कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

आपस में कोई बैर भाव न रहे
न रहे कोई जात-पात का बंधन
हर घर आँगन में बनी रहे खुशहाली
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

तोड़कर नफरत भरी सब दीवारें
बस एक भाव रहे, वह हो प्रेमबंधन
ऊँच-नीच का भाव मिटे जहाँ से
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

श्रेष्ठता सवर्धन के हों प्रयास
और निकृष्टता का हो उन्मूलन
मिटे संकीर्ण स्वार्थपरता का भाव
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

अन्तःकरण से सदभाव उपजकर
सद्ज्ञान, सदाचरण का हो जतन
मिटे बुद्धिबल, धनबल घमंड जहाँ से
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

उछ्रंखलता उद्धत उदंड न बने कभी
न हो कभी शालीनता का शमन
अवांछनीयता, अनैतिकता न हो हावी
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

मरुस्थली अन्तःस्थल में भरें संवेदना
सहयोग, त्याग, उदारता से भर जाय मन
परस्पर विरोध-विग्रह दूर हों सभी के
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

बीज सा गलकर फिर बने वृक्ष
धरकर परमार्थव्रत करें नवसर्जन
समभाव दिखे सबको दुःख-सुख
कुछ ऐसा हो नूतनवर्षाभिनंदन

Kavita Rawat
वक्त बदलेगा जरुर

वक्त बदलेगा जरुर


मेहनत करना बहुत अच्छी बात है और अपनी- अपनी जगह सभी मेहनत करते हैं लेकिन उसका फल किसको कितना मिले, यह सब भाग्य पर निर्भर करता है. कर्म के साथ यदि भाग्य जुड जाता है तो मन मुताबिक फल मिल ही जाता है लेकिन यदि भाग्य विमुख हो तो आशातीत सफलता नहीं मिलती. कई लोगों की किस्मत में खूब मेहनत करना ही लिखा रहता है और वे मेहनत करते रहते हैं इसी आशा में कि कभी न कभी तो उनका भी वक्त आएगा, उनकी भी अपनी सुबह होगी .........

सुबह घर से निकलती हूँ उम्मीदों के पर लगाकर
शाम को गुम सी हो जाती हूँ दिनभर के अंधियारों में
रात को खो जाती हूँ जिंदगी के सुनहरे सपनों में
दिनभर भटकती फिरती हूँ धुंधभरी गलियारों में
न कहीं दिल को सुकूँ मिलता और न दिखता आराम
पता नहीं कब हो जाती सुबह कब ढल जाती शाम
वक्त बदलेगा जरुर हर शख्स मुझसे यही कहता है
पर वह वक्त आएगा कब यह सपना सा दिखता है

copyright@Kavita Rawat
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी



देश में एक ओर जहाँ शांतिप्रिय श्रीरामजी ने राज किया
वहीँ दूसरी ओर अत्याचारी घमंडी रावण ने भी राज किया
दोनों ओर ही थे धुरंधर यौद्धा और थे निपुण धनुषधारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

देश में राज्य पहले भी थे जिनके राजा आपस में लड़ते-रहते थे
स्व राज्य विस्तार के महालोभ में ये आपस में मार-काट करते थे
चाटुकारी स्वामिभक्तों के बीच छुटपुट हुआ करते थे परोपकारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

अंग्रेज आये थे व्यापार करने पर शोषण कर नाक में कर गए दम
तब देश में देशप्रेमी मौजूद थे जो दरिंदों को भागने में हुए सक्षम
वे दुष्ट गए तो गए टुकड़े कर देश में रोष व्याप्त कर गए भारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

आज भी देश में जगह-जगह अशांति के बादल छाते जा रहे हैं
कोई रावण तो कोई द्रुयोधन बनकर देश को अशांत कर रहे हैं
शांतिदूत मूक बन बैठते जब अशांति का तांडव मचता है भारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

राजनेता देशप्रेम का मुखौटा ओढ़कर अपने लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं
कोई पहन रहा घोटालों का ताज तो कोई भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ रहे हैं
जात-पात, ऊँच-नीच, अमीर- गरीब का भेदभाव अब तक है जारी
देश की जो रीति पहले थी वह समझो अब तक है जारी

copyright@Kavita Rawat
फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं

फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं



अक्सर एकाकीपन ही मुझे अच्छा लगता
अपनेपन से भरा साथ मिले किसी का
जैसे यह दिखता कोई सुन्दर सपना है
अपने पास तो आंसू ही शेष ऐसे दिखते
जो वक्त-बेवक्त साथ देते अपना है
न होंठों पर खिलकर हंसीं आ पाई कभी
न शायद मुस्कान कभी लौट सकती है
हँस-हँस कर ही जीना जिंदगी है
ये अक्सर मुझसे मेरी वेदना कहती है
ये जिंदगी नहीं उदास रहने की
तू हरदम क्यों उदास हो जाती है
दुःख में भी मुस्कराना सीख ले
ये दुखभरी घड़ियाँ अक्सर कहती है
पर खुशियाँ तू अबतक नसीब न हुई
सिर्फ देखती आयी हूँ सुनहरे सपने
होता गम अगर सीने में कुछ कम
तो छुपा लेती उसे सीने में अपने
दर्द छुपाना चाहा मैंने हरदम
पर पीड़ा कुछ कम होती नहीं
हँसना चाहती हूँ मैं भी जीभर कर
पर होंठों तक मुस्कान आती नहीं
ख़ुशी तो मिलती है जिंदगी में मगर
हर राह मिलती मुझे टेढ़ी है
बातें जो जख्मी कर जाते दिल को
फिर वही बात हर किसी ने छेड़ी हैं

copyright@Kavita Rawat
दूर-दूर न जाओ इस कदर

दूर-दूर न जाओ इस कदर



जिंदगी की भागदौड़ के बीच अब कालेज की दिन सपने जैसे दिखाते हैं, तब कालेज से निकलने के बाद जिंदगी किस दिशा को मुड जायेगी, शायद ही कोई जान पाया हो. अलग-अलग मिजाज के दोस्त जब कालेज छोड़कर अपनी घर-गृहस्थी की दुनिया में रच-बस जाते हैं तो कभी कई वर्ष बाद मिलने पर यकायक यकीन ही नहीं होता की ये वही दोस्त हैं, जो कभी कालेज में साथ पढ़ते थे ...... बहुत कुछ बदले-बदले नज़र आते है सभी ........ कालेज की एक दोस्त के अनुरोध पर कि उसे भी कालेज फेयरवेल में कुछ बोलना है, मैंने एक कविता लिख कर दी, जिसे उसने फेयरवेल के दिन सुनाया तो उसकी सभी ने खूब तालियाँ बजाकर तारीफ़ की. फेयरवेल समाप्ति पर वह मुझसे मिली और कहने लगी कि मुझे नहीं मालूम था की तेरी लिखी कविता को सभी इतना पसंद करेंगे, तू लिखती रहना, मुझे भी लगता है तू अच्छा लिख सकती है..........यह सुनकर मुझे भी अच्छा लगा की चलो कवितायेँ भी कुछ अवसरों पर सबको अच्छी लगती है ......... आज उसी अवसर की कविता कालेज की दिन याद कर प्रस्तुत कर रही हूँ ..... शायद कोई कालेज का दोस्त भी पढ़कर अपने कालेज के दिन याद कर कुछ पल के लिए ही सही खुश हो ले.........


हमने लिखे कुछ गीत
तुम्हे सुनाने को
सोचा था
तुम मिलोगे किसी डगर पर
जहाँ दिल खोलकर बातें करेंगे
कुछ अतीत की, कुछ वर्तमान की और कुछ भविष्य की
पर सोचा था जो हमने
सोचते ही रह गए
हमारे वे प्यार भरे गीत
सब बेसुरे हो गए
तुम मिले हमें जरुर
पर उस राह पर
जहाँ दिल घवराया
कुछ न कह पाया
सिर्फ घडकन ही तेज होती रही
बात जो होनी थी तुमसे
जुबां पर आकर अटकती रही
अब तुम्हें कैसे बताऊँ
कि वे सब गीत बेसुरे हो चुके हैं
वे ख्वाब जो मिलकर देखे थे हमने
वे हकीकत न बन सके हैं
अरे वो उजाड़ के साथी!
क्यों न आबाद कर लेते घर
अभी समाये हो दिल में
दूर-दूर न जाओ इस कदर
दूर-दूर न जाओ इस कदर

copyright@Kavita Rawat