अलविदा 2010 :  भूली-बिसरी यादें

अलविदा 2010 : भूली-बिसरी यादें

वर्ष २०१० को अलविदा करने और नए वर्ष के आगमन के जोर-शोर के बीच भूली-बिसरी यादों का चलचित्र जेहन में उभरने लगा है. मैं समझती हूँ कि हर वर्षारम्भ और वर्षांत तक के सफ़र में न जाने कितने ही व्यक्तिगत व सामाजिक खट्टे-मीठे, कडुवे अनुभवों के बीच साल कैसा गुजरा; इस लेखे-जोखे को हर आदमी कम से कम एक बार जरुर टटोलने के कोशिश करता है. एक और जहाँ बीता वर्ष जिनकी जिंदगी में खुशगवार गुजरा वे नई ऊर्जा, उमंग-तरंग के साथ नए वर्ष के स्वागत के लिए पलक बिछाए आतुर-व्याकुल दिखते हैं, वहीँ दूसरी और बहुत से लोग अप्रत्याशित घटनाओं/दुर्घटनाओं से आहत बुझे मन से शांतचित भाव से नए साल की शुभकामना के निमित्त अपने-अपने ईष्ट देव से प्रार्थना करते नज़र आते हैं.
        मैं भी जब वर्ष २०१० के परिदृश्य में अपने आपको झांकती हूँ तो देखती हूँ कि किस तरह वर्ष की शुरुआत ही मेरे लिए दु:खद क्षणों से शुरू होकर अंत तक बनी रही. ३० दिसम्बर २००९ को जब लोग नए साल की स्वागत की तैयारी में मग्न थे, मैं पहले सर्दी-जुकाम और फिर श्वास की परेशानी के वजह के चलते अस्पताल में भर्ती होकर स्वाइन फ्लू जैसी घातक बीमारी की आशंका के चलते मशीनी श्वास लेकर जी रही थी. एक अजीब सी स्थिति बन पड़ी थी. नया साल कब शुरू हुआ इसकी भनक 4 जनवरी को स्वाइन फ्लू की नेगटिव रिपोर्ट के आने पर डॉक्टर ने नए वर्ष की शुभकामना के रूप में दी. नाते-रिश्तों और परिचितों ने भी नए साल की वजाय सकुशल घर वापस आने की शुभकामना दी तो सच में लगा कि नया वर्ष आ गया है. अभी कुछ दिन ठीक ठाक चल ही रहा था कि एक के बाद अपने ७ निकट सम्बन्धियों को अपने से सदा-सदा के लिए दूर जाते देख जीवन की नश्वरता पर अमिट प्रश्नचिन्ह लगाते हुए गहरे जख्म दे गया. ऊपर वाले की मर्जी के आगे इंसान कितना बेवस है, यह देखते हुए मन बहुत व्यथित होता है, विशेषकर जब जाने वाला तो चला जाता है लेकिन जिन्दा रहने वालों को जीते जी नरक के समान जीने के लिए मजबूर कर देता है! खैर अपने मन को यह सोचकर तसल्ली देनी ही पड़ती हैं कि शायद इसी का नाम जिंदगी है.

        अपने ब्लोग्गर्स व सुधि पाठकों से यही अपेक्षा करती हूँ कि उनका जिस तरह से वर्ष २०१० में मेरे प्रति स्नेह, आशीर्वाद बना रहा जिसके कारण मैं ब्लॉग पर निरंतर लिखने के लिए प्रेरित होती रही हूँ, वही स्नेह, आशीर्वाद बनायें रखें. आप सभी के लिए वर्ष २०११ मंगलमय हो, यही सबके लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं.
    
      ......कविता रावत
वह रहने लगा है दूर परदेश कहीं

वह रहने लगा है दूर परदेश कहीं

सुन्दर मनमोहक गाँव में बसा
एक छोटा सा घर था जिसका
खेती-बाड़ी  कर पढ़ना-लिखना ही
तब मुख्य लक्ष्य था उसका

खेलने-कूदने की फुरसत नहीं उसे
वह हरदम अपने काम में लगा रहता
कभी तो आएगी ख़ुशी हिस्से उसकी
यही हरपल बैठ सोच लिया करता

हंसी-ख़ुशी काम करते बीते दिन
वह कभी दु:खी होता था नहीं
अब सिर्फ कुछ यादें बची हैं मन में
वह रहने लगा है दूर परदेश कहीं!

गाँव के चहुँदिशी आच्छादित सुन्दर वन
झूम-झूम कर उसे अपने पास बुलाते
मनमोहक छटा बिखेरते खेत-खलियान
जब मिली-जुली फसलों से भर आते

घर-आँगन में फुदकती रहती चिड़ियाँ
देते सब उनको भरपूर दाना-पानी
उतर जाती उसकी दिन भर की थकन
सुनने को मिलती जब किस्से कहानी

खो जाता तब सुनहरे सपनों में  
कभी वह बेचैन होता था नहीं
अब सिर्फ कुछ यादें बची हैं मन में
वह रहने लगा है दूर परदेश कहीं!

गाँव पास उसके बहती नदी-नहर
जो सींचती खेत-खेत, डाली-डाली
अपनेपन लिए होता सारा माहौल
हरतरफ हरदम छायी रहती खुशहाली

गिरता हिम लुभाते नदी-नाले, पहाड़
हिमाच्छादित पेड़-पौधे झुक-झुक जाते
फिर जब सर्द बयार बहती झूम-झूम
तब लगता जैसे वे गीत सुमंगल गाते

ऐसे मनोहार गाँव की राह छोड़ वह
कौन राह खो गया उसका पता नहीं
अब सिर्फ कुछ यादें बची हैं मन में
वह रहने लगा है दूर परदेश कहीं!


........कविता रावत  
घर-गृहस्थी और समाज

घर-गृहस्थी और समाज

बचपन की धमाचौकड़ी के साथ स्कूली शिक्षा और फिर कॉलेज की चकाचौंध से बाहर निकलकर जब मैं कुछ वर्ष बाद परिवार और नाते रिश्तेदारों की दिन-रात की दौड़-धूप के फलीभूत होने से अनजाने रिश्तों की डोर से बंधी तो मैंने अपने आपको एक अलग ही दुनिया में पाया, जिसे एक लड़की की अपनी घर गृहस्थी कहा जाता है, जो सदियों से उसका असली घर बताया गया है। यह संयोग ही रहा कि इधर शादी की बात पक्की हुई और दूसरी ओर मेरी शिक्षा विभाग में सर्विस लगी। शादी की बात पक्की होने के बाद मुझे प्यार की भाषा समझ आयी तो कुछ दिन कविता, कहानी और शेरो-शायरी का सुखद दौर चल पड़ा लेकिन शादी होने बाद घर-गृहस्थी और समाज का जो कटु अनुभव हुआ, वह किसी त्रासदी से कमतर नहीं है।    
         शादी होने के बाद समाज में एक लड़की के लिए जो सबसे अहम् बात समझी जाती है वह उसका माँ बनना है, लेकिन मेरा १० वर्ष की लम्बी त्रासदी झेलने के बाद माँ बनना, जीवन के कटु अनुभवों से गुजरना रहा है। त्रासदी इसलिए कहूँगी क्योंकि आज भी एक माध्यम परिवार की स्त्री को इतनी लम्बी अवधि के बाद माँ न बनने की स्थिति में अपने ही घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार और समाज के लोगों से जो ताने- कडुवी बातें झेलनी पड़ती है, मैं समझती हूँ कि वह किसी त्रासदी से कमतर नहीं। मेरे लिए भी यह भोपाल गैस त्रासदी झेलने के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी रही है। इस व्यथा से गुजरने वाली प्रत्येक स्त्री मेरी  यह बात बखूबी समझ सकती है।  खैर मैं इस मामले में अपने जीवन साथी जो कि मेरे लिए शुरू से ही कभी अनजाने नहीं रहे, हर कदम पर एक सच्चे हमसफ़र की तरह कदम-दर-कदम साथ निभाते चले आये, इसे मैं अपना सौभाग्य समझती हूँ।  अब मेरी एक बिटिया और एक बेटा है, ऑफिस की भागमभाग और उनकी देखभाल में एक-एक दिन और साल कब निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।  जिंदगी में दौड़ धूप जरुर बहुत है लेकिन घर आकर बच्चों की खट्टी--मीठी, अटपटी, समझदार भरी बातें सुनकर मन को एक सुकून मिलता है।  मेरे पति और मेरी आदतें भी लगभग एक सी हैं, जिससे हमारे बीच कभी कोई  टकराव की स्थिति निर्मित नहीं हुई।  हम शुरू से ही पति-पत्नी की तरह नहीं बल्कि दोस्त की तरह रहते हैं, जिससे आपसी सामंजस्य से सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है।  मेरा ब्लॉग लेखन बिना इनके प्रोत्साहन और सहयोग के संभव नहीं है, जिसके कारण मैं अपने विचार, भावनाएं ब्लॉग पर साझा कर पाती हूँ।
          ब्लॉग पर कविता, लेख के बाद समय मिलने पर मैं अपनी कुछ अप्रकाशित अपठित कहानियां भी प्रस्तुत करना चाहूंगी, बस आपका यूँ ही आशीर्वाद, प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सहयोग की आकांक्षी हूँ

                                                           ...कविता रावत

इससे पहले कि कोई

इससे पहले कि कोई

इससे पहले कि कोई
आप, तुम से तू पर आता हुआ
दिल बहलाने की चीज़ समझ बैठे
संभल जाना
इससे पहले कि कोई
मीठी बातों में उलझा कर
गलत राह पर मजबूर करने लगे
समझ जाना
इससे पहले कि कोई
घर में घुसकर
अपनों में फूट डालने लगे
भांप जाना
इससे पहले कि किसी की कोई
बात चुभने लगे
बातों पर अपनी ध्यान देना
इससे पहले कि कोई
अपमानित होने के क्षण आएं
सबका मान रखना
इससे पहले कि हर कोई
कतरा के चलने लगे
इतरा के न चलना
इससे पहले कि भीड़ में बनो
अपनी कोई अलग
पहचान बनाए रखना
इससे पहले कि कोई
नफरत भरी निगाहों से देखे
प्यार में संभल कर चलना
इससे पहले कि दुनिया में
कहीं बदनाम हो जाएं
अपने नाम का मान रखना
इससे पहले कि अपनी ही
नज़रों में गिर जाएं
कदम संभाल कर रखना
इससे पहले कि कोई
मंजिल की राह से भटका दे
आंखे खुली रखना

               ..कविता रावत
तुमको सोचने के बाद

तुमको सोचने के बाद

तुमको
सोचने के बाद
जाने क्यों
तुमसे बात करने की प्रबल इच्छा
जाग उठती है
तुमको
सोचने के बाद

डरती हूँ
कहीं जुबाँ पर
आ न जाएं वे बातें
जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको
फूलों से लदी खुशगवार डाली देख


सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
मुहं फेर बढ़ लेगा कोई अपना
जो आता था कभी करीब
अपना समझ प्यार भरे कदमों से
और चुन ले जाता कुछ फूल
मान,सम्मान, पूजा की खातिर
बेधड़क, बेरोकटोक

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
पर अंतर्मन रोकता है बमुश्किल
फिर चेहरा तुम्हारा
झूम आता है आँखों में
तुम उतरते हो
दिल की अतल गहराईयों में
जिसके छोर को पकड़ पाना
नामुमकिन सा लगता है

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
फिर कभी अचानक ही
बदली बन गरज-चमक कर
प्रेम बगिया पर आ
बरसने लगता है
तुमको
सोचने के बाद
जाने क्यों!

   ...कविता रावत
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें

ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें

अँधियारा मिटाने आया दीपपर्व
आओ मिलकर पूजा थाल सजायें
फैले उजियारा हर घर आँगन
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!

गाँव-शहर में फैले खुशहाली
दु:खिया के घर भी मने दीवाली
मुरझाये चेहरों पर खुशियाँ लायें
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!

ऊँच-नीच, जात-पात खाई पाटकर
सदभाव, समभाव प्रकाश फैलायें
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!

न हो कोई अपने घर में बेघर
बड़े-बुजुर्गों से न रहे कोई बेखबर
रखे ख्याल कोई दिल न दु:खायें
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!

कर अहंकार, प्रपंच, स्वार्थ दमन
फिर रामराज सा करें नव-सृजन
मिटा अनाचार,भ्रष्टता, निकृष्टता
सर्वहित संकल्प दीपोत्सव मनायें
ऐसा मिलकर कोई दीप जलायें!

सबको दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ
                        ..कविता रावत

गाँव छोड़ शहर को धावै

गाँव छोड़ शहर को धावै

गाँव छोड़ शहर को धावै
करने अपने सपने साकार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निरख शहर में जन-जन को
बिखरते सपने टूटता दिल
भटक रहें हैं शहर-शहर
पर पा न सके मंजिल

कदाचार व्याप्त दिखे हरतरफ
जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार
तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार

अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

          ........कविता रावत
मरना आसान लेकिन जीना बहुत कठिन है

मरना आसान लेकिन जीना बहुत कठिन है

पिछले सप्ताह एक के बाद एक तीन निकट सम्बन्धियों के मृत्यु समाचार से मन बेहद व्यथित है. कभी घर कभी बाहर की दौड़-भाग के बीच दिन-रात कैसे गुजर रहे हैं, कुछ पता नहीं चलता. मन में दुनिया भर की बातें घर करने लगती हैं. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है, थोडा मन हल्का हो यही सोच ब्लॉग पर अपने मन का कुछ गुबार बाहर निकाल कर सहज होने का प्रयत्न कर रहूँ हूँ. जानती हूँ की जीना-मरना जीवन चक्र है, फिर भी जब-जब शोक संतप्त परिवारों की हालातों को देखती हूँ तो मन में एक गहरी टीस उठने लगती है. जाने वाले चले जाते हैं लेकिन जीने वालों के लिए जीना कितना कठिन हो जाता है, यही सोच बार-बार मन उद्धिग्न होकर जिंदगी के भंवर जाल उलझने लगता है. सोचती हूँ....


जिंदगी को क्या कहूँ?
अतीत का खंडहर
या फिर
भविष्य की कल्पना!
भविष्य की आशा में अटका आदमी
उठता, बैठता, काम करता
बड़ी हड़बड़ी में भागता रहता
कुछ निश्चित नहीं किसलिए?
जिंदगी में कितने झूठ
बना लेता है एक आदमी-
लड़का बड़ा होगा, शादी होगी
बच्चे होंगे, धन कमाएगा
नाम रोशन करेगा, खुशहाल रखेगा
और यही सब करते-करते
मर जाता है बेटे के नाम
और बेटा बेटे के लिए
ऐसे ही मरते चले जाते है
एक-दूसरे के नाम पर!
गलत कहते है लोग
की मौत दुस्तर है?
भला मौत में क्या दुस्तरता?
क्षण भर में मर जाते हैं
सबकुछ धरा रह जाता है यहीं
खाली हाथ आया, खाली हाथ गया
जन्म लेता है तो किसी और के हाथ में
और मरता है तो भी किसी दूसरे के हाथ में
बीच की थोड़ी-बहुत घड़ियों में
अपने लिए कितना जी पाता है?
सच में मरना बहुत आसान है
लेकिन जीना बहुत कठिन!

          ....कविता रावत
नवरात्रि :  भक्ति और शक्ति का उत्सव

नवरात्रि : भक्ति और शक्ति का उत्सव

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे देवि नमोsस्तु ते ।।

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोsस्तु ते ।।

गणेशोत्सव के बाद नौ दिन तक चलने वाला शक्ति और भक्ति का अनुपम उत्सव दुर्गोत्सव सर्वाधिक धूम-धाम से मनाया जाने वाला उत्सव है। अकेले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में दुर्गा उत्सव के अवसर पर लगभग डेढ़ हजार स्थानों पर माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं आकर्षक साज-सज्जा के साथ स्थापित की जाती हैं। वहीँ दुर्गा मंदिरों में नौ दिन तक माता रानी की अखंड ज्योत जलाकर पूजा अर्चना, हवनादि होता रहता है। नवरात्र उत्सव का विशेष आकर्षण भव्यतम झाँकियाँ जो पौराणिक गाथाओं के साथ-साथ सामयिक सामाजिक व्यवस्थाओं को प्रदर्शित कर नव जागरण का सन्देश देती हैं, सभी जाति, धर्म सम्प्रदाय के लोगों को समान रूप से आकृष्ट करती है। शाम ढलते ही माँ दुर्गे की भव्य प्रतिमाओं और आकर्षक झाँकियों के दर्शन के लिए जन समूह एक साथ उमड़ पड़ता है। जगह-जगह नौ दिन तक हर दिन मेला लगा रहता है।
नवरात्र में यंत्रस्थ कलश, गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तर्षि, सप्तचिरंजीव, ६४ योगिनी, ५० क्षेत्रपाल तथा अन्यान्य देवताओं की वैदिक विधि के साथ पूजा करने का विधान है। अखंड दीप की व्यवस्था के साथ देवी प्रतिमा की अंग-न्यास और अग्नुत्तारण आदि विधि के साथ विधिवत पूजा का भी विधान प्रचलित है। नव दुर्गा पूजा,ज्योतिपूजा, वटुक-गणेशादि सहित कुमारी पूजा, अभिषेक, नान्दीश्राद्ध, रक्षाबंधन, मंगलपाठ, गुरुपूजा, मंत्र-स्नान आदि के अनुसार अनुष्ठान होता है। इस प्रकार विस्तृत विधि से पूजा करने वाले भक्तों पर भगवती अपनी असीम कृपा कर उनके दुःख, भय, रोग, शोकादि दूर कर शक्ति और समृद्धि प्रदान करती है।

सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा प्रतिपादित नौ देवियों का स्वरुप 'नवदुर्गा' कहलाती हैं, जिनको पृथक-पृथक शक्ति रूप से जाना जाता है। माँ दुर्गा की प्रथम शक्ति है शैलपुत्री :  माता  सती के अगले जन्म मैं शैलराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनकी स्तुति शैलपुत्री के रूप में करते हैं । माता शैलपुत्री की आराधना से आत्मसम्मान, चिंतन और उच्च विचारों का आविर्भाव होता है। माँ की दूसरी शक्ति है ब्रह्मचारिणी :  सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ब्रह्मचारिणी कहलाई। माँ की तीसरी शक्ति है चंद्रघंटा : इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है, इसलिए इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान चमकीला है। दस हाथ वाली खडग और अन्य अस्त्र=शस्त्र से सज्जित सिंह पर सवार यह देवी युद्ध के लिए उद्धत मुद्रा में विराजमान रहती हैं। इनके दर्शन से अलौकिक वस्तु दर्शन, दिव्य सुगंधियों का अनुभव और कई तरह की घंटियाँ सुनायी देती हैं। इनकी आराधना से साधक  में वीरता, निर्भयता के साथ सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। माँ की चौथी शक्ति है कूष्मांडा : यह देवी चराचर जगत की अधिष्ठात्री है। अष्टभुजा युक्त होने से इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है। इस देवी की आराधना से अधियों-व्याधियों से मुक्ति और सुख- समृद्धि की प्राप्ति होती है।  माँ की पांचवीं शक्ति है स्कंदमाता:  भगवती शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, उनकी माता होने से वे स्कंदमाता कहलाई। माँ की छठवीं शक्ति है कात्यायनी :  देवताओं के कार्यसिद्धि हेतु महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई, जिससे उनके द्वारा अपने पुत्री मानने से कात्यायनी नाम से प्रसिद्द हुई. माँ की सातवीं शक्ति है कालरात्रि : काल की भी रात्रि (विनाशिका) होने से उनका नाम कालरात्रि कहलाई. माँ की आठवीं शक्ति हैमहागौरी : तपस्या के द्वारा महान  गौरवर्ण प्राप्त करने से महागौरी कहलाई। माँ की नौवीं शक्ति है सिद्धिदात्री : सिद्धि अर्थात मोक्षदायिनी होने से सिद्धिदात्री कहलाती है।
नाना प्रकार के आभूषणों और रत्नों से सुशोभित ये देवियाँ क्रोध से भरी हुई और रथ पर आरूढ़ दिखाई देती हैं. ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मुसल, खेटक, तोमर, परशु, पाश, कुंत, त्रिशूल एवं उत्तम शांर्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण किए रहती हैं, जिसका उद्देश्य दुरात्माओं का नाश कर भक्तों को अभयदान देते हुए उनकी रक्षा कर लोक में शांति व्याप्त करना है।

नवरात्रि के अवसर पर भक्तों का शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा की आराधना के मूल में शक्तिशाली और विजयी होने की भावना के साथ-साथ विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश और भय-नाश ही सर्वोपरि परिलक्षित होती है।

माँ दुर्गा अपने नामानुकूल सभी पर माँ जैसी समान कृपा बनाये रखे इसी नेक भावना के साथ मेरी ओर से सभी को भक्ति और शक्ति के द्योतक दुर्गोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।


संघर्ष की सुखद अनुभूति

संघर्ष की सुखद अनुभूति

आशा और निराशा के बीच
झूलते-डूबते-उतराते
घोर निराशा के क्षण में भी
अविरल भाव से लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना
बहुत मुश्किल पर नामुमकिन नही
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी
चढ़ने के उपरांत
चिर प्रतीक्षा चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर ख़ुशी
बेजोड़ व अनमोल है
क्योंकि इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर सकता है
जिसने हर हाल में रहकर
अपना सघर्ष जारी रखकर
कोशिश की सबको साथ लेकर
निरंतर बने रहने की
कभी भाग्य के भरोसे नहीं बैठे
लगे रहे कर्म अपना मानकर
और सफलता के मुकाम पर पहुचे
सगर्व, सम्मान
तभी तो कहा जाता है
आदमी अपने भाग्य से नहीं
अपने कर्म से महान होता है
छोटी-छोटी लड़ाईयां जीतने के बाद ही
कोई बड़ी जंग जीतता है

               .....कविता रावत

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है

एक जगह पहुंचकर अच्छे और बुरे में बहुत कम दूरी रह जाती है
इने-गिने लोगों की दुष्टता सब लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है !

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!

चूने से मुहँ जल जाने पर दही देखकर  डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना हो जाता है !

जिसका जहाज डूब चुका हो वह हर समुद्र से खौफ़ खाता है
जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने में डर लगता है!

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं!

                    ..कविता रावत
अपनेपन की भूल

अपनेपन की भूल

जिन्हें हम अपना समझते हैं
गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
तो दिखता क्यों नहीं हरदम
आँखों में उनके पहला सा प्यार?
एक पल तो सब अपने से लगते हैं
पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
सोचकर आघात लगता दिल को कि
जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
ढूँढो तो सबकुछ मिल सकता है
देखो अगर अपनेपन से तो
सबकुछ अपना सा लगता है
पर कविता समझी नहीं कि
अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

         ......कविता रावत
भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है

भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है


गम का एक दिन हँसी-ख़ुशी के एक महीने से भी लम्बा होता है
दुःखी आदमी का समय हमेशा बहुत धीरे-धीरे बीतता है !

जो दर्द के मारे जागता रहे उसकी रात बहुत लम्बी होती है
हल्की व्यथा बताना सरल है पर गहरी व्यथा मूक रहती है!

बड़े-बड़े दुःख के आने पर आदमी छोटे-छोटे दुखों को भूल जाता है
पहले से भीगा हुआ आदमी वारिश को महसूस नहीं करता है!

हँसी-ख़ुशी कभी टिक कर नहीं वह तो पंख लगाकर उड़ जाती है
सुखभरी मधुर घड़ियाँ बड़ी जल्दी-जल्दी बीत जाया करती है!

ऐसा कोई आदमी नहीं जो दुःख व रोग से अछूता रह पाता है
भाग्य हमें कुछ भी दान नहीं देता वह तो केवल उधार देता है!

.....कविता रावत

गणेशोत्सव : सबको भाता गणपति बप्पा

गणेशोत्सव : सबको भाता गणपति बप्पा

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू १० दिवसीय ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि के प्रथम पूज्य देव गणेश जी के जन्मोत्सव का बड़ों को ही नहीं वरन बच्चों को भी कुछ ज्यादा ही बेसब्री से इंतज़ार रहता है। बच्चों का गणेश जी से सहज लगाव शायद उनकी चंचल, लुभावनी मूर्तियों, नटखट से भरी प्यारी-प्यारी कहानियों और विविध रूप, आकार की आकृतियों को लेकर अधिक रहता है  जहाँ मेरा बचपन से ही शिव-पूजन से बेहद जुड़ाव रहा है, वहीँ आज जब मैं अपने बेटे जो अभी-अभी इसी वर्ष से स्कूल जा रहा है, का गणेश प्रेम देखकर कभी-कभी बहुत हैरान-परेशान हो जाती हूँ   हैरान-परेशान इसलिए क्योंकि अभी से आये दिन स्कूल से उसकी यह शिकायत आती है कि वह कक्षा में बैठकर आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से गणेश के चित्र बनाता रहता है
घर में भी बहुत डांटने-फटकारने के बावजूद भी वह दीवार से लेकर जो भी कोरा पन्ना मिला उसमें आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से गणेश के चित्र उकेरना बैठ जाता है उसे दूसरे बच्चों की तरह खिलोंनों के बजाय गणपति जी से सम्बंधित किसी भी वस्तु/चीज आदि से खेलना बेहद भाता है. दूसरे बच्चों के साथ भी वह गणपति का खेल शुरू कर देता है, जिसे देख लोग हँसकर रह जाते हैं. रास्ते में या कहीं भी बाजार में जहाँ कहीं भी उसके नज़र गणेशनुमा चीज पर पड़ी नहीं कि फिर तो हाथ धोकर उसे लेने के पीछे पड़ जाता है यही नहीं संस्कृत के श्लोक "वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा" और 'गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्जम्बू फलचारूभक्षणं, उमासुतं शोकविनाशकारम नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम" जैसे कठिन वाक्य भी बड़ी सरलता से बिना अटके कहा देता है गणेश जी की कोई किताब हाथ लगी नहीं कि एक ही रट लगा बैठता है कि सुनाओ/बताओ क्या लिखा है इसमें, मना करने पर मुहं लटकाकर एक कोने में बैठ 'कट्टी' कहकर मौन धारण कर लेता है, और भी बहुत सी बातें जो मैं बाद में कभी बताऊँगी फिलहाल इस अवसर पर मैं उसकी आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से बनाई कुछ गणेश आकृति और गणपति प्रेम प्रस्तुत कर इसे यहीं विराम देकर गणेश जन्म और अवतार सम्बन्धी कुछ बातें करना चाहती हूँ
          हमारी संस्कृति में गणेश जी के जन्म व अवतार की कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें उनके जन्म की माँ पार्वती द्वारा अपनी शक्तियों के बल पर उत्पत्ति की कथा सर्वाधिक प्रचलित है। 
हमारी भारतीय संस्कृति में गणेश जी के जन्मोत्सव की कई कथाएं प्रचलित हैं। हिन्दू संस्कृति (कल्याण) के अनुसार भगवान श्रीगणेश के जन्मकथा का इस प्रकार उल्लेख है- “जगदम्बिका लीलामयी है। कैलाश पर अपने अन्तःपुर में वे विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थी। शरीर से गिरे उबटन को उन आदि शक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु अचेतन तो होता नहीं, उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। उसे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वारा से अंदर न आने पाए। बालक डंडा लेकर द्वारा पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंतःपुर में आने लगे तो उसने रोक दिया। भगवान भूतनाथ कम विनोदी नहीं हैं, उन्होंने देवताओं को आज्ञा दी- बालक को द्वार से हटा देनी की। इन्द्र, वरूण, कुबेर, यम आदि सब उसके डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए- वह महाशक्ति का पुत्र जो था। इसका इतना औद्धत्य उचित नहीं फलतः भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और बालक का मस्तक काट दिया।“ पार्वती ने जिस तपस्या से शिशु को प्राप्त किया उसके इस तरह जाने वे बहुत दुःखी हुई। उस समय भगवान विष्णु की सलाह से शिशु हाथी का सिर काटकर जोड़ दिया गया, जिससे वे जी उठे, लेकिन उनका शीश हाथी का होने से वे गणपति ‘गजानन‘ कहलाए।                   
भगवान गणेश के कई अवतारों की प्रचलित  कथाओं सभी कथाओं पर यदि थोडा-बहुत गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होती है, वह यह कि गणेश जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) 'असुरों' की आसुरी शक्तियों का दमन कर लोक कल्याणार्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो तो, तो उस बुराई का खात्मा करने के परियोजनार्थ जरुर कोई आगे बढ़कर उसे ख़त्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि कायम करता है  हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि असुरी शक्तियों की समाप्ति की मंशा लेकर लिए शायद हम गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की स्थापना कर उनसे ज्ञान-बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाये रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपाकांक्षी बनना नहीं भूलते हैं
       अगले वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक बोले : "गणपति बप्पा मोरया, पुरछिया वर्षी लौकरिया"

सभी ब्लोग्गर्स और सुधि पाठकों को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!

                                                                        ....कविता रावत

कौन हो तुम

कौन हो तुम

कौन हो तुम!
पहले पहल प्यार करने वाली
शीत लहर सी
सप्तरंगी सपनों का ताना-बाना बुनती
चमकती चपला सी
शरद की चांदनी सी
गुलाब की पंखुड़ियों सी
काँटों की तीखी चुभन से बेखबर
मरू में हिमकणों को तराशती
कौन हो तुम!

अधर दांतों में दबाती
नयन फैलाती
घनघोर घटाओं में सूरज का
इन्तजार करती
अरमानों को
आंचल बांधे
मिलन की तीव्र
साधना में रत
प्रेम उपासना को उद्धत
जिंदगी के सुहावने सपनों में
खोई-सोई दिखने वाली
कौन हो तुम!

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

             ......कविता रावत







जिंदगी रहती कहाँ है

जिंदगी रहती कहाँ है















अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है!

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

है पता ख़ुशी से जी ले चार दिन
पर ख़ुशी से कितने जी पाते यहां हैं!
कौन कितना साथ होगा अपने
यह हम जान पाते कहाँ हैं!

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!

                      .... कविता रावत
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

अबकी बार राखी में जरुर घर आना


राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें हैं बुलाते
कभी खेले-कूदे अब क्यों हो भूले जाते
अपनी बारहखड़ी का स्कूल देखते जाना
बचपन के दिन की यादें साथ ले आना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का  है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब मन कम लगता
गाँव में रह शहर का सपना दिखता
सूने घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे
कब सुध लोगे देख बागवाँ बुला रहे
आकर अपनी आखों से  देख जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना


गाँव के बड़े-बुजुर्ग याद करते रहते हैं
अपने-पराये जब-तब पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर अनजान बने हुए हो
आकर सबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

                   ......कविता रावत



बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन

बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन

शहर की महज औपचारिक दिशा की और निरंतर अग्रसर होती स्वत्रंत्रता दिवस की एक दिवसीय चकाचौध के बीच बचपन में गाँव के स्कूल में मनाये जाने वाले स्वत्रंत्रता दिवस की याद रह रह कर आ जाती है  जब गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी, संकरी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से प्रभात फेरी के लिए गाँव-गाँव, घर-घर जाकर देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम में अलख जागते थे, जिन्हें गाँव के नौजवान, बड़े,बुजुर्ग सभी बड़े जोश के साथ बड़ी उत्सुकता से स्वागत कर बड़े मग्न होकर सुनते थे एक गीत हमारे तिरंगे का जिसे मैं अब भी बच्चों से संग गाया करती हूँ जो मुझे बेहद प्यारा लगता है..

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा
इस झंडे के नीचे निर्भय
होये महान शक्ति का संचय
बोलो भारत माता की जय
....................

उस समय छोटे-छोटे कदमों से जंगल की संकरी डरावनी राह चलते यह गीत हौसला बुलंद करने के लिए कम नहीं था.............

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो
या सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं
तुम निडर हटो नहीं
...............

......अब तो शहरी हालातों को देश स्कूल में पढ़ी देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारी अमर वीर देशभक्तों का बलिदानी इतिहास धार्मिक पौराणिक कथा-कहानियों की तरह बनती जा रही हैं, जिसे पढ़ना-सुनना दुर्भाग्यवस उबाऊ, नीरस समझा जाने लगा है राजनीति शास्त्र की किताब में पढ़ा 'हमारा संविधान' जिसमें हमारा लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, मौलिक अधिकार व कर्तव्यों की बड़ी-बड़ी व्याख्याएं होती थी अब स्कूल के बस्तों और पुस्तकालयों में स्वयं ही घुट रहीं हैं और वर्तमान वास्तविक राजनीति तो हमारी संसद, विधान मंडलों की सुरक्षित, चाक-चौबंद समझी जानी वाली बंद कंदराओं से बाहर आकर स्कूल, कॉलेज में सीधे दाखिला लेकर सीधे-साधे, भोले-भाले, गरीब समझे जाने वाले ग्रामीणों के घर-घर में अपनी घुसपैठ करते हुए 'राजनीति' की एक खुली किताब बन गयी है, जिसमें सभी बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाते नज़र आने लगे हैं
..कविता रावत 

मनभावन वर्षा

मनभावन वर्षा

मुरझाये पौधे भी खिल उठते
जब उमड़- घुमड़ बरसे पानी,
आह! इन काली घटाओं की दिखती
हरदम अजब- गजब की मनमानी।
देख बरसते बादलों को ऊपर
मलिन पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं,
ज्यों बरसाये बादल बूंद- बूंद
त्यों नित ये अद्भुत छटा बिखेरते हैं।
अजब- गजब के रंग बिखरे
इस बर्षा से चहुंदिशि फैले हरियाली,
जब उमड़- घुमड़ बरसे बदरा
तब मनमोहक दिखती हरदम डाली!
आह! काले बादलों वाली बर्षा
तू भी क्या- क्या गुल खिलाती है,
हरदम बूंद-बूंद बरस-बरसकर
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है।
ये घनघोर काली घटाएं तो
बार- बार बरसाये बरसा की बौछारे
बरसकर भर देते मन उमंग तब
जब घर ऊपर घिर- घिर आते सारे।
धन्य - धन्य! वे घर सारे
जिनके ऊपर बरसे ऊपर का पानी,
धन्य- धन्य हैं वे जीव धरा पर
जिनको फल मिलता नित मनमानी।
कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

                                                      ........कविता रावत

मित्र और मित्रता :  एक नज़र

मित्र और मित्रता : एक नज़र















मैत्री बहुत उदार होती है पर प्रेम कृपण होता है
मित्र के घर का रास्ता कभी लम्बा नहीं होता है

मित्र के लिए जो भार उठाया वह हल्का मालूम होता है
जो मित्रों का भला करे वह अपना ही भला करता है

बिना विश्वास कभी मित्रता चिर स्थाई नहीं रहती है
मैत्री में महज औपचरिकता अधूरेपन को दर्शाती है

दूसरों से तुलना करने पर दोस्त भी दुश्मन बन जाता है
दो मित्रों के विवाद में निर्णायक बन एक गंवाना पड़ता है

मित्र वही जो भर्त्सना एकांत में पर प्रशंसा सबके सम्मुख करता है
सच्चा मित्र दूसरों को हमारे गुण पर अवगुण हमें बताता है

जो उपहार में मित्र खरीदते हैं उन्हें दूसरे कोई खरीद ले जाते हैं
मित्र सांरगी के तार हैं ज्यादा कसने पर टूटकर बिखर जाते हैं

अनपरखे मित्र अनतोड़े अखरोट के तरह होते हैं
विपत्ति में सच्चे-झूठे मित्र पहचान लिए जाते हैं

झूठे मित्रों की जुबाँ मीठी लेकिन दिल बहुत कडुवे होते हैं
झूठे मित्र व परछाई सूरज चमकने तक ही साथ रहते हैं

मित्रों का चयन थोड़े पर चुनिंदा पुस्तकों की भांति कर लिया
तो समझो जिंदगी में हमने एक साथ बहुत कुछ पा लिया

                             ......कविता रावत
जब कोई मुझसे पूछता है

जब कोई मुझसे पूछता है

आज की भाग-दौड़ की जिंदगी के बीच अनियमित दिनचर्या, खान-पान, रहन-सहन, बढ़ते प्रदूषण आदि कारणों से इन्सान को कई प्रकार के व्याधियों ने आ घेरा हैं, किसे कब क्या हो जाय, कोई कुछ नहीं बता सकता? फिर भी हमारे इर्द-गिर्द ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं, जो अपनी स्वस्थ बने रहने की घोषणा करते हुए किसी अच्छे-खासे दिखते पर व्याधिग्रस्त व्यक्ति का मजाक उड़ाने में जरा भी आगे-पीछे नहीं सोचते. ऐसे में भला एक पीड़ित व्यक्ति भला क्या सोचेगा? ऐसे ही पीड़ित व्यक्ति की मनोदशा का चित्रण ..............


जब कोई मुझसे पूछता है.......
'कैसे हो?'
तो होंठों पर ' उधार की हंसी'
लानी ही पड़ती है
और मीठी जुबां से
'ठीक हूँ '
कहना ही पड़ता है
अगर जरा भी जुबां फिसल गई
और कह दिया
'नहीं बीमार हूँ'
तो समझो कि अब मैं बेकार हूँ!
फिर कुछ लोग कहाँ कहने से चूकते हैं
दुनिया भर की दवा-दारू बताने लगते है!
कहते हैं-
'अरे भई! तुम तो कुछ भी खाते-पीते नहीं हो
फिर भी बीमार हो
अरे हमें देखो! हम तो सबकुछ खाते-पीते हैं
पर कभी कहाँ तुम्हारी तरह बीमार होते हैं?
अरे भई! सबकुछ खाया-पिया करो
और हमारी तरह स्वस्थ रहा करो.''
बेवस होकर सोचता हूँ कि -
अच्छे-खासे दिखते इंसान को
जब कोई रोग लग जाता है
तो क्यों वह कुछ लोगों के लिए
अच्छा-खासा मजाक सा बन जाता है!
क्यों वे लोग भी आकर दवा-दारू बताते हैं
जो ज़माने भर के बेदर्द हुआ करते हैं

                     . .. कविता रावत