अहसास की पाती

अहसास की पाती



30 नवम्बर को मेरी शादी की 14वीं सालगिरह है. इस अवसर पर हम विशेष धूमधाम तो नहीं, परन्तु हाँ बच्चों के साथ यही भोपाल में केरवा डैम (पिकनिक स्थल) या फिर बड़े तालाब के किनारे घूमने जरुर जाते हैं. इस बार सोचा कि चलो ब्लॉग परिवार के साथ ही इस सालगिरह को मनाकर देखा जाय, नया अनुभव होगा. इस अवसर पर मैं अपनी एक छोटी रचना जो मैंने अभी मार्च माह में जब मैं ऑफिस ट्रेनिंग से एक सप्ताह के लिये मसूरी गयी थी तब घर पर मेरे पति को छोटे-छोटे दोनों बच्चों को सँभालने का जिम्मा आ पड़ा. फिर क्या! रोज फ़ोन पर अपने और बच्चों की बात होती रहती थी, उनकी इसी मनोदशा को भान कर मैंने उनके ही शब्दों को कुछ इस तरह पिरो दिया ...........

तू नहीं है पास
कैसे बताऊँ तुझे
मन है बहुत उदास
बिखरा-बिखरा सा यह घर लगता
सिमटा-सिमटा सा आकाश
तू नहीं .........

बेटी तो रो-रोकर कह रही है
माँ कि बहुत याद आ रही है
पर बेटा तो बहुत मस्त है
मैं भी मसूरी जाऊंगा
एक ही रट लगाये रहता है
बच्चे तो बच्चे पल भी भूले-याद करे
उन्हें कहाँ मुझसा अन्तरंग अहसास
तू नहीं ...........

थकाहारा जब मैं पहुँचता घर
मैं चिंतित पर बच्चे बेखबर
घर कुछ खाली-खाली सा लगता है
हर घडी दिल तुझे पास बुलाता है
हरपल होता इस दूरी का अहसास
तू नहीं ...............

अब देर नहीं जल्दी से घर आ जाओ
हाल मेरा सुनकर अपना भी सुनाओ
अपने घर में ही होता है सुखद अहसास
तू नहीं .............

अब बच्चों के वास्ते .................


एक दिन जब मेरा छोटा बेटा जब वह ३ साल का था तो वह घर कि दीवार और फर्श पर चाक से रंग रहा था तो मेरी बेटी यह देख मेरा हाथ पकड़कर मुझे उसकी यह करतूत देखकर कहने लगी. देखो मम्मी ! भैया ने कितनी गोदागादी कर दी है, आप इसे भी मेरे साथ स्कूल क्यों नहीं भेजती? बड़ा हो गया है यह! स्कूल जायेगा तो ये ये गोदागादी सब भूल जायेगा! इसे अवसर पर मैं एक छोटी कविता लिखी. आज इस अवसर पर प्रस्तुत कर रही हूँ. आशा है आप लोगों को भी अच्छी लगे.............

ABCD सिखला दो .........

मम्मी देखो! पापा देखो!
भैया मेरा बड़ा हुआ
देखो जरा दीवार तो देखो
इसने कितना गोद दिया
जाकर बाज़ार से इसके लिए
स्लेट-बत्ती ला दो
पकड़कर हाथ इसका
ABCD सिखला दो
रात को जल्दी सुलाकर इसे
सुबह जगाना न जाना भूल
मेरे संग-संग मेरा भैया भी
अब जायेगा स्कूल

Copyright@Kavita Rawat
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है

नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है


जब मन उदास हो, राह काँटों भरी दिखाती हो, आस-पास हौंसलापस्त करते लोगों की निगाहों घूरती हों, जो सीधे दिल पर नस्तर सी चुभ रही हों ऐसी परिस्थिति में दुःख किससे बांटें कहाँ सूझता है?
हताशा, निराशा के क्षणों में उपजी मेरी यह कृति देखआज भी मैं सोचती हूँ कि ईश्वर किसी भी प्राणी को दुःख न दें, और अगर दें भी तो उसे किसी का भी दया पात्र बनाने से वंचित रखें, उसे इतनी शक्ति अवश्य दें कि वह अपना स्वाभिमान हर परिस्थिति में बचाए रखने में सक्षम बना रहे ...........

पथरीली, संकरी राह में भटक रही ये जिंदगी
ओझल मंजिल लगता कदम-कदम पर फेरा है
जब- जब भी दिखा उगता सूरज ख़ुशी का
तब-तब मुझको गहन तम ने आकर घेरा है

हरतरफ वीरान पहाड़ियों से घिरी हूँ मैं
इर्द-गिर्द कंटीली झाड़ियाँ उगने लगी है
बचा पास मेरे एक धुंधला सा दर्पण
वह भी अब छोर- छोर से चटकने लगी है

चलती हैं मन में कभी तूफानी हवाएं
कभी इर्द-गिर्द काली घटायें घिरती हैं
कसते देख व्यंग्य मुस्कान किसी की
सीने में शूल सी चुभने लगती हैं

दीन-हीन दया पात्र हूँ नहीं मैं
फिर भी देख मुझ पर कोई दया जताता है
आहिस्ते से छिड़कते नमक छुपे घाव पर
नहीं कोई 'रिसते घाव' को सहलाता है.

Copyright@Kavita Rawat
दुर्जनता का भाव

दुर्जनता का भाव


समाज में व्याप्त उन प्राणियों से कैसे और कितने सुधार की उम्मीद की जा सकती है, जिनका स्वभाव ही दुर्जनता से भरा हो, जो अपनी आदत से मजबूर होकर समय-असमय अपनी वास्तविक छबि दिखाने से बाज नहीं आते हैं. ऐसे प्राणियों की अपने समाज में भरमार है आज ....
इनसे कैसी और कितनी उम्मीद रखते है आप .......



सांप को चाहे जितना ढूध पिलाओ वह कभी मित्र नहीं बनेगा
आग में गिरे बिच्छू को उठा लेने लें तो वह डंक ही मारेगा

गड्ढे में गिरे हुए कुत्ते को बाहर निकालो तो वह काट लेगा
भेड़िये को चाहे जितना खिलाओ-पिलाओ वह जंगल भागेगा

गधे के कान में घी डालो तो वह यही कहेगा कान मरोड़ते हैं
तोते को जितना भी प्यार से रखो वह मौका देख उड़ जाते हैं

काला कौआ पालो तो वह चोंच मारकर ऑंखें फोड़ देगा
खलनायक नायक बना तो वह मौका देख छुरा भोंक देगा

टूटी थाली में जो कुछ भी डालो सब बर्बाद हो जाता है
अज्ञानी मंदिर में बैठकर मंदिर के ही पत्थर उखाड़ता है

बिल्ली ने शेर को सिखाया- पढ़ाया वह उसे ही खाने चला
लकड़ी ने हत्था दिया कुल्हाड़ी को वह उसे ही काटने चला

copyright@Kavita Rawat
लगता पतझड़ सा यह जीवन

लगता पतझड़ सा यह जीवन

आम्रकुन्जों के झुरमुट से
बह रही मंद-मंद पवन
पर उदास मन बैठी मैं
दिखता हरतरफ सूनापन
आम्रकुंजों की देख हरीतिमा तब
कहता मुझसे मेरा पतझड़ मन
छिपा ले हरे -भरे पत्तों में तू भी
अपनी अदृश्य पीड़ा सघन
हरे -भरे पत्तों के बीच बैठी कोयल
क्यों मधुर गीत सुनाती है!
मेरे सूने मन खंडहर में आकर
क्यों सोए अरमान जगाती है

पतझड़ मन से झर- झर झरती पत्ती
लगती जीवन डाली सूनी खाली
हरतरफ आवाज झनकती झींगुरों की
जीवन डाल पर बुनती मकड़ी जाली

यूँ ही बीत रहे जीवन के पल-पल
कभी लगता वीरान यह अंतर्मन
आता वसंत कब पता न चलता
लगता पतझड़ सा यह जीवन


        मन के घोर निराशा के क्षण में जब चाह तमन्नाओं की निरंतर धारा प्रवाहित होने लगती है, तब कहाँ कुछ भी अच्छा लगता है! ये सुन्दर प्रकृति भी वीरान, सुनसान लगने लगाती है. अवसाद भरा मन सबसे दूर भागता है और अपने ही दुःख में डूबा इंसान खुद से बातें करता, खुद को समझाता रहता है, जिससे वह सारी दुनिया से कटकर रह जाता है. वह मन में ऐसी धारणा बिठा लेता है कि यही दुनिया तो उसके दुःख का कारण है!
        ऐसे ही अवसाद के क्षणों में रची मेरी यह रचना भले ही वर्तमान परिदृश्य में अप्रासंगिक हो चली हो, लेकिन यह मुझे उन क्षणों की याद दिलाकर मुझमे ऊर्जा का संचार करती है और मैं डटकर आज विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने में अपने को सक्षम पाती हूँ. आज मैं यह कदापि नहीं चाहती हूँ कि किसी इंसान पर उसका दुःख हावी हो और वह उसी में डूबकर अपने आप को इस संसार से अलग-थलग समझने की भूल कर अपना संसार बर्बाद कर दे. आज इसी वजह से मैं जब कभी, जहाँ कहीं भी किसी भी इंसान को इस दशा में देखती हूँ तो मैं उसे इससे उबारने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहती हूँ, ताकि वह भी जीवन को सच्चे अर्थ में लेकर जीवन जीने का आशय समझ सके............ कविता रावत 
भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है

भ्रष्टाचार एक कल्पतरु है




सुना होगा आपने कभी एक कल्पतरु हुआ करता था
जिसके तले बैठ मानव इच्छित फल को पाता था
इच्छा उसकी पूर्ण होती, वह सुख-चैन से रहता
जो भी इसके तले बैठता, वही ख़ुशी से झूमता
क्या आधुनिक युग में भी कहीं ऐसा वृक्ष होगा?
जो हमें मन वांछित फल दे सकेगा!
आप कहोगे कल्पतरु अब नहीं, जो सपने करे साकार
मैं कहती हूँ वह वृक्ष व्याप्त है, नाम है उसका भ्रष्टाचार
यह ऐसा वृक्ष है जिसकी शीतल है छाया
जो भी तले बैठे इसके, उसी ने पायी माया
इसकी जड़ें होती गहरी, यह उखड़ नहीं पाता
जो भी यत्न करता वही सदा पछताता
जो भी जड़ें जकड़ता इसकी, इच्छित फल वह पाता
जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल बजता
कामधेनु है यह जिसका दूध सफ़ेद नहीं है काला
जो सर्व प्रचलित है, उसी का नाम है घोटाला
आत्मा तन से निकलती, यह धर्मशास्त्र है कहता
भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है, यह मानव शास्त्र कहता
विराट कल्पतरु का रूप ले चुका है भ्रष्टाचार
इसीलिए यही बन बैठा है आज का शिष्टाचार।

             वर्तमान समय की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते नैतिक मूल्यों के गिरावट के परिणाम स्वरुप भ्रष्टाचार ने जिस तेजी से अपनी जड़ें गहरी जमा ली हैं, उससे सबको लगने लगा हैं कि इसे समूल नष्ट कर पाना बहुत टेढ़ी खीर है. देश में व्याप्त कुटिल राजनीति, नौकरशाही, बेरोजगारी, भुखमरी, अल्प वेतन कि समस्या, दंड विधान की ढिलाई, पूँजी संग्रह और अर्थोन्माद की प्रवृति ने लोगों की मानसिकता, सोच-विचार और व्यवहार की स्वच्छता के मूल्य को ही कुंद कर दिया है.
             वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्वरुप को उदघाटित करने का मेरा यह लघु प्रयास कहाँ तक सफल हो पाया है, यह आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होगा ................


copyright@Kavita Rawat