बुरी आदत



कभी-कभी कुछ लोकाक्तियों के माध्यम से जिसमें मनुष्य की विवशता की हँसी या किसी वर्ग विशेष पर कटाक्ष परिलक्षित होता है, उसे एक सूत्र में गूंथने के लिए मैं कविता/रचना के माध्यम से प्रयासरत रहती हूँ. इसी सन्दर्भ में बुरी आदत पर एक प्रस्तुति.....


गधा कभी घोडा नहीं बन सकता, चाहे उसके कान क़तर दो
नीम-करेला कडुआ ही रहेगा, चाहे शक्कर की चासनी में डाल दो

हाथी को कितना भी नहला दो वह अपने तन पर कीचड मल देगा
भेड़िये के दांत भले ही टूट जाय वह अपनी आदत नहीं छोड़ेगा

पानी चाहे जितना भी उबल जाय उसमे चिंगारी नहीं उठती है
एक बार बुरी लत लग जाय तो वह आसानी से नहीं छूटती है

एक आदत को बदलने के लिए दूसरी आदत डालनी पड़ती है
और अगर आदत को नहीं रोका जाय तो वह जरुरत बन जाती है


-Kavita Rawat

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January 22, 2010 at 7:35 PM

Bahut hi satik kaha aapne kavitaji

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January 22, 2010 at 7:35 PM

bahut achhi aur sacchi baat...........

dhnyavaad !

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January 22, 2010 at 7:41 PM

सारी कहावते बहुत अच्छी लगी पर विजेता है---
पानी चाहे जितना भी उबल जाय उसमे चिंगारी नहीं उठती है
अच्छी और उपयोगी जानकारी ..आभार!

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January 23, 2010 at 12:28 PM

बस यही सोच अक्सर मन में बहने लगती सबके सुख-दुःख की सरिता, जब-जब मचता घमासान अंतर्मन में तब-तब साकार हो उठती है कविता|
douno panktiyo me ek ke baad ek ka naam aa gaya .hai na sanjog .
Mujhe betiya bahut pyaree hai isee se shayad bhagvan ne teen dee hai. Kavita duniya me jo apanapan de vo apne hai beta....baki naam ke rishte hai jo hum nibhate bhee hai. swasthy ka dhyan rakho ........

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January 23, 2010 at 7:56 PM

कमाल! अद्भुत!! बेजोड़!!!

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January 24, 2010 at 2:47 PM

सत्य वचन ........ मुहावरों में अक्सर सच ही बयान होता है ...... जन लोकोक्तियाँ यथार्थ के धरातल में ही पलटी हैं ......

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January 26, 2010 at 12:11 AM

गणतंत्र दिवस की आपको बहुत शुभकामनाएं

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