डाॅक्टर बनने की राह आसान बनाने हेतु एक सार्वजनिक अपील

डाॅक्टर बनने की राह आसान बनाने हेतु एक सार्वजनिक अपील


माउंटेन मैन के नाम से विख्यात दशरथ मांझी को आज दुनिया भर के लोग जानते हैं। वे बिहार जिले के गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे, जिन्होंने अकेले अपनी दृ़ढ़ इच्छा शक्ति के बूते  अत्री व वजीरगंज की 55 किलोमीटर की लम्बी दूरी को 22 वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद गहलौर पहाड़ काटकर 15 किलोमीटर की दूरी में बदलकर ही दम लिया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि जब वे गहलौर पहाड़ के दूसरे छोर पर लकड़ी काट रहे थे तब उनकी पत्नी उनके लिए खाना ले जा रही थी और उसी दौरान वह पहाड़ के दर्रे में गिर गई, जिससे चिकित्सा के अभाव में उसकी मृत्यु हो गई, क्योंकि वहां से बाजार की दूरी बहुत थी। उनके मन में यह बात घर कर गई कि यदि समय पर उनकी पत्नी का उपचार हो गया होता तो वह जिन्दा होती। इसलिए उन्होंने उसी समय ठान लिया कि वे अकेले दम पर पहाड़ के बीचों-बीच से रास्ता निकालकर ही दम लेगें, जो उन्होंने तमाम तरह की कठिनाईयों के बावजूद कर दिखाया। यहां एक बात साफ है कि यदि गांव में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होती तो शायद उनकी पत्नी की जान बच गई होती। कमोवेश आज भी अधिकतर गांवों की स्थिति चिकित्सा के मामले में बड़ी सोचनीय व दयनीय है। गांव में एक ओर जहां चिकित्सा के अलावा गरीबी का आलम पसरा मिलता है वहीं दूसरी ओर गरीब बच्चों के लिए उच्च स्तर पर शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था न होने से गरीबी के चलते उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है। नगरीय क्षेत्रों की अपेक्षा देहातों में अशिक्षा का अभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिलता है, जिसका दुःखद पहलू यह भी है कि कई समझदार और पढ़े-लिखे लोग इनका फायदा उठाने से पीछे नहीं हटते। बेचारे गरीब आदमी अपने गुजर-बसर के बाद यदि अपना जीवन स्तर कुछ ऊपर उठने के लिए सोचते भी हैं तो उसके लिए जब वे इधर-उधर से कर्जा लेते हैं तो उसी में डूब जाते हैं और फिर वे कभी कुछ सोचने-समझने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते हैं। उनकी ऐसी ही दशा के बारे में किसी कवि ने बड़ा ही सटीक कहा है कि-
है जिसका सर पर कर्जे का बोझ
न मिलती जिसको रोटी रोज
करेगा वह क्या जीवन खोज-
लायेगा कहां से बोलो ओज?
मैंने यहां माउंटेन मैन ‘दशरथ मांझी’ का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि उनकी तरह जाने कितने ही गरीब लोग अपनी दयनीय स्थिति के कारण अपनी मंजिल की ओर दृढ़ निश्चय होकर कदम तो बढ़ा लेते हैं लेकिन उन्हें गरीबी की मार के चलते अपनी मंजिल बीच में ही अधूरी छोड़नी पड़ती है। दशरथ मांझी की तरह धर्मेन्द्र मांझी जो कि सोहागपुर, जिला होशंगाबाद का निवासी है, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से विगत 9 वर्ष से जानती हूँ, जिसने औसत दर्जे के छात्र होने के बावजूद एक पिछड़े इलाके से आकर भोपाल में मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए 8 वर्ष की कठोर साधना की और वर्ष 2016 में एम.बी.बी.एस. की प्रवेश परीक्षा पास करके भोपाल स्थित चिरायु मेडिकल काॅलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लेकर ही दम लिया। मैं यहाँ यह बात बताना जरुरी समझती हूँ कि जहां बहुत से छात्र दो-तीन बार असफल होने पर आगे तैयारी करना छोड़ देते हैं वहीं मांझी की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम ही है कि विकट परिस्थितियों के बाद भी कई बार असफल रहने के बाद उसने मैदान नहीं छोड़ा, डटा रहा और कभी निराश नहीं हुआ। वह निरन्तर मेरिट में आने के लिए सरकारी काॅलेज मिलने की आस लगाये कठोर परिश्रम करता रहा, ताकि वह सरकारी काॅलेज में दाखिला लेकर सरकारी अनुदान से अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर सके। लेकिन इस दौरान मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पैटर्न में बदलाव किया गया तो नए नियमों के तहत जब उसने देखा कि अब वह आगे प्रवेश परीक्षा के लिए पात्र नहीं होगा तो फिर अन्य कोई विकल्प न होने से उसे प्रायवेट काॅलेज में प्रवेश लेना पड़ा। जहाँ उसे इस बात का मलाल जरूर है कि यदि वह आरक्षित श्रेणी का होता तो निश्चित ही अब तक वह अपनी एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण कर चुका होता और उसे आज फीस की जुगत में मारा-मारा नहीं भटकना पड़ता। 
मांझी के पिताजी फलों का हाथ ठेला लगाकर अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं, इसके बाद भी बेहद तंगहाली में उन्होंने धुन के पक्के अपने बेटे की दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर परिश्रम को पढ़ लिया तभी तो उन्होंने अपना जो कुछ थोड़ा बहुत था, उसे बेचकर और रिश्तेदारों की मदद से प्रायवेट मेडिकल काॅलेज में प्रवेश दिलाने की हिम्मत दिखाई। वे पढ़े-लिखे भले ही नहीं है, लेकिन इस बात को अच्छे से समझ गए हैं कि जब उनके बेटे ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की है तो निश्चित ही वह आगे भी कठोर परिश्रम कर अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब रहेगा। वे अपने बेटे की लगन देखकर समझ गए हैं कि कठिन परिश्रम के लिए आदमी में जो सहनशीलता, साहस, निर्भीकता आदि गुण होने आवश्यक है, वे उसमें विद्यमान हैं। कठोर परिश्रम करने की प्रवृत्ति प्रत्येक व्यक्ति में नहीं होती, लेकिन अपनी धुन के पक्के व्यक्ति कठिन परिश्रम करके ही सौभाग्यशाली कहलाते हैं।
         धर्मेन्द्र कुमार मांझी की एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूर्ण हों और उसका डॉक्टर बनने का सपना साकार हो, इस हेतु मैं आप सभी पाठकों एवं सुधिजनों से यथासंभव आर्थिक सहायता की अपील करती हूँ।  

आर्थिक सहायता हेतु धर्मेन्द्र मांझी द्वारा लिखित सार्वजनिक निवेदन पत्र

मैं धर्मेन्द्र कुमार मांझी आत्मज श्री बेनीप्रसाद, निवासी-सोहागपुर, जिला होशंगाबाद मध्यप्रदेश आप सभी सम्मानीय पाठकों एवं सुधिजनों से करबद्ध निवेदन करता हूँ-
मैंने डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का एक सुनहरा सपना देखा है। इसी उद्देश्य पूर्ति के लिए 8 साल सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद वर्ष 2016 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर मैं चिरायु मेडिकल काॅलेज एण्ड हाॅस्पिटल, भोपाल में एम.बी.बी.एस. में दाखिला ले पाया हूँ। मैं पिछले एक वर्ष से लगातार काॅलेज में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा हूँ। मैंने प्रथम वर्ष की पढ़ाई करते हुए 62 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया है और वर्तमान में द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय है, फिर भी पहले साल की फीस मेरे घर वालों ने अपना जो कुछ भी था वह सब बेचकर एवं रिश्तेदारों की मदद् से भर दी थी। मेरे पास कोई प्रोपर्टी भी नहीं है, इसलिए मुझे पढ़ाई के लिए कोई भी बैंक लोन नहीं दे पा रहा है उनका कहना है कि प्रोपर्टी के मूल्यांकन के आधार पर ही लोन पास होता है। पिछले 2 माह से मैं स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित बहुत से जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के अलावा कलेक्टर कार्यालय एवं कई प्राइवेट संस्थानों के चक्कर काट चुका हूँ, लेकिन सभी का रवैया टालमटाल रहा है। एक गरीब की मदद् केवल इतनी ही हो पाई है कि सब जगह से औपचारिक रूप से बैंक को फोन लगाया गया, जिसके जवाब में बैंक यही कहता आ रहा है कि वे केवल अंतिम वर्ष की बची फीस ही लोन के रूप में दे सकते हैं।
मेरे घर की आय का एकमात्र जरिया मेरे पिताजी द्वारा फलों का हाथ ठेला लगाकर गुजारा भर है, फिर में मेरी डाॅक्टर बनने और समाज सेवा की धुन को देखते हुए उन्होंने अपनी सामथ्र्य से बढ़कर पहले साल की फीस अपना सबकुछ बेचकर और बाकी निकट रिश्तेदारों की मदद् से भर ली। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि द्वितीय वर्ष की फीस मेरी अत्यन्त कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए मेरे सीनियर और सुपर सीनियर और डिपार्टमेंट के सभी लोगों ने मिलकर भर दी। अब चूंकि मुझे तृतीय वर्ष की फीस भरनी है, जिसके लिए मैं शहर में मारा-मारा फिरने के लिए मजबूर होकर अपने आप को असहाय महसूस कर रहा हूँ। मुझे इसकी दिन-रात भारी चिन्ता सता रही है, इस कारण मेरी पढ़ाई भी बाधित हो रही है। मुझे इसी साल की फीस की चिन्ता है, जो 5 लाख 72 हजार है, जिसे मुझे 12 जून, 2018 तक भरना है। अगले साल की ज्यादा चिंता नहीं है क्योंकि तब मुझे बैंक से लोन मिल जायेगा। 
मैं एक औसत दर्जे का छात्र रहा हूँ, फिर भी मैंने अपनी पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाई करते हुए मेडिकल की प्रवेश परीक्षा पास करते हुए यह मुकाम हासिल किया है, जिसे आगे भी हर हाल में मुझे आगे बढ़ाना है और डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का मैंने जो लक्ष्य निर्धारित किया हैै, उसे पूरा करना है, जिस हेतु आपके आशीर्वाद स्वरूप आप सभी से यथासंभव आर्थिक सहायता की उम्मीद कर रहा हूँ।
मैं मेधावी छात्र योजना के अंतर्गत भी नहीं आता हूँ क्योंकि मेरा प्रवेश वर्ष 2016 में हुआ जबकि यह योजना 2017 शुरू हुई है। मेरी घर की माली हालत किसी से छिपी नहीं है। घर में पिताजी फलों का हाथ ठेला कर जैसे-तैसे घर चला रहे हैं और मैं अपना थोड़ा-बहुत खर्च अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर बड़े ही संघर्षपूर्ण ढंग से निकाल पा रहा हूँ।
मैंने होश संभालते ही डाॅक्टर बनने का सपना देखा हैै। क्योंकि मैंने अपने गांव और  अपने निकट सम्बन्धियों में से किसी को डाॅक्टर बनते नहीं देखा है। मैं भलीभांति परिचित  हूँ कि कहीं पास डाॅक्टर न होने की दशा में हम जैसे गरीब गांव वालों को कितनी शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए मर-खपना पड़ता है। मेरा डाॅक्टर बनकर समाज सेवा का लक्ष्य न छूटे इसके लिए मुझे आपके आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है लेकिन इसके लिए मेरी और मेरे परिवार वालों की हृदय से नेक दुआएं आपको मिलेगी क्योंकि कहते हैं कि जो लोग जरूरतमंद लोगों की समय पर मदद करते हैं, ईश्वर उनके भण्डार को हमेशा भरा रखता है।
मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि मानवीय संवेदना और मेरी उपरोक्त दयनीय स्थिति पर आप सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए यथा आर्थिक सहयोग करते हुए मेरे डाॅक्टर बनने के सपने को साकार करते हुए सहभागी बनेगें, इसके लिए मैं और मेरा परिवार आप सभी लोगों का जीवनपर्यन्त आभारी रहूँगा।
       कृपया अपना आर्थिक योगदान मुझे मेरे निम्न बैंक खाते,  Paytm अथवा वर्तमान निवास के माध्यम से प्रदान करने की कृपा करें:-
नाम- धर्मेन्द्र कुमार मांझी    
Mobile Number :  9340359567
बैंक का नाम - बैंक आॅफ बड़ौदा, शाखा हबीबगंज भोपाल
Account No.   18600100015544
IFSC Code  :   BARB0HABIBG    (Fifth character is Zero)
MICR Code :  462012005
Paytm No.      9340359567
वर्तमान निवास का पता -
हनुमंदिर मंदिर स्वर्गाश्रम,
बद्रीनारायण मंदिर के पास,
 साउथ टी.टी. नगर, भोपाल

दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है

दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है


जब तक चूजे अंडे से बाहर न आ  जाएं
तब तक उनकी गिनती नहीं करनी चाहिए
जब तक ताजा पानी न मिल जाए
तब तक गंदे पानी को नहीं फेंकना चाहिए

भालू को मारने से पहले उसके खाल की कीमत नहीं लगानी चाहिए
मछली पकड़ने से पहले ही उसके तलने की बात नहीं करनी चाहिए

हाथ आई चिड़िया आसमान उड़ते गिद्द से कहीं अच्छी होती है
दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है

पास का खुरदरा पत्थर दूर चिकने पत्थर से अच्छा होता है
बहुत बार प्याला होठों तक आते-आते हाथ से छूट जाता है

एक छोटा उपहार किसी वचन से बड़ा होता है
कल की मुर्गी से आज का अंडा भला होता है


भेड़ाघाट (जबलपुर) नौका विहार  Bhedaghat Nauka Vihar

भेड़ाघाट (जबलपुर) नौका विहार Bhedaghat Nauka Vihar


ठण्ड अथवा बरसात के मौसम की अपेक्षा गर्मियों में सबसे ज्यादा शादी-ब्याह होते हैं। शादी-ब्याह अगर घर के आस-पास हो तो रात को घूमते-घामते एक के बाद एक शामिल होने में ज्यादा कष्ट की अनुभूति नहीं होती। लेकिन अगर शादी दूर किसी रिश्तेदार के घर हो, तो सौ बार सोचना पड़ता है। बावजूद इसके जब हमें जबलपुर रहने वाले एक निकट संबंधी का विवाह निमंत्रण पत्र मिला तो हमने फौरन गर्मी से हाल-बेहाल होते मन की सुनते हुए शादी में सम्मिलित होने एवं भेड़ाघाट में नौका-विहार का आनन्द उठाने का कार्यक्रम निश्चित कर लिया। गर्मियों में नौका-विहार करना अत्यन्त आनन्दप्रद होता है। नर्मदा का शान्त और शीतल वातावरण मन में अपूर्व आल्हाद उत्पन्न करता है। ऊंची-नीची विभिन्न रंग वाली संगमरमरी चट्टानों के अनोखे सौंदर्य में जब नौका मंथर गति से आगे बढ़ती है और उसमें सवार सभी ‘नर्मदा मैया की जै‘ का उद्घोष करते रहते हैं तो थका-हरा मन तरंगित होकर तरोताजगी से भर उठता है। भेड़ाघाट में धुआंधार जल प्रपात के बाद जब नौका-विहार को निकले तो नौका-विहार को मोबाईल में कैद कर लिया, जिसे यू-ट्यूब में पोस्ट किया तो सोचा ब्लाॅग में भी पोस्ट करती चलूँ।



हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला

हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला

गर्म पानी से झुलसा कुत्ता ठण्डे पानी से भी डरता है
चूने से मुँह जले वाले को दही देखकर डर लगता है

रीछ से डरा आदमी कंबल वाले को देख डर जाता है
दूध का जला छाछ को फूँक-फूँक कर पीता है

ईश्वर से न डरने वाले से सभी को डर लगता है
आग में झुलसा हुआ बच्चा आग से डरता है

जिससे बचना मुश्किल हो, उससे मूर्खता है डरना
कल क्या हो यह सोचकर आज क्यों डर के रहना

दुष्ट को क्षमा नहीं डर दिखाकर बस में करना भला
हमेशा के डर से उससे एक बार गुजर जाना भला
अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

गलत ढंग से कमाया धन गलत ढंग से खर्च हो जाता है
बड़ी आसानी से मिलने वाला आसानी से खो भी जाता है

दूध की कमाई दूध और पानी की पानी में जाती है
चोरी की ऊन ज्यादा दिन गर्माइश नहीं देती है

एक नुकसान होने पर नुकसान होते चले जाते हैं
लाभ की चाहत में बुद्धिमान भी मूर्ख बन जाते हैं

हर लाभ के साथ कोई न कोई हानि जुड़ी रहती है
बिना परिश्रम की कमाई लड़ाई में गंवाई जाती है

बाल्टी डूब जाने के बाद रस्सी को नहीं फेंका जाता है
आग जलाने वाले को धुआं भी सहन करना पड़ता है

अंधेरे घर में चांद का उजाला जितने दिन उतना भला
ठंड में ठिठुरने से आंखो में धुआं बर्दाश्त करना भला

कस्तूरी की व्यापार हानि से मिट्टी के व्यापार से लाभ कमाना भला
अपमान के साथ मिले लाभ से सम्मान के साथ हानि उठाना भला

....कविता रावत
होली पर उत्तराखंड में  गाए जाने वाले गीत

होली पर उत्तराखंड में गाए जाने वाले गीत

खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर,
दरसन दीज्यो माई आंबे, झुलसी रहो जी
तीलू को तेल कपास की बाती
जगमग जोत जले दिन राती, झुलसी रहो जी
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जल कैसे भरूं जमुना गहरी
जल कैसे भरूं जमुना गहरी
खड़े भरूं तो सास बुरी है
बैठे भरूं तो फूटे गगरी , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                   
ठाडे भरूं  तो कृष्ण जी  खड़े हैं
बैठे भरूं तो भीगे चुनरिया , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                       
भागे चलूँ तो छलके गगरी , 
जल कैसे भरूं जमुना गहरी                       
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हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो जनम निवास,  जय देवी आदि भवानी
कांगड़ा जनम निवास , जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो जौंला निसाण , जय देवी आदि भवानी
कश्मीर जौंल़ा निसाण , जय देवी आदि भवानी
कहाँ तेरो खड्ग ख़पर, जय देवी आदि भवानी
बंगाल खड्ग खपर, जय देवी आदि भवानी
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी
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चम्पा चमेली के नौ दस फूला ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
पार्वती ने गुंथी हार शिवजी के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
कमला ने गुंथी हार ब्रह्मा के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
लक्ष्मी ने गुंथी हार विष्णु के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
सीता ने गुंथी हार राम  के गले में बिराजे ,
चम्पा चमेली के नौ दस फूला
राधा ने गुंथी हार कृष्ण के गले में बिराजे
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मत मरो मोहनलाला  पिचकारी
काहे को तेरो रंग बनो है
काहे को तेरी पिचकारी बनी है,
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

लाल गुलाल को रंग बनी है
हरिया बांसा की पिचकारी
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

कौन जनों पर रंग सोहत है
कौन जनों पर पिचकारी
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी

राजा जनों पर रंग सोहत है
रंक जनों पर पिचकारी ,
मत मरो मोहनलाला  पिचकारी
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हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष ...........1
बामण जीवे   लाखों बरस
बामणि जीवें लाखों बरस...........2
जिनके  गोंदों में लड़का खिलौण्या
ह्व़े जयां उनका नाती खिलौण्या ...........3
जौंला द्याया होळी का दान
ऊँ थै द्याला श्री भगवान ...........4
एक लाख पुत्र सवा लाख नाती
जी रयाँ पुत्र अमर रयाँ नाती ...........5
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष

डॉ. शिवानंद नौटियाल जी द्वारा रचित पुस्तक  'गढवाल के नृत्य गीत' से साभार 

कैसे तुझको प्यार करूँ

कैसे तुझको प्यार करूँ

विवशता देखो इस पागल मन की
कहता दूर नहीं हरदम तेरे करीब रहूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

देख तेरी प्यार भरी निगाहें
दिल तुझमें डूबने लगता
इतना प्यार भरा है दिल में
बरबस ही खिंचा चला आता
चाहती हैं निगाहें तुझमें डूबी रहे
बेबस निगाहें कैसे रोक पाऊँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

एकपल की दूरी भी अखरती
जब दर्द प्यार का रह-रहकर उठता
जितनी भी दूरी बनानी चाही
उतना ही प्यार भरा दर्द बढ़ता
ये मीठा दर्द और ये ख्याल दूरी का
नासमझ दिल कैसे इसे समझाऊँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

तारे गिन-गिन कटती रातें
तुझे देख मन का सूरज उगता
दिनभर नाचे मन-मयूर इधर-उधर
शाम ढले जाने कहाँं छिपता 
न दिल न मन रहता पास
अब तुम्हीं बताओ कैसे खबरदार रहूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ

सुखद अहसास तेरे मिलन का
अच्छा लगता प्यार में खो जाना
कैसा प्यार जो बना देता पागल
पागलपन में दिल का खुश होना
मिला प्यार बन गया तराना
फिर दुनिया से मैं क्यों  डरूँ
समझ न आता राज प्यार का
कैसे तुझको प्यार करूँ
...........कविता रावत

कभी प्यार में ऐसे ही जाने कितने ही मन में ख्याल उमड़-घुमड़कर बरसते रहते। अब तो घर-परिवार के बीच बमुश्किल कुछ विशेष अवसरों पर ही कभी-कभार  उन दिनों की यादें ताज़ी कर खुश होने के दिन हाथ लगते  हैं। आज ऐसा ही एक अवसर है मेरे हमसफ़र के जन्मदिन का आया है तो, उन बीतें प्यार भरे लम्हों की यादें ताज़ी करने का मन हुआ है।  



सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार


राष्ट्रीय त्यौहारों में गणतंत्र दिवस का विशेष महत्व है। यह दिवस हमारा अत्यन्त लोकप्रिय राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष आकर हमें हमारी प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली का भान कराता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीयों के गौरव को स्थिर रखने के लिए डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में देश के गणमान्य नेताओं द्वारा निर्मित विधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। संविधान में देश के समस्त नागरिकों को समान अधिकार दिए गए। भारत को गणतंत्र घोषित किया गया। इसलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कहा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में यह समारोह विशेष उत्साह से मनाया जाता है। 
        विविधाओं से भरे हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता के बावजूद एक ऐसी मजबूत कड़ी है, जो हम सबको आपस में जोड़े रखती है, वह है हम सबके भारतवासी होनी की और इस भारतीय होने की खुशी को प्रकट करने के सबसे अच्छे अवसर हैं, हमारे राष्ट्रीय त्यौहार। बावजूद अन्य त्यौहार जैसे होली, दीवाली, विजयादशमी, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, पोंगल, ओणम आदि के अवसर पर जैसा हर्षोल्लास व अपनापन देखने को मिलता है, वैसा जब हमारे राष्ट्रीय त्यौहारों पर दिखाई नहीं देता है तब मन में मलाल रह जाता है। लगता है हमने हमारे राष्ट्रीय त्यौहार जैसे-गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस को केवल सरकारी आयोजन मान लिया है, जो हमारे लिए मात्र एक अवकाश भर से और अधिक कुछ भी नहीं? यदि ऐसा नहीं तो फिर जब हम अंग्रेजी न्यू ईयर, फ्रेंडस डे, वेलेन्टाईन डे यहाँ  तक कि शादी-ब्याह की वर्षगांठ को भी धूमधाम से मना सकते हैं तो फिर राष्ट्रीय त्यौहारों पर बेरूखी क्यों? आइए, इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम सभी राष्ट्रीय त्यौहारों को मात्र शासकीय आयोजन तक ही सीमित न रखते हुए अपने घर-आंगन व दिलों में उतारकर उसे  सम्पूर्ण देश को जोड़ने की एक उत्सवमयी शुरूआत करें।
       राष्ट्रीय त्यौहार हमें जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों से परे एक सूत्र में बांधने में सहायक हैं। सामूहिक स्तर पर प्रेमभाव से इन्हें मनाने से राष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक एकता को विशेष प्रेरणा और बल मिलता रहे इसके लिए हम सभी अपने-अपने घरों में वंदनवार लगायें, दीपों से सजायें, तिरंगा फहराये, रंगोली बनायें, पकवान बनायें, अपने-अपने कार्यस्थलों व मोहल्लों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें। अपने धार्मिक स्थलों मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि में देश की एकता, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। मातृ-भूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावार कर देने वाले अमर वीर सपूतों को सारे भेदभाव भुलाकर एक विशाल कुटुम्ब के सदस्य बनकर याद करें।
         आइए, समस्त भारतवासी इस गणतंत्र दिवस को संकल्प लें कि देश का हर घर और हर धार्मिक स्थल को सारे भेद-भावों से ऊपर उठकर दीप-मालाओं की रोशनी से जगमगायेंगे और दुनिया को गर्व से बतायेंगे कि हम सब कई भिन्नताओं के बावजूद भी एक हैं। हमारा यह दृढ़ संकल्प ही मातृ भूमि के लिए जाति, धर्म, वर्ण, भाषा एवं क्षेत्रीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर वीर सपूतों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
  
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित - जय हिन्द, जय भारत!!
भोपाल उत्सव मेले में झलकता शहर का वसंत

भोपाल उत्सव मेले में झलकता शहर का वसंत

इस बार तो २६ जनवरी से पहले ही वसंत पंचमी आ गयी। भला हो घर के बगीचे की छोटी सी क्यारी में खिली वासंती फूलों से लदी सरसों का! वसंत के आगमन की सूचना मुझ तक उसने ही पहुँचाई । गाँव में वसंत की सूचना तो प्रकृति के माध्यम से सहज रूप से मिल जाती हैं लेकिन शहर में वसंत को तलाशना कतई आसान काम नहीं है। इसी वासंती रंग की तलाश में जब हम घर से भोपाल स्थित नार्थ टी.टी. नगर में एक विशाल मैदान 'दशहरा मैदान' में लगे मेले में पहुंचे तो रात को बिजली की आकर्षक साज-सज्जा से सुसज्जित रंग-बिरंगी रौशनी में नहाये मेले को देखकर लगा शहर में वसंत आ गया है।  क्रमशः  .....................


एक हमारा प्यारा तोता

एक हमारा प्यारा तोता

एक हमारा प्यारा तोता
'ओरियो ' है वह कहलाता
बोली हमारी वह सीखता
फिर उसको है दोहराता

चोंच उसकी है लाल-लाल
ठुमक-ठुमक है उसकी चाल
घर-भर वह पूरे घूमता रहता
मिट्ठू-मिट्ठू   कहता  फिरता

सुबह पिंजरे से बाहर निकलता
ऊँगली छोड़ सीधे कंधे बैठता
टुकुर-टुकुर फिर मुँह देखता
बड़ा प्यारा-प्यारा वह लगता

दाने, बीज, आम, अमरूद खाता
लाल-हरी मिर्च उसे खूब है भाता
फलियाँ वह अपने पंजे से पकड़ता
चोंच से काटकर बड़े मजे से खाता

जो कोई भी उसको है देखता
वह उससे बहुत प्यार जताता
जैसे ही कोई अपना हाथ बढ़ाता
झट वह उसके कंधे चढ़ जाता
....कविता रावत

हमारे स्कूल के समय तो हमें प्रोजेक्ट बनाने को मिलते नहीं थे, लेकिन आजकल स्कूल से बच्चों को प्रोजेक्ट बनाने को मिलता है तो मां-बाप को भी उसके लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे ही बच्चों को स्कूल से प्रोजेक्ट के लिए एक ’पक्षी अथवा जानवर’ में कविता लिखने थी, तो बच्चों के साथ थोड़ी कोशिश करने के बाद अपने पालतू तोते ’ओरियो’ को देखकर यह कविता बन पड़ी। बहुत प्यारा है हमारा 'ओरियो' उसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।





एक ही थाल में 48 स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भरा है 'ख्याल' में

एक ही थाल में 48 स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद भरा है 'ख्याल' में

'ख्याल' कविता संग्रह नाम से मेरी सहपाठी निवेदिता ने खूबसूरत ख्यालों का ताना-बना बुना है। भोपाल स्थित स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी में ‘ख्याल’ का लोकार्पण हुआ तो कविताओं को सुन-पढ़कर लगा जैसे मुझे अचानक मेरे ख्यालों का भूला-बिसरा पिटारा मिल गया हो। जहाँ पहले स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही कौन कहाँ चला गया, इसकी खबर तक नहीं हो पाती थी, वहीं आजकल इंटरनेट भूले-बिसरे रिश्तों के मेल-मिलाप का एक बड़ा सुलभ साधन बन बैठा है। इसी की सुखद अनुभूति है कि करीब 20 वर्ष तक जिसकी कोई खबर न थी, वही सखी एक दिन अचानक मिल जायेगी, कभी सोचा न था। भूली-बिसरी स्कूल की यादें फिर से ताजी हों, एक-दूजे की सुध ली जाए, इसी उद्देश्य से जब सहपाठियों ने व्हाट्सएप्प में बचपन ग्रुप  बनाया तो बहुत सहपाठी एक-एक कर आपस में जुड़ते चले गए, जिससे ज्ञात हुआ कि निवेदिता मध्यप्रदेश में ही बैतूल जिले में है और अपनी कविता संग्रह 'ख्याल' के लोकार्पण हेतु भोपाल आ रही हैं। निवेदिता ने दूरभाष पर जब मुझसे यह अनुरोध किया कि मेरी उसकी कविता संग्रह ’ख्याल’ के लोकार्पण के अवसर पर हाजिरी जरूरी है तो मन में कई भूली-बिसरी यादें ताजी हो चली और इसी बहाने मेल-मिलाप का ’खुल जा सिमसिम’ की तरह एक बंद दरवाजा खुला।        
        निवेदिता और मेरे ख्याल कितने कुछ मिलते-जुलते हैं, यह मैंने उसकी कविता संग्रह ’ख्याल’ पढ़ते हुए अनुभव किया। मुझे यह देख सुखद अनुभूति हुई कि उसने कविता संग्रह ’ख्याल’ में न सिर्फ अपना बल्कि दुनिया का भी बखूबी ख्याल रखा है। उसका मानना है कि- “उसकी कविताएं आस-पास के वातावरण, रोजमर्रा की घटनाएं, अनुभूतियों की उपज है। स्वान्तः सुखाय लेखन के लिए कोई निश्चित खांचा नहीं है, जहाँ गीत, गजल, छंद, तुकांत, अतुकांत का मिश्रण है। जैसा महसूस करना वैसा लिख देना बिना किसी काट-छांट के यही उचित है, यही सत्य है और मौलिक प्रतिक्रिया है।" इसमें मैं यह जोड़ना चाहूँगी कि भले ही एक रचनाकार पहले स्वान्तः सुखाय के लिए लिखता हो, लेकिन धीरे-धीरे जब वह लिखते-लिखते दीन-दुनिया को अपना समझ उनके सुख-दुःख को अपना लेता है तो फिर उसका लेखन स्वान्तः सुखाय न होकर सर्वजन हिताय बन जाता है।                  
निवेदिता के ’ख्याल’ कविता संग्रह को यदि मैं स्वादिष्ट व्यंजनों से परोसा गया एक थाल कहूँ तो यह अतिश्योक्ति न होगी, क्योंकि उसने अपनी कविता संग्रह किसी एक विधा में न रचते हुए उसमें विविधता का समावेश किया है, जहाँ न बनावट है न कृत्रिमता, जो हमें उसकी अपनी एक अलग पहचान कराती है। सीधे-साधे पदों में रची रचनाएं उसके लेखन की ताकत है, जो भाषा के अनावश्यक अलंकरण से दूर है। उसके लेखन में ताजगी और सरलता के साथ परिपक्वता है, जो उसकी पहली कविता से ही स्पष्ट देखने को मिलती है- 
“ये जो एक लफ्ज है ’हाँ’
ये अगर मुख्तसर नहीं होता
तो जरा सोचिये कि क्या होता? 
..................................................... 
इसलिए लम्बा और दुश्वार सा होना था इसे
कि कोई बीच में ही रूक जाये
‘हा’ कहते कहते ’“
          आपसी प्रेम जाने कब और कैसे कितने रूपों में हमारे सामने आकर खड़ा हो जाय, यह कोई नहीं जानता। इसका कोई पारखी नहीं मिलता। प्रेम की उड़ान सोच से भी ऊँची है। मुझे कुछ ऐसे ही ख्याल निवेदिता की 'अघटित’ कविता में देखने को मिली-
“मेरे कानों में गूँजती हैं वो बातें
जो तुमने कभी नहीं कही
और मैं सुनती हूँ एकांत में हवा की पत्तियों से छेड़खानी 
.................
और हो जाती हूँ सराबोर, उस प्रेम से
जो तुमने मुझसे कभी नहीं किया।“
        आपसी रिश्तों की निरंतरता के लिए संवाद जरूरी है। यदि थोड़ी सी खटपट से इनमें खटास आकर संवाद अवरुद्ध हो जाय तो फिर समझो उन्हें नदी के तट बनते देर नहीं लगती- 
"तुम कह देते तो क्या होता?
कह देने से क्या होता है, सारी दुनिया कहती है
कभी-कभी दो हृदय नदी के तट बन जाते हैं
..................................................... 
और नदी के तट रह जाते हैं
निर्जन, उजाड़"
         कुछ इसी तरह की झलक ’लकीर’ कविता में देखने को मिली- 
"कलम पकड़कर सबसे पहले सीखा था, 
लकीर बनाना, 
और लकीरें जोड़-जोड़कर 
सीखा बनाना अक्षर 
..................................................... 
हमारे बीच कौन सी लकीर सरहद बन गई? 
या फिर ऊपर वाला भूल गया, 
हम दोनों के हाथों में एक-दूसरे के नाम की, लकीर बनाना।"
          निवेदिता की कविताओं में कभी सीधा-सरल वृतांत नजर आता है तो कभी कहीं-कहीं व्यवस्था से उपजी गहन पीड़ा, जो कटाक्ष रूप में देखने को मिलती है-
"प्यार वफा अब मिलना मुश्किल, सबकुछ सौदेबाजी है।
सब लोक यहां पर मोहरे हैं, दुनिया शतरंज की बाजी है।
..................................................... 
चोरों का सरदार ही अक्सर काजी है ......
जिसका जैसा दांव लगे वैसा सौदा पट जाता है,
वक्त किसी के पास नहीं, बस खबरे बासी, ताजी है
और 
         एक अन्य कविता में वह दुनिया में फैले झूठ-फरेब की ओर इशारा करती है कि-
"एक ही किस्सा गांव-गांव और शहर-शहर है
चेहरों और मुखौटों में अब कम अंतर है
..................................................... 
चलते -चलते पांव जल गये इस सहरा में
झूठ कहा था सबने कदम-कदम पे शजर है।"
        वर्तमान परिस्थितियों में आस-पास की दुनिया में संरक्षण का खूब हो-हल्ला है। जबकि वास्तविक संरक्षण तो आदमी का होना चाहिए। इसी को निवेदिता ने ’संरक्षण’ कविता में चुटीले अंदाज में कहा है-
“आजकल सब तरह शोर है बचाओ बचाओ
जमीन को, जंगल को, हवा को, पानी को
बाघ को, इतिहास को, संस्कृति और साहित्य को
नारी और नानी को
बोली और बानी को
किससे?
आदमी से?
और फिर आदमी को भी आदमी से बचाओ।"
       कुछ कविताओ में निवेदिता ने नारी मन की उलझनों को बहुत सरल पर सटीक रूप से अभिव्यक्त किया है। स्वयं से किए गए प्रश्न, दूसरे व्यक्तियों से की गई अपूर्ण अपेक्षाएं और कभी परिस्थितिजन्य उलाहनाएं, यह सब उसकी कविताओं में नजर आती हैं। कहीं-कहीं इन्होंने मन की छटपटाहट को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप से व्यक्त किया है। 'दुनिया’ कविता में उसके समक्ष एक ऐसी ही चुनौती है। जहाँ मानो सारे दर्द एक जगह रखकर भी वह बहुत प्रयास करने के बाद भी जीवन की सुंदरता और कोमलता को शब्दों में संजोने में अपने को असमर्थ है। वे चाहती हैं कि सुंदरता और कोमलता दिखे, लेकिन जीवन के मन को समझने की वजह से वह विफल नजर आती हैं- 
“बहुत बार चाहा मैंने कि फूलों पर लिखूं कविता
लेकिन आंखों के आगे
सड़कों पर भीख मांगते बच्चे आ गए
और शब्द कहीं खो गये।"
         आम किताबी भाषा से दूर निवेदिता की कविताओं में वह जीवन है जो हमारे रोजमर्रा के अनगिनत अनकहे पहलुओं को दोहरता है। 48 स्वादिष्ट व्यंजनों को एक ही थाल में सुघड़ तरीके से परोसने वाली और हर व्यंजन में अलग-अलग स्वाद भरने वाली निवेदिता को कविता संग्रह 'ख्याल' के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मीय शुभकामनाएं।

सभी ब्लॉगर्स एवं पाठकों को कविता रावत की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!



चूहे के न्याय से बिल्ली का अत्याचार भला

चूहे के न्याय से बिल्ली का अत्याचार भला

कानून का निर्णय काले कौए को बरी लेकिन फाख्ता को दोषी ठहराता है
निर्धन के लिए मुसीबत और धनवान के लिए कानून फायदेमंद होता है

मुकदमे में किसान नहीं जमींदार को हमेशा सही माना जाता है
धनवान के लिए एक कानून और निर्धन के लिए दूसरा होता है

एक निर्दोष को दंड देने से दस दोषियों को छोड़ देना भला
दो वकीलों के बीच फंसने से मुकदमा वापस लेना भला

जो दूसरों का बुरा सोचता है उसका अपना बुरा होता है
ईश्वर देर भले ही करे लेकिन अनदेखी नहीं करता है

गीदड़ भाग जाते हैं पर बंदरों को डंडे पड़ते हैं
कानून से अधिक उल्लंघन करने वाले मिलते हैं।

चूहे के न्याय से बिल्ली का अत्याचार भला
अन्यायपूर्ण शान्ति से न्यायपूर्ण युद्ध भला

...कविता रावत

हुए हम घायल प्यार में तेरे

हुए हम घायल प्यार में तेरे

हुए हम घायल प्यार में तेरे
घायल ही हमको रहने दो
जरूरत नहीं मरहम पट्टी की
घाव दिल पर गहराने दो
मुश्किल से बने हम दीवाने
अब हमें होश में मत लाना
कितना सूकूँ है इस प्यार में
बनकर दीवाना समझ जाना

मिले तुम घायल करने वाले
जरा प्यार की हद गुजरने दो
हुए हम घायल प्यार में तेरे
घायल ही हमको रहने दो

छोड़ दी यदि दीवानगी हमने
तो तुम भी घायल हो जाओगे
सोचना प्यारभरी यादों में डूबकर
बनकर दीवाना कैसे रह पाओगे
अच्छी नहीं ज्यादा दीवानगी
कहता कोई तो कहने दो
हुए हम घायल प्यार में तेरे
घायल ही हमको रहने दो

कल तक बेखबर दिल प्यार से
उसे अब प्यार निभाना सीखना है
रहना है जिस दिल में उसे
गहराई उसकी भी नापना है
पहली प्यार की ये दीवानगी
प्यार की उम्रकैदी बनने दो
हुए हम घायल प्यार में तेरे
घायल ही हमको रहने दो
.................................................
आज वैवाहिक जीवन की 22वीं वर्षगांठ पर पहले पहल प्यार में गुजरे प्रेम पातियों से निकली एक पाती प्रस्तुत है  ......कविता रावत

अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं :  रवीन्द्र प्रभात

अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं : रवीन्द्र प्रभात

           कहा गया है, कि साधना जब सरस्वती की अग्निवीणा पर सुर साधती है तो साहित्य की अमृतधारा प्रवाहित होती है, जिससे हित की भावनाएं हिलकोरें मारने लगती है । इन हिलकोरों में जब सृजन की अग्नि की धाह आंच मारती है तो वह कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। सही मायनों में इसी को कविता कहते हैं। मुझे खुशी है कि कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता' में ये सारे भाव मैंने महसूस किए हैं।
         कविता रावत अपनी कविताओं में कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। कविता रावत की कविता रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच कविता की कविता शाश्वत एवं चिरंतन है।
          कविता रावत की कुछ कवितायें मन-मस्तिष्क को आंदोलित करती है, जैसे संगति का प्रभाव,  दुर्जनता का भाव,  वह राष्ट्रगान क्या समझेगा,  भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है,  अभिमान ऐसा फूल है जो शैतान की बगिया में उगता है, बुरी आदत,  गरीब,कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है,  हाय पैसा! हाय पैसा.... आदि।
कविता रावत की कविताओं में शब्द-शब्द से दर्शन टपकता नज़र आता है। शायद उन्हें इस बात का भान होगा कि कविता में जीवन दर्शन नहीं हो तो वह निष्प्राण है। कुछ कवितायें तो पत्थरों में भी प्राण-प्रतिष्ठा करती नज़र आती है, जो इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। संग्रह की कुछ कवितायें जीवन के प्रति एक गहरी आसक्ति, ललक अर्थात रागधर्मी जीवनोंमुखता व रोमांटिक नवीनता का आभास कराती है । 
          यह संग्रह वास्तव में प्राणवान कविताओं की पुष्पांजलि है जिसे कविता रावत ने पूरे मनोयोग से सजाकर माँ सरस्वती की अग्निवीणा को समर्पित करने का प्रयास किया है। यह संग्रह पठनीय ही नहीं सहेजकर रखने योग्य भी है।
         अपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने की दक्षता के साथ ब्लॉग पर शब्दों,लोकोक्तियों व मुहावरों की सामर्थ्य एवं सीमा का सूक्ष्म संधान करने वाली कविता रावत की लघु काव्य कृति ' लोक उक्ति में कविता  के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मिक शुभकामनायें।
रवीन्द्र प्रभात
प्रधान संपादक: परिकल्पना समय(मासिक)

अनुक्रमणिका

1.   संगति का प्रभाव                                                           
2.   दुर्जनता का भाव       
3.   तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है                                 
4.   वह राष्ट्रगान क्या समझेगा          
5.   समय                                                                         
6.   भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है
11. उसी के हँसी सबको भली लगे जो अंत में हँसता है            
12. हाय पैसा ! हाय पैसा !  
13. दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है               
14. दिल को दिल से राह होती है
15. मित्र और मित्रता                                                       
16. दूर-पास का लगाव-अलगाव
17. आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है  
18. दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है
19. बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है         
20. अपने-पराये का भेद
21. भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है                     
22. अति से सब जगह बचना चाहिए
23. हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है                       
24. अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है
25. ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है                       
26. उद्यम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है
27. भोजन मीठा नहीं भूख मीठी होती है                               
28. विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है
29. हर मनुष्य की अपनी-अपनी जगह होती है                       
30. दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं
31. सच और झूठ का सम्बन्ध                                           
32. समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं
33. दो घरों का मेहमान भूखा मरता है

दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है

दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है

दो काम एक साथ हाथ में लेने पर एक भी नहीं हो पाता है।
बहुत ज्यादा सोच-विचार वाला कुछ भी नहीं कर पाता  है।।

जो कुछ नहीं जानता वह किसी बात में संदेह नहीं करता है।
जो अधिक जानता है वह कम पर भी विश्वास कर लेता है ।।

जो जल्दी विश्वास कर लेता है वह बाद में पछताता है ।
समझदार आदमी हर मामले में समझदार नहीं होता है ।।

कमजोर काठ को अक्सर कीड़ा जल्दी खा जाता है ।
दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है ।।  
क्या दीवाली लक्ष्मी जयन्ती है?

क्या दीवाली लक्ष्मी जयन्ती है?

एक मान्यता के अनुसार दीपावली ‘लक्ष्मी जयन्ती’ अर्थात् लक्ष्मी के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। निश्चित ही यह कल्पना अर्वाचीन है, क्योंकि प्राचीन देवताओं की जयन्ती या जन्मदिन की अवधारणा वैदिक काल में नहीं थी। लक्ष्मी एक वैदिक देवता है जो मूलतः भूदेवी या पृथ्वी का प्रतीक थी। इन्द्र और वरुण आदि वैदिक देवों की जयन्ती जिस प्रकार नहीं मनाई जाती उसी प्रकार लक्ष्मी के भी जन्मदिन का प्रश्न नहीं उठता। किन्तु बाद के समय में इस दिन लक्ष्मी के जन्म होने की कल्पना विकसित हुई हो सकती है। इसके आधार क्या रहे होंगे, इस पर विचार किया जाए तो कार्तिक कृष्ण अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी की उत्पत्ति की कल्पना के मूल में निम्नलिखित वैज्ञानिक तथ्य विचारणीय है-
           लक्ष्मी, चन्द्रमा आदि चतुर्दश रत्न समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए, ऐसा माना जाता है। समुद्र मंथन की तिथि क्या रही होगी, इसका उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाला ज्वार वर्ष भर के सबसे बड़े ज्वारों में से एक है। इस समय विशाल समुद्र के जल का विक्षुब्ध होना, कोलाहल सहित लहरों का उत्थान-पतन समुद्रमंथन का ही दृश्य उपस्थित करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने इसी आधार पर प्राचीन मान्यताओं का विश्वलेषण करते हुए बताया था कि संभव है, हमारे पौराणिक युग में समुद्र मंथन की कल्पना उन्हीं भयंकर ज्वारों को देखकर की गई हो। रूपकप्रिय वैदिक ऋषियों और पुराणकारों ने इसी रूपक के लेकर सूर्य आदि देवताओं द्वारा मथे जाने वाले समुद्र की कल्पना की हो और इस समुद्र मंथन के दूसरे ही दिन निकले वाले चन्द्रमा को (जो कार्तिक शुक्ल द्वितीया को निकलता है) समुद्र मंथन से उत्पन्न माना हो यह स्वाभाविक है। चन्द्रमा की बहिन लक्ष्मी भी (पृथ्वी का प्रतीक) समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई मानी जाती है, इसलिए कार्तिक कृष्ण अमावस्या को लक्ष्मी जयन्ती मानना भी इसी दृष्टि से सुसंगत लगता है।
          पुराणों में लक्ष्मीपूजा के अलावा दीवाली के दिन दीपक जलाने का जो विधान मिलता है उसका भी एक समाज-वैज्ञानिक पक्ष उन्होंने स्पष्ट किया है। जिस प्रकार बरसात में आई अस्वच्छता को दूर कर सफाई और घरों की लिपाई-पुताई का विधान मिलता है उसी प्रकार न केवल घरों में बल्कि देवालयों में ‘दीपवृक्ष’ समर्पित करने तथा बाजारों और सार्वजनिक स्थानों में दीप पंक्ति रखने के विधान का स्पष्ट आश्य यही है कि गृहस्वामी अपने घर को हर प्रकार से जगमगाने से भी अधिक महत्व सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश करने को दें। यमत्रयोदशी से लेकर दीवाली तक चौराहों, गलियों और रास्तों में दीप जलाने को विशेष महत्व दिया जाता है। सामान्यतः व्यक्ति जिन स्थानों पर दीपक नहीं जलाता, वहां भी इस दिन दिए जलाये जाएं, यही इस परम्परा का उद्देश्य प्रतीत होता है।      "पर्व पारिजात से साभार"
सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!