कहीं एक सूने कोने में

भरे-पूरे परिवार के बावजूद
किसी की खुशियाँ
बेवसी, बेचारगी में सिमटी देख
दिल को पहुँचती है गहरी ठेस
सोचती हूं
क्यों अपने ही घर में कोई
बनकर तानाशाह चलाता हुक्म
सबको नचाता है अपने इशारों पर
हांकता है निरीह प्राणियों की तरह
डराता-धमकाता है दुश्मन समझकर
केवल अपनी ख़ुशी चाहता है
क्यों नहीं देख पाता वह
परिवार में अपनी ख़ुशी!

माना कि स्वतंत्र है
अपनी जिंदगी जीने के लिए
खा-पीकर,
देर-सबेर घर लौटने के लिए
लेकिन
क्यों भूल जाता है
कि पत्नी बैठी होगी
दिन भर की थकी हारी दरवाजे पर
बच्चे अपने बस्ते में भरी खट्टी-मीठी
बातें सुनाने, दिखाने के लिए होंगे बैचेन
अपनी मन पसंद चीज़ खाने की प्रतीक्षा में
देर तक जाग रहे होंगे
लाचार माँ-बाप
शंका-आशंकाओं के बीच मोह से बंधी,
बुढ़ाती आखों में
दुनिया की भीड़ में बच्चे के भटक जाने का डर पाले
अपनी मद्धम होती साँसों को बमुश्किल
थाम रहे होंगे

सच तो यह है कि
सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
वे अपने ही परिवार, समाज में एक दिन
दुत्कार दिए जाते हैं
और छोड़ दिए जाते हैं
जिन्दा लावारिस लाश की तरह
सड़-गलकर मरने के लिए
कहीं एक सूने कोने में!

  .....कविता रावत

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May 8, 2010 at 8:47 AM

संवेदना-शून्य लोगों को जगाने के लिए लिखी गयी इस कविता में कविता जी का भाव-प्रेषण सुन्दर है। शुभकामनाएं।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

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May 8, 2010 at 8:56 AM

सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
बिल्कुल सही कहा आपने।
मुस्कान पाने वाला मालामाल हो जाता है पर देने वाला दरिद्र नहीं होता।

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May 8, 2010 at 8:58 AM

Bahut gambheer mudde ko sahajata se utha achhee chetana bhee jagane kee koshish acchee lagee......
Aabhar .

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May 8, 2010 at 11:28 AM

भरे-पूरे परिवार के बावजूद
किसी की खुशियाँ
बेवसी, बेचारगी में सिमटी देख
दिल को पहुँचती है गहरी ठेस
खुशियाँ घर में ही मिलेगी, पर भ्रमवश लोग बाहर ढूढते हैं

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May 8, 2010 at 11:34 AM

संवेदनशील रचना ।

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May 8, 2010 at 12:41 PM

waah samvedna aapki kavita se mukhar hui aur sabak mila samvednaheen jaanvaron ko jo insaano ke bhesh me rehte hain...

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May 8, 2010 at 1:13 PM

बहुत उम्दा रचना।

मुश्किल मुश्किल
हाँ मुश्किल
एक टिप्पणी से बचना।

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May 8, 2010 at 1:40 PM

कमाल की पंक्तिया और भाव है, संवेदना की हदों हो छुती हुई रचना!

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May 8, 2010 at 2:28 PM

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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May 8, 2010 at 2:29 PM

... बेहद प्रभावशाली

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May 9, 2010 at 12:25 AM

संवेदनशील प्रस्तुति है।

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May 9, 2010 at 1:08 AM

एक सशक्त रचना, एक ज्वलंत प्रश्न, एक जीवंत समस्या... विशेषतः परिवार के बीच पनपती सम्वादहीनता की ओर इंगित करती आपकी कविता एक घिनौने किंतु सत्य से साक्षात्कार कराती है...

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May 9, 2010 at 4:17 PM

परिवार इकाई है समाज की. परिवार सुख शान्ति से रहेगा तो समाज में सुख शान्ति होगी.

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May 10, 2010 at 7:26 PM

मार्मिक ... दिल को छूती हैं आपकी पंक्तियाँ ...

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May 10, 2010 at 7:26 PM

माना कि स्वतंत्र है
अपनी जिंदगी जीने के लिए
खा-पीकर,
देर-सबेर घर लौटने के लिए
लेकिन
क्यों भूल जाता है
कि पत्नी बैठी होगी
दिन भर की थकी हारी दरवाजे पर
बच्चे अपने बस्ते में भरी खट्टी-मीठी
बातें सुनाने, दिखाने के लिए होंगे बैचेन
अपनी मन पसंद चीज़ खाने की प्रतीक्षा में
देर तक जाग रहे होंगे
bahut prabhshalee reeti se saMwedanaaoM kaa prastutikaraN

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May 10, 2010 at 10:39 PM

करीब अस्सी प्रतिशत परिवारों की व्यथा भर दी इस रचना में ।पहला छंद पूरे परिवार के लिये .दूसरा पत्नि ,बच्चे और बुजुर्ग मा बाप के लिये।तीसरे पद मे चेतावनी कि अपने लिये जिये तो क्या जिये ।अपनी ही खुशी चाहने वाले कभी सुखी नही रह सकते ,यह एक हकीकत भी है और एक दर्शन भी ,जिसके वाबत बहुत से ग्रन्थों मे हिदायते भी दी गई है कि पडोसी के भूखे होते हुए स्वंम भोजन करलेना पाप है

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sm
May 11, 2010 at 12:18 AM

beautiful educational poem

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sm
May 11, 2010 at 12:19 AM

beautiful educational poem

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May 11, 2010 at 12:40 AM

बहुत ही संवेदनशील रचना है...इतनी माम्रिक रचना..मन को झकझोर गयी

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May 11, 2010 at 7:54 AM

सच तो यह है कि
सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
bahut hi gahra sach

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May 11, 2010 at 1:00 PM

सच तो यह है कि
सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
वे अपने ही परिवार, समाज में एक दिन
दुत्कार दिए जाते हैं ..sach kaha aapne ..behtreen dhng se likha hai aapne in bhaavon ko ..

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May 11, 2010 at 6:30 PM

This is what such people deserve.....
Beautifully encapsulated!
Regards,
Ashish :)

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May 12, 2010 at 8:18 PM

एक बेहतरीन रचना
काबिले तारीफ़ शव्द संयोजन
बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति
सुन्दर भावाव्यक्ति .साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

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May 13, 2010 at 12:36 AM

bahut hi achhi rachna...
dil mein utar gayi...
yun hi likhte rahein..
regards
http://i555.blogspot.com/
idhar ka bhi rukh karein....

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May 13, 2010 at 7:23 AM

बहुत ही अच्छी कविता....पूरा परिवार होने के बाद भी खुशियों के लिए क्यों तरसता है....आखिर एक आदमी की सनक के कारण पूरा परिवार दुखी होता है..सब भूल जाता है इंसान की असली खुशी दूसरो को सुखी करने में है..अपने अलावा अपने परिवार के बारे में भी सोचे इंसान तो कोई दिक्तत न हो, पर क्या करें...?

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May 13, 2010 at 10:42 AM

सच तो यह है कि
सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहने वाले
कभी सुखी नहीं रह पाए हैं
...बहुत खूब..सुन्दर व सार्थक सन्देश. यही तो जिंदगी है.

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May 14, 2010 at 4:42 PM

कविताजी,
आपने बहुत ही सटीक वर्णन किया है | अपने परिवार में भी संवेदना की कमी महसूस करतें है कभी.. आपके पास शब्द चित्रण करने की अनूठी कुशलता है | यह शब्द पज़ल की तरह नहीं है बल्कि मोतीयों की माला जैसे है... जिसका एक मूल्य है और सुन्दरता भी...
बहुत ही उम्दा कार्य करो और ख़ास तो आपके पास विषय वैविध्य है | आप चाहें धर्म की बात करें, परिवार की या धुप की... बहुत ही सुन्दर और पूर्णरूप से आत्मसात किएँ अनुभवों की पूंजी है... |
धन्यवाद
- पंकज त्रिवेदी

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May 14, 2010 at 4:42 PM This comment has been removed by the author.
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