ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Friday, January 8, 2010

सूनापन



नव वर्ष के आगमन पर ब्लॉग पर किसी को भी शुभकामनाएं नहीं दे पाई, जिसका मुझे बेहद अफ़सोस है. जबकि मैंने सोचा था कि इस वर्ष मैं ब्लॉग पर पहली तारीख को सारा दिन जितने संभव हो सके, उतने ब्लॉग पर शुभकामनाएँ प्रेषित करुँगी, लेकिन सबकुछ उल्टा हो गया, कुछ संयोग ही ऐसा बना कि सर्दी-खांसी के चलते ३० दिसम्बर को मेरा स्वास्थ्य बहुत ख़राब हो गया, सांस लेने भी बहुत तकलीफ होने लगी, जिसके चलते नर्सिंग होम्स में भर्ती होना पड़ा. ३० तारीख से नव वर्ष की 7 तारीख हॉस्पिटल में ही निकल गयी. स्वाइन फ्लू की आशंका के बीच झूलती रही और जब टेस्ट नेगेटिव आया और केवल निमोनिया बताया तो सच मानो सब परिचित नव वर्ष की नहीं बल्कि स्वाइन फ्लू से बच जाने की मुझे बधाई देते नजर आये. अभी निमोनिया के कारण घर पर डॉक्टर ने ८-१० दिन का रेस्ट करने के साथ ही कुछ भी काम न करने की भी हिदायत दी है, लेकिन आज एक सहेली के लैपटॉप को देखा तो आप ब्लॉगर को ख्याल आया और उसी से यह टाइप करने को कहा. कविता तो अभी कुछ नहीं लिख पा रही हूँ, बस सोचा कि नए साल में अपनी सबसे पहले लिखी कविता जो को १५ वर्ष पूर्व जब मैं कविता लिखने के बारे में सोचती भी नहीं थी, कुछ दुखदायी परिस्थितियों के कारण अपना दुःख छुपाने के लिए लिख दी थी, उसी को टाइप कराकर आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रही हूँ. पता नहीं नए वर्ष में मेरी सबसे पहले कविता और वह भी दुख भरी आप लोग क्या सोचेंगे.. क्या कहेंगे........... पर इस हालात में क्या किया जाय, कुछ परिस्थितियों के आगे मजबूर जो होना पड़ता है............................
सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.


दिखे दूर-दूर दमकते रेतकण
तरसता बिन पानी यह मन
नीरस, निरुत्साह और बेवस
लगता मरुस्थल सा यह जीवन
मिलता नहीं मरू में छाँव-पानी
दिखती हरतरफ कंटीली झाडियाँ
भागे यह पागल मन दूर पहाड़ पर
किन्तु हरतरफ दिखती वीरान पहाडियां
दिन को सूरज अंगार सा बरसाता
रात को चांदनी किसलिये छटा बिखेरती
तड़फ-तड़फ कर मरते जीव जब भू पर
तब भी सूरज को तनिक दया न आती
न हट सकता अंगार बरसाता सूरज
न जीवन पथ से कांटें हट सकते हैं
कांटे दुखदायी होते हैं सदा
न ये फूल बनकर राहत पहुंचाते हैं
लगता कभी धुप अंधकार में हूँ खड़ी
जहाँ उदासी और है सन्नाटा
हूँ सुख-दुःख के पलड़े में खड़ी
पर दुःख की ओर झुका है कांटा
आती घटाएं घिर-घिर, घाट-घाट पर
लेकिन आकर तूफ़ान उन्हें उड़ा ले जाता है
देख हतोत्साहित खड़ी ही रह जाती हूँ मैं
दिन को भी सूनापन घिर-घिर आता है

copyright@Kavita Rawat

11 comments:

  1. swasthya hi hamare liye shubhkamnayen hai.........swasth rahen

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  2. शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हो , नव वर्ष मंगलमय हो । अच्छी रचना

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  3. swasthy ka dhyan rakhiye .sheeghr swasth labh kee shubhkamnae.

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  4. आप शीघ्रातिशीघ्र स्वश्थ हों इसी कामना के साथ आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं।

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  5. सुख-दुःख यही तो जीवन है, अति शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना. रही कविता की बात कविता तो (मन के उदगार हैं) कविता है "दुख भरी" या "सुख-भरी" नहीं.

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  6. कविता जी आपके स्वास्थ्य के बार्वेरे मे जान कर बहुत चिन्ता हुई। सर्दी भी बहुत है अपना ध्यान रखना। नये साल की बहुत बहुत शुभकामनायें। रचना बहुत अच्छी है।

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  7. आप शीघ्रातिशीघ्र स्वश्थ हों इसी कामना के साथ आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं।

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  8. द्वीपांतर परिवार की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  9. निराशा से बाहर निकलिये नववर्ष की शुभकामनाये।

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  10. नववर्ष / मकर संक्रांति कि शुभकामनाएं
    आप शीघ्रा स्वश्थ हों इसी कामना के साथ


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