लाख बहाने

लाख बहाने पास हमारे
सच भूल, झूठ का फैला हर तरफ़ रोग,
जितने रंग न बदलता गिरगिट
उतने रंग बदलते लोग।

नहीं पता कब किसको
किसके आगे रोना-झुकना है,
इस रंग बदलती दुनिया में
कब कितना जीना-मरना है।

नहीं अगर कुछ पास तुम्हारे, तो देखो!
कोई कितना अपना-अपना रह पाता है,
अपनों की भीड़ में तन्हा आदमी
न रो पाता न हँस पाता है।

फेहरिस्त लम्बी है अपनों की
हैं इसका सबको बहुत खूब पता,
पर जब ढूँढ़ो वक्त पर इनको
तो होगा न कहीं अता-पता
होगा न कहीं अता-पता

Copyright@Kavita Rawat, Bhopal

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September 20, 2009 at 1:12 PM

नहीं पता कब किसको
किसके आगे रोना-झुकना है,
इस रंग बदलती दुनिया में
कब कितना जीना-मरना है।

waah.....sahi saar likha hai

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July 19, 2011 at 7:13 AM

जितने रंग ना बदलता गिरगिट ,उतने रंग बदलते लोग "
बहुत सही तुलना |सुन्दर पोस्ट के लिए बधाई
आशा

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July 19, 2011 at 10:03 AM

सच्चाई को कहती अच्छी प्रस्तुति

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July 19, 2011 at 7:14 PM

जितने रंग न बदलता गिरगिट
उतने रंग बदलते लोग।

एकदम सच....

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ana
October 8, 2011 at 7:59 AM

बहुत सुन्दर पोस्ट ......बधाई

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June 19, 2013 at 2:52 PM

मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
आप की ये रचना 21-06-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।


जय हिंद जय भारत...

कुलदीप ठाकुर...

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June 21, 2013 at 6:18 PM

अपनों की भीड़ में तन्हा आदमी
न रो पाता न हँस पाता है। katu satya ....

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June 24, 2013 at 10:58 AM

बहुत गहन और सुन्दर रचना.बहुत बहुत बधाई...

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