मजदूर : सबके करीब सबसे दूर


मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!

कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

 
...कविता रावत


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May 1, 2010 at 8:55 AM

मजदूर के नाम पर हम सिर्फ कुछ प्रकार के मजदूर ही दिखाते हैं जबकि हम सब मजदूर हैं, मैं भी एक मजदूर हूँ

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May 1, 2010 at 8:56 AM

अभी टिप्पणियां करने की मजदूरी कर रहा हूँ, और इसका पारिश्रमिक जानता हूँ

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May 1, 2010 at 9:04 AM

samvedansheel abhivykti........
ati sunder .

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May 1, 2010 at 9:09 AM

'माँ' उपन्यास के प्रथम पृष्ठ का वह अंश याद आ गया जिसके अंत में यह वाक्य है:
"ऐसे ही कोई पचास वर्ष जीने के बाद आदमी मर जाता था। "
..मुझे ऐसी रचनाएँ बहुत पसन्द हैं जो सम्वेदित कर कालजयी कृतियों के भूले अंशों की याद दिला देती हैं।
धन्यवाद।

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May 1, 2010 at 9:12 AM

मजदूरों की दयनीय स्थिति को चित्रित और उस पर सार्थक विवेचना करती आपके इस रचना को सरकार में बैठे निति निर्माताओं को पढना चाहिए /अच्छी वैचारिक रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद /

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May 1, 2010 at 9:24 AM This comment has been removed by the author.
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May 1, 2010 at 9:26 AM

बहुत बड़ी है मजदूरों की जमात
रोना ये है कि
उन में से तीन चौथाई
ये बात जानते नहीं
जानते हैं तो
मानते नहीं

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May 1, 2010 at 9:30 AM

sahi kaha kavita ji majdoor aaj ham ek shoshit samaaj ki paribhasha samajhte hai...aapne bada hriday vidarak chitran kiya....
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html
ye kavitapadhe majdooro ke haalaat bayan karti...

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May 1, 2010 at 9:34 AM

संक्षेप में यही कहूँगा एक मजदूर की मज़बूरी का बखूबी चित्रण किया है आपने , सुंदर अभिव्यक्ति .........

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May 1, 2010 at 9:38 AM

Mazdoor Mazboor aur sahansheelta ka chalta phirta stambh?

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May 1, 2010 at 10:23 AM

संवेदनाओं को झकझोरकर रख देने वाली कविता...!

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May 1, 2010 at 12:49 PM

har pal marne ko majboor
lekin fir bhi maut se dur
ye majdooor...........:(


Kavita jee.......samvedanseel rachna......!!
kabhi yahan bhi aayen
jindagi ka kainvess
www.jindagikeerahen.blogspot.com

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May 1, 2010 at 1:08 PM

.एक मजदूर के दिल में उतर कर उसकी असली पीड़ा को रेखांकित किया है आपने

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May 1, 2010 at 1:32 PM

ख्वाबों में आती रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
पर दिन-रात पिसते रहे
हर दिन देखे ख्वाब
जो होते चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

superb

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May 1, 2010 at 3:58 PM

"हरी-भरी घास
बंधी रही आस" यही है मजदूर की धुन।

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May 1, 2010 at 4:11 PM

आज मजदूर दिवस पर आपकी रचना पढकर यह सोचने पर विवश हो गया कि इन मजदूरों के मसीहा वातानुकूलित कक्ष में दुनिया के मज़दूरों एक हो का नारा बुलंद कर रहे हैं और वो मज़दूर गर्मी में पिघलती डामर के साथ उलझा है… कैसी विडम्बना है... जनाब मुनव्वर राना का शेर याद आ गया
शर्म आती है मज़दूरी बताते हुए हमको
इतने में तो बच्चे का गुब्बारा नहीं मिलता.
कविता जी आपके विचारों को सलाम!! लाल सलाम नहीं कहुँ गा..क्योंकि इसपर तो कालिख पुती है!!

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May 1, 2010 at 4:49 PM

... बेहद प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!

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May 1, 2010 at 5:32 PM

बहुत ही मार्मिक रचना।

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May 1, 2010 at 5:34 PM

आपने मजदूरों की पीड़ा को, उसकी मजबूरी को सही शब्‍द दि‍या है-
मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!
कम शब्‍दों में कि‍तने सघन भाव।

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May 1, 2010 at 5:45 PM

Kavita ji, jo pagaar pata hai woh majdoor hi hai . yeh alg baat hai ki sharirik shram ko hum doosri drishti se dekhte hain .
Appki kavita aur vichar dono hi prashansniya hain

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May 1, 2010 at 6:07 PM

बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति!

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May 1, 2010 at 6:10 PM

majdooro ki sthithi ka sahi aklan karti man ko choo gai yh rachna .

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May 1, 2010 at 6:11 PM

majdoro ki sthiti ka sahi aklan karti man ko choo gai ye rachna .

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May 1, 2010 at 11:11 PM

मार्मिक और संवेदनशील रचना! 'उगली दी आग' की जगह 'उगल दी आग' करें!

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May 2, 2010 at 8:00 AM

वाह... सुंदर भावाभिव्यक्ति... मार्मिक यथार्थ... साधुवाद...

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May 2, 2010 at 9:56 AM

kavita ji,jab bhi koi inke prati itani gambhirata se sohata hai to pata nahi unke prati samvedan shilata mere dil ko dravit kar jati hai. aapki yah post mujhe bahut hi achhi lagi shayad aap bhi meri tarah samvedan sheel hain.bahut hi achhi rachna.
poonam

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May 2, 2010 at 1:19 PM

उच्च स्तरीय संवदेनशील रचना - बधाई

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May 2, 2010 at 1:40 PM

अति सुन्दर आपने सच मे उनकी समस्याऒ को दिल से महसूस किया हॆ..आभार

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May 2, 2010 at 1:54 PM

मार्मिक और संवेदनशील रचना!

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May 2, 2010 at 5:27 PM

इतनी संवेदनशीलता
बड़े गहरे उतरी हैं आप सागर में

अगर आपकी नजर में कोई सोरायसिस का मरीज हो तो हमारे पास भेजिए ,हम उसका फ्री ईलाज करेंगे दो महीने हमारे पास रहना होगा

www.sahity.merasamast.com

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May 2, 2010 at 8:36 PM

क्या कहने साहब
जबाब नहीं
प्रसंशनीय प्रस्तुति
satguru-satykikhoj.blogspot.com

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May 3, 2010 at 11:50 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी उच्च स्तरीय

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May 3, 2010 at 4:03 PM

पहला पद ही शानदार कितने पास कितने दूर ।कविता शुरु करने के पूर्व जो विवरण दिया है उसमे जो दयनीय दशा का चित्रण किया है चित्रण के लिये जो शब्द चुने है वे बेहद मार्मिक है ।कोल्हू के बैल बन घूमते और हरी घास का सपना देखते (अधिकांश लोगों ने तो कोल्हू देखा भी न होगा कि कैसा होता है )।भूखे प्यासे गर्मी का मौसम क्या यही आदमी होने की सजा है ।(गत ग्रीषम बरसा रितु आई) उसका भी बहुत भावुक व मार्मिक चित्रण है इस रचना में ।इतने मे बबंडर आया और सब कुछ उडा ले गया यह चित्रन भी लाजवाब ।जहां तक सबल का निर्बल पर जोर आजमाइश का सबाल है तो क्या कीजियेगा यह प्रक्रति का ही नियम है ""सबै सहायक सबल के निबल न कोउ सहाय /पवन जलावत आग को दीपहिं देत बुझाय//बहुत ही अच्छी रचना ।

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May 4, 2010 at 7:48 AM

मजदूरों की व्यथा का सही चित्रण ।

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May 4, 2010 at 9:08 PM

मजदूर नहीं मजबूर पर इस सुन्दर रचना के लिए साधुवाद.

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May 4, 2010 at 10:29 PM

कभी आकर कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
उड़ा ले गया तिनका-तिनका
पल भर में मिटा गया हस्ती!
देख यह सब असहाय बन
हरदम सोचते ही रह गए
क्यों! सबल सदा ही निर्बलों पर
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!


Achchha sachchaa chitran

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May 5, 2010 at 10:10 AM

आपकी कविता को पढ़ कर अपनी लिखी इक कविता याद आ गयी .....

ओ महलों में सोने वालो
कभी देखी है ..
फुटपाथों पे सोई गरीबी ....?

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May 6, 2010 at 7:39 PM

मजदूरों की करूँ गात ... उनकी मजबूरियों को बहुत करीब से देखा और लिखा है आपने ... बहुत ही संवेदनशील है ...

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May 6, 2010 at 7:55 PM

बहुत ही संवेदनशील और मार्मिक रचना....मजदूरों की मजबूरी को बड़ी गहनता से उभारा है

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May 6, 2010 at 9:24 PM

जिन महलों को ये मजदूर बनाते हैं, तैयार होने के बाद उनमे ये जाने का ख्याल भी नहीं ला सकते...
संवेदनशील, भावपूर्ण!

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May 7, 2010 at 6:52 PM

kaavya mei
ythaarth hai...
aur ythaarth hi
sachchaa kaavyaa hai

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May 7, 2010 at 7:41 PM

अति संवेदन शील चित्रण । प्रशंसनीयता ।

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April 25, 2013 at 8:22 PM

kavita jee,
aapkee is kavita ka upyog ham ek lekh men karnaa chahte hain. aap apna mobail number den, taaki bat ho sake
RK Nirad
9431177865

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May 1, 2013 at 8:32 AM

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 02/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!

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May 2, 2013 at 8:56 AM

मानवीय सम्वेदनाओं से भरपूर
गजब है दुनियाँ
अजब है दस्तूर..........

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May 2, 2013 at 6:51 PM

bahut sundar warnan ..majdooron ki wyatha ka ....

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May 3, 2013 at 12:27 PM

सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!

बहुत खूब....बहुत सच्चा.

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