वो वसंत की चितचोर डाली

कुछ शर्माती कुछ सकुचाती
          आती बाहर जब वो नहाकर
मन ही मन कुछ कहती
          उलझे बालों को सुलझाकर

पट-पट-पट,झटक-झटककर
          बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
दिखतीं ये मोती सी मुझको
          या ज्यों झरता झरने का जल

तिरछी नजर घुमाती वो
         अधरों पर मदिर मुस्कान लिए
कभी एकटक निहारती
          पलकों को जैसे आराम दिए

हँसमुख चेहरा लुभाता उसका
          सूरत दिखती भली-भली
कभी लगती खिली फूल सी
          कभी दिखती कच्‍ची कली

महकता उपवन यौवन उसका
          नाजुक डली सुमधुर मिश्री
वो वसंत की चितचोर डाली
          मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!

         .......कविता रावत

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May 22, 2010 at 7:29 AM

...सुन्दर रचना!!!

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May 22, 2010 at 7:43 AM

bahut hi behtareen rachna.....
achha warnan....
yun hi likhte rahein..
regards...
meri nayi kavita bhi jaroor padhein...

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May 22, 2010 at 8:04 AM

वाह !!....बसंत को बहुत ख़ूबसूरती और चंचलता के साथ आपने पेश किया है .........बहुत ही लाजवाब रचना .

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May 22, 2010 at 8:09 AM

पट-पट-पट,झटक-झटककर
बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
वाह बसंत का मानवीकरण आपने बहुत सुन्दरता से किया है
बहुत सुन्दर

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May 22, 2010 at 8:21 AM

बहुत उम्दा!

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May 22, 2010 at 10:03 AM

खूबसूरत रचना

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May 22, 2010 at 10:23 AM

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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May 22, 2010 at 11:03 AM

तिरछी नजर घुमाती वो
अधरों पर मदिर मुस्कान लिए
कभी एकटक निहारती
पलकों को जैसे आराम दिए
बहुत सुन्दर रचना कविता जी , एक बात और कहूंगा कि जिस पेड़ का चित्र आपने साथ में लगाया उस पर लगे फलों को देख मुह में पानी आ गया ! खटाई बहुत प्रिय डिश हुआ करती थी कभी सर्दियों की दोपहर की !

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May 22, 2010 at 12:40 PM

बहुत ही ख़ूबसूरत, रचना

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May 22, 2010 at 12:47 PM

कविता जी मन प्रसन्‍न हुआ। एक सुझाव है। अगर हर चार पंक्तियों के बीच आप एक एंटर स्‍पेश दे देंती तो रचना पढ़ने में और आनंद आता। क्‍योंकि कविता की चार-चार पंक्तियां अपने आप में संपूर्ण हैं। बधाई।

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May 22, 2010 at 1:08 PM

wo basant ki chitchor daali............:)

Kavita jee.......aapne to apne andar male figure ko feel karke badi pyari baat kah daali........hai na!!

Kash!! aise soch ham me bhi aata........:P

bahut khubsurat........bahut pyari
RACHNA!!

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May 22, 2010 at 2:33 PM

कमाल है कविता जी...क्षमा चाहूँगा ..शुरूआती पंक्तियों को पढकर लगा जैसे किसी पुरुष के मुख से सद्यःस्नाता स्त्री का वर्णन है... बहुत खूब..

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May 22, 2010 at 2:43 PM

वो वसंत की चितचोर डाली
मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!
बहुत सुन्दर प्रकृति-चित्रण. सुन्दर रचना

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May 22, 2010 at 4:31 PM

उत्तम अभिव्यक्ति।

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May 22, 2010 at 7:10 PM

खूबसूरत शब्दों से संजोयी खूबसूरत रचना.... खूबसूरती से दिल को छू गई....

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May 22, 2010 at 8:10 PM

बहुत सुंदर रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

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May 23, 2010 at 7:35 AM

वसंत का बहुत खूबसूरत वर्णन ...मगर वसंत में पतझड़ का क्या काम ...झूम लीजिये वसंत के संग में ...पतझड़ भी सावन हो जाएगा ...!!

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May 23, 2010 at 8:13 AM

हँसमुख चेहरा लुभाता उसका
सूरत दिखती भली-भली
कभी लगती खिली फूल सी
कभी दिखती कच्‍ची कली

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ! बढ़िया रचना !

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May 23, 2010 at 12:31 PM

वो वसंत की चितचोर डाली
मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!
क्यूँ खुद को भी ऐसा ही बना डालिए - सुंदर रचना के लिए बधाई

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May 25, 2010 at 3:41 AM

वाह क्या रचना प्रस्तुत की आपने..सुंदर भावपूर्ण और लयबद्ध वाकी बहुत सुन्दर रचना है बसंत का सजीव वर्णन ..आभार

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May 25, 2010 at 12:12 PM

पट-पट-पट,झटक-झटककर
बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
दिखतीं ये मोती सी मुझको
या ज्यों झरता झरने का जल

Sundar bhaav .. lay liye .. basant ka jeeta jaagta varnan kiya hai aapne ... bahut madhur rachna ..

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May 25, 2010 at 8:22 PM

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो प्रशंग्सनीय है!

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May 26, 2010 at 1:33 AM

बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति।

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May 26, 2010 at 9:40 AM

kavi kee kalam basant kee daali kisi heer se kam nahin

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May 26, 2010 at 11:58 PM

गर्मी के मौसम मे बसंत की कविता पढ़कर अच्छा लगा

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May 27, 2010 at 3:32 PM

aapne mere blog gaurtalab par aakar mera hausla badhaya..Shukriya!
main jab aapki rachnaye padhata hoon to mujhe apni sachayi ka ehsas ho jaaa hai..jaise "sagar mein gagar"

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May 29, 2010 at 10:30 AM

हाय गजबे हो आंटी !!

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May 30, 2010 at 10:32 AM

aur haan mere blog par...
तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
regards
http://i555.blogspot.com/

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May 30, 2010 at 12:58 PM

कुछ शर्माती कुछ सकुचाती
आती बाहर जब वो नहाकर
मन ही मन कुछ कहती
उलझे बालों को सुलझाकर


वाह....!
छंदबद्ध सुंदर शब्द बंधन .....!!

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June 1, 2010 at 10:44 PM

लाजवाब पेशकश!
वाह वाह वाह !!!

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August 20, 2010 at 8:22 AM

sarachnayen sachmuch utkrist hain.

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August 26, 2010 at 10:28 PM

जन्हा एक ओर बाढ़ से लोग परेशान हैं
वन्ही बसंत के आगमन का मधुर सन्देश
मन को सुकून पंहुचाता है. |

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