धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता


मन को पहुँचा कर आघात
वे अक्सर पूछ लेते हैं हाल हमारा
'कैसे हो'
मृदुल कंठ से
दिल कचोट जाने वाली
कुटिल भावना के साथ
यकायक मन में मच जाती तीव्र हलचल
शांत मन में जैसे आ गया हो तूफां
अशांति का तांडव मच जाता
जैसे उफनती नदी का शोर कल-कल, छल-छल
शांत मन में कैसी ये उथल-पुथल!
बड़े ही उदार दिखते हैं ऐसे लोग
जो पहले दिल पर वार करते हैं
और फिर अपनापन जताकर
सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनाने का ढोंग कर
बड़ी बेशर्मी से
हाल चाल भी पूछ लेते हैं
धन्य है! उनकी यह धृष्टता
और धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता!

Kavita Rawat

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October 29, 2009 at 1:36 PM

मन को पहुँचा कर आघात
वे अक्सर पूछ लेते हैं हाल हमारा
'कैसे हो'
मृदुल कंठ से
दिल कचोट जाने वाली
कुटिल भावना के साथ .........isi kutilta ko log apna raham samajhte hain

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October 29, 2009 at 6:31 PM

yahi chalan hai aaj ka.

katu satya ko udghatit karti maulik rachna
achha laga padhkar
aabhar

shubh kamnayen

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October 29, 2009 at 7:07 PM

aajkal ise hee vyavhar kushalata kee bhee sanghya dee jatee hai .

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October 29, 2009 at 8:40 PM

निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

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October 30, 2009 at 5:12 PM

बहुत अच्छी और सच्ची रचना...बधाई...आपको.
नीरज

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October 30, 2009 at 10:05 PM

सही कहा है आपने। मन की बात रख दी आपंने सुन्दरता के साथ

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October 31, 2009 at 8:44 AM

इस कुटिलता से ही दुनिया चल रही है। ऐसा लगने लगा है कि इसने इतनी तेजी से पैर पसारे हैं कि सब कुछ छोटा लगने लगा है। बधाई।

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October 31, 2009 at 9:14 AM

यह अच्छी कविता है लेकिन भाव के अलावा इसे थोड़ी मेहनत कर कविता केशिल्प मे ढालना होगा ताकि लय और प्रवाह दोनो आ जाये एसे एक बार सस्वर पढ़ो पता चल जायेगा कैसे करना है ।

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October 31, 2009 at 11:49 AM

समाज के स्वार्थी और दो मुँहे चरित्रों को दिगंबर करती धारदार कविता,,,,,,,,,,

बारम्बार बधाई !

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October 31, 2009 at 2:56 PM

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October 31, 2009 at 8:59 PM

aaj isi ko pribhashit kar dya gya hai .

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November 2, 2009 at 12:21 PM

जो पहले दिल पर वार करते हैं
और फिर अपनापन जताकर
सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनाने का ढोंग कर
बड़ी बेशर्मी से
हाल चाल भी पूछ लेते हैं
धन्य है! उनकी यह ध्रष्टता
और धिकार है उनकी ऐसी उदारता
बिलकुल सही कहा है ये दुनिया सच मे ऐसी ही है बहुत अच्छी कविता है बधाई

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November 10, 2009 at 8:53 PM

कुटिलता पर करारी चोट. सच को दर्शाती बहुत बहुत सुंदर रचना. बधाई.

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November 11, 2009 at 1:53 AM

कविता जी
मेल के लिए आभार।
अंतरमन का गीत वही
जो तुम भी गाओ
हम भी गाएं
कुछ पीड़ा अधूरी है
तुम सुनो मगर
हम कह न पाएं
सूर्यकांत

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November 18, 2009 at 6:15 PM

बेहतर ढ़ंग से आपने अपने मन की बात कही।

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December 25, 2009 at 5:10 PM

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं. आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

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