छोड़े; भूल न लेंगे नाम, हाथ अब हमने जोड़े।।“         
         इस घटना से हेमला का खूब डंका बजा। इधर-उधर के गांव वालों ने भी खेतासर की सीमा में पांव रखना बंद कर दिया। एक दिन एक ठाकुर अपने लाव लश्कर के साथ ऊंटों पर सवार होकर अपने ससुराल को निकले। चलते-चलते जब वे एक गांव पहुंचे तो लोगों ने उनसे कहा कि आगे रास्ता बंद है। आपको खेतासर छोड़कर तीन कोस का फेर लगाना होगा। पूछने पर उन्होंने हेमला का हाल सुनाया तो ठाकुर को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्हें विश्वास नहीं हुआ। वे बोले- ’वे अवश्य ही खेतासर होकर जायेंगे और आज हेमला भूत वहां जाकर देखेंगे।’ यह सुनकर उनके नौकर-चाकर और संगी साथियों ने उन्हें खेतासर से नहीं चलने की विनती की। उन्होंने समझाया कि तीन कोस को फेर ज्यादा नहीं है, ऊंट को चढ़ने में देर नहीं लगती है।सौ-सौ बात हुई लेकिन ठाकुर नहीं माना, उसने जहाँ हेमला है, वहीं चलने की ठान ली। आओ कहकर वह खेतासर की ओर चल पड़ा। खेतासर के सूने घर भायं-भायं कर रहे थे। ठाकुर बोले- यहीं बितायेंगे दोपहरी, यहाँ जल का बड़ा सुबास और गहरी छाया है। अनेक बार अनुनय-विनय के बाद सब हारे। ताल किनारे डेरा डाला गया। नौकर-चाकर सभी हेमला से डरते थे। उनमें से किसी में भी डेरे से दो कदम आगे बढ़ाने का साहस न था। हर कोई सोचता कि अब तो प्राण जाने वाले हैं, सत्ता भूत सदेह अभी आने वाला है। सब मन ही मन बुरी तरह से ठाकुर को कोस रहे थे। सभी आपस में खुसुर-फुसुर सुनी-सुनाई बातों को दोहराते कि भूत विकट है, वह खूब लाते जमाता है। सब डर से कांप रहे थे, अगर कहीं पत्ता भी खड़का तो चौंक पड़ते। सभी लोग आपस में सटकर बैठे हुए थे लेकिन ठाकुर निर्भय होकर अलग दरी बिछाकर उस पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बीच-बीच में ’डरना मत तुम लोग’ कहकर सबको दिलासा दे रहे थे। उसने अपने बगल में बंदूक रखी थी।          
       मटरगस्ती कर ज्यों ही हेमला ताल के किनारे आया एक ऊंट बल-बल बल्लाया। वह मरघट से बाहर आया तो उसने मनुष्यों की आवाज सुनी तो उसे अचम्भा हुआ। उसने देखा कि ताल पर कुछ लोग ठहरे हुए है। अरे, कौन ये मूढ़ आज मरने चले आये हैं। मेरे ताल पर डेरा जमाकर बैठे हैं। अभी हेमला यही सोच रहा था कि कैसे इन्हें यहाँ से भगाऊँ कि इतने में एक आदमी की नजर उस पर पड़ी तो वह चिल्लाया- ’ठाकुर साहब, हाय! वह देखो, हेमला सत्ता आया।’ ठाकुर बोला कहाँ? अरे, किस ओर? किधर है? उधर देखिए उधर, यहीं, यह, उधर, उधर है, सब एक साथ चिल्लाये। “देखा ठाकुर ने कि वेश विकराल बड़ा है, मरघट में से निकल सामने भूत खड़ा है। दुर्बल, दीर्घ शरीर, भील सा काला काला, सिर पर रूखे बाल, घुसी सी आंखों वाला। मुंह पर दाढ़ी-मूंछ बड़ी बेडौल बढ़ी है, नंगे तन पर बिना चढ़ाई भस्म चढ़ी है। दृष्टि रोप कर के देखने वे जैसे ही दुडू-दुडू कर कूद चला सन्मुख वैसे। चिल्लाये सब लोग- अरे आया, वह आया हाय! करें क्या? मरे, आज सत्ता ने खाया। ठाकुर ने ललकार उन्हें तब डांट लगाई भरी धरी थी निकट, विकट बन्दूक उठाई। सीधी कर दी कालरूप भयहरण भवानी, जिसे देख मर गई आज सत्ता की नानी। दुडू-दुडू भूलकर भागना चाहा जैसे- तनी देख बन्दूक डरा-भागूंगा कैसे? मर जाऊंगा, नहीं बचूंगा किसी तरह से, गरजा ठाकुर- अरे, चला आ इसी तरह से। खबरदार, जो उधर-उधर को कहीं हिला है, देखा सत्ता ने कि आज यह गुरू मिला है। हिला जहां बस, देह फोड़ दूंगा मैं तेरी, देख खोपड़ी अभी तोड़ दूंगा“  ऐसी विकट स्थिति देख हेमला दीनता से बोला- ’आदमी हूँ मत मारो; महाराज मैं भूत नहीं हूं, मुझ पर दया विचारो।’ ठाकुर बोला- ’भूत हो कि अवधूत या कि यमदूत बड़ा लेकिन आज तू काजी के सामने है। आज तुझे बचना है तो मेरा कहा मानना होगा, जहां धड़ाका हुआ तो तेरा फड़ाका हो जायेगा। बस, सीधा, चुपचाप चला आ यहां अभी, भगने की भूल न करना। आकर अपना सच्चा हाल सुना दे मुझे, मैं तुझ शैतान को प्राणदान दे दूँगा। कालमुखी को देख हेमला दीन हुआ, सुन ठाकुर के वचन वह बलहीन हुआ। उसने सोचा जो यह कहे आज उसे करना ही होगा नहीं तो बेमौत मारा जाऊंगा। उसने कहा- ’दुहाई अब मुझे गोली मत मारना, अब मैं कभी भूत नहीं बनूँगा, जो हो ली सो हो ली। हुक्म आपका मानकर आपके चरणों में हाजिर होकर अपना दुःखड़ा रोता हूँ, पर नंगा हूं, इसीलिए कुछ शरमाता हूँ, मारो मत मैं हाथ जोड़ता हूँ। तब ठाकुर ने एक दुपट्टा फेंक उधर को कहा- इसे पहन, चला आ शीघ्र इधर। उसे पहन कर पास हेमला उनके आया। कर प्रणाम, कुछ दूर बैठ, सब हाल सुनाया। सुनकर हाल ठाकुर बोला- अरे दुष्ट, पापी, हत्यारे, डरा-डराकर तूने क्यों इतने लोगों को मारा? तो हेमला ने बोला- ’कहां मैंने मारे हैं? वे तो अपने आप सारे डर कर मरे हैं। ’अच्छा तो दुडू-दुडू की बदमाशी क्यों करता था सत्यानाशी? जो डरते थे उन्हें और डरवा देता था, अरे मूर्ख तभी तो उनके प्राण निकल जाते थे।  तब हाथ जोड़कर हेमला ने विनती कि मुझे माफ करें, मेरा चोला बदलवा दीजे हुजूर।’ ठाकुर बोले- अभी चार दिन मेरे लौटने तक इसी ठौर पर जमा रह। जब ससुराल लौटकर आऊंगा तो तुझे बड़े गाँव ले जाऊंगा। यह मेरा कर्तव्य है मैं उससे मुंह नहीं मोडूंगा। तुझे भूत से आदमी बनाकर रहूँंगा।’ हेमला बोला- आपकी कृपा बड़ी है पर अब मेरे लिए एक घड़ी भी बरस के बराबर है। सर्वसुखी जो कभी हेमला जाट रहा था भूत योनि में पड़ा, कठिन दिन काट रहा था। उसका यों उद्धार आपने आज किया है, मरे हुए को जिला कर नया नर जन्म दिया है। मैं आपका कृतज्ञ हूं मैं आपका सेवक हूं और आप हैं मेरे स्वामी। बहुत रह लिया, नहीं यहां अब रह सकता हूं। भूतपने के कष्ट नहीं अब सह सकता हूँं। गांव नहीं तो साथ आपके रहूंगा। अपनी बीती आप कहानी वहां कहूंगा।’  ठाकुर को बात पसंद आई कि “इसका शोर इधर सब ओर बड़ा है, विकट भूत यमदूत हेमला नाम बड़ा है। मारे जिसने पटक खलीफा जी को ऐसे वह सत्ता फिर कहो, मनुज हो सकता कैसे। होगी किसको भला हेमला से यह आशा। होगा निस्संदेह विलक्षण बड़ा तमाशा। आयेंगे वे लोग मुझे मिलने जैसे ही भागेंगे सब देख हेमला को वैसे ही। हुल्लड़ होगा, एक बड़ी दिल्लगी रहेगी, इस प्रकार से वहां हास्य की नदी बहेगी।“  यही सोच ठाकुर ने अपने साथियों से कहा-“हेमला भूत हमारे साथ चलेगा।“ सुनकर हुक्म ठाकुर का हेमला बहुत खुश हुआ। हाथ जोड़कर बोला- कई दिनों से भूखा हूँ सरकार, खाना मिल जाता तो! ठाकुर ने नौकर से खाना देने को कहा तो वह डरकर दूर से उसे खाना देने लगा तो ठाकुर बोला- अरे, इतनी दूर, किसलिए खड़ा है, किस बात का डर है, यह भूत नहीं है। लेकिन नौकर के लिए उसके पास जाना सहज नहीं था उसने दूर से ही खाना फेंका तो ठाकुर ने हंसकर कहा- ’अरे यह भूत नहीं है, देखो यह खाना खा रहा है, जला नही है, मरा नहीं है, क्या तुमने अभी इसकी कथा नहीं सुनी है।“  लेकिन नौकर-चाकर सभी बडे़ भयभीत थे, वे यही सोच रहे थे कि “ठाकुर चकमे में हैं। भला हेमला भूत किसके बस में आया है? छल से आज यह मरघट का बना हुआ है हाऊ और ठाकुर बछिया का ताऊ।“ ठाकुर ने समझाया पर उन्हें पूरा विश्वास नहीं हुआ, किसी को पौंन तो किसी का पूरा अधूरा रहा।          
ठाकुर ने फिर हुक्म दिया- तैयारी हो अब। झट से ऊंट कसे गए और सभी तैयार हो गए। दो-दो कर प्रत्येक ऊंट पर चढ़े। केवल एक अकेला ऊंट पर नाई चढ़ा। उसे ठाकुर ने हुक्म दिया कि वह हेमला को अपने साथ बिठा ले। इस पर नाई बोला- अगर वह मुझे खा ले तो? यह सुनकर ठाकुर हँसने लगा तो उनके साथ सभी नौकर-चाकर हँसने लगे। नाई बोला-’भूत हो या आदमी की खाल चढ़ा भूत, मैं तो पैदल ही चलूंगा।’ यह सुनकर जब ठाकुर ने उसे फटकार लगाई तो उसने हेमला को पीठ पिछाड़ी बिठाया। नाई चलते-चलते सोच-विचार करने लगा- ’यों कि इसी ने गांव उजाड़ा, मारे आदमी मारे, मौलवी पटक पछाडा। सिवा भूत के कौन प्राण यों हर सकता है। क्या ऐसा अन्धेर आदमी कर सकता है। हाय! आज हो गया हमारा ठाकुर उल्लू, और साथ ही बना दिया मुझको भी भुल्लू। मैं बातों में भूल, फंसा हूं भूत-जाल में, अब है बचना कठिन, पड़ा है काल-गाल में।“  तमाम उल्टी-सीधी बातें सोचकर नाई का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, कलेजा कांप रहा था, वह भयभत होकर भूत को भांप रहा था। वह देख रहा था कि जाने कब यह सत्यानाशी अपने पैर बढ़ा देगा या फिर उसके शरीर में दांत गड़ा देगा। वह रह-रह कर इधर-उधर ताक-झांक कर रहा था। उसका ऊंट बोदा था इसलिए सभी से पिछड़कर दस हाथ पिछड़ गया। इतने में हेमला को छींक आई तो नाई ’हाय! मुझे खा लिया’ कहकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। ठाकुर को जोर की आवाज सुनाई दी तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा कि नाई सिर के बल गिरा हुआ है। ठाकुर चिल्लाया- अरे कैसे गिर पड़ा नाई? हेमला बोला- मुझे जोर की छींक आई थी, जैसे ही छींका, यह चिल्ला कर ऊँट से गिर पड़ा। ठाकुर ऊँट से उतर कर नाई के पास आया तो देखा सब लोग घबराये थे। नाई पत्थर पर गिरा था। उसकी नब्ज छूट गई थी, खोपड़ी फूट गई थी, गर्दन टूट गई थी, वह निष्प्राण पड़ा था। खेतासर से अभी आधा कोस भी नहीं बढ़े कि श्रीगणेश कर दिया हाय! इसी भांति कौन जानता है कि अभी किस-किस के प्राण लेगा? आप मानते ही नहीं? इसे साथ न लो यहीं रहने दो, यों सब साथी ठाकुर से विनती करने लगे। हेमला बोला- हाय! मेरी तकदीर अभागी है, निर्दोष होकर भी पाप का भागीदार बन रहा हूँं। ठाकुर बोले- चलो लौटकर अब खेतासर चलकर इस नाई का ताल किनारे दाह करो। दाह कर सभी ने ताल में नहाया। इतने में शाम हो गई। ठाकुर ने सोचा- यह व्यर्थ ही हँसी-हँसी में अनर्थ हो गया। इसी तरह से और लोग भी डर सकते हैं, बिना मौत ही मूर्ख मर सकते हैं। हेमला को साथ ले जाना उचित नहीं होगा। इसे पहले बड़े गांव पहुंचाना होगा। अब बड़े गांव की तैयारी हुई। हेमला आफतों का परकाला एकदम खाली ऊँट पर सवार होकर चला।       
          संध्या का समय था। जैसे ही ठाकुर अपने लाव-लश्कर के साथ गांव पहुंचा, अरे, हेमला भूत, हेमला भूत चिल्लाते हुए लोग इधर-उधर भागने लगे। यह देखकर ठाकुर ने सबको समझाया- ’मत भागो, मत डरो, हेमला भूत नहीं है, इसे पकड़ कर आज मैं अपने साथ लाया हूँ।’ फिर ठाकुर ने बीच गांव में डेरा डाला और खेतासर के सभी लोगों को बुलवाया। सभी लोग इकट्ठे हुए, सभी अचरज कर रहे थे, कुछ डर के मारे बहुत दूर से ही देख रहे थे। ठाकुर ने बैठकर पहले सबको स्वयं थोड़ा-बहुत हाल सुनाया फिर पूरा-पूरा हाल पुनः हेमला से सुनवाया। हाल सुनने के बाद ठाकुर बोला- ’सुन ली सत्य कहानी? यों लोगों ने भूत बनाकर नादानी की। तब लोग हेमला से बोले- ’हेमला, दादा, चाचा, तू मनुष्य है? फिर क्यों तू भूत बन नंगा नाचा, खूब सताया और गांव से हमें निकाला। तूने दुडू-दुडू कहकर कितनों को मार डाला।’  गांव वालों की बात सुनकर हेमला दुःखी होकर बोला- ’अब मैने दुडू-दुडू छोड़ दिया है। मैंने बड़ा अनर्थ किया, यह बात सही है, मुझे सब लोग क्षमा करो मेरी यही विनती है।’ इतना सुनकर भी गांव को पूरा विश्वास नहीं हुआ कि हेमला भूत नहीं है, इसलिए वे ठाकुर से बोले- ’प्रभुवर, इसे रात भर अपने पास रखिए, जैसी कृपा अब तक की, इतनी कृपा और कर दीजिए। रात बीतने और सवेरा होने दीजिए।’ यह प्रस्ताव जब ठाकुर के संगी-साथियों ने सुना तो वे डरे, मन में सोचने लगे कि यह बात तो बड़ी बेढ़ंगी है। वे चिन्ता करने लगे कि जाने हेमला भूत ठाकुर को जीवित छोड़ता है या मार डालेगा? लेकिन वे विवश थे, किसी को रात भर नींद नहीं आई, जाग कर किसी तरह सबने रात बिताई। इस तरह रात भर ठाकुर के पास हेमला रहा और जब सवेरा हुआ तो सभी लोग वहाँ एक इकट्ठा हुए।  
सभी लोगों ने ठाकुर को जीवित देखा तो ज्यादातर लोगों को विश्वास हो गया कि हेमला भूत नहीं है। तब ठाकुर ने कहा- एक नाई बुलवाओ और हेमला के बाल काटकर उसे नहलाओ। डरते-डरते बड़े गांव वाला नाई हेमला के पास आकर बैठा और उससे बोला- ’अरे हेमला तू भूत नहीं है, मरा नहीं है?’ हेमला बोला- अरे मरा कभी लौटता है क्या?’ ’तो उस दिन क्यों दुडू-दुडू कह मुझे डराया। कब का बदला लिया तूने मुझसे? क्यों तूने नाइन को खाया। मैंने भला कौन सी तेरी चोरी कर दी जो तूने मेरी गृहस्थी चौपट कर दी।’ यह सुनते ही हेमला बोला- ’याद है तुझको नाई, तूने ही तो उस दिन नाइन से मुझे आत्मघात कर विकट भूत बनकर घूमने वाला बताया था। तेरी बात सुनकर ही मुझे भूत बनने की सूझी।“ नाई बोला-“अरे, मैंने समझ-बूझकर थोड़े कहा था, मैंने तो नाइन से दिल्लगी की थी। वह डरती है या नहीं उसकी परीक्षा ली थी। मैं नहीं जानता था कि दैव मेरे साथ छल करेगा।“ यह बात सुनकर ठाकुर बोला- “झूठ हंसी में भी खलता है।“ सुनकर ठाकुर की बात नाई बहुत पछताया। हेमला की हजामत बनी और उसने खूब नहाया। कपड़े पहनकर ठाकुर से हाथ जोड़कर बोला- “आज भूत का चोला छोड़ मैं फिर से मनुष्य हुआ हूँ। इसके लिए मैं आपका ऋणी रहूंगा। सदा आपके गुण गाता रहूंगा। आप न मिलते तो मैं भूत बनकर ही किसी दिन मरकर पड़ा रहता।“  हेमला को कृपा दृष्टि से देख कर ठाकुर ने सबसे कहा- “सुनो, अब से भूलकर भी भूत से नहीं डरना। भूत-भाव के भय से देखो कैसे सबने हेमला को मनुष्य से भूत समझ लिया, यह प्रत्यक्ष उदाहरण तुम्हारे सामने है।“
(मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)

हेमलासत्ता   [भाग- एक]

हेमलासत्ता [भाग- एक]

एक छोटे से गांव खेतासर में हेमला जाट रहता था। उसके घर में दूध, पूत, धन, धान्य सभी था। सभी तरह से उसकी जिन्दगी सुखपूर्वक कट रही थी। उसकी अपनी प्रिय पत्नी से हमेशा प्रेमपूर्वक खूब पटती थी। वह हमेशा अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों से घिरा रहता था। सब कुछ होते हुए भी एक कसर बाकी थी कि वह अनपढ़-अज्ञानी ‘काला अच्छर भैंस बराबर’ था। एक बार अचानक उसकी घरवाली बीमार पड़ी और उसने खाट पकड़ ली। जाट पर इस बार भारी विपत्ति टूट पड़ी। उसने खूब दौड़-धूप की, किन्तु कोई चारा न चला, किसी देवता ने भी कोई सहारा न दिया। अंततः उसकी प्रिय पत्नी उसे छोड़ चल बसी। यह देख वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना सुनकर आस-पड़ौसी आए और उसे ढ़ांढ़स देने लगे, लेकिन हेमला की समझ में कुछ नहीं आया। उसने एक रट पकड़ ली कि वह भी सन्तो की मां के संग सत्ता होगा। उसकी ऐसी बात सुन सभी लोग आश्चर्यचकित हुए और उसे समझाने लगे- ‘क्यों व्यर्थ ही बक रहा है, रहने दे रहने, पति संग पत्नी को सती होते तो सुना है हमने, लेकिन कभी यह नहीं सुना कि पत्नी संग कोई पति सत्ता हुआ हो।’ लोगों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। वह लोगों से कहता अगर उसे किसी ने रोका तो उसे सत्ता का शाप लगेगा। उसके ऐसे बोल सुन लोग सोच विचारने लगे कि यदि वह अपने प्राण गंवाता है तो गवाएं, हम उसके शाप के भागीदार क्यों बने। विवश होकर सभी लोगों ने शव यात्रा की तैयारी की और चुपचाप श्मशान की ओर चलने में ही भला समझा। शव यात्रा में हेमला हाथ में श्रीफल लेकर संसार से हमेशा नाता त्यागने की प्रबल इच्छा से ’हर-हर’ कहता हुए आगे-आगे चलने लगा तो यह देख स्त्रियाँ मुक्तकंठ से उसकी प्रशंसा करने लगी, कहती- 'अद्भुत पत्नी प्रेम है हेमला का, धन्य है हेमला की पत्नी जिसे ऐसा पति मिला जो उसके साथ सत्ता होने जा रहा है।’ जब हेमला ने अपनी प्रशंसा सुनी तो उसका उत्साह चरम सीमा पर पहुंच गया। वह श्मशान घाट पहुंचने तक जोर-जोर से हर-हर की रट लगाता आया। श्मशान ताल से कुछ दूरी पर था, जहां कुछ ही दूरी पर पीलू का एक घना पेड़ था, उसी के पास चिता सजाई गई। एक बार फिर अंतिम बार बड़े बुजुर्गों ने हेमला को समझाना चाहा किन्तु सब व्यर्थ गया, वह न माना और सूर्य की ओर हाथ जोड़कर उछलकर हर-हर कहता हुए चिता में जा बैठा। संध्याकाल का समय था। सूर्य छिपने वाला था। हेमला तब तक 'हर हर’ की रट लगाता रहा जब तक उसके शरीर को लकड़ियों से पूरी तरह ढ़क न लिया गया। पूरी लकड़ी लगाने के बाद हेमला की आज्ञा लेकर जब चिता पर आग लगाई गई तब काले धुंए के साथ कुछ ही क्षण बाद उससे धू-धू कर भयंकर लपटें निकलने लगी। तेज लपट लगने से हेमला का जब तन झुलसने लगा तो उसका ज्ञान-विराग और पत्नी राग जाता रहा। असहनीय पीड़ा ने उसे भगने पर मजबूर कर दिया। अकुलाकर वह झट से चिता से बाहर उस ओर कूदा जहांँ अंधकार के कारण किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी। वह पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया।        
          आग की लपटों में जले-भुने हेमला के अंगों में भयंकर पीड़ा हो रही थी। वह व्याकुल, व्यथित, विहाल, रात भर सिसकता रहा। बड़े सवेरे उठकर घिसटता जब उसने गूलर खाकर पानी पिया तो उसे कुछ राहत मिली। गांववालों के जागने से पहले वह यह सब काम करके वापस पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया। वह सोचता रहा कि इतने कष्ट सहते हुए वह कब तक यहां छिपा पड़ा रहेगा। एक पल को उसने सोच विचार कर गांव जाकर अपना सच्चा हाल सुनाने का मन बनाया लेकिन दूसरे पल ही सोचने लगा कि वह किस मुंह बेशरम बनकर गांव लौटेगा, लाखों लानतें देंगे लोग। उससे यह बात हरगिज नहीं होगी। वह जीते-जी गांव नहीं जा सकता। इससे अच्छा तो वह जंगम-जोगी बनकर परदेश चला जाय। अगर वह गांव जायेगा तो शरम के मारे मर जायेगा। ऐसी बात मन में सोचकर हेमला उदास होने लगा और मरघट वासी बन गया। उसी जगह वह कभी बीन-बीन कर गूलर खाता कभी छिप-छिपाते बकरियां पकड़ उनका दूध लगाकर पी जाता। यूं ही छिपते-छिपते बारह दिन हो गये। उसके जलने के घाव भी अच्छे हो गये। तेरहवीं के दिन उसे याद आई कि आज तो उसके घर में खूब मालपुए, पूड़ी-साग बना होगा, लेकिन क्या करें अब कोई उसके लिए पीलू के पेड़ के नीचे तो पत्तल परोस के नहीं लाने वाला है, इसलिए वह मन मसोसकर रह गया।
            हर तेरहवीं की तरह ही इस बार भी खेतासर में बड़े गांव से नाई अपनी पत्नी सहित आया, किन्तु शाम तक काम पूरा न होने से उन्हें देर हो गई। मालपुओं की गठरी बांधे वे दोनों पहर रात आपस में बतियाते हुए मरघट से निकले। अचानक नाई को दिल्लगी सूझी वह नाइन से बोला- ’सुनो प्यारी! जाट हेमला यहीं सत्ता हुआ था।’ नाइन बोली- ’उसका प्रेम अलौकिक था।’ यह सुनकर नाई हंसकर बोला- ’नहीं रे, व्यर्थ ही मूढ़ मति हेमला ने आत्महत्या की, अब तो वह विकट भूत बनकर यहीं-कहीं भटक रहा होगा।’ इतना सुनते ही नाइन बिगड़कर बोली- ’ऐसी बात न करो जी, भला क्यों ठिठोली कर रहे हो, मुझे डर लगता है।’ पेड़ की आड़ से हेमला चुपचाप नाई-नाइन का कथन सुन रहा था। उसने सोचा- ’क्यों न इनका संशय सच में दूर कर दूं। विकट भूत का रूप धारण कर जीते-जी संसार के बीच मरकर देखूं।’ झट से हेमला पहले पेड़ में चढ़ा और उसे जोर-जोर से हिलाते हुए बम से नीचे कूदा तो यह देख नाई-नाइन थर-थर कांपने लगे। काले-काले बिखरे बाल, नंग-धड़ंग वह लमटंगा जैसे ही ’दुड़ू-दुडू़’ कर उनके सामने आया तो नाई-नाइन उल्टे पैर भागे, लेकिन नाइन गिरकर चिल्लाई तो फिर न उठ सकी, उसकी सांसे वहीं थम कर रह गई। मालपुए की टोकरी लेकर हेमला वापस आ गया और यह सोचकर हंसने लगा कि विकट भूत का वेश भला है और बोला- 'चलो आज का श्रीगणेश हो गया है।' बद्हवास नाई गांव वापस आकर चिल्लाया- ’अरे! हेमला भूत हाय! उसने नाइन को खा लिया। यह कहते-कहते बेहोश हो गया। उपचार करने पर जब उसकी चेतना वापस आई तो वह हेमला के बच्चों को रोते-रोते यों हाल सुनाने लगा-
"था पूरा पच्चीस हाथ, काला काला-सा,
बड़े बड़े थे दांत, हाथ में था भाला सा।।
’दुडू-दुडू़’ कह, कूद सामने आ ललकारा;
बोली से पहचान लिया, था बाप तुम्हारा।
मारी पटक, पछाड़ हाय रे! नाइन मारी,
भाग बचा मैं, भाग न पाई वह बेचारी।
अरे चलो झट, हाय! मार ही डाली होगी;
पड़ी धूल में देह प्राण से खाली होगी।"
इस प्रकार विकल, विलपता नाई मन ही मन और भी दुःखी हुआ कि उसकी दिल्लगी उसे भारी पड़ गई। यों रात को हल्ला-गुल्ला सुन पूरे गांव के लोग हेमला के घर इकट्ठा हुए और वहीं सबने रात बितायी। सुबह-सुबह मौके पर पहुंचे तो नाइन को मृत देख सभी डरे, चौंके और चकराये। उन्हें पूर्ण विश्वास हो चला कि यह काम हेमला भूत का ही है। जल्दी से लोगों ने नाइन की वहीं चिता बनाई और नाई को ढ़ांढ़स देकर क्रियाकर्म की विधि पूरी करवाई। यों ही श्मशान में बहुत देर तक लोग बातें करते रहे, लेकिन मालपुओं की किसी को याद नहीं आई।
            दिन चढ़ते ही पूरे गांव में हेमला की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। कोई कहता हेमला का अत्याचारी भूत प्रकट हुआ है, जिसने राह चलते रात को नाइन को मार दिया है। कोई कहता रात-विरात भूलकर भी उस राह नहीं जाना। हेमला बहुत बड़ा भूत है। कब किसको खा जाय कोई नहीं जानता। इन सब बातों से बेखबर हेमला मरघट में छिपा रहा। मालपुए खाकर उसका मन तृप्त हुआ तो उसे आत्मग्लानि हुई,सोचने लगा- ’हाय हेमला! यह तूने क्या किया एक निरपराधिनी को मार दिया, उसने तेरा क्या बिगाड़ा था। बहुत बुरा है हमेशा भूत-भड़ंग बनकर मरघट में छिपे रहना। कब तक यूं दुःख सहता रहूंगा।’ यह सोचते-सोचते जैसे ही हेमला पेड़ की आड़ से बाहर आया तो उसने कुछ दूरी पर मुखिया को अकेला खड़ा देखा तो मारे खुशी के उछल पड़ा। वह विचारने लगा कि अगर मुखिया के पास जाकर अपना हाल सुनाऊँ तो इस दुःखिया का बेड़ा पार हो जाय। फिर सोचता कहीं अगर वह मुझे देख डरकर भागने लगे तो जाकर एकदम से उनके पैर पकड़ लूंगा।’ यही सोच उसने दबे पांव, चुपचाप पीठ-पीछे से जाकर अचानक मुखिया के पैर पकड़ लिए। मुखिया 'कौन' कहकर चिल्लाया तो 'हेमला' का नाम सुना तो चिल्लाया- ’अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ कहते हुए गिर पड़ा, जिसे देख हेमला बहुत घबराया। खेतों में कुछ दूरी पर लोग काम रहे थे, मुखिया के शब्द सुनकर लोगों ने उस ओर देखा तो उन्हें हेमला के बड़े-बड़े बाल, नंग-धड़ंग शरीर दिखाई दिया। दिन-दोपहरी में भूत देखकर लोग घबराकर अनहोनी की बात से भयाकुल होकर चिल्लाने लगे- ‘अरे, हेमला भूत खड़ा है ताल-किनारे; देखो, उसने पटक हाय! मुखिया जी मारे’ मुखिया को बेहोश देख मरघटिया हेमला भागा और अभागा पीलू के पेड़ की आड़ में छिपते हुए सोचने लगा- अरे, चला था अच्छा करने, किन्तु बुरा हो गया। अब क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता क्यों विधाता मुझसे खपा हो गये हैं। जाने क्या लिखा है मेरे कपाल में, भूतपने से मुक्ति दीखते नजर नहीं आ रही है। उधर गांव के लोग मुखिया को उठा लाये। उन्हें बेदम बुखार चढ़ा, दस्त लग गये। वे बेहोशी में चौंककर चीख पुकार मचाते- ’वह आया-अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ रात भर यों ही मुखिया बेचारा पड़े रहे और सवेरे लोक छोड़ परलोक सिधार गए। जब मुखिया की चिता तैयार हुई तो सत्ता ने सोचा दो हो गए। जब से मुखिया मरा, हेमला की धाक जम गई। लोग रात क्या दिन में उस जीवित जमदूत, भूतों के ताऊ के इलाके में जाने से डरने लगे। मुखिया की तेरहवीं पर मालपुए और पूड़ी-साग की बात सोचकर उसके मुंह में पानी आया तो उसका मन विकल हो उठा। तन-मन में संग्राम मचा। जाय तो किधर जायें। तन पर मन की जीत हुई तो बुद्धि चलाई और इधर-उधर से जोड़कर लकड़ियां लेकर आग जलाई। वहीं चिता की आग के लिए लाई हुई काली-काली हांडिया दिखी तो उन्हीं में आग भरकर खुरापात करने गांव की ओर निकल पड़ा। गांव के नजदीक आते ही उसने एक हांडी से आग उछाली और भयंकर आवाज के साथ उसे जोर से पत्थर पर दे पटका तो ऐसा दृश्य देखकर गांव वाले भोजन की पत्तल छोड़कर भूत-भूत कर भागने लगे। उसने एक-एक कर भयंकर आवाज के साथ आग और हांडी से तमाशा किया, जिसे देख लोगों में भगदड़ मची तो मौका पाकर वह उछलता-कूदता उनके बीच गया और वहां पहुंचकर उसने कुछ को उछल-उछल कर दो-चार लाते जमाई और मालपुओं की डलिया लेकर भाग खड़ा हुआ। डरे-सहमे गांव वालों ने मिलकर जैसे-तैसे रात काटी और सवेरा होने पर गांव छोड़ने की ठान ली। अब वे बड़ा गांव रहेंगे। हद हो चुकी, कब तक त्रास सहेंगे। पापी हाथ धोकर पीछे पड़ गया है। भूत है कि यमदूत। कहीं नहीं सुना ऐसा। इसके मारे कोई काम नहीं कर पायेंगे, नाइन और मुखिया की तरह एक दिन सबको खा जायेगा। खेत भले ही बड़े हैं किन्तु प्राणों से प्यारे नहीं हैं। हमारी जमीन, धन, धान्य सभी बाद में हैं। सभी एकमत हुए कि गांव छोड़ने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। अपना-अपना सामान बैलगाड़ियों में लादकर सारे गांव वाले खेतासर खाली करके चल दिए। दुःखी मन राह सोचते कि इस पिचाश ने तो मां से मोह तोड़ा है और जन्मभूमि का वास छुडा दिया है।           
         इस प्रकार रोते-कलपते खेतासर गांव के वासी उदास होकर गांव छोड़कर उसे सूना छोड़ गए। इस घटना का शोर जब हेमला के कानों तक पहुंचा तो वह खेतासर गांव के घर-घर में घुसकर घूमने-फिरने लगा। देख-दाख कर फिर पीलू के पेड़ की आड़ में छिप जाता। वह अपना पूर्ण प्रताप देख फूला न समाता। अब उसे उजड़े गांव से नहीं मरघट से लगाव हो गया। उस पर भूतपने का रंग बहुत चढ़ चुका था, इसलिए उसका लौटना कठिन हो चुका था। वह कभी मरघट से चहल-कदमी करते हुए गांव निकल पड़ता, जहां सुनसान घरों में उसे कुछ न कुछ खाने को मिल जाता। खेतों से भी पेट भरने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता। यों दुःख को सुख जान हेमला जाट सुखी था, किन्तु पूर्व स्मृति के कारण उसका हृदय दुःखी था। खेतासर गांव वाले बड़े गांव जाकर बस गए। बेचारे प्रेत सत्ता के मारे करते भी क्या? बड़े गांव में एक दिन घोड़े पर चढ़कर शाही हुक्म लेकर एक रौबदार सिपाही आया। बना-ठना था ऊपरी पैसा खाकर। नाई पर उसकी नजर पड़ी तो बोला- ’चल बे! इधर आ, पहले मेरे घोड़े का पानी पिला, फिर मेरी हजामत बना और मुझको नहला भी दे। जल्दी कर हुक्म की तामील।’ नाई को उसकी अकड़ बुरी लगी, उसने उसे टरकाना चाहा, बोला- ’पानी का यहां बड़ा संकट है सरकार, लेकिन यहां से थोड़ी दूर एक लबालब ताल है, वहीं कृपा कर आप कष्ट करें तो खूब नहा लें आप और घोड़ा भी।’ नाई की बात सुन सिपाही बहुत खुश हुआ बोला- ’क्या खूब गहरी मनचाही छाया भी है वहां? नाई के हाँ कहने पर वह बोला अच्छा तो वहीं ले चल। वहाँ चलने की बात सुनकर नाई घबराकर मन में सोचने लगा- अरे मेरी चतुराई तो चौपट हो गई। मैंने तो अपनी बचत सोच आफत टाली थी। खेतासर की बला सिपाही पर डाली थी। वह यह न समझा था कि साथ में जाना होगा और मुझे वहां इसे नहलाना होगा। नाई को चुप देख सिपाही ने भौंह चढ़ाई- ’क्यों बे! चुप हो गया, क्या तेरी नानी मर गई।’ नाई चौंका, सोचने लगा लगता है अब तो नाइन के बाद उसी की बारी है। इसलिए वह विनती कर गिड़गिड़ाने लगा-’ महाराज! जब से नाइन और मुखिया मरे है और खेतासर उजड़ा है, तब से ताल पर मनुष्यों का नहीं केवल भूतराजा हेमला का राज है।’ उसकी बात सुनकर सिपाही बिगड़ते हुए बोला- ’अबे! उल्लू के पट्ठे, बदमाश, क्या मैं ही मिला तुझे ठट्ठा करने के लिए? सुन बे! हम कचहरी के पक्के जिन्दा भूत हैं, जिस पर लग जाते हैं उसके छक्के छुड़ा देते हैं। चल, आज दिखाई तो दें वह भूत, देखता हूँ उसे भी।’ सिपाही ने नाई को बहुत समझाया कि भूतवूत कुछ नहीं होता, वह उसे वहां ले चले, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो सिपाही ने जैसे ही चार तमाचे उसके आंखों के नीचे जड़े तो उनसे चिन्गारियां क्या निकली कि वह झट से मान गया। ’चलता है या नहीं कि खाएगा अब कोड़े?’ दोनों हाथ जोड़कर ’चलता हूँ सरकार’ कहते हुए सिर पर घास रखकर, घोड़े के आगे-आगे नाई गुमसुम चल दिया। देखने वाले भाग खड़े हुए। खेतासर का ताल सिपाही के मन भाया, उसमें स्वच्छ जल भरा हुआ था, पेड़-पौधों की घनी छाया देख वह खुश हुआ, लेकिन नाई का हृदय धुकुड़-पुकुड़ कर रहा था। घोड़े को खूंटे से बांध उसे घास डालकर नाई चौकन्ना होकर सिपाही की खोपड़ी घोंटने बैठ गया। वह कभी इधर कभी उधर देखता जा रहा था। अभी सिपाही की आधी खोपड़ी घुट पाई थी कि नाई को दूर से हेमला आता दिखाई दिया तो उसकी अकुलाहट बढ़ गई, वह थर-थर कांपने लगा। उसकी थर-थर्राहट से सिपाही चिल्लाया- ’क्यों बे क्या हुआ? क्या बिच्छू ने काट खाया तेरे को।’ इतना सुनते ही ‘जाता हूँ, ले देख, वह तेरा बाप आया‘ कहकर नाई नौ दो ग्यारह हो गया। झुंझलाते हुए सिपाही उठा और इधर-उधर देखने लगा। उसने देखा सचमुच भूत उसी की ओर आ रहा है। उसका दिल दहल गया, सोचने लगा- यह कौन बला है? उसने देखा कि उसके सिवा दूर-दूर तक कोई नहीं है। सब ओर सूना है तो उसका मन बहुत घबराया। इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता जैसे ही दुडू-दुडू का भयानक शब्द उसे सुनाई दिया उसकी देह थर-थर थराई, वह फुर्ती से घोड़े की खूंटी खोले बिना ही उस पर एड़ लगाकर सड़ा-सड़ कोड़े बरसाने लगा। घोड़ा हिनहिनाते हुए खूंटी उखाड़कर भाग खड़ा हुआ। जैसे ही घोड़े की चाल बढ़ी तड़ा तड़ पीछे से खूंटी सिपाही के सिर पड़ने लगी। भूत का डर उसकी खोपड़ी में बैठ गया। वह समझा कि मुझे और कोई नहीं भूत मार रहा है। पीछे तरफ घुटी-घुटाई साफ खोपड़ी में ज्यों-ज्यों मार पड़ी वह बड़बड़ाने लगा- ’अब मत मार, धरम की कसम है तुझे। तौबा-तौबा, अरे माफ कर, मुझे, न मार, मैं तेरी पूजा कराऊंगा, कभी ताल पर नहीं आऊंगा, सत्ते! तुझको पूजने के बाद ही शहर वापस जाऊंगा।’ इधर हेमला तालियाँ बजाकर खूब हंसा उधर सिपाही गांव के पास बेहाल होकर गिरा। घोड़ा पास ही घुप्पू बन खड़ा हुआ था। समाचार सुनकर बड़े गांव का मुखिया आया। सिपाही को बेहोश देख बहुतेरे उपाय किए लेकिन उसने मुंह नहीं खोला, पहर रात सिपाही चल बसा। यह देखकर नाई ने खूब नमक-मिर्च लगाकर बढ़ा-चढ़ाकर किस्सा सुनाया। 

निरंतर .........                                                                  (मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)
कई रोगों की जड़ है  तम्बाकू/धूम्रपान

कई रोगों की जड़ है तम्बाकू/धूम्रपान

तम्बाकू/धूम्रपान जनित कुछ प्रमुख रोगों के बारे में जानिए और आज ही छोड़ने का संकल्प कीजिए 
  • कैंसर: तम्बाकू के धुएं से उपस्थित बेंजपाएरीन कैंसर जनित रोग होता है। लगभग 95 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मरीज धूम्रपान के कारण होते हैं। विपरीत धूम्रपान मुख कैंसर का कारण होता है। विपरीत धूम्रपान में सिगार का जलता हुआ सिरा मुख में रखा जाता है। विपरीत धूम्रपान आंध्रप्रदेश के गांवों में सामान्य होता है। बीड़ी के धूम्रपान के कारण जीभ, फैरिंग्स (गला), लैरिंग्स, टांन्सिल एवं ग्रासनली के कैंसर हो जाता है। होंठ कैंसर सिगार एवं पाइप के द्वारा होता है। तम्बाकू चबाने से मुख कैंसर होता है
  • टी.बी. (तपेदिक): धूम्रपान से हमारे भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं। तपेदिक के जीवाणु संक्रमति व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं।
  • खांसी एवं ब्रोंकाइटिस : तम्बाकू के धूम्रपान से फैरिंग्स और ब्रोंकाई की म्यूकस झिल्ली उत्तेजित होने के कारण खांसी एवं ब्रोंकाइटिस हो जाता है।
  • हृदय संवहनी रोग : तम्बाकू के धूम्रपान के कारण एड्रीनील का स्त्रावण बढ़ जाता है जिससे धमनियों के संकुचन द्वारा रक्त दाब, हृदय स्पंदन की दर में वृद्धि हो जाती है। उच्च रक्त दाब हृदय संबंधी रोगों की संभावनाओं को बढ़ाता है। निकोटीन हृदय के द्विपट कपाट को नष्ट करता हैं
  • एम्फाइसिमा- तम्बाकू का धुआं फेफड़ों की एल्वियोलाई की भित्ति तोड़ सकता है। गैसीय विनिमय के लिए सतही क्षेत्रफल को कम कर देता है, जिससे एम्फाइसिमा हो जाता है।
  • प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव : यह प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है।
  • आॅक्सीजन वहन क्षमता में कमी : तम्बाकू के धुंए की कार्बनमोनोआॅक्साइड शीघ्रता से आरबीसी की होमोग्लोबिन को बांधती है एवं सह विषाक्तता का कारण होती है, जो हीमोग्लोबिन की आॅक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है


तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है

तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है

अनाड़ी कारीगर अपने औजारों में दोष निकालता है।
पकाने का सलीका नहीं जिसे वह देगची का कसूर बताता है।।

कातना न जाने जो वह चर्खे को दुत्कारने चला।
लुहार बूढ़ा हुआ तो लोहे को कड़ा बताने लगा।।

जिसका मुँह टेढ़ा वह आइने को तमाचा मारता है।
कायर सिपाही हमेशा हथियार को कोसता है।।

जो लिखना नहीं जानता वह कलम को खराब बताता है।
भेड़िए को मेमना पकड़ने का कारण अवश्य मिल जाता है।।

कायर अपने आप को सावधान कहता है।
कंजूस अपने आप को मितव्ययी बताता है।।

बहानेबाजों के पास कभी बहानों की कमी नहीं रहती है।
गुनाहगार को बहाना बनाने में दिक्कत पेश नहीं आती है।।

अनाड़ी निशानेबाज के पास हमेशा झूठ तैयार रहता है।।
तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है।।

....कविता रावत 


कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

कब साकार होगा नशा मुक्त देवभूमि का सपना

जब कोई हमारी प्रकृति की सुरम्य पहाड़ियों की गोद में बसे देवता, ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों की निवास स्थली देवभूमि उत्तराखंड की चर्चाएं मद्यपान के फलते-फूलते कारोबारी के रूप में करता है, तब ऐसी बातें सुनकर मन खट्टा होने लगता है। विश्वास नहीं होता कि सच में क्या यह हमारी वही देवभूमि है जिसके नाममात्र से हम उत्तराखंडी लोग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं? अफसोस! आज जिस तरह से नशे का व्यापार हमारी देवभूमि में अपनी पैठ बनाकर उसकी जड़ों को खोखला करने में लगी है, उससे यह स्पष्ट होता है एक के बाद एक चोला बदलती हमारी सरकारें नींद के झौंके में विकास के नाम पर आम जनता को सुनहरे सपने दिखाकर केवल अपना उल्लू सीधा करने की फिराक भर में हैं।
आज शराब की सुगमता के कारण हमारे शांति प्रिय पहाड़ी गांव विकास के नाम पर ’सूरज अस्त, उत्तराखंड मस्त’ की पहचान बनाने में रमे हुए हैं, जिसमें बड़े-बुजुर्ग, युवा पीढ़ी से लेकर नौनिहाल तक नशे में धुत होकर हमारी पहाड़ी संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डालकर खोखला करने में तुले हुए हैं। वे नशे में मग्न होकर भूल रहे हैं कि धीरे-धीरे वे मानसिक विकृति के शिकार हो रहे हैं, जिससे उनके घर-परिवार में जब-तब गाली-गलौज़, लड़ाई-झगड़े का माहौल निर्मित होने से अशांति के बादल मंडरा रहे हैं।  यद्यपि पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत पहले से ही बीड़ी-तम्बाकू पीना आम बात है, लेकिन जब से यहाँं शराब रूपी दानव ने अपने पांव पसारे हैं, अधिकांश लोगों को इसकी लत लग चुकी है, जो तेजी से उनके तन-मन को खोखला करती जा रही है। शराब के सेवन से न केवल उनकी आंते सूख रहीं है, अपितु किडनी और लिवर सम्बन्धी बीमारियां बिन मांगे शरीर को दुर्बल और असहाय बना रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप समाज और घर-परिवार बडे़ पैमाने पर बिखराव की कगार पर खड़े नजर आ रहेे हैं।
नशा नाश का दूसरा पहलू है। नशा करने या मद्यपान करने के अनेक दुर्गुण हैं। नशे में धुत होकर नशेड़ी अपना होश और विवेक खोकर अपने बच्चों और पत्नी की दुर्दशा करता है। अपना घर-परिवार भूलकर ऊल-जलूल बकते हुए लड़खड़ाते कदमों से गली-कूचों में बेदम पड़ा रहता है। जब कोई वाहन चालक शराब पीकर गाड़ी चलाता है तो वह न केवल अपनी, अपितु दूसरों की जान के लिए भी खतरनाक सिद्ध होता है। ऐसी हालात में कई  घर-परिवार असमय उजड़ते हैं, बर्बाद होते हैं। शराब मानव जाति के लिए किसी भी दृष्टिकोण से लाभदायक नहीं है, इस बात को समय-समय पर ज्ञानी, बुद्धिजीवी, लेखक, चिन्तक एवं विभिन्न समाज सेवी मनीषियों ने भी समझाया है। मिल्टन कहते हैं- ‘संसार की सारी सेनाएं मिलकर इतने मानवों और इतनी सम्पत्ति को नष्ट नहीं करतीं, जितनी शराब पीने की आदत।’ वाल्मीकि ने मद्यपान की बुराई करते हुए कहा है- ’पानादर्थश्च धर्मश्च कामश्च परिहीयते।’ अर्थात् मद्य पीने से अर्थ, धर्म और काम, तीनों नष्ट हो जाते हैं।’ दीर्घनिकाय का वचन है- ’मदिरा तत्काल धन की हानि करती है, कलह को बढ़ाती है, रोगों का घर है, अपयश की जननी है, लज्जा का नाश करती है और बुद्धि को दुर्बल बनाती है।’ मुंशी प्रेमचंद कहते हैं- ’जहां सौ में से अस्सी आदमी भूूखों मरते हों, वहांँ दारू पीना गरीबों का रक्त पीने के बराबर है।’ भगवतीप्रसाद वाजपेयी जी कहते हैं- ’शराब भी क्षय (टीबी) जैसा एक रोग है, जिसका दामन पकड़ती है, उसे समाप्त करके ही छोड़ती है।’ अकबर इलाहाबादी ने चुटकी ली है कि- "उसकी बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर। खैरियत गुजरी कि अंगूर के बेटा न हुआ।।"
शराबबंदी को लेकर देवभूमि की जनता में इन तीनों तीव्र आक्रोश है, जिसमें महिलाओं की भूमिका मुख्य है; क्योंकि शराब पीने वाले तो पुरुष ही होते हैं, जिनका मुख्य काम खाना-पीना और, मारपीट के साथ लड़ाई-झगड़ा कर घर-परिवार और समाज के माहौल को बिगाड़ना भर रह गया है। घर-परिवार को संभालने का काम केवल महिलाओं के जिम्मे ही होता है, जिसे निभाना उन्हें भली-भांति आता है। यही कारण है कि आज महिलाएं शराबबंदी के लिए बढ़-चढ़कर जगह-जगह एक होकर आंदोलनरत हैं। शराब विरोधी  आंदोलन पहले भी हुए हैं लेकिन इस बार विरोध सम्पूर्ण देवभूमि से शराब रूपी  दानव के सदा के खात्मे के लिए है। जब से सुप्रीम कोर्ट के के एक फैसले के तहत् राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे वाली शराब की दुकानों को बंद कर दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने का निर्णय हुआ है, तब से पीड़ित और जागरूक महिलाओं में तीव्र आक्रोश भरा हुआ है। इसी बात को लेकर वे जहां एक तरफ कई जगह शराब की दुकानें खोले जाने के विरोधस्वरूप उग्र प्रदर्शन कर तोड़-फोड़ कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाझाईश देकर शराबबंदी के लिए आन्दोलनरत हैं। आंदोलनकारी अपनी भूख-प्यास, नींद, चैन सबकुछ भूलकर शराबबंदी के लिए एकजुट हो विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैंैं, लेकिन बिडम्बना देखिए अभी तक सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग पायी है। आखिर क्यों सरकार फैसला लेने में असमर्थ है? यह समझना अब आम जनता के लिए भी कोई टेढ़ी खीर नहीं रही है। इसका सीधा सा गणित उनकी भी समझ में आ रहा है शराब के कारोबार से सरकार जो सालाना लगभग 1900 करोड़ की आमदनी होती है, उसके आगे वे उनका दुःख-दर्द, सुख-चैन समझने में अपने आप को असमर्थ पा रहा है। उन्हें आम जनता की नहीं, अपितु इस बात की चिन्ता है कि अगर कहीं शराबबंदी हुई और उनकी आमदनी चली गई तो फिर वे कैसे राज्य के विकास की योजनाओं का खाका खींचने वाले सरकारी महकमों में तैनात अधिकारी/कर्मचारियों के वेतन-भत्ते निकालेंगे, मोटर मार्ग बनायेंगे, स्कूल खुलवायेंगे और बिजली-पानी का बन्दोबस्त करेंगे? इतनी बड़ी राशि का विकल्प न ढूंढ पाने में राज्य सरकार शराबबंदी हेतु असमर्थ और असहाय बनी हुई है। लेकिन आम जनता अब यह भी बखूबी समझने लगी है कि शराबबंदी के लिए सिर्फ यही कारण पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि शराब कारोबारियों की राजनीति के गलियारों तक गहरी पहुंच होने एवं उनकी काॅकटेल पार्टियों के खर्च आदि वहन करने और उन्हें मालामाल करना भी है। 
          कुछ भी हो लेकिन अब सम्पूर्ण उत्तराखंड में हो रहे शराबबंदी के आंदोलनकारियों के इरादों से स्पष्ट है कि अब वे किसी भी प्रकार से सरकार के झांसे में नहीं आने वाले हैं। इसके लिए उन्होंने कमर कस ली है कि अब वे तभी मैदान से हटेंगे, जब उत्तराखंड सरकार पूर्ण शराबबंदी की घोषणा करने के लिए मजबूर न हो जाय। वे दृढ़ संकल्पित हैं कि इस बार वे ‘कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरी छोड़ि अब होब कि रानी।“ की तर्ज पर सरकारों के चोलाबदली और जड़ राजनेताओं के झूठे आश्वासनों के दम पर नहीं, अपितु दुर्गा-काली बनकर देवभूमि से दानव रूपी शराब का खात्मा कर नशा मुक्त देवभूमि का सपना करेंगे।
नशा हटाओ देवभूमि बचाओ ...  कविता रावत 


हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

 22 मार्च पानी बचाने  का संकल्प, उसके महत्व को जानने  और संरक्षण के लिए सचेत होने का दिन है।   अनुसंधानों से पता चला है  कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है। इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं। जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल-आपूर्ति आज के युग की गंभीर समस्या बन गयी है।   बिना एकजुट होकर जागरूक न होने से इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती है।  यदि जल संकट के प्रति हम सचेत और दृढ संकल्पित होकर आगे नहीं आये तो वैज्ञानिक आइन्स्टीन की कही बात सच न हो जाय, जिसमें उन्होंने कहा था की तीसरा महायुद्ध चाहे परमाणु अस्त्रों से लड़ लिया जाय पर चौथा महायुद्ध यदि होगा तो पत्थरों से लड़ा जायेगा और इससे एक कदम आगे बढ़कर नास्त्रेदम ने भविष्यवाणी की थी कि चौथा महायुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा?  यदि इस भविष्यवाणी को झुठलाना है तो पानी की एक-एक बूँद बचाने के लिए हर व्यक्ति को संकल्पित होकर अपने-अपने स्तर  से पहल करते हुए आगे आना होगा।  
ढूंढा राक्षसी : होली कथा

ढूंढा राक्षसी : होली कथा

होली पर्व से सम्बन्धित अनेक कहानियों में से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा ढूंढा नामक राक्षसी की कहानी का वर्णन भी मिलता है, जो बड़ी रोचक है।  कहते हैं कि सतयुग में रघु नामक राजा का सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार था। वह विद्वान, मधुरभाषी होने के साथ ही प्रजा की सेवा में तत्पर रहता था। एक दिन उसके राज्य के नागरिकों ने दरबार में आकर प्रार्थना कि नगर में ढू़ंढा नाम की राक्षसी ने अनेक गांवों और नगरों में उत्पात मचाया हुआ है। वह बड़ी मायाविनी है और अपनी इच्छानुसार रूप बदलने में शातिर है। वह बच्चों का मांस खाने की आदी है। उनके द्वारा अनेक उपाय किए गए हैं, लेकिन उस पर किसी तंत्र-मंत्र अथवा शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आप अतिशीघ्र कोई उपाय कीजिए वर्ना नगर से बालकों की किलकारियाँ सदा के लिए बंद हो जाएगी। नगरवासियों के करुण पुकार सुनकर रघु बहुत चिन्तित हुए। उन्होंने नगरवासियों को आश्वस्त करते हुए अपने-अपने घर जाने को कहा।
   नगरवासियों के जाने के बाद राजा रघु बहुत विचार कर अपने गुरु वशिष्ठ के पास गये। गुरु के पास पहुंचकर उन्होंने विनम्रतापूर्व उनसे ढूंढा राक्षसी के बारे में समस्या का समाधान जानने के लिए बड़ी नम्रता से चरण स्पर्श किए और वहीं गुरु वशिष्ट के समीप बिछे कुशासन पर बैठकर और अपने आने का कारण बताया। उन्होंने गुरु वशिष्ट से पूछा कि कि यह राक्षसी कौन है? इसके अत्याचारों को निवारण का उपाय बताइये? वशिष्ट थोड़ी देर चुप रहकर बोले- राजन! यह माली नाम के राक्षस की कन्या है। एक समय की बात है। इसने शिव की आराधना में बड़ा उग्र तप किया। भगवान भोलेनाथ ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसको वर मांगने को कहा। इस पर वह कुछ भी न बोली तो फिर शिव जी ने कहा- “संकोच मत करो बालिके! जो कुछ तुम्हारे मन में हो वह मांग डालो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगा।
    महादेव के ऐसे वचन सुनकर उसका रहा सहा संकोच भी जाता रहा और वह हाथ जोड़कर बोले- हे भोलेनाथ मुझे देवता, दैत्य और शस्त्रों से अवध्य कर दीजिए। मुझे गर्मी-सर्दी, बरसात, दिन-रात, घर-बाहर सभी स्थानों से अभय प्राप्त हो। उसकी इस बात को सुनकर शिव सोच में पड़ गये। इतनी शक्तियों के प्राप्त हो जाने से यह उनका अवश्य दुरुपयोग करेगी और सर्वत्र आतंक फैलाती रहेगी, लेकिन मैं तो वचन दे चुका हूं फिर ........... शिवजी बोले- अरे, तुमने सब कुछ कहा लेकिन पागल और बालकों का नाम क्यों नहीं लिया?
ढूंढा हंसते हुए बोली- पागल तो पागल होता है। वह भला किसी का क्या बिगाड़ सकता है और रही बालकों की बात, भला उन्हें मैं क्यों सताने लगी, वे तो मुझे बहुत प्रिय है। शिव तथास्तु कहकर वहां से अन्तर्ध्यान हो गये। शिव के चले जाने पर उसने अपने कथन पर विचार किया- वह बालकों को लेकर चिन्ताग्रस्त हो गई। इसीलिए वह तब से बालकों को परेशान करती रहती है- सोचती है न कोई जीवित बचेगा और न मेरा अहित होगा। ऐसा वशिष्ट ने रघु को कह सुनाया।
गुरुदेव की समस्त बातें ध्यानपूर्वक सुनकर रघु बोले- इससे मुक्ति को भी तो कोई उपाय होगा। उपाय क्यों नहीं है, उपाय तो है- कोई भी देवता कोई तपस्वी को ऐसे ही वरदान थोड़े ही दे दिया जाता है। बहुत आगा-पीछा सोचकर, उसी के कथन में से सार निकालकर उसकी मौत का कारण समझ वरदान दिया जाता है। यदि वह तपस्वी का वरदान न दें तो व्यक्ति का ईश्वर पर से आस्था ही समाप्त हो जाए। इसलिए देवताओं को उनकी तपस्या को सार्थक करने के लिए वरदान तो देना ही पड़ता है। यदि उसने पाई हुई सिद्धि का दुरुपयोग किया तो उसी के मांगे हुए वरदान में से उसकी मौत का उपाय भी खोज लेते हैं। इसलिए हे राजन, आप चिन्तित न हो और जैसा मैं कहूं वैसा ही कृत्य करें।
          फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को राज्य के बालकों को बुलाकर उनसे सूखे उपले (गोबर के कंडे) मंगाकर एक जगह इकट्ठे करवाएं और उसमें सूखे पत्तां, टहनियां, लकड़ियां मंगाकर एक ढूंढ बनवाएं । उसके बीचों बीच एक लकड़ी का लम्बा डंडा लगवाएं क्योंकि उसने (ढूंढा) वरदान मांगते समय जंगली वस्तुओं और पशुओं का नाम नहीं लिया था। बालकों के हाथ में लकड़ी की तलवारें दें और उनसे कहें कि अपनी अपनी तलवारों को इस प्रकार चलाएं जिस प्रकार युद्ध में योद्धा अपने शत्रु पर वार करने के लिए प्रहार करता है। बड़े लोगों से कहें कि वे पागलों की तरह व्यवहार करें, क्रूर हास्य, अनर्गल प्रलाप और हंसी-मजाक करें। निःशंक होकर जिसके मन में जो आये वही करें फिर आप राक्षसों के नाश वाला मंत्र बोलकर अग्नि को प्रज्जवति करें। तत्काल रघु क्षमायाचना सहित बोल उठे- लेकिन गुरूदेव, इस सबसे ढूंढा का कैसे नाश होगा। नाश ....नाशम ही तो होगा। वह इतने बालकों के समूह को देखकर लार टपकाती हुई वहां आयेगी और अपने को सबों की दृष्टि से ओझल रखने की लिए उसी ढूंढ में छुप जाएगी। राक्षसों के नाश करने वाले मंत्र से ज्यों ही अग्नि प्रज्जवलित होगी, वह उसी में जल मरेगी। राजन, ऐसा अवश्य होगा क्योकि उसकी मृत्यु इसी प्रकार लिखी हुई है।
  राजा रघु ने गुरूदेव की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। ढूंढा नाम की राक्षसी अपने प्रलोभन के कारण सचमुच वहां आई और ढूंढा को अग्नि के चारों तरफ से घेर लिया तो वह निकल भागने का उपाय खोजने लगी लेकिन वशिष्ट के मंत्रों ने उस अग्नि के चारों ओर से एक गोलाकार रेखा से बांध जो दिया था। मंत्रों के प्रभाव से वह न तो एक इंच वहां से सरक सकी न ही मायावी रूप धारण कर पाई। अपनी मृत्यु को देख वह चीख-चीखकर शिव को पुकारने लगी। शिवजी वहां आये और उन्हें धिक्कारते हुए कहा कि तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया इसीलिए परिणाम भुगतो। उसकी अनुनय-विनय सब बेकार गई और वह जल मरी।  तब से आज तक होली जलाने, अनाप-शनाप बोलने  और होली की राख को तांंत्रिक लोगों द्वारा उपयोग आदि की प्रथा चल निकली। 

सभी को होली की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

एक अभियान नारी आधारित गालियों के विरुद्ध भी चले

एक अभियान नारी आधारित गालियों के विरुद्ध भी चले

भले ही हम "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" वाली बात सुनकर खुशफहमी में जीते आ रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इसके उलट नज़र आता  है।  जहाँ एक ओर नारी के सम्मान की बात की जाती है, वही दूसरी ओर इसकी वास्तविकता की तस्वीर जब आए-दिन समाचार पत्रों और टीवी आदि के जरिये सबके सामने देखने-सुनने को मिलती है, तब यह बात अच्छी नहीं दिल में चुभती है।  आधुनिक कहलाने वाले समाज के बावजूद  आज भी नारी के प्रति कोई बहुत बड़ा मूलभूत परिवर्तन नहीं आ पाना गंभीर चिंतन का विषय है, यह परिवर्तन कैसे होगा, इस पर सबको विचार करने की सख्त आवश्यकता  है।  
इसी तारतम्य में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक सामाजिक बुराई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगी कि जहाँ एक ओर हमारा समाज औरत को सम्मान देने की बात करता है, वहीँ दूसरी ओर  उसके लिए माँ-बहिन जैसी गालियों को बौछार सरेआम होते देख ऐसा मौन धारण किये रहता है,जैसे कुछ हुआ ही न हो।  कितनी बिडम्बना है यह!  आज अधिकांश लोगों ने गालियों को इतनी सहजता से अपने स्वभाव में ढाल लिया है कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि वे खुद की माँ, बहिन को गाली दे रहे हैं या दूसरे की?  भले ही स्त्री से जोड़कर गालियाँ देने कि प्रथा बहुत पहले से है लेकिन आज जब हम इतने शिक्षित और सभ्य हो चुके हैं तब आखिर क्यों  इस आदत को छोड़ नहीं पा रहे हैं।
           आज जगह-जगह बेशर्म की तरह उग रही गालियों की अमरबेल को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए नारी-पुरुष मानसिकता से ऊपर उठकर एकजुट होकर स्वच्छता अभियान चलाने की जरुरत है। सबको गम्भीरता से सोचने की जरुरत है कि इस तरह की नारी संबोधनकारी गालियां सभ्य कहलाने वाले  समाज के नाम पर बदनुमा दाग हैं, अतः इसे अपने-अपने स्तर से जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर एक स्वच्छता अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए जिससे ऐसे लोगों को सबक मिले जो अपनी माँ-बहन और नारी का सम्मान करना भूल चुकें हों।
....कविता रावत   


शिव-पार्वती बारात

शिव-पार्वती बारात



महाशिवरात्रि को त्यौहारों का राजा कहा जाता है। यह पर्व भगवान शंकर की पूजा तथा भक्त की श्रद्धा और आस्था का पर्व है। शिवरात्रि व्रत ’सर्व पाप प्रणाशनम्’ अर्थात् सभी पापों को नष्ट करने वाला तथा ’भुक्ति भुक्ति प्रदायकम्’ अर्थात्  भोगों तथा मोक्ष का प्रदाता है। मान्यता है कि जो लोग शिवरात्रि का व्रत रखते हैं, उन्हें कामधेनु, कल्पवृक्ष और चिंतामणि के सदृश मनोवांछित फल प्राप्त होता है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि ‘जो मनुष्य महाशिवरात्रि के दिन व्रत कर जागरण करता है और विधिवत शिव पूजा करता है, उसे फिर कभी अपनी माता का दूध नहीं पीना पड़ता, वह मुक्त हो जाता है, अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्ति होती है। ज्योतिष के अनुसार अमावस्या में चंद्रमा सूर्य के समीप होता है, अतः उस समय जीवन रूपी चंद्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ संयोग होने से इष्ट सिद्धि की प्राप्ति होती है।
        शिवरात्रि शिव-पार्वती के विवाह का दिन है। शिव-पार्वती के मिलन की रात है, शिव शक्ति पूर्ण समरस होने की रात है। इसलिए शिव ने पार्वती को वरदान दिया कि आज शिवरात्रि के दिन जहाँ कहीं तुम्हारे साथ मेरा स्मरण होगा, वहाँ उपस्थित रहूँगा। 
         महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिर में पूजा अर्चना के बाद जब दोपहर में शिव-पार्वती बारात में शामिल होने का अवसर मिला तो आत्मीय शांति का अनुभव हुआ। यूट्यूब पर विडियो लोड हुआ तो उसमें ब्लॉग पर शेयर करने का बटन भी सामने आ गया तो क्लिक करने पर ब्लॉग पर आ गया तो सोचा इसके साथ ही दो-चार शब्द लिखती चलूँ।
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
 
भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल उत्सव मेले की रंगत में

भोपाल स्थित नार्थ टी.टी.नगर में न्यू मार्केट के पास एक विशाल मैदान है, जिसे दशहरा मैदान के नाम से जाना जाता है। इस मैदान में दशहरा के दिन हजारों की संख्या में शहरवासी एकत्रित होकर रावण के साथ कुम्भकरण और मेघनाथ का पुतला दहन कर दशहरा मनाते हैं। यहाँ हर वर्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह से फरवरी के प्रथम सप्ताह तक भोपाल उत्सव मेला लगता है। अभी जब मेले की गूँज बच्चों के कानों तक सुनाई दी तो उन्होंने भी 25 जनवरी 2017 को पूर्व घोषणा कर दी कि वे भी 26 जनवरी को भोपाल उत्सव मेला देखने जाएंगे। यद्यपि मैंने मेले से पहले ही कुछ आवश्यक खरीददारी कर ली थी, फिर भी बच्चों की जिद्द के चलते यही सोचकर कि चलिए मुख्य परीक्षा के पहले घूम-फिरकर उनका मन हल्का हो जायेगा, निश्चित किया। तयशुदा कार्यक्रम के तहत् 26 जनवरी के दिन सुबह जल्दी उठकर ऑफिस में झंडा वंदन के बाद घर लौटकर जल्दी से चाय-नाश्ता तैयार करते-करते टेलीविजन पर गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय समारोह देखकर गणतंत्र दिवस मनाया गया।
         गांव में भले ही दिन में मेले लगते हैं, लेकिन शहर में अधिकांश मेले रात को ही लगते हैं, क्योंकि रात को बिजली की आकर्षक साज-सज्जा से मेले की रौनक दोगुनी बढ़ जाती है। हमारे घर से दशहरा मैदान की दूरी लगभग 1 कि.मी. होगी, इसलिए हम सायं 7 बजे घर से पैदल मार्च करते हुए रंग-बिरंगी रोशनी में नहाये दशहरा मैदान पहुंचे तो लगा शहर में जैसे वसंत आ गया हो।
          मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने मां शारदा भवानी के जगमगाते दरबार की सुंदर झाँकी के साथ उनकी गाथा के गूंजते गीत कानों में पड़े, तो रास्ते की थकान पल भर में काफूर हो गई। मेला लोगों से ठसाठस भरा पड़ा था। हम भी चींटी की चाल से धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले गए। मेले में जिधर नजर घुमाओ उधर लोग ही लोग नजर आ रहे थे। मेला कार्यालय से लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से कभी किसी बच्चे के गुम होने की सूचना तो कभी जेबकतरों से सावधान रहने और अपने-अपने सामान की सुरक्षा की उद्घोषणा की जा रही थी।
मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के साथ छोटे मध्यम हर तरह की दुकानों के बीच-बीच छोटी-छोटी दुकान जैसे-पानी पूरी वाला, बच्चों के रंग-बिरंगे खेल-खिलौने बेचने वाला, इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाला, गुब्बारे वाला, लाइलप्पा वाला, जो व्यक्ति कम अपने आप में दुकान ज्यादा थे, भरे-पटे थे। मेले में घरेलू उपयोग में आने वाले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक, साज-सज्जा एवं विभिन्न प्रकार के फर्नीचर भी अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे।  मेले में इस बार प्रॉपर्टी फेयर का भव्य व आकर्षक डोम भी देखने को मिला, जिसमें कई लोग बिल्डर्स के प्रोजेक्ट में फ्लैट, डुप्लेक्स, प्लॉट, बंगले, ऑफिस व दुकान की जानकारी एवं बुकिंग करते हुए मिले। दो एवं चार पहिए वाहनों के शोरूम में भी अच्छी खासी भीड़ थी। मेले में कुछ लोग घरेलू सामान की खरीददारी कर रहे थे तो कुछ लोग कई प्रकार के अचार और चूरन की गोलियां बेचने वाली दुकान पर मुफ्त स्वाद चखने वालों की कतार में बड़े ही अनुशासित ढंग से अपनी बारी का इंतजार करते नज़र आ रहे थे। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से एक स्टॉल पर शासकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय द्वारा शिविर लगाकर निःशुल्क जांच की जा रही थी।         
मेला जाकर झूले न झूले तो लगता है, कुछ छूट सा गया है। नए-पुराने कई प्रकार के झूले हमारा इंतजार कर रहे थे। दो-तीन अत्याधुनिक झूला झूलने के बाद लगा मजा नहीं आया तो अपने पुराने ऊंचे डिब्बे वाले झूले की टिकट खरीदी और उसमें जा बैठे। कुछ देर बाद धीरे-धीरे घूमने के बाद हम आसमान से बातें करने लगे। जब-जब झूला तेजी से ऊपर से नीचे आता, तब-तब बच्चे और दूसरे लोग चिल्लाने लगते, उन्हें डर के साथ मजा भी खूब आ रहा था। लगभग 10 चक्कर लगाने के बाद जब धीरे-धीरे झूला रूका तो एक-एक करके लोग उससे उतरने लगे तब सुअवसर जानकर मैंने झट से पूरे मेले की 4-5 तस्वीरें धड़ाघड़ खींच मारी।
          मेले में बच्चों की फरमाईश करतब देखने की हुई तो मौत का कुंआ और जासूसी कुत्तों के कारनामे देखे। पेट की खातिर इंसान क्या-क्या नहीं करता है। एक तरफ मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर 2 मोटर सायकिल और 2 कारों को एक साथ घूं-घूं की जोरदार आवाज के साथ करतब दिखाते आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सरपट भागते देखते हुए रोंगटे खड़े हो गए तो दूसरी ओर एक बड़े से पांडाल में रिंग मास्टर के इशारों पर दर्शकों की वाहवाही और तालियों के बीच जासूसी कुत्तों के अजब-गजब कारनामे देखकर सुखद आश्चर्य हुआ।
         मेले में गए और वहां कुछ चटपटा खाने का मन न होता हो, ऐसा कैसे हो सकता है! उसके बिना तो मेले सैर अधूरी रहती है। यहां भी खाने-पीने की छोटी-बड़ी कई दुकानें सजी मिली, जिनमें लोग जाने क्या-क्या और कितना-कितना खाए जा रहे थे। लेकिन इस बीच एक जो अच्छी बात थी कि बाहर गंदगी देखने को नहीं मिली। लोगों को खाते देख और खाने-खजाने के स्टॉलों से आती सुंगध से पेट में चूहे कूदने लगे तो हमने भी जलेबी, चाट, मसाला डोसा और पनीर कुलच्छा खाया फिर गरमागर्म कॉफी पीने के बाद मेले के सांस्कृतिक मंच की ओर रूखसत किया। मंच पर राजस्थानी लोक संगीत की जुगलबंदी में मन काफी देर तक रमा रहा।
        मेले में बड़े-छोटे, रईस-गरीब सभी तरह के लोग घूम-फिर रहे थे। जैसा कि हर मेले में देखने को मिलता है कि गरीब लोग अपेक्षाकृत ज्यादा खुश नजर आते हैं, यहां भी देखने को मिला। कई युवक बेमतलब इधर-उधर से मटरगस्ती कर रहे थे। दुनिया फैशन की मारी है यह बात कुछ मॉडर्न टाईप लोगों को देख सच होते दिखा, जो काफी ठंड के बावजूद भी बिना गर्म कपड़े पहने, महीन वस्त्र धारण किए थे, लेकिन उनकी स्फूर्ति देखते ही बन रही थी। मेला कई वर्षों से अपने भूले-बिसरे लोगों से मिलने का भी एक सुलभ माध्यम भी है। इसका अहसास मेले में इधर-उधर घूमते-घामते, बीच-बीच में अपने कई भूले-बिसरे लोगों से मिलकर, उनसे दो-चार बातें करके सहज रूप में देखने को  मिला। यह अलग बात है कि बच्चों को मेला घूमना था, इसलिए बीच-बीच में उनकी टोकाटाकी चलती रही।
          भोपाल मेले का यह प्रशंसनीय बात है कि आयोजकों द्वारा प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें भजन संध्या, किसी फिल्म स्टार या विख्यात पार्श्व गायक के नाम से नाईट, मिक्स बॉलीबुड नाइट, अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, संगीतमय संध्या, नाट्य प्रस्तुति, मैजिक शो, लाफ्टर शो, कव्वाली, देशभक्ति गीत शामिल होते हैं। इसके अलावा भी चित्रकला, नृत्य प्रतियोगिता आदि आयोजन भी मेले की रौनक बढ़ाते हैं।
...कविता रावत

मकर-संक्रांति पर्व

मकर-संक्रांति पर्व

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। सूर्य के चक्रण मार्ग में कुल 27 नक्षत्र तथा उनकी 12 राशियां क्रमशः मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन आती हैं। किसी मास की जिस तिथि को सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रान्ति कहा जाता है। संक्रांति का अर्थ ही सूर्य का एक राशि से अन्य राशि में जाना होता है। सूर्य 12 मास में 12 राशियों में चक्कर लगाता है, जिस दिन सूर्य मेष आदि राशियों का भ्रमण करता हुआ मकर राशि में प्रवेश करता है, उस दिन को मकर-संक्रांति कहा जाता है।
         उत्तरायण और दक्षिणायन सूर्य के संक्रमण में दो महत्वूपर्ण संयोग हैं। सूर्य 6 मास उत्तरायण और 6 माह दक्षिणायन में रहता है। उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर तथा दक्षिणायन-काल में दक्षिण की ओर मुड़ता-सा दिखाई देता है। इसीलिए उत्तरायण काल की दशा में दिन बड़ा और रात छोटी तथा दक्षिणायन की दशा में रात बड़ी और दिन छोटा होता है। मकर-संक्रांति में सूर्य उत्तरायण एवं कर्क-संक्रांति में दक्षिणायन की ओर गमन करता है।  मकर संक्रांति सूर्य उपासना का पर्व है। सूर्य को कृषि का देवता माना जाता है। सूर्य का तेज ताप अन्न को पकाता है, समृद्ध करता है, इसीलिए उसका एक नाम ’पूपा’ अर्थात पुष्ट करने वाला भी है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पूजा करके किसान सूर्य देव के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं।
तमिलनाडु में मकर-संक्रांति को पोंगल पर्व रूप में मनाया जाता है। इसे वे द्रविड़ सभ्यता की उपज मानते हैं। यही कारण है कि द्रविड़ लोग इसे धूम-धाम से मनाते हैं। मद्रास में पोंगल ही ऐसा पर्व है जिसे सभी वर्ग के लोग मनाते हैं। पंजाब में लोहड़ी पर्व मकर-संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है। यह हंसी-खुशी और उल्लास का विशिष्ट पर्व है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर लकड़ियां एकत्रित कर जलाई जाती हैं। तिलों, मक्की की खीलों से अग्नि-पूजन की परम्परा है। अग्नि के चारों ओर नाचना-गाना पर्व के उल्लास का प्रतीक है। प्रत्येक पंजाबी परिवार में नव-वधू या नव-शिशु की पहली लोहड़ी को विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। 
उत्तर-भारत में इस पर्व पर गंगा, यमुना अथवा पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान तथा तिल, गुड़, खिचड़ी आदि दान देने का महत्व है। तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर (कलकत्ता) में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है, जहां देश के अन्य प्रांतों से भी हजारों तीर्थयात्री पहुंचते हैं। शीत ऋतु के लिए तिल, गुड़, मेवा आदि बलबर्द्धक पदार्थ हैं। इनके सेवन से शरीर पुष्ट होता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस शीत ऋतु में तिल, गुड़ और गर्म भोजन का सेवन नहीं करता, वह मंद भागी होता है। संक्रांति पर्व पर तिल, गुड़, मेवा दान की प्रथा शायद इसीलिए रही है कि कोई मंद भागी न रहे।

सभी ब्लॉगर्स साथियों और सुधि पाठकों को मकर संक्रांति, पोंगल,माघी,बिहू पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

नववर्ष में महक उठे......

नववर्ष में महक उठे......

तन-मन में रहे सदा, माटी की सौंधी गंध
कर्मों में गूंजे सदा, भारतीयता के छंद
जन-जन से हो उल्लास, प्रेम के अनुबंध
नववर्ष में महक उठे, घर-घर ये मकरंद
......................
कविता रावत की ओर से आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!


अपने-पराये का भेद

अपने-पराये का भेद

लाठी मारने से पानी जुदा नहीं होता है।
हर पंछी को अपना घोंसला सुन्दर लगता है।।

शुभ कार्य की शुरुआत अपने घर से की जाती है।
पहले अपने फिर दूसरे घर की आग बुझाई जाती है।।

दूसरे के भरे बटुए से अपनी जेब के थोड़े पैसे भले होते हैं।
समझदार पराया महल देख अपनी झोंपड़ी नहीं गिराते हैं।।

पड़ोसी की फसल अपनी फसल से बढ़िया दिखाई देती है।
बहुधा पराई चीज़ अपनी से ज्यादा आकर्षक नजर आती है।।

जूते में पड़े कंकर की चुभन को कोई दूसरा नहीं जानता है।
कांटा जिसे भी चुभा हो वही उसकी चुभन समझ सकता है।।

अपना सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता है।
जो दूसरों का भाग्य सराहता है अपने भाग्य को कोसता है।।


 कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

कैप्टन राम सिंह राष्ट्रगान के धुन निर्माता

आजाद हिन्द फौज के सिपाही और संगीतकार रहे कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने ही भारत के राष्ट्र गान “जन गण  मन” की धुन बनाई थी। वे मूलतः पिथौरागढ़ जनपद के मूनाकोट गांव के मूल निवासी थे, उनके दादा जमनी चंद जी १८९० के आस-पास हिमाचल प्रदेश में जाकर बस गये थे।
प्रस्तुत है एक पोस्टर के माध्यम से हमारे राष्ट्रगान के धुन निर्माता के बारे में .......




भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है

बिना साहस कोई ऊँचा पद प्राप्त नहीं कर पाता है।
निराश होने पर कायर में भी साहस आ जाता है।।

मुर्गा अपने दड़बे पर बड़ा दिलेर होता है।
कुत्ता अपनी गली में शेर बन जाता है।।

शेर की मांद में घुसने पर ही उसका बच्चा पकड़ा जा सकता है।
स्वयं को सुरक्षित देखकर कायर अपने दुश्मन को ललकारता है।।

साहस के बल पर बहुत बड़े डर को भी छिपा सकते हैं।
कायर अपनी मौत से पहले कई बार मरते हैं।।

लज्जित होकर जीने से सम्मानपूर्वक मरना भला होता है।
भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है।।

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको

जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
जीने से बेजार था दिल
तुम बहार बन के आ गए

ख़ुशी होती है क्या जिंदगी में
न थी इसकी खबर मन को
जब से तुम मिले प्यार से
लगता पा लिया गगन को
सूनी फुलवारी में तुम
तुम बहार बन के आ गए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए

दिल की बस्ती में राज तेरा
तुम मुस्कान बन होंठों पर छाए
जब से मिले तुम मुझको
मेरे ख्याल बदल गए
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आज वैवाहिक जीवन की 21वीं वर्षगांठ है तो सोचा कुछ लिखती चलूँ .. ऐसे में प्रेम पातियाँ बड़े काम आती हैं  ......कविता रावत