हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ

जब भी तुम्हारा ख्याल आता है
दिल में मीठा सा दर्द उठता है
और तुम उतरने लगते हो दिल में
गहरे, अति गहरे रंग के तरह
जो जमकर उतरता नहीं
तुम वही रंग मुझे लगते हो
जो मुझमें समाये दिखते हो
जब भी दिल की धड़कन बढ़ती हैं
लगता है जैसे महसूस कर तुम्हें करीब
वे डूबकर प्यारभरी बातें करती हैं
तुम्हारा दिल भी तो धड़कता होगा
बन धड़कन प्यार की करीब आता होगा
फिर प्यारभरी बस्ती में दौड़-घूमकर
कोई खूबसूरत तराना सुनाता होगा
'यूँ ही प्यार में डूबा रहूँ' कहता होगा
तुमको सोच-सोच बुनती हूँ प्रेमरंग-तरंग
नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ

      .....कविता रावत

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April 16, 2010 at 9:56 AM

लाजवाब रचना .....प्रेम रस में डूबी ये ....सुन्दर रचना

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April 16, 2010 at 10:13 AM

Beautiful creation !

Badhai.

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April 16, 2010 at 10:29 AM

बहुत मार्मिक कविता।

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April 16, 2010 at 11:50 AM

सच भी है....प्यार की दास्ताँ तुम सुनो तो कहें

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April 16, 2010 at 12:57 PM

जब भी तुम्हारा ख्याल आता है
दिल में मीठा सा दर्द उठता है
और तुम उतरने लगते हो दिल में
गहरे, अति गहरे रंग के तरह

क्या खूब प्रेमाभिव्यक्ति है

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April 16, 2010 at 1:08 PM

तुमको सोच-सोच बुनती हूँ प्रेमरंग-तरंग
नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ


wow !!!!!!!!!


bahut khub

shkhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

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April 16, 2010 at 1:09 PM

wow !!!!!!!!!


bahut khub

shkhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

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April 16, 2010 at 1:13 PM

लाजवाब रचना ....सुन्दर रचना........
bahut sunder.......

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April 16, 2010 at 3:53 PM

bahut sundar Kavita ji...
shringaar ka achcha sanyojan...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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April 16, 2010 at 4:26 PM

नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ
........लाजवाब ,मार्मिक रचना

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April 16, 2010 at 6:03 PM

bhavnao ka ye rang pyara laga...............
sada khush raho aur sabko rakho .

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April 16, 2010 at 7:26 PM

...अतिसुन्दर, प्रसंशनीय !!

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April 16, 2010 at 10:56 PM

बहुत सुंदर.

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April 16, 2010 at 11:40 PM

धनयवाद.आप बलाग पर आई.कहा थी आज तक....सुदर रचना..

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April 17, 2010 at 12:04 AM

प्रेम रस में रची रचना...

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April 17, 2010 at 12:07 AM

लाजवाब ....बहुत अच्छी लगी यह कविता....

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April 17, 2010 at 2:46 AM

जब भी तुम्हारा ख्याल आता है
दिल में मीठा सा दर्द उठता है

कविता जी यही तो दर्द है....जो कभी ज्यादा चोट दे जाती है .पर चुपके चुपके...

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April 17, 2010 at 8:52 AM

लाजवाब, मार्मिक और अमूल्य कवीता.
"नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ"
बहुत सुंदर शब्द रचना

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April 17, 2010 at 8:57 AM

भावनाओँ पर मीरा का प्रभाव । उत्कट समर्पण ।

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April 17, 2010 at 5:55 PM

Bahut achchi kavita......
Badhiya likha hai aap ne.

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April 18, 2010 at 3:58 PM

वे डूबकर प्यारभरी बातें करती हैं
तुम्हारा दिल भी तो धड़कता होगा
दिल जब धडकता है तो चुप कहाँ रहता है
बेहतरीन रचना

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April 18, 2010 at 7:05 PM

प्रेम की भावनात्मक अभिव्यक्ति .... किसी की प्रेम-धुन बन जाना .... स्वयं किसी को महसूस करना ... बहुत ही लाजवाब रचना ...

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April 19, 2010 at 1:08 AM

बहुत अच्छा लगा पढ़कर

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April 19, 2010 at 1:26 PM

जब-जब मचता घमासान अंतर्मन में तब-तब साकार हो उठती है कविता -अबकी बात अंतर्मन में उनका ख्याल आया ,गहरा रंग समाया , फिर आया उनके दिल के धड़कने का ख्याल और प्रेम धुन की कविता हुई तैयार तत्काल

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April 19, 2010 at 5:55 PM

सुन्दर प्रेमगीत. पढ कर पता नहीं क्यों "पुष्प की अभिलाषा" याद आ गई जबकि इन दोनों एं कोई साम्य नहीं, सिवाय अभिलाषी होने के. बधाई.

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April 20, 2010 at 12:03 AM

जब भी तुम्हारा ख्याल आता है
दिल में मीठा सा दर्द उठता है
और तुम उतरने लगते हो दिल में
गहरे, अति गहरे रंग के तरह
achchhi rachna gahre prem ko vyakt karti hui .

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April 20, 2010 at 8:40 AM

Loving self is a step towards loving others.

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April 20, 2010 at 6:56 PM

तुम्हारा दिल भी तो धड़कता होगा
बन धड़कन प्यार की करीब आता होगा
फिर प्यारभरी बस्ती में दौड़-घूमकर
कोई खूबसूरत तराना सुनाता होगा
'यूँ ही प्यार में डूबा रहूँ' कहता होगा
तुमको सोच-सोच बुनती हूँ प्रेमरंग-तरंग
नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ

प्रेम रस में डूबी अंतर्मन की गहराइयों से लिखी कविता ......!!

बहुत सुंदर.....!!

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April 20, 2010 at 8:26 PM

प्रेम की सुन्दर और भावनात्मक अभिव्यक्ति!! बधाई.

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April 20, 2010 at 10:31 PM

आपकी कविता मुझे भी पसंद आई.
______________
'पाखी की दुनिया' में इस बार माउन्ट हैरियट की सैर करना न भूलें !!

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April 20, 2010 at 10:54 PM

अच्छा प्रेम गीत है ..लेकिन अभी नया कहने के लिये भी बहुत कुछ है ।

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April 21, 2010 at 2:49 PM

तुमको सोच-सोच बुनती हूँ प्रेमरंग-तरंग
नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ
बस आरजू है रमकर प्रेमधुन में
हरपल तेरी चाहत बनी रहूँ
Kitne nazakat bhare ehsaas hain!

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April 21, 2010 at 3:03 PM

bahut sundar rachna. jab bhi mauka mile hamare blog par bhi aaiyega http://1minuteplease.blogspot.com

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April 22, 2010 at 12:29 AM

बहुत ही सुन्दर, शानदार और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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April 22, 2010 at 8:34 PM

kavita ji aapke blog par pahli baar aana hua hai. rachna achchi lagi.....kya aap uttarakhand se hai.....

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April 23, 2010 at 12:22 PM

और तुम उतरने लगते हो दिल में
गहरे, अति गहरे रंग के तरह

क्या खूब प्रेमाभिव्यक्ति है

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April 23, 2010 at 12:22 PM

Maaf kijiyga kai dino busy hone ke kaaran blog par nahi aa skaa

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April 23, 2010 at 1:23 PM

बहुत ही उत्तम रचना है

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April 16, 2012 at 3:21 PM

कल 17/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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April 17, 2012 at 8:29 AM

हलचल के माध्यम से इस पुरानी रचना तक पहुँची............

बहुत सुंदर ...

अनु

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April 17, 2012 at 10:01 AM

तुमको सोच-सोच बुनती हूँ प्रेमरंग-तरंग
नवगीत बन होठों पर सजती रहूँ ....
बहुत सुन्दर कोमल भाव ...!

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