रखना इनका पूरा ध्यान



बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान
दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया
पहले रखना इनका पूरा ध्यान!

मल-मल कर गुटका मुंह में डालकर
हुए हम चिंता मुक्त हाथ झाड़कर
जब सर्वसुलभ वस्तु अनमोल बनी यह
फिर क्यों छोड़े? क्या घर, क्या दफ्तर!

हम चले सफ़र को बस में बैठकर
जब रुकी बस लाये हम बीडी-गुटका खरीदकर
सड़क अपनी चलते-फिरते सब लोग अपने
फिर काहे की चिंता? गर थूक दे इधर-उधर

सुना था रामराज में बही दूध की नदियाँ
और कृष्णराज में मक्खन-घी खूब मिला
पर आज गाँव-शहर में बहती दारु की नदियाँ
देख गटक दो घूंट फतह कर लो हर किला

अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा, अनपढ़ यहाँ कोई भेद नहीं
सब मिल बैठ बड़े मजे से खा-पीकर खूब रंग जमाते!
बिना खाए-पिए गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी भैया!
गली-सड़क, मोहल्ले, घर-भर यही बतियाते!

-Kavita Rawat

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January 28, 2010 at 9:23 PM

मूल्य निर्णय न देकर व्यंग्यात्मक ब्याख्यान अच्छा लगा।

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January 28, 2010 at 9:28 PM

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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January 28, 2010 at 10:36 PM

सटीक अभिव्यक्ति!

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January 29, 2010 at 9:28 AM

bahut-bahut dhanyavad aapka,mai prayas kr raha hun, prerna ke liye aap logon ka sahyog or margdarshan chahiye ki main bhi blog ki is duniya mai muththi bhar jameen hasil kar sakun, thanks once again......

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January 29, 2010 at 11:10 AM

सही कहा आपने , लोगों के जीवन में घुस गया है

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January 29, 2010 at 8:21 PM

कविता और उसमे भी व्यंगात्मक ।बिना खाये पिये गाड़ी कैसे बढेगी ।आजकल कुछ ज्यादा ही शौक बढता चला जा रहा है

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January 29, 2010 at 8:27 PM

sambodhan accha laga bete bas ek salah hai jee hata do chaho to see lagao varna aise bhee chalega.....

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January 30, 2010 at 7:29 AM

.... बेहद प्रभावशाली !!!

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January 30, 2010 at 9:56 AM

कविता जी बहुत अच्छा व्यंग है सही मे आज कल रोटी खाने को मिले न मिले मगर नशा जरूरी है समाज मे फैली दुर्व्यस्न की परकाष्ठा पर अच्छा व्यंग शुभकामनायें

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January 30, 2010 at 2:01 PM

अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा, अनपढ़ यहाँ कोई भेद नहीं
सब मिल बैठ बड़े मजे से खा-पीकर खूब रंग जमाते!
बिना खाए-पिए गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी भैया!
गली-सड़क, मोहल्ले, घर-भर यही बतियाते!
Antarmukh kar diya aapne!

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January 30, 2010 at 2:03 PM

बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान
दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया
पहले रखना इनका पूरा ध्यान ...

सटीक व्यंग है आज की सामाजिक हालात पर ......... समाज की दिशा बदलती जा रही आई ...... मूल्य बदल रहे हैं .......

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February 2, 2010 at 9:55 AM

nashe ke bare mein aapka ye vyang aapki gahan peeda se ubhra hai esliye ye kewal vyang nahi hai ...peeda se uthi aawaj hai jo ese kavita ke kareeb le jati hai....aapki ye kavita aaj ki jarurat hai ...hardik badhai

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February 2, 2010 at 5:08 PM

इस कविता का पर्चा बनवाकर बँटवा दिया जाये ?

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May 30, 2016 at 2:36 PM

सादर नमन
बिना सूचना
कल के पाँच लिंकों का आनन्द में ये रचना प्रकाशिक होगी
सादर

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