ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Saturday, February 27, 2010

ख़ुशी लेकर होली आयी



है साथ रंगभरी सौगात ख़ुशी की लेकर होली आयी
देखो! गाँव-शहर मची धूम सबके मन रंग कितना भायी
आओ सद्भाव, एकता, प्रेम, समरसता के रंग घोलें
बना स्नेह कुण्ड भर पिचकारी बरस फुहार होली खेलें

.... कविता रावत

रंगों के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Friday, February 19, 2010

हर बात हमारी है निराली


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हमारे देश में नारी के लिए "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" यानि  जहाँ नारी की पूजा की जाती है, वहां देवता रमते हैं. लेकिन वास्तव में  कुछ ऐसा दिखता नज़र नहीं आता है. आज जिस तरह से नारी संबोधनकारी गलियों
-->की बौछार सरेआम होते दिखती है, जिसमें अनपढ़ हो या पढ़े-लिखे सभी गाहे-बजाये शामिल होते दिखते हैं, उससे साफ़ झलकता हैं कि हमारा आज का  सुसंस्कृत समाज इस दिशा में कितनी तरक्की कर रहा है.  क्या यह स्वस्थ समाज की दिशा में बाधक नहीं है? ......................
प्रस्तुत हैं
कुछ झांकियां..... .....

सड़क, बस या हो रेल का कोई सफ़र
हम रहते सदा चिंतामुक्त और बेखबर
हर जगह अपने ही लोग नज़र आये हमें
फिर काहे की चिंता! क्यों देखें इधर-उधर
माफ़ करना गर फिसले जुबाँ कभी
और झरे मोती बनकर  दो-चार गाली
आजाद देश के आजाद पंछी है हम
हर बात हमारी है निराली!

हम ड्राईवर सबको ढ़ोते फिरते
चाहे चपरासी हो या कोई अफसर
पर जब आते टेंशन में हम भैय्या
तब दिखता न घर न दफ्तर
पान-गुटखा-बीडी-सिगरेट साथ देते
और है जुबाँ की शान हमारी गाली
आजाद देश के आजाद पंछी है हम
हर बात हमारी है निराली!

बहुत सीधे-साधे किस्म के जीव है हम
चाय-गुटका-दारु से काम चला लेते हैं
रीढ़ की हड्डी हैं हम सरकार की भैय्या
हम सबके प्यारे बाबू कहलाते हैं
सबकुछ सीख लिया हमने भी भैय्या
किसको प्यार, किसको देनी है गाली
आजाद देश के आजाद पंछी है हम
हर बात हमारी है निराली!

जनता का सारा बोझ सर पर हमारे
हम मिलजुल, सोच-समझकर काम करते हैं
हम सीख गए बखूबी गोटियाँ जमाना भैय्या
तभी तो हम नेता-अफसर कहलाते हैं
पर अगर कोई बिगाड़ दे बना खेल अपना
तो हम पुचकार कर उसे देते दो-चार गाली
आजाद देश के आजाद पंछी है हम
हर बात हमारी है निराली!

सड़क, घर-दफ्तर, पार्क या कहीं सफ़र में
जमती चौकड़ी, होती चर्चा, बंटती मुफ्त गाली
कोई कुछ भी बके चुप खिसक लेना भैय्या
है अपनी जनता पर है बहुत भोली-भाली

-Kavita Rawat

Sunday, February 14, 2010

शाम ढले तेरी याद का आना


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जिंदगी में प्यार खुशनसीब वालों को ही नसीब होता है,
जो ज्यादा रुलाता है, वही दिल से सबसे करीब होता है.
जहाँ प्यार मिले वही जगह सुहानी है,
जहाँ प्यार बसता है, वहीँ जिंदगानी है.

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वेलेंटाइन डे के अवसर पर आज से लगभग १०-१२ वर्ष पूर्व लिखी अपनी  एक प्यारभरी प्रस्तुति प्रस्तुत कर रही हूँ. प्यार के बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि जिसे भी जिंदगी में सच्चा प्यार मिल जाता है, उसकी जिंदगी आसान हो जाती है.  प्रस्तुत है...............



शाम ढले तेरी याद का आना
आकर फिर दूर न जाना.

अक्सर याद आती है तेरी प्यारभरी बातें
वे छुपते-छुपाते प्यारभरी मुलाकातें
जब प्यार में एक-दूजे में खो जाते
खोकर प्यार भरी दुनिया की सैर करते
अच्छा लगता है प्यार में डूब जाना
डूबकर तेरे करीब आना
शाम ढले तेरी याद का आना
आकर फिर दूर न जाना

पागल मन का डूबकर प्यार में
न जाने क्या-क्या सपने देख लेना
तेरा कुछ भी न कहकर प्यार में
कभी आँखों से ही बहुत कुछ कह देना
अच्छा लगता प्रेमभरी मूक भाषा को
प्यार-भरे दिल का पढ़ लेना
शाम ढले तेरी याद का आना
आकर फिर दूर न जाना

दिल करता है मैं हरपल ही
तेरे करीब रह तुझे ही देखा करूँ
भूलकर दुनिया के हर बंधन
यूँ ही खोकर प्यार में डूबी रहूँ
अच्छा लगता है इस कदर
अक्सर तेरे प्यार में डूब जाना
डूबकर प्यार महसूस करना
शाम ढले तेरी याद का आना
आकर फिर दूर न जाना

न परखना कभी प्यारभरे दिल  को
हर कदम पर साथ मेरा  देना
अपना भी होगा खुशियों भरा आशियाना
बस सदा प्यार जगाये रखना
जब भी उमड़े प्यार दिल में
प्यारभरी इबारत लिख भेजना
शाम ढले तेरी याद का आना
आकर फिर दूर न जाना

-Kavita Rawat
 

Thursday, February 11, 2010

जब निराश हो भूलोक से बैरंग लौटे शिव-पार्वती



एक दिन पार्वतीजी शिवजी से बोली-
"भगवन! भूलोक पर आज लोग इतना कमर्काण्ड करते है
फिर भी वे क्यों इसके लाभ से वंचिंत रह जाते है?
प्रश्न सुन गंभीर होकर शिवजी बोले-
"चलो हम भूलोक चलकर तुमको आँखों देखी दिखलाएं
क्यों निष्फल हो रहे हैं पूजा-पाठ रहस्य समझाएं"
शिवरात्रि का शुभ दिन भीड़ बहुत थी मंदिर में
भूखे-नंगे चीथड़ों में लिपटी बेजान जानें बैठ आस लगाये थे
कि कोई तो शिव के नाम देगा कुछ न कुछ पेट भर
यही सोच धसीं आँखों से सबपर अपनी गिद्ध-दृष्टि जमाये थे
पार्वती जी बन बैठी सुंदरी साध्वी पत्नी
शिवजी ने कोढ़ी रूप धर लिया
वहीँ शिव मंदिर की सीढ़ियों में
दोनों ने अपना आसन जमा दिया
सज-धज शिव दर्शन को आते -जाते लोग
बीच राह में देख कोढ़ी को नाक-भौं सिकोड़ते
पर देख साथ में सुंदरी साध्वी बैठी
रख बुरी नीयत, घूरकर सिक्के उछालते
देख यह पाखंड कुत्सित स्वरुप मंदिर में
पार्वती जी मन ही मन बहुत घबराई
"लौट चलिए अब अपने कैलाश पर"
पति अपमान वह सहन न कर पाई
निराश हो बैरंग लौटे शिव-पार्वती जी
तब महाशिवरात्रि को जब ध्यान लगाया
तो कुछ ही गिने चुने सच्चे भक्त दिखे
बाकी सब में धार्मिक आडम्बर ही पाया
'यह कैसी सर्वोत्कर्ष्ट, शक्तिशाली कृति हमारी'
बेवस हो आँखों देखी दोनों सोच में डूब गए
कब समझेगें इंसान, इंसान को इंसान जैसे
कैसे,किसको समझाएं वे भी हिम्मत हार बैठे


सभी ब्लोग्गर्स को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें.

-Kavita Rawat

Monday, February 8, 2010

दिल को दिल से राह होती है


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दिल को दिल से राह होती है
जब दिल में जगह बन जाय
तो घर में भी जगह बन जाती है

दिल आदमी का छुपा हुआ खजाना है
छोट-छोटे उपहार दिल से दिए जाते हैं
पर बड़े-बड़े उपहार दौलत दिखाना है.

दिल की ख़ुशी दौलत से बढकर है
यह हजारों लोगों से गवाही से बढकर है

जब दिल में भभक रही हो ज्वाला
तो कुछ चिंगारियां मुहं से बाहर निकलती हैं
दिल तो कांच का महल है
जिसकी मरम्मत नहीं की जा सकती है

दिल में लगी हो आग तो दिमाग में धुंआ भर जाता है
ऑंखें छलकने लगती हैं और दिल भर-भर आता है



-Kavita Rawat

Wednesday, February 3, 2010

रहता जीवन कितना अकेला


जीवन में यदि थोड़ी सी व्यथा हो तो उसका वर्णन सबके सामने कर लिया जाता है, लेकिन यदि वह गहरी हो तो वह मूक ही बनी रह जाती है. जिसे सहन करना कठिन होता है लेकिन कभी-कभी यही व्यथा अपनों की भीड़ से हटकर अनजाने रिश्तों की व्यथा में डूबकर बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ ही लेती है और फिर उसकी परिणति एक अलग ही व्यथा का रूप धर हमारे सामने उपस्थित होती है. कुछ ऐसे ही मनोभावों की प्रस्तुति .......


घेर लेती उदासी और सूनापन
न दिखता कोई साथ सहारा
मन की घोर निराशा के क्षण में
बहती चाह, तमन्नाओं की व्यर्थ निरंतर धारा
सबसे अच्छे दिन, साल गुजरते जब जीवन में
सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!

-Kavita Rawat