जरुरी तो नहीं - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Sunday, October 25, 2009

जरुरी तो नहीं

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देखकर दिल दहला जाने वाला मंजर
हर किसी का दिल दहल जाय
जरुरी तो नहीं
देखकर सुन्दर] मनोरम दृश्य कोई
सबके मन को सुकूं मिल जाय
जरुरी तो नहीं
उसका दिल पिघलता है बर्फ की तरह
सबके लिए पिघल जाय
जरुरी तो नहीं
लोहे जैसा मजबूत दिल रखता है वह
पर सबके लिए मजबूत हो
जरुरी तो नहीं
माना कि उनकी बातें होती हैं असरदार
पर सब पर हो जाय असर
जरुरी तो नहीं
उनकी बातों में कितनी गहराई] सच्चाई है
सबको आईना सा दिख जाय
जरुरी तो नहीं

कविता रावत

13 comments:

  1. कुछ कड़वे सच को उजागर करती रचना भाषिक बेफिक्री से की गई आत्माभिव्यक्ति, बधाई।

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  2. hamesha kee bhati ek sunder rachana .

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  3. बिल्कुल zaruri नहीं........अपने मन की स्थिति अलग-अलग होती है

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  4. ham sbko pyar krte hai
    sab hme pyar kre jruri to nhi?
    kavita ji bahut hi sundar abhvykti sare jeevan ka nichod aa gya hai is anuthi rchna me .
    abhar

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  5. अच्छा प्रयास है कविता , शुभकामनायें । भगवत रावत जी के परिवार से तो नहीं हैं आप ?

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  6. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

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  7. कल 18/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. सबकी प्रकृति अलग अलग जो है!

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  9. हाथ के पाँचों उंगलिया ही भिन्न है !
    बहुत सुन्दर रचना है
    ...
    आभार आपका ..
    मेरी नई पोस्ट लिए पधारे..

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  10. बहुत ही गजब कह दिया है अपने ...
    बहुत ही सुन्दर .....

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