भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है




सुना होगा आपने कभी एक कल्पतरु हुआ करता था
जिसके तले बैठ मानव इच्छित फल को पाता था
इच्छा उसकी पूर्ण होती, वह सुख-चैन से रहता
जो भी इसके तले बैठता, वही ख़ुशी से झूमता
क्या आधुनिक युग में भी कहीं ऐसा वृक्ष होगा?
जो हमें मन वांछित फल दे सकेगा!
आप कहोगे कल्पतरु अब नहीं, जो सपने करे साकार
मैं कहती हूँ वह वृक्ष व्याप्त है, नाम है उसका भ्रष्टाचार
यह ऐसा वृक्ष है जिसकी शीतल है छाया
जो भी तले बैठे इसके, उसी ने पायी माया
इसकी जड़ें होती गहरी, यह उखड़ नहीं पाता
जो भी यत्न करता वही सदा पछताता
जो भी जड़ें जकड़ता इसकी, इच्छित फल वह पाता
जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल बजता
कामधेनु है यह जिसका दूध सफ़ेद नहीं है काला
जो सर्व प्रचलित है, उसी का नाम है घोटाला
आत्मा तन से निकलती, यह धर्मशास्त्र है कहता
भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है, यह मानव शास्त्र कहता
विराट कल्पतरु का रूप ले चुका है भ्रष्टाचार
इसीलिए यही बन बैठा है आज का शिष्टाचार।

             वर्तमान समय की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते नैतिक मूल्यों के गिरावट के परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार ने जिस तेजी से अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं, उससे सबको लगने लगा हैं कि इसे समूल नष्ट कर पाना बहुत टेढ़ी खीर है. देश में व्याप्त कुटिल राजनीति, नौकरशाही, बेरोजगारी, भुखमरी, अल्प वेतन कि समस्या, दंड विधान की ढिलाई, पूँजी संग्रह और अर्थोन्माद की प्रवृति ने लोगों की मानसिकता, सोच-विचार और व्यवहार की स्वच्छता के मूल्य को ही कुंद कर दिया है.
             वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्वरुप को उदघाटित करने का मेरा यह लघु प्रयास कहाँ तक सफल हो पाया है, यह आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होगा ................


copyright@Kavita Rawat

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November 3, 2009 at 11:31 PM

आपका सृजनात्मक कौशल हर पंक्ति में झांकता दिखाई देता है।

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November 4, 2009 at 12:54 PM

सही बात है आज भ्रश्टाचार आज कल ्रकत्बीज जैसे दानव की तरह फैल रहा है और हम लोग मूक दर्शक बने रहने के सिवा कुछ भी नहीं कर पा रहे। बहुत अच्छी तरह उठाया है इस मुद्दे को । मेरी बेटी को मेरी चिन्ता है और मेरे लिये दुया है तो मुझे कुछ नहीं होगा ठीक हो रही हूँ कुछ दिन जरा काम कम करूँगी। थक जाती हूँ। बहुत बहुत आशीर्वाद्

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November 4, 2009 at 2:20 PM

भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है,aur ikshayen sursaa kee tarah munh failaye jaa rahi hain ....... isi vriksh ke tale sab baithe hain.......isse bahar nikalne ka raasta apni soch se milega

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November 4, 2009 at 4:52 PM

अपनी बात को बहुत ही स्‍पष्‍टता के साथ तुमने लिखा है मेरी बधाई भी और शुभकामनाएं भी।

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November 4, 2009 at 8:16 PM

aaj ke samaj system ko aaina dikhatee rachana .insaan bhoutikata me itana lupt hai ki aatma to dab gai hai isake bhar tale .
bahut achee rachana .

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November 5, 2009 at 11:59 AM

sach kaha hai aaj bhrashtachaar kalptaru se bhi badaa ho gaya hai .... saari maanavta, niyam, aadarsh, manushyata isme sama gayee hai .... iska vikraal roop sabko leel raha hai ...
bahoot hi gahre bhaav liye vyangatmak shaili mein likhi rachna ....

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November 6, 2009 at 6:57 AM

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
आपने बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है! बहुत बढ़िया लगा!

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November 7, 2009 at 11:01 AM

sabne sahi kaha aapki rachna kabile tarif hai .bahut sundar sandesh .bahut badhiya likha hai .

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November 7, 2009 at 11:54 AM

उपस्‍थि‍त।

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November 7, 2009 at 6:31 PM

मानव जगत के इतिहास में कई बार भ्रष्टाचार इतना या इससे अधिक बढ चुका है, लेकिन सामाजिक नवजागरण के कारण उसका उन्मूलन हो सका था. आज देश की जरूरत एक नवजागरण की है.

सस्नेह -- शास्त्री

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