ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Thursday, January 28, 2010

रखना इनका पूरा ध्यान




बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान
दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया
पहले रखना इनका पूरा ध्यान!

मल-मल कर गुटका मुंह में डालकर
हुए हम चिंता मुक्त हाथ झाड़कर
जब सर्वसुलभ वस्तु अनमोल बनी यह
फिर क्यों छोड़े? क्या घर, क्या दफ्तर!

हम चले सफ़र को बस में बैठकर
जब रुकी बस लाये हम बीडी-गुटका खरीदकर
सड़क अपनी चलते-फिरते सब लोग अपने
फिर काहे की चिंता? गर थूक दे इधर-उधर

सुना था रामराज में बही दूध की नदियाँ
और कृष्णराज में मक्खन-घी खूब मिला
पर आज गाँव-शहर में बहती दारु की नदियाँ
देख गटक दो घूंट फतह कर लो हर किला

अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा, अनपढ़ यहाँ कोई भेद नहीं
सब मिल बैठ बड़े मजे से खा-पीकर खूब रंग जमाते!
बिना खाए-पिए गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी भैया!
गली-सड़क, मोहल्ले, घर-भर यही बतियाते!

-Kavita Rawat

Tuesday, January 26, 2010

जरा होश में आओ




हमारे देश को गणतंत्र दिवस मानते हुए 60 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, बावजूद इसके यह सोचनीय स्थिति है कि इतने वर्ष बीत जाने पर भी देश में जाति, संप्रदाय, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अपराध और राजनीतिक मूल्यहीनता बढ़ता ही जा रहा है, इसके फलस्वरूप देशप्रेम कि भावना में तीव्र ह्रास परिलक्षित होता है.

आज देश को बाहरी आतंकवाद से ही नहीं अपितु अपने देश के असामाजिक तत्वों की विघटनकारी और शंतिविरोधी गतिविधियों के कारण शांति बनाये रखने के लिए अघोषित युद्ध की स्थिति से बार-बार जूझना पड़ रहा है. इसलिए आज हर गली, मोहल्ले, गाँव और शहर स्तर पर सक्रिय जनक्रांति लाने की सख्त आवश्यकता है. इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत है कुछ पंक्तियाँ......

कहीं अचानक मच ज़ाती भगदड़
कहीं छिड़ ज़ाती है ख़ूनी संघर्ष
भर ज़ाती जब दिलों में दहशत
तब जहाँ से गायब होता हर्ष
आतंक के साए से सिहर जाते लोग
कोई तो इन आतंकियों को भगाओ
देश को आंतक करने वाले दरिंदो
जरा होश में आओ.

आसुंओं से नम रहती आँखे उनकी सदा
जिनके प्रियजन शहीद हो चुके है
रोते-कलपते जीवन बिताते वे
जो असहाय बन चुके है
यह देख क्यों मन नहीं पिघलता इनका!
कोई तो इन्हें दयाभाव सिखलाओ
देश को आंतक करने वाले दरिंदो
जरा होश में आओ.

क्यों बेकसूरों पर चलाते हैं गोलियां
क्यों आंखे मूंद लगा देते है आग
क्यों शांत घरों में भर देते सूनापन
क्यों जला डालते हैं घर के चिराग
क्यों उजाड़ बनाते घर आँगन
कोई तो इन्हें सबक सिखाओ
देश को आंतक करने वाले दरिंदो
जरा होश में आओ.

क्यों अपने ही बन्धुं-बांधवों को मारकर
ये कर देते हैं रिश्तों को तार-तार
मानवता के ऐसे इन दुश्मनों को
इस मानव जीवन की है धिक्कार!
हैवानियत पर क्यों तुल जाते ये
कोई तो इन्हें मानवता सिखलाओ
देश को आंतक करने वाले दरिंदो
जरा होश में आओ.

सभी ब्लोगर्स को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं

-Kavita Rawat

Friday, January 22, 2010

बुरी आदत




कभी-कभी कुछ लोकाक्तियों के माध्यम से जिसमें मनुष्य की विवशता की हँसी या किसी वर्ग विशेष पर कटाक्ष परिलक्षित होता है, उसे एक सूत्र में गूंथने के लिए मैं कविता/रचना के माध्यम से प्रयासरत रहती हूँ. इसी सन्दर्भ में बुरी आदत पर एक प्रस्तुति.....


गधा कभी घोडा नहीं बन सकता, चाहे उसके कान क़तर दो
नीम-करेला कडुआ ही रहेगा, चाहे शक्कर की चासनी में डाल दो

हाथी को कितना भी नहला दो वह अपने तन पर कीचड मल देगा
भेड़िये के दांत भले ही टूट जाय वह अपनी आदत नहीं छोड़ेगा

पानी चाहे जितना भी उबल जाय उसमे चिंगारी नहीं उठती है
एक बार बुरी लत लग जाय तो वह आसानी से नहीं छूटती है

एक आदत को बदलने के लिए दूसरी आदत डालनी पड़ती है
और अगर आदत को नहीं रोका जाय तो वह जरुरत बन जाती है


-Kavita Rawat

Monday, January 18, 2010

जंगल के राजा शेर ने एक आपात बैठक बुलाई



एक बार जंगल के राजा शेर ने
एक आपात बैठक बुलाई
प्रस्ताव रखा-
'हम सबका भी एक कुशल राजनेता हो
जिसमें हो गहरी सूझ-बूझ और चतुराई'
सुनकर प्रस्ताव झटके से गजराज बोले-
"मैं हूँ शक्तिशाली मैं ही राजनेता बनूँगा
जो भी गड़बड़ घोटाला करेगा शासन में
उसे मैं तुरंत मसल कर रख दूंगा"
सुनकर गजराज के बातें हिलते-डुलते
भालूराम जी बोले-
"आप सभी की कृपा से यदि मैं राजनेता बनूँगा
तो मैं सभी भाई-बंधुओं से पक्का वादा करता हूँ
कि प्रतिदिन सबको नए-नए डिस्को दिखलाऊंगा"
भालूराम जी कि बातें सुनकर शरमाते हुए
गधेचंद जी बोले -
"भाई-बंधुओं! मैं सीधा-साधा मेरी सुनो मुझे राजनेता बनाना
मेरी पीठ पर लाद-लादकर ईंट-पत्थर तुम
अपनी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी करते जाना"
यह सुनते ही एक कोने में दुबका मूषकराज उछालकर बोला-
"मुझे बना लो अपना राजनेता, मेरा राज-काज होगा महान
कोई न होगा भूखा-नंगा, सबको मिलेगा रोटी-कपडा और मकान"
सबके मन में राजनेता बनने को तीव्र लालसा
सबने अपनी-चिकनी-चुपड़ी बातें सुनाई
किन्तु समस्या जहाँ की तहां रही
सुलझाये सभी किन्तु सुलझ न पाई
अंत में राजा शेर से मंत्रणा करके
मंत्री महोदय सियार बोले-
"साथियो! हमने तय किया है हम प्रजातंत्र की राह चलेंगे
अब वोट के द्वारा ही हम अपना राजनेता चुना करेंगे"
यह सुनकर सबने प्रस्ताव का समर्थन किया
और अपना-अपना मत डालना आरंभ किया
जब मतगणना हुई और मूषकराज राजनेता चुने गए
यह देखकर वे मन में फूले न समाये
राजनेता बनकर मूषकराज ने चतुराई से हेर-फेर कर
फाईलें कुतर-कुतर कर बिल में दे डाले
कभी पकड़ न पाया कोई उसे
जब कर डाले उसने घोटाले

copyright@Kavita Rawat

Friday, January 8, 2010

सूनापन



नव वर्ष के आगमन पर ब्लॉग पर किसी को भी शुभकामनाएं नहीं दे पाई, जिसका मुझे बेहद अफ़सोस है. जबकि मैंने सोचा था कि इस वर्ष मैं ब्लॉग पर पहली तारीख को सारा दिन जितने संभव हो सके, उतने ब्लॉग पर शुभकामनाएँ प्रेषित करुँगी, लेकिन सबकुछ उल्टा हो गया, कुछ संयोग ही ऐसा बना कि सर्दी-खांसी के चलते ३० दिसम्बर को मेरा स्वास्थ्य बहुत ख़राब हो गया, सांस लेने भी बहुत तकलीफ होने लगी, जिसके चलते नर्सिंग होम्स में भर्ती होना पड़ा. ३० तारीख से नव वर्ष की 7 तारीख हॉस्पिटल में ही निकल गयी. स्वाइन फ्लू की आशंका के बीच झूलती रही और जब टेस्ट नेगेटिव आया और केवल निमोनिया बताया तो सच मानो सब परिचित नव वर्ष की नहीं बल्कि स्वाइन फ्लू से बच जाने की मुझे बधाई देते नजर आये. अभी निमोनिया के कारण घर पर डॉक्टर ने ८-१० दिन का रेस्ट करने के साथ ही कुछ भी काम न करने की भी हिदायत दी है, लेकिन आज एक सहेली के लैपटॉप को देखा तो आप ब्लॉगर को ख्याल आया और उसी से यह टाइप करने को कहा. कविता तो अभी कुछ नहीं लिख पा रही हूँ, बस सोचा कि नए साल में अपनी सबसे पहले लिखी कविता जो को १५ वर्ष पूर्व जब मैं कविता लिखने के बारे में सोचती भी नहीं थी, कुछ दुखदायी परिस्थितियों के कारण अपना दुःख छुपाने के लिए लिख दी थी, उसी को टाइप कराकर आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही हूँ. पता नहीं नए वर्ष में मेरी सबसे पहले कविता और वह भी दुख भरी आप लोग क्या सोचेंगे.. क्या कहेंगे........... पर इस हालात में क्या किया जाय, कुछ परिस्थितियों के आगे मजबूर जो होना पड़ता है............................
सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.


दिखे दूर-दूर दमकते रेतकण
तरसता बिन पानी यह मन
नीरस, निरुत्साह और बेवस
लगता मरुस्थल सा यह जीवन
मिलता नहीं मरू में छाँव-पानी
दिखती हरतरफ कंटीली झाडियाँ
भागे यह पागल मन दूर पहाड़ पर
किन्तु हरतरफ दिखती वीरान पहाडियां
दिन को सूरज अंगार सा बरसाता
रात को चांदनी किसलिये छटा बिखेरती
तड़फ-तड़फ कर मरते जीव जब भू पर
तब भी सूरज को तनिक दया न आती
न हट सकता अंगार बरसाता सूरज
न जीवन पथ से कांटें हट सकते हैं
कांटे दुखदायी होते हैं सदा
न ये फूल बनकर राहत पहुंचाते हैं
लगता कभी धुप अंधकार में हूँ खड़ी
जहाँ उदासी और है सन्नाटा
हूँ सुख-दुःख के पलड़े में खड़ी
पर दुःख की ओर झुका है कांटा
आती घटाएं घिर-घिर, घाट-घाट पर
लेकिन आकर तूफ़ान उन्हें उड़ा ले जाता है
देख हतोत्साहित खड़ी ही रह जाती हूँ मैं
दिन को भी सूनापन घिर-घिर आता है

copyright@Kavita Rawat