रहता जीवन कितना अकेला

जीवन में यदि थोड़ी सी व्यथा हो तो उसका वर्णन सबके सामने कर लिया जाता है, लेकिन यदि वह गहरी हो तो वह मूक ही बनी रह जाती है. जिसे सहन करना कठिन होता है लेकिन कभी-कभी यही व्यथा अपनों की भीड़ से हटकर अनजाने रिश्तों की व्यथा में डूबकर बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ ही लेती है और फिर उसकी परिणति एक अलग ही व्यथा का रूप धर हमारे सामने उपस्थित होती है. कुछ ऐसे ही मनोभावों की प्रस्तुति .......


घेर लेती उदासी और सूनापन
न दिखता कोई साथ सहारा
मन की घोर निराशा के क्षण में
बहती चाह, तमन्नाओं की व्यर्थ निरंतर धारा
सबसे अच्छे दिन, साल गुजरते जब जीवन में
सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!

-Kavita Rawat

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February 3, 2010 at 1:12 PM

अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला....

अक्सर कभी कभी जब उदासी छाती है .......... मन अपने आप को अकेला महसूस करता है ....... सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........

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February 3, 2010 at 2:08 PM

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

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February 3, 2010 at 5:24 PM

रचना अच्छी लगी। बधाई।

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February 3, 2010 at 7:49 PM

सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........

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February 3, 2010 at 7:50 PM

PLZ VISIT MY BLOG KAVITA JI...
....देश सबका है ....
MY NEW POST..

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February 3, 2010 at 7:50 PM

प्रभावशाली रचना....वाह !!!

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February 3, 2010 at 8:53 PM

bahut sunder abhivykti........

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February 3, 2010 at 9:13 PM

ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
सही बात है बहुत भावमय मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

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February 3, 2010 at 10:54 PM

अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
...सच है. जब तक अंतर्मन में दीपक नहीं जलता जीवन खुद को सदा अकेला ही महसूस करता है.

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February 4, 2010 at 9:58 AM

बहुत ही खूबसूरत कविता..... आपने तो निःशब्द कर दिया....

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February 4, 2010 at 10:29 AM

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द गहरे भावों की प्रस्‍तुति ।

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February 5, 2010 at 5:32 PM

सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
bahut sundarkavita

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February 12, 2010 at 6:13 PM

अन्त्रदुअन्द के वीराने मे
रहता जीवन कितना अकेला
उदासी के आलम मे मन की व्यथा का सजीव चित्रण शुभकामनायें

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February 13, 2010 at 7:14 PM

कविता जी, आपका ब्लॉग पर आना पहाड़ की सैर पर आने का अनुभव देता है, बहुत बहुत साधुवाद!! लिखते रहिएगा...

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