नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है


जब मन उदास हो, राह काँटों भरी दिखाती हो, आस-पास हौंसलापस्त करते लोगों की निगाहों घूरती हों, जो सीधे दिल पर नस्तर सी चुभ रही हों ऐसी परिस्थिति में दुःख किससे बांटें कहाँ सूझता है?
हताशा, निराशा के क्षणों में उपजी मेरी यह कृति देखआज भी मैं सोचती हूँ कि ईश्वर किसी भी प्राणी को दुःख न दें, और अगर दें भी तो उसे किसी का भी दया पात्र बनाने से वंचित रखें, उसे इतनी शक्ति अवश्य दें कि वह अपना स्वाभिमान हर परिस्थिति में बचाए रखने में सक्षम बना रहे ...........

पथरीली, संकरी राह में भटक रही ये जिंदगी
ओझल मंजिल लगता कदम-कदम पर फेरा है
जब- जब भी दिखा उगता सूरज ख़ुशी का
तब-तब मुझको गहन तम ने आकर घेरा है

हरतरफ वीरान पहाड़ियों से घिरी हूँ मैं
इर्द-गिर्द कंटीली झाड़ियाँ उगने लगी है
बचा पास मेरे एक धुंधला सा दर्पण
वह भी अब छोर- छोर से चटकने लगी है

चलती हैं मन में कभी तूफानी हवाएं
कभी इर्द-गिर्द काली घटायें घिरती हैं
कसते देख व्यंग्य मुस्कान किसी की
सीने में शूल सी चुभने लगती हैं

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है.

Copyright@Kavita Rawat

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November 20, 2009 at 11:00 AM

कविता क्या बात हैआज मेरी बेटी उदास सी लग रही है। अरे तुम तो बहादुर लडकी हो जब खुद सक्षम हो तो किसी कन्धे की तलाश क्यों? आज कल लोग सिर्फ तमाशा देखते हैं कोई किसी का सहारा नहीं बनता। तुम्हारे सुख मे सब साथ देंगे मगर दुख मे कोई नहीं फिर ऐसे मे अपने हौसले को ही कायम रखना होता है औरत के लिये तो कदम कदम पर ताने उलाहमे ही हैं बस खुद अगर सही राह पर हैं तो किसी की परवाह नहीं करनी चाहिये। बस अपने लक्षय पर निगाह रखो । भौँकने वाले अपने आप ही रास्ता बदल लेंगे। यूँ अगर रचना की बात करें तो बहुत सुन्दर बन पडी है। अपने वज़ूद के लिये लडती एक औरत का अन्तर्दुअन्द साफ झ्लकता है। बहुत बहुत आशीर्वाद। तुम बेटियों का साहस ही तो मेरा साहस है। चलो मिल कर चलते हैं अपने वज़ूद की तलाश मे। बहुत बहुत आशीर्वाद।

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November 20, 2009 at 1:06 PM

एक बार मैंने कहा था....अँधेरे में मंजिल की तरफ जो बढ़ते हैं वे ठोकर खाते हैं, और रौशनी से लोग नसीहतें देते हैं,
बड़ा आसान होता है...........पर ये ठोकरें,ये अँधेरे तोड़ते नहीं, दृढ बनाते हैं !
सही कहा-
दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
उस नमक को मरहम बनाना ये अँधेरे सिखला जाते हैं,
.............
है ना

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November 20, 2009 at 1:12 PM

Nirmala Kapila jee ne aaj to lagata hai mere saare bhavo ,shavdo par poora adhikar hee kar liya .kavita bahut achee hai isame koi shak nahee par har kathin samay me anubhav kiya hoga ki sahane kee shakti apane aap ikaththee ho jatee hai .bahut saaree shubh kamnae
hamaree aapke saath hai .

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November 20, 2009 at 2:47 PM

chalti hai man me kabhi tufaani hawayen........
wah maza aa gaya in panctiyon me kaphi gahraai hai........

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November 20, 2009 at 4:42 PM

इस कविता में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं। कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है । सबल नारी के दर्द को बड़ी कुशलता से उतारा गया है।

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November 20, 2009 at 6:38 PM

सुंदर कविता.... साधुवाद...

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November 20, 2009 at 6:41 PM

इतनी खूबसूरती से आपने हर एक शब्द को बखूबी प्रस्तुत किया है की रचना अत्यन्त उत्तम बन गया है! दिल को छू गई आपकी ये शानदार रचना! इस उम्दा और बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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November 20, 2009 at 7:48 PM

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है....

SACH MEIN ... AISE MEIN BAHUT TAKLEEF HOTI HAI ... PAR BEBAS HOTA HAI INSAAN US VAQT ... ACHEE RACHNA HAI ...

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November 20, 2009 at 8:03 PM

एक बार मैने एक गीत लिखा था उम्र तो 14 साल थी और गीत वार्धक्य पर .." प्रकाश से अन्धकार को बढी जा रही है ये ज़िन्दगी " भोपाल आकाशवाणी से इसे सोहागपुर के मेरे मित्र सोमेश सिटोके ने गाया । डैडी ने सुना तो पत्र भेजा डाँटते हुए .." अभी उम्र कया है तुम्हारी जो इस तरह की निराशावादी कविताएँ लिख रहे हो ? और उसके बाद फिर कभी मैने ऐसी कविता नहीं लिखी । डैडी जीवित होते तो वे आपको भी डाँटते ।

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November 20, 2009 at 10:54 PM

डैडी जीवित होते तो डांटते से डैडी की छवि न खराब करें। :-)
माँ और पिता दोनों ही डांटते हैं एक उम्र में ताकि बच्चा आशावादी हो और दृढ़ता से जीवन में आगे बढ़े पर बड़े हो जाने पर कभी-कभी अपने आस पास की चीज़े भी निराशा से भर देती हैं जिसका कोई हल व्यक्तिगत रूप से हमारे पास नहीं होता और वह निराशा कविता का रूप ले लेती है।
कविता जी, कविता मन को छूने वाला है और जो मन को छू ले वही कविता है।

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November 21, 2009 at 10:36 AM

वास्तविक जीवन की वेदनाओं और संवेदनाओं को समेटे एक अच्छी रचना.

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November 21, 2009 at 7:12 PM

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है.

Baat sahi hai kintu sharadji sahi kaha rahe hain itana nirshavad kyon?

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November 23, 2009 at 5:01 PM

न-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है.

कवी भले ही निराशावादी कवितायेँ लिख ले पर वह वास्तव में निराशावादी नहीं होता . निराशावादी व्यक्ति तो कवितायेँ लिख ही नहीं सकता ....ये दर्द ही सफलता की सीढ़ी हैं ....बहुत सुंदर तरीके से आपने अपने भाव पिरोये....बधाई ....!!

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November 24, 2009 at 2:03 PM

रिसते घाव का दर्द है
समय आने पर ही ठीक होगा
किसी ने लिखा है-
"धैर्य हो तो रहो थिर
निकालेगा धुन
समय कोई.."

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November 24, 2009 at 9:51 PM

निराशा के क्षणों को भी इतनी खूबसूरती के साथ शब्दों में पिरोना ही तो सच्ची रचनाधर्मिता है। अच्छी लगी आपकी ये रचना।
पूनम

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November 25, 2009 at 3:57 PM

pahali bar aapke blog pr aane ka saubhagya prapt hua . bahut hi achchha lga .

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November 26, 2009 at 3:31 AM

शुभ अभिवादन! दिनों बाद अंतरजाल पर! न जाने क्या लिख डाला आप ने! सुभान अल्लाह! खूब लेखन है आपका अंदाज़ भी निराल.खूब लिखिए. खूब पढ़िए!

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November 26, 2009 at 6:53 PM

निकालेगा धुन
समय कोई.."

हां पूरा गीत सुनने के बाद ही तो पता चलता है कि‍ धुन क्‍या है ?

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November 26, 2009 at 10:30 PM

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है....
bahut shaandar rachna ,bahut lagan ke saath me padhti rahi

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December 13, 2009 at 6:07 PM

पथरीली, संकरी राह में भटक रही ये जिंदगी
ओझल मंजिल लगता कदम-कदम पर फेरा है
जब- जब भी दिखा उगता सूरज ख़ुशी का
तब-तब मुझको गहन तम ने आकर घेरा है
bahut shaandaar rachna ,man ko bha gayi

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December 16, 2009 at 11:50 AM

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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October 27, 2015 at 9:53 PM

सुंदर कविता....

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