ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Tuesday, November 3, 2009

भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है





सुना होगा आपने कभी एक कल्पतरु हुआ करता था
जिसके तले बैठ मानव इच्छित फल को पाता था
इच्छा उसकी पूर्ण होती, वह सुख-चैन से रहता
जो भी इसके तले बैठता, वही ख़ुशी से झूमता
क्या आधुनिक युग में भी कहीं ऐसा वृक्ष होगा?
जो हमें मन वांछित फल दे सकेगा!
आप कहोगे कल्पतरु अब नहीं, जो सपने करे साकार
मैं कहती हूँ वह वृक्ष व्याप्त है, नाम है उसका भ्रष्टाचार
यह ऐसा वृक्ष है जिसकी शीतल है छाया
जो भी तले बैठे इसके, उसी ने पायी माया
इसकी जड़ें होती गहरी, यह उखड़ नहीं पाता
जो भी यत्न करता वही सदा पछताता
जो भी जड़ें जकड़ता इसकी, इच्छित फल वह पाता
जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल बजता
कामधेनु है यह जिसका दूध सफ़ेद नहीं है काला
जो सर्व प्रचलित है, उसी का नाम है घोटाला
आत्मा तन से निकलती, यह धर्मशास्त्र है कहता
भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है, यह मानव शास्त्र कहता
विराट कल्पतरु का रूप ले चुका है भ्रष्टाचार
इसीलिए यही बन बैठा है आज का शिष्टाचार।

             वर्तमान समय की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते नैतिक मूल्यों के गिरावट के परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार ने जिस तेजी से अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं, उससे सबको लगने लगा हैं कि इसे समूल नष्ट कर पाना बहुत टेढ़ी खीर है. देश में व्याप्त कुटिल राजनीति, नौकरशाही, बेरोजगारी, भुखमरी, अल्प वेतन कि समस्या, दंड विधान की ढिलाई, पूँजी संग्रह और अर्थोन्माद की प्रवृति ने लोगों की मानसिकता, सोच-विचार और व्यवहार की स्वच्छता के मूल्य को ही कुंद कर दिया है.
             वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्वरुप को उदघाटित करने का मेरा यह लघु प्रयास कहाँ तक सफल हो पाया है, यह आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होगा ................


copyright@Kavita Rawat

11 comments:

  1. आपका सृजनात्मक कौशल हर पंक्ति में झांकता दिखाई देता है।

    ReplyDelete
  2. सही बात है आज भ्रश्टाचार आज कल ्रकत्बीज जैसे दानव की तरह फैल रहा है और हम लोग मूक दर्शक बने रहने के सिवा कुछ भी नहीं कर पा रहे। बहुत अच्छी तरह उठाया है इस मुद्दे को । मेरी बेटी को मेरी चिन्ता है और मेरे लिये दुया है तो मुझे कुछ नहीं होगा ठीक हो रही हूँ कुछ दिन जरा काम कम करूँगी। थक जाती हूँ। बहुत बहुत आशीर्वाद्

    ReplyDelete
  3. भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है,aur ikshayen sursaa kee tarah munh failaye jaa rahi hain ....... isi vriksh ke tale sab baithe hain.......isse bahar nikalne ka raasta apni soch se milega

    ReplyDelete
  4. अपनी बात को बहुत ही स्‍पष्‍टता के साथ तुमने लिखा है मेरी बधाई भी और शुभकामनाएं भी।

    ReplyDelete
  5. aaj ke samaj system ko aaina dikhatee rachana .insaan bhoutikata me itana lupt hai ki aatma to dab gai hai isake bhar tale .
    bahut achee rachana .

    ReplyDelete
  6. sach kaha hai aaj bhrashtachaar kalptaru se bhi badaa ho gaya hai .... saari maanavta, niyam, aadarsh, manushyata isme sama gayee hai .... iska vikraal roop sabko leel raha hai ...
    bahoot hi gahre bhaav liye vyangatmak shaili mein likhi rachna ....

    ReplyDelete
  7. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
    आपने बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है! बहुत बढ़िया लगा!

    ReplyDelete
  8. sabne sahi kaha aapki rachna kabile tarif hai .bahut sundar sandesh .bahut badhiya likha hai .

    ReplyDelete
  9. मानव जगत के इतिहास में कई बार भ्रष्टाचार इतना या इससे अधिक बढ चुका है, लेकिन सामाजिक नवजागरण के कारण उसका उन्मूलन हो सका था. आज देश की जरूरत एक नवजागरण की है.

    सस्नेह -- शास्त्री

    ReplyDelete