कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

आपस में कोई बैर भाव न रहे
न रहे कोई जात-पात का बंधन
हर घर आँगन में बनी रहे खुशहाली
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

तोड़कर नफरत भरी सब दीवारें
बस एक भाव रहे, वह हो प्रेमबंधन
ऊँच-नीच का भाव मिटे जहाँ से
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

श्रेष्ठता सवर्धन के हों प्रयास
और निकृष्टता का हो उन्मूलन
मिटे संकीर्ण स्वार्थपरता का भाव
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

अन्तःकरण से सदभाव उपजकर
सद्ज्ञान, सदाचरण का हो जतन
मिटे बुद्धिबल, धनबल घमंड जहाँ से
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

उछ्रंखलता उद्धत उदंड न बने कभी
न हो कभी शालीनता का शमन
अवांछनीयता, अनैतिकता न हो हावी
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

मरुस्थली अन्तःस्थल में भरें संवेदना
सहयोग, त्याग, उदारता से भर जाय मन
परस्पर विरोध-विग्रह दूर हों सभी के
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

बीज सा गलकर फिर बने वृक्ष
धरकर परमार्थव्रत करें नवसर्जन
समभाव दिखे सबको दुःख-सुख
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

Kavita Rawat
वक्त बदलेगा जरुर

वक्त बदलेगा जरुर


मेहनत करना बहुत अच्छी बात है और अपनी- अपनी जगह सभी मेहनत करते हैं लेकिन उसका फल किसको कितना मिले, यह सब भाग्य पर निर्भर करता है. कर्म के साथ यदि भाग्य जुड जाता है तो मन मुताबिक फल मिल ही जाता है लेकिन यदि भाग्य विमुख हो तो आशातीत सफलता नहीं मिलती. कई लोगों की किस्मत में खूब मेहनत करना ही लिखा रहता है और वे मेहनत करते रहते हैं इसी आशा में कि कभी न कभी तो उनका भी वक्त आएगा, उनकी भी अपनी सुबह होगी .........

सुबह घर से निकलती हूँ उम्मीदों के पर लगाकर
शाम को गुम सी हो जाती हूँ दिनभर के अंधियारों में
रात को खो जाती हूँ जिंदगी के सुनहरे सपनों में
दिनभर भटकती फिरती हूँ धुंधभरी गलियारों में
न कहीं दिल को सुकूँ मिलता और न दिखता आराम
पता नहीं कब हो जाती सुबह कब ढल जाती शाम
वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
पर वह वक्त आएगा कब यह सपना सा दिखता है

copyright@Kavita Rawat
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी



देश में एक ओर जहाँ शांतिप्रिय श्रीरामजी ने राज किया
वहीँ दूसरी ओर अत्याचारी घमंडी रावण ने भी राज किया
दोनों ओर ही थे धुरंधर यौद्धा और थे निपुण धनुषधारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

देश में राज्य पहले भी थे जिनके राजा आपस में लड़ते-रहते थे
स्व राज्य विस्तार के महालोभ में ये आपस में मार-काट करते थे
चाटुकारी स्वामिभक्तों के बीच छुटपुट हुआ करते थे परोपकारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

अंग्रेज आये थे व्यापार करने पर शोषण कर नाक में कर गए दम
तब देश में देशप्रेमी मौजूद थे जो दरिंदों को भागने में हुए सक्षम
वे दुष्ट गए तो गए टुकड़े कर देश में रोष व्याप्त कर गए भारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

आज भी देश में जगह-जगह अशांति के बादल छाते जा रहे हैं
कोई रावण तो कोई द्रुयोधन बनकर देश को अशांत कर रहे हैं
शांतिदूत मूक बन बैठते जब अशांति का तांडव मचता है भारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

राजनेता देशप्रेम का मुखौटा ओढ़कर अपने लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं
कोई पहन रहा घोटालों का ताज तो कोई भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ रहे हैं
जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर- गरीब का भेदभाव अब तक है जारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

copyright@Kavita Rawat
फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं

फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं



अक्सर एकाकीपन ही मुझे अच्छा लगता
अपनेपन से भरा साथ मिले किसी का
जैसे यह दिखता कोई सुन्दर सपना है
अपने पास तो आंसू ही शेष ऐसे दिखते
जो वक्त-बेवक्त साथ देते अपना है
न होंठों पर खिलकर हंसीं आ पाई कभी
न शायद मुस्कान कभी लौट सकती है
हँस-हँस कर ही जीना जिंदगी है
ये अक्सर मुझसे मेरी वेदना कहती है
ये जिंदगी नहीं उदास रहने की
तू हरदम क्यों उदास हो जाती है
दुःख में भी मुस्कराना सीख ले
ये दुखभरी घड़ियाँ अक्सर कहती है
पर खुशियाँ तू अबतक नसीब न हुई
सिर्फ देखती आयी हूँ सुनहरे सपने
होता गम अगर सीने में कुछ कम
तो छुपा लेती उसे सीने में अपने
दर्द छुपाना चाहा मैंने हरदम
पर पीड़ा कुछ कम होती नहीं
हँसना चाहती हूँ मैं भी जीभर कर
पर होंठों तक मुस्कान आती नहीं
ख़ुशी तो मिलती है जिंदगी में मगर
हर राह मिलती मुझे टेढ़ी है
बातें जो जख्मी कर जाते दिल को
फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं

copyright@Kavita Rawat
दूर-दूर न जाओ इस कदर

दूर-दूर न जाओ इस कदर



जिंदगी की भागदौड़ के बीच अब कालेज की दिन सपने जैसे दिखाते हैं, तब कालेज से निकलने के बाद जिंदगी किस दिशा को मुड जायेगी, शायद ही कोई जान पाया हो. अलग-अलग मिजाज के दोस्त जब कालेज छोड़कर अपनी घर-गृहस्थी की दुनिया में रच-बस जाते हैं तो कभी कई वर्ष बाद मिलने पर यकायक यकीन ही नहीं होता की ये वही दोस्त हैं, जो कभी कालेज में साथ पढ़ते थे ...... बहुत कुछ बदले-बदले नज़र आते है सभी ........ कालेज की एक दोस्त के अनुरोध पर कि उसे भी कालेज फेयरवेल में कुछ बोलना है, मैंने एक कविता लिख कर दी, जिसे उसने फेयरवेल के दिन सुनाया तो उसकी सभी ने खूब तालियाँ बजाकर तारीफ़ की. फेयरवेल समाप्ति पर वह मुझसे मिली और कहने लगी कि मुझे नहीं मालूम था की तेरी लिखी कविता को सभी इतना पसंद करेंगे, तू लिखती रहना, मुझे भी लगता है तू अच्छा लिख सकती है..........यह सुनकर मुझे भी अच्छा लगा की चलो कवितायेँ भी कुछ अवसरों पर सबको अच्छी लगती है ......... आज उसी अवसर की कविता कालेज की दिन याद कर प्रस्तुत कर रही हूँ ..... शायद कोई कालेज का दोस्त भी पढ़कर अपने कालेज के दिन याद कर कुछ पल के लिए ही सही खुश हो ले.........


हमने लिखे कुछ गीत
तुम्हे सुनाने को
सोचा था
तुम मिलोगे किसी डगर पर
जहाँ दिल खोलकर बातें करेंगे
कुछ अतीत की, कुछ वर्तमान की और कुछ भविष्य की
पर सोचा था जो हमने
सोचते ही रह गए
हमारे वे प्यार भरे गीत
सब बेसुरे हो गए
तुम मिले हमें जरुर
पर उस राह पर
जहाँ दिल घवराया
कुछ न कह पाया
सिर्फ घडकन ही तेज होती रही
बात जो होनी थी तुमसे
जुबां पर आकर अटकती रही
अब तुम्हें कैसे बताऊँ
कि वे सब गीत बेसुरे हो चुके हैं
वे ख्वाब जो मिलकर देखे थे हमने
वे हकीकत न बन सके हैं
अरे वो उजाड़ के साथी!
क्यों न आबाद कर लेते घर
अभी समाये हो दिल में
दूर-दूर न जाओ इस कदर
दूर-दूर न जाओ इस कदर

copyright@Kavita Rawat
अहसास की पाती

अहसास की पाती



30 नवम्बर को मेरी शादी की 14वीं सालगिरह है. इस अवसर पर हम विशेष धूमधाम तो नहीं, परन्तु हाँ बच्चों के साथ यही भोपाल में केरवा डैम (पिकनिक स्थल) या फिर बड़े तालाब के किनारे घूमने जरुर जाते हैं. इस बार सोचा कि चलो ब्लॉग परिवार के साथ ही इस सालगिरह को मनाकर देखा जाय, नया अनुभव होगा. इस अवसर पर मैं अपनी एक छोटी रचना जो मैंने अभी मार्च माह में जब मैं ऑफिस ट्रेनिंग से एक सप्ताह के लिये मसूरी गयी थी तब घर पर मेरे पति को छोटे-छोटे दोनों बच्चों को सँभालने का जिम्मा आ पड़ा. फिर क्या! रोज फ़ोन पर अपने और बच्चों की बात होती रहती थी, उनकी इसी मनोदशा को भान कर मैंने उनके ही शब्दों को कुछ इस तरह पिरो दिया ...........

तू नहीं है पास
कैसे बताऊँ तुझे
मन है बहुत उदास
बिखरा-बिखरा सा यह घर लगता
सिमटा-सिमटा सा आकाश
तू नहीं .........

बेटी तो रो-रोकर कह रही है
माँ कि बहुत याद आ रही है
पर बेटा तो बहुत मस्त है
मैं भी मसूरी जाऊंगा
एक ही रट लगाये रहता है
बच्चे तो बच्चे पल भी भूले-याद करे
उन्हें कहाँ मुझसा अन्तरंग अहसास
तू नहीं ...........

थकाहारा जब मैं पहुँचता घर
मैं चिंतित पर बच्चे बेखबर
घर कुछ खाली-खाली सा लगता है
हर घडी दिल तुझे पास बुलाता है
हरपल होता इस दूरी का अहसास
तू नहीं ...............

अब देर नहीं जल्दी से घर आ जाओ
हाल मेरा सुनकर अपना भी सुनाओ
अपने घर में ही होता है सुखद अहसास
तू नहीं .............

अब बच्चों के वास्ते .................


एक दिन जब मेरा छोटा बेटा जब वह ३ साल का था तो वह घर कि दीवार और फर्श पर चाक से रंग रहा था तो मेरी बेटी यह देख मेरा हाथ पकड़कर मुझे उसकी यह करतूत देखकर कहने लगी. देखो मम्मी ! भैया ने कितनी गोदागादी कर दी है, आप इसे भी मेरे साथ स्कूल क्यों नहीं भेजती? बड़ा हो गया है यह! स्कूल जायेगा तो ये ये गोदागादी सब भूल जायेगा! इसे अवसर पर मैं एक छोटी कविता लिखी. आज इस अवसर पर प्रस्तुत कर रही हूँ. आशा है आप लोगों को भी अच्छी लगे.............

ABCD सिखला दो .........

मम्मी देखो! पापा देखो!
भैया मेरा बड़ा हुआ
देखो जरा दीवार तो देखो
इसने कितना गोद दिया
जाकर बाज़ार से इसके लिए
स्लेट-बत्ती ला दो
पकड़कर हाथ इसका
ABCD सिखला दो
रात को जल्दी सुलाकर इसे
सुबह जगाना न जाना भूल
मेरे संग-संग मेरा भैया भी
अब जायेगा स्कूल

Copyright@Kavita Rawat
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है

नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है


जब मन उदास हो, राह काँटों भरी दिखाती हो, आस-पास हौंसलापस्त करते लोगों की निगाहों घूरती हों, जो सीधे दिल पर नस्तर सी चुभ रही हों ऐसी परिस्थिति में दुःख किससे बांटें कहाँ सूझता है?
हताशा, निराशा के क्षणों में उपजी मेरी यह कृति देखआज भी मैं सोचती हूँ कि ईश्वर किसी भी प्राणी को दुःख न दें, और अगर दें भी तो उसे किसी का भी दया पात्र बनाने से वंचित रखें, उसे इतनी शक्ति अवश्य दें कि वह अपना स्वाभिमान हर परिस्थिति में बचाए रखने में सक्षम बना रहे ...........

पथरीली, संकरी राह में भटक रही ये जिंदगी
ओझल मंजिल लगता कदम-कदम पर फेरा है
जब- जब भी दिखा उगता सूरज ख़ुशी का
तब-तब मुझको गहन तम ने आकर घेरा है

हरतरफ वीरान पहाड़ियों से घिरी हूँ मैं
इर्द-गिर्द कंटीली झाड़ियाँ उगने लगी है
बचा पास मेरे एक धुंधला सा दर्पण
वह भी अब छोर- छोर से चटकने लगी है

चलती हैं मन में कभी तूफानी हवाएं
कभी इर्द-गिर्द काली घटायें घिरती हैं
कसते देख व्यंग्य मुस्कान किसी की
सीने में शूल सी चुभने लगती हैं

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है.

Copyright@Kavita Rawat
दुर्जनता का भाव

दुर्जनता का भाव


समाज में व्याप्त उन प्राणियों से कैसे और कितने सुधार की उम्मीद की जा सकती है, जिनका स्वभाव ही दुर्जनता से भरा हो, जो अपनी आदत से मजबूर होकर समय-असमय अपनी वास्तविक छबि दिखाने से बाज नहीं आते हैं. ऐसे प्राणियों की अपने समाज में भरमार है आज ....
इनसे कैसी और कितनी उम्मीद रखते है आप .......



सांप को चाहे जितना ढूध पिलाओ वह कभी मित्र नहीं बनेगा
आग में गिरे बिच्छू को उठा लेने लें तो वह डंक ही मारेगा

गड्ढे में गिरे हुए कुत्ते को बाहर निकालो तो वह काट लेगा
भेड़िये को चाहे जितना खिलाओ-पिलाओ वह जंगल भागेगा

गधे के कान में घी डालो तो वह यही कहेगा कान मरोड़ते हैं
तोते को जितना भी प्यार से रखो वह मौका देख उड़ जाते हैं

काला कौआ पालो तो वह चोंच मारकर ऑंखें फोड़ देगा
खलनायक नायक बना तो वह मौका देख छुरा भोंक देगा

टूटी थाली में जो कुछ भी डालो सब बर्बाद हो जाता है
अज्ञानी मंदिर में बैठकर मंदिर के ही पत्थर उखाड़ता है

बिल्ली ने शेर को सिखाया- पढ़ाया वह उसे ही खाने चला
लकड़ी ने हत्था दिया कुल्हाड़ी को वह उसे ही काटने चला

copyright@Kavita Rawat
लगता पतझड़ सा यह जीवन

लगता पतझड़ सा यह जीवन

आम्रकुन्जों के झुरमुट से
बह रही मंद-मंद पवन
पर उदास मन बैठी मैं
दिखता हरतरफ सूनापन
आम्रकुंजों की देख हरीतिमा तब
कहता मुझसे मेरा पतझड़ मन
छिपा ले हरे -भरे पत्तों में तू भी
अपनी अदृश्य पीड़ा सघन
हरे -भरे पत्तों के बीच बैठी कोयल
क्यों मधुर गीत सुनाती है!
मेरे सूने मन खंडहर में आकर
क्यों सोए अरमान जगाती है

पतझड़ मन से झर- झर झरती पत्ती
लगती जीवन डाली सूनी खाली
हरतरफ आवाज झनकती झींगुरों की
जीवन डाल पर बुनती मकड़ी जाली

यूँ ही बीत रहे जीवन के पल-पल
कभी लगता वीरान यह अंतर्मन
आता वसंत कब पता न चलता
लगता पतझड़ सा यह जीवन


        मन के घोर निराशा के क्षण में जब चाह तमन्नाओं की निरंतर धारा प्रवाहित होने लगती है, तब कहाँ कुछ भी अच्छा लगता है! ये सुन्दर प्रकृति भी वीरान, सुनसान लगने लगाती है. अवसाद भरा मन सबसे दूर भागता है और अपने ही दुःख में डूबा इंसान खुद से बातें करता, खुद को समझाता रहता है, जिससे वह सारी दुनिया से कटकर रह जाता है. वह मन में ऐसी धारणा बिठा लेता है कि यही दुनिया तो उसके दुःख का कारण है!
        ऐसे ही अवसाद के क्षणों में रची मेरी यह रचना भले ही वर्तमान परिदृश्य में अप्रासंगिक हो चली हो, लेकिन यह मुझे उन क्षणों की याद दिलाकर मुझमे ऊर्जा का संचार करती है और मैं डटकर आज विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने में अपने को सक्षम पाती हूँ. आज मैं यह कदापि नहीं चाहती हूँ कि किसी इंसान पर उसका दुःख हावी हो और वह उसी में डूबकर अपने आप को इस संसार से अलग-थलग समझने की भूल कर अपना संसार बर्बाद कर दे. आज इसी वजह से मैं जब कभी, जहाँ कहीं भी किसी भी इंसान को इस दशा में देखती हूँ तो मैं उसे इससे उबारने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहती हूँ, ताकि वह भी जीवन को सच्चे अर्थ में लेकर जीवन जीने का आशय समझ सके............ कविता रावत 
भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है

भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है




सुना होगा आपने कभी एक कल्पतरु हुआ करता था
जिसके तले बैठ मानव इच्छित फल को पाता था
इच्छा उसकी पूर्ण होती, वह सुख-चैन से रहता
जो भी इसके तले बैठता, वही ख़ुशी से झूमता
क्या आधुनिक युग में भी कहीं ऐसा वृक्ष होगा?
जो हमें मन वांछित फल दे सकेगा!
आप कहोगे कल्पतरु अब नहीं, जो सपने करे साकार
मैं कहती हूँ वह वृक्ष व्याप्त है, नाम है उसका भ्रष्टाचार
यह ऐसा वृक्ष है जिसकी शीतल है छाया
जो भी तले बैठे इसके, उसी ने पायी माया
इसकी जड़ें होती गहरी, यह उखड़ नहीं पाता
जो भी यत्न करता वही सदा पछताता
जो भी जड़ें जकड़ता इसकी, इच्छित फल वह पाता
जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल बजता
कामधेनु है यह जिसका दूध सफ़ेद नहीं है काला
जो सर्व प्रचलित है, उसी का नाम है घोटाला
आत्मा तन से निकलती, यह धर्मशास्त्र है कहता
भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है, यह मानव शास्त्र कहता
विराट कल्पतरु का रूप ले चुका है भ्रष्टाचार
इसीलिए यही बन बैठा है आज का शिष्टाचार।

             वर्तमान समय की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते नैतिक मूल्यों के गिरावट के परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार ने जिस तेजी से अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं, उससे सबको लगने लगा हैं कि इसे समूल नष्ट कर पाना बहुत टेढ़ी खीर है. देश में व्याप्त कुटिल राजनीति, नौकरशाही, बेरोजगारी, भुखमरी, अल्प वेतन कि समस्या, दंड विधान की ढिलाई, पूँजी संग्रह और अर्थोन्माद की प्रवृति ने लोगों की मानसिकता, सोच-विचार और व्यवहार की स्वच्छता के मूल्य को ही कुंद कर दिया है.
             वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्वरुप को उदघाटित करने का मेरा यह लघु प्रयास कहाँ तक सफल हो पाया है, यह आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होगा ................


copyright@Kavita Rawat
धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता

धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता


मन को पहुँचा कर आघात
वे अक्सर पूछ लेते हैं हाल हमारा
'कैसे हो'
मृदुल कंठ से
दिल कचोट जाने वाली
कुटिल भावना के साथ
यकायक मन में मच जाती तीव्र हलचल
शांत मन में जैसे आ गया हो तूफां
अशांति का तांडव मच जाता
जैसे उफनती नदी का शोर कल-कल, छल-छल
शांत मन में कैसी ये उथल-पुथल!
बड़े ही उदार दिखते हैं ऐसे लोग
जो पहले दिल पर वार करते हैं
और फिर अपनापन जताकर
सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनाने का ढोंग कर
बड़ी बेशर्मी से
हाल चाल भी पूछ लेते हैं
धन्य है! उनकी यह धृष्टता
और धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता!

Kavita Rawat
दाम करे सब काम

दाम करे सब काम



दाम करे सब काम
पैसा मिलता घोड़ी चलती
पार लगावे नैया
बाप बड़ा न भैया
सबको प्यारा है रुपैया!
मेला लगता उदास
जब पैसा न होता पास
ठन-ठन गोपाल का
कौन करता विश्वास!
वह भला मानस कैसा!
जिसकी जेब में न हो पैसा
कौन बैठता उसके पास
मुखड़ा जिसका दिखता उदास
बिन कर, पग, पर उड़ता-फिरता
अजब- गजब रंग दिखाता है पैसा
कब किस को, कितना उठावे-गिरावे
बिन बोल, सर्वत्र बोल रहा है पैसा!

Kavita Rawat
जरुरी तो नहीं

जरुरी तो नहीं

-->
देखकर दिल दहला जाने वाला मंजर
हर किसी का दिल दहल जाय
जरुरी तो नहीं
देखकर सुन्दर] मनोरम दृश्य कोई
सबके मन को सुकूं मिल जाय
जरुरी तो नहीं
उसका दिल पिघलता है बर्फ की तरह
सबके लिए पिघल जाय
जरुरी तो नहीं
लोहे जैसा मजबूत दिल रखता है वह
पर सबके लिए मजबूत हो
जरुरी तो नहीं
माना कि उनकी बातें होती हैं असरदार
पर सब पर हो जाय असर
जरुरी तो नहीं
उनकी बातों में कितनी गहराई] सच्चाई है
सबको आईना सा दिख जाय
जरुरी तो नहीं

कविता रावत
आओ  मिलकर   दीप  जलाएं

आओ मिलकर दीप जलाएं

आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं
रह न जाय अँधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना
सदा ऐसा कोई दीप जलाते रहना
हर घर -आँगन में रंगोली सजाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

भेदभाव, ऊँच -नीच की दीवार ढहाकर
आपस में सब मिलजुल पग बढायें
पर सेवा का संकल्प लेकर मन में
जहाँ से नफरत की दीवार ढहायें
सर्वहित संकल्प का थाल सजाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं.


Kavita Rawat
असहाय वेदना

असहाय वेदना

वो पास खड़ी थी मेरे
दूर कहीं की रहने वाली,
दिखती थी वो मुझको ऐसी
ज्यों मूक खड़ी हो डाली।
पलभर उसके ऊपर उठे नयन
पलभर नीचे थे झपके,
पसीज गया यह मन मेरा
जब आँसू उसके थे टपके।
वीरान दिखती वो इस कदर
ज्यों पतझड़ में रहती डाली,
वो मूक खड़ी थी पास मेरे
दूर कहीं की रहने वाली।।
समझ न पाया मैं दु:ख उसका
जाने वो क्या चाहती थी,
सूनापन दिखता नयनों में
वो पल-पल आँसू बहाती थी।
निरख रही थी सूनी गोद वह
और पसार रही थी निज झोली
जब दु:ख का कारण पूछा मैंने
तब वह तनिक सहमकर बोली-
'छिन चुका था सुहाग मेरा
किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी
दूर कहीं की रहने वाली।।

Copyrigt@Kavita Rawat, Bhopal २३ फरवरी २००९
इंसानियत भूल जाते जहाँ

इंसानियत भूल जाते जहाँ

तीज त्यौहार का शुभ अवसर
मंदिर में बारंबार बजती घंटियाँ
फल-फूलों से लकझक सजे देवी-देवता
पूजा-अर्चना हेतु लगी लंबी-लंबी कतारें
रंग-बिरंगे परिधानों में सजेधजे लोग
बड़े मग्न होकर सेवा करते अपने अर्घ्य देवों की
चढ़ाते अनेक पकवान, फल-फूलादि
अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार।
वहीं मंदिर के द्वार पर मुरझाए
सड़े-गले चीथड़ों में लिपटी छोटी-बड़ी जानें
अपनी गिद्ध दृष्टि जमाए बाहर आने वालों पर
कि कहीं कोई मुँह फेर कर सामने से निकल न जाएँ
और वे भगवान के प्रसाद से चूक न जाएँ।
पर जब प्रसाद तक नसीब नहीं होता उन्हें
तो कोसते हैं वे अपने-अपने भाग्य को
और सराहते हैं उन कुत्तों के भाग्य को
जो बेझिझक, बेरोक-टोक उठा ले जाते हैं
चढ़ावा देवी-देवताओं का
सगर्व जैसे अधिकार भाव से
और लाकर पास उनके खाते हैं बड़े चाव से
मजाल क्या उनकी जो छीन लें वे उन्हीं से!
जब देखते हैं वे उन्हें अपनी भुखमरी निगाहों से
तो वे भी घूरते हैं उन्हें जैसी निकृष्ट दृष्टि से
और फिर जैसे घुड़ककर खबरदार करते हुए
उन्हें बताना चाहते हैं-
कि तुम इंसान होकर भी इतने गए गुज़रे हो गए हो
कि जो भीख माँगने भगवान के द्वार तक चले आते हो
अरे कौन इंसान तुम्हें भला भीख देगा वहाँ
करके भगवान की पूजा इंसानियत भूल जाते जहाँ!

Copyright@Kavita Rawat, Bhopal, २३ फरवरी २००९
लाख बहाने

लाख बहाने

लाख बहाने पास हमारे
सच भूल, झूठ का फैला हर तरफ़ रोग,
जितने रंग न बदलता गिरगिट
उतने रंग बदलते लोग।

नहीं पता कब किसको
किसके आगे रोना-झुकना है,
इस रंग बदलती दुनिया में
कब कितना जीना-मरना है।

नहीं अगर कुछ पास तुम्हारे, तो देखो!
कोई कितना अपना-अपना रह पाता है,
अपनों की भीड़ में तन्हा आदमी
न रो पाता न हँस पाता है।

फेहरिस्त लम्बी है अपनों की
हैं इसका सबको बहुत खूब पता,
पर जब ढूँढ़ो वक्त पर इनको
तो होगा न कहीं अता-पता
होगा न कहीं अता-पता

Copyright@Kavita Rawat, Bhopal
इससे पहले कि

इससे पहले कि

इससे पहले कि कोई आप से तुम और तुम से तू पर आकर
अपनी कोई दिल बहलाने की चीज़ समझ बैठे
संभल जाना
इससे पहले कि कोई अपनी मीठी बातों में उलझा कर
गलत राह पर चलने को मजबूर करने लगे
नीयत समझ लेना
इससे पहले कि कोई घर में गलत इरादों से घुसकर
आपस में फूट डालने की बातें करने लगे
परख कर देखना
इससे पहले कि घर में कोई भेदिया बनकर घुस जाय
सूझ-बूझ से काम लेना
इससे पहले कि किसी की कोई बात बुरी लगने लगे
बातों पर अपनी ध्यान देना
इससे पहले कि कोई अपमान करने पर तुल जाय
सबका मान रखना
इससे पहले कि कोई टाइम पास पीस समझ बैठे
समय देख चलना
इससे पहले कि कोई परिवार से अलग करने कि सोचे
परिवार पर ध्यान देना
इससे पहले कि हर कोई कतरा के चलने लगे
अभिमान न करना
इससे पहले कि भीड़ का हिस्सा मात्र बन बैठे
अलग पहचान रखना
इससे पहले कि जिंदगी उलझनों से घिर जाय
जिंदगी आसान रखना
इससे पहले कि कोई नफरत भरी निगाहों से देखें
संभल कर चलना
इससे पहले कि कोई मंजिल की राह से भटका दे
आंखे खुली रखना
इससे पहले कि दुनिया में कहीं बदनाम न हो जायं
हरतरफ नज़र रखना
इससे पहले कि कभी अपनी ही नज़रों में गिर जायं
फ़ूक-फूक कर कदम रखना

         आज जहाँ लोग कहते हैं की समय नहीं मिल पाता है वहीँ यह भी देखा जाता है कि लोग किस तरह से अपना टाइम पास करते रहते हैं। अपने परिवार वालों के लिए भले ही समय न हो लेकिन बाहर घंटों मोबाइल या फ़ोन पर बतियाते फिरते है, इतना कि आस पास कि सुध भी नहीं रहती है. इन्टरनेट को ही ले लीजिये इसमें इतनी अच्छी जानकारी होने के बाद भी आज की युवा पीढ़ी जिस तरह से अपना समय आपस में बर्बाद करते दिखते हैं, उससे उनकी सोच कुंद होती दिखाई देती है. जिस तरह से इन्टरनेट का दुरपयोग हो रहा है, यह देखकर दुःख होता है कि क्यूँ कोई अपना कीमती समय फालतू कामों या बातों में लगाकर कहता है कि समय नहीं मिलता, जबकि सत्य तो यही है कि ऐसे लोगों के पास वास्तव में अच्छे कामों के लिए समय कि कमी है. जरा अगर अपने घर परिवार, अपने बारे मैं कभी गौर से देखें तो उन्हें पीछे पछताने कि जरुरत नहीं होगी, बस इससे पहले उन्हें अपना मूल्यांकन खुद करना होगा कि उन्हें क्या करना चाहिए और वे क्या कर रहे हैं. इसी सन्दर्भ में कविता प्रस्तुत हैं.

Copyright @Kavita Rawat, Bhopal, 25 Aug, 2009
समय

समय

पंख होते हैं समय के
पंख लगाकर उड़ जाता है
पर छाया पीछे छोड़ जाता है
भरोसा नहीं समय का
न कुछ बोलता न दुआ सलाम करता है
सबको अपने आगे झुकाकर
चमत्कार दिखाता है
बड़ा सयाना है समय
हर गुथी यही सुलझाता है
बात मानो समय की
हर घाव पर मरहम यही लगाता है
सर्वोत्तम चिकित्सक भी यही है
मगर हर शक्ल भी बिगाड़ देता है
यह ऐसा ऋण है
जिसे कोई नहीं चुका पाता है
समय नहीं झुकता किसी के आगे
आगे इसके सबको झुकना पड़ता है
ये दुनिया समझो साथ उसी की
जो समय देखकर चलता है

Copyright @Kavita Rawat, Bhopal,2009
सबको नाच नचाता पैसा

सबको नाच नचाता पैसा


नाते रिश्ते सब हैं पीछे
सबसे आगे है ये पैसा
खूब हंसाता, खूब रूलाता
सबको नाच नचाता पैसा!
अपने इससे दूर हो जाते
दूजे इसके पास आ जाते
दूरपास का खेल ये कैसा
सबको नाच नचाता पैसा!

बना काम घर लौटे खुश होकर
ओढ़ी चादर सो गये तनकर
तभी देकर पैसा कोई बिगाड़ता काम
देखकर हश्र उड़ती नींद खाना हराम
कम्बख्त किसने ये खेल खेला ऐसा
सबको नाच नचाता पैसा!

छोड़छाड़ कर काम अपना लगे मैच देखने
मार चौका, लगा छक्के लगे एडवाइस देने
पर जब लगता सट्टा या मैच होता फिक्स
फिर कहाँ फोर? कैसा सिक्स!
कमबख्त किसने ये खेल बिगाड़ा ऐसा
सबको नाच नचाता पैसा!

जब तक घुटती आपस में
क्या तेरा क्या मेरा
बस जुबां पर सिर्फ नाम उनका
क्या सांझ! क्या सबेरा!
पर जब चलता लेन-देन होती खटपट
तब जाता भाड़ में सबकुछ सरपट 
फिर संबंध कहाँ रहता पहले जैसा!
सबको नाच नचाता पैसा!
सबको नाच नचाता पैसा!

..कविता रावत