यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
अन्दर ही अन्दर कुछ रहा है रिसता
किसे फुरसत कि देखे फ़ुरसत से जरा
कहाँ उथला कहाँ राज है बहुत गहरा
बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ कहने को सारा जग अपना होता
पर वक्त पर कौन है जो साथ रोता
तेरे-मेरे के घेरे से कौन बाहर निकले
साथ जीने-मरने वाले होते हैं बिरले
जो सगा है वही कितना संग चलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ ही कोई किसी की सुध नहीं लेता
बिन मांगे कोई किसी को कब देता
जब तक विप्र सुदामा नहीं गए मांगने
सर्वज्ञ कृष्ण भी कब गए उनके आंगने
महलों का सुख, झोपड़ी को है जलाता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

कल तक खूब बनी पर अब है ठनी
बात बढती है तो तकरार ही है तनी
तू-तू-मैं-मैं की अगर जंग छिड गयी
तो अपने-पराए की भावना मर गयी
सागर में यूं‍ ही कब ज्वार-भाटा चढ़ता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता

.. .. कविता रावत
 


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July 19, 2010 at 11:27 AM

bahut sundar vichaaron kee abhivyakti

बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पार आना हुआ

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July 19, 2010 at 11:28 AM

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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July 19, 2010 at 11:54 AM

Yahi hai zindagi ka dard...har koyi tanha hi is path pe chalta hai!

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July 19, 2010 at 12:46 PM

"जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता"

हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ,
सच तो यही है .यही है आज के जीवन का यथार्थ
दिल में गहरे बैठ गई आपकी ये प्रस्तुती

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July 19, 2010 at 2:00 PM

यूँ ही कोई किसी की सुध नहीं लेता
बिन मांगे कोई किसी को कब देता
जब तक विप्र सुदामा नहीं गए मांगने
सर्वज्ञ कृष्ण भी कब गए उनके आंगने
महलों का सुख, झोपड़ी को है जलाता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
sachchi yun hi kuch nahin hota, bahut badhiyaa

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July 19, 2010 at 2:24 PM

बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
....hridaysparshee rachna. bahut badhiya.

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July 19, 2010 at 3:01 PM

यथार्थ के बेहद करीब सुंदर रचना

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July 19, 2010 at 3:07 PM

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

बहुत सुन्दर रचना है ... और एक एक लब्ज़ सच है ...

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July 19, 2010 at 4:01 PM

एक-एक शब्द तोल-मोलकर
मान गए आपको
अच्छी रचना के लिए बधाई.

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July 19, 2010 at 4:51 PM

aaj ko aainaa dikhatee ek utkrusht rachana......apanee yaha to kahawat bhee haiki bina roye ma bhee bacche ko doodh nahee pilatee.........aur ye bhee saty hai ki acche samay me sath dene walo kee kamee nahee.....mai do mahine nahee hoo atah comment dene me shayad aniymitata aa jae..........
shubhkamnae.......

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July 19, 2010 at 5:14 PM

हिंदी ब्लॉग लेखकों के लिए खुशखबरी -


"हमारीवाणी.कॉम" का घूँघट उठ चूका है और इसके साथ ही अस्थाई feed cluster संकलक को बंद कर दिया गया है. हमारीवाणी.कॉम पर कुछ तकनीकी कार्य अभी भी चल रहे हैं, इसलिए अभी इसके पूरे फीचर्स उपलब्ध नहीं है, आशा है यह भी जल्द पूरे कर लिए जाएँगे.

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July 19, 2010 at 5:36 PM

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ...

सच कहा है ... बेवजह तो कुछ भी नही होता ... पर क्या कुछ होने में इंसान का हाथ होता है ....
बहुत प्रश्न ढूँढने का प्रयास करती दिखती है ये रचना ...

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July 19, 2010 at 6:22 PM

कुछ भी बेवजह नहीं होता ...गिरगिट भी दुश्मन को देख कर ही रंग बदलती है ...

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July 19, 2010 at 7:02 PM

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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July 19, 2010 at 7:11 PM

बिलकुल ही यथार्थवादी रचना...दिल की गहराइयों में जगह बनाती हुई

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July 19, 2010 at 7:13 PM

बहुत सुन्दर रचना ! शब्द शब्द पिरोया गया है !

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July 19, 2010 at 7:38 PM

स्वार्थ का रंग ऐसा चढा है दुनिया पर कि अगर निःस्वार्थ कुछ भी मिले तो किसी को भरोसा नहीं होता..जब इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का शोषण करना शुरू का दिया तो बादलों पर स्वार्थी होने का दोष क्यों मढ़ना... अच्छी रचना.

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July 20, 2010 at 10:37 AM

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ....
ek such......AAAAAbhar

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July 20, 2010 at 12:02 PM

सार्थक रचना...सच है की बिना बात कुछ नहीं होता

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July 20, 2010 at 5:18 PM

संवेदनशील कविता, कविता।
जीवन एक पाठशाला है जिसमें व्यक्ति अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करता है।

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July 21, 2010 at 2:39 PM

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
--
सभी छन्द बहुत सुन्दर रचे हैं आपने!

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July 21, 2010 at 5:00 PM

सचमुच, बहुत तार्किक हैं आपके विचार। हर क्रिया के पीछे एक लम्बी प्रक्रिया होती है।
………….
संसार की सबसे सुंदर आँखें।
बड़े-बड़े ब्लॉगर छक गये इस बार।

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July 22, 2010 at 2:33 PM

हर पँक्ति एक सच को ब्यान कर रही है समझ नही आ रहा कि किस पँक्ति को कोट करूँ
जीवन के हर रंग की अनुभूति है इस कविता मे। बधाई इस सुन्दर रचना के लिये।

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July 22, 2010 at 3:29 PM

सच्चाई का आइना,
आभार...

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July 22, 2010 at 6:36 PM

शब्द - शब्द
अर्थपूर्ण गहराई ....

सुन्दर और प्रभावशाली रचना .

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July 22, 2010 at 7:35 PM

बहुत सार्थक अच्छी रचना...बधाई
नीरज

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July 22, 2010 at 7:49 PM

सुंदर रचना...

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July 22, 2010 at 10:12 PM

'यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता'

- यही सच है.

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July 23, 2010 at 1:01 AM

बहुत सुन्दर!

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July 23, 2010 at 6:31 AM

बहुत सुन्दरता लिखती हैं आप |बधाई
आशा

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July 23, 2010 at 10:57 PM

बरसो की साधना होती है
यु ही कोई इतनी सुन्दर कविता नहीं लिख देता |
बहुत अच्छी रचना |

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July 24, 2010 at 8:34 PM

कल तक खूब बनी पर अब है ठनी
बात बढती है तो तकरार ही है तनी
तू-तू-मैं-मैं की अगर जंग छिड गयी
तो अपने-पराए की भावना मर गयी
सागर में यूं‍ ही कब ज्वार-भाटा चढ़ता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
nice words .

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July 25, 2010 at 7:57 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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Anonymous
July 25, 2010 at 4:04 PM

Kavita jee, jeevan ko samajhna aur usake darshan ko samajhana do alag-alag cheejen hain. aap kee yah kavita usee darshan ko samjhaatee hai. kuchh chahiye to ichchha to vykdl karnee padegee.bahut achchha chintan.

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July 25, 2010 at 4:05 PM

uper takaneeki badha se mera nam rah gaya hai.

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July 25, 2010 at 9:21 PM

दर्द को समेट कर लिखा है आपने। जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास हो रहा है हर लाइन में। परछाई भी तभी तक साथ देती है जब तक आशा कि किरण हो। वरना अंधेरा होने पर वो भी साथ छोड़ देती है कविता जी। स्वार्थ की दुनिया में हर पग पर धोखा है. फरेब है। तो कभी कभी अनजान लोग साथ देते हैं। लगता है कि दोस्त अब आस्तिन में रहते हैं। औऱ अनजाने सड़क किनारे पत्थर की तरह जिन्हें हम समझते हैं वो अचानक नींव बनकर सहारा देने लगते हैं।

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July 25, 2010 at 10:32 PM

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता

सही कहा .....लक्ष्य दृढ होना चाहिए ......!!

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July 26, 2010 at 2:02 PM

बहुत सुन्दर शब्दों से सजी कविता लिखी है किन्तु उससे भी सुन्दर उसमें जीवन का दर्शन है। पढ़कर मन खुश हुआ।
जन्मदिन की बधाई के लिए आभार।
घुघूती बासूती

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July 26, 2010 at 4:12 PM

kavita ji..har lafz apne aap mein ek kehani si kehta hai...badhai!

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July 26, 2010 at 4:52 PM

प्रभावी कविता.....! आभार.....!

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July 26, 2010 at 6:25 PM

सृष्टिचक्र। जीवन-क्रम। सहज अनुभूति। सरल अभिव्यक्ति।

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July 26, 2010 at 9:10 PM

कमोबेश,हम सब की गाथा।

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July 26, 2010 at 10:18 PM

तुक के मोह से हटकर देखिये कविता सुन्दर बन पड़ेगी ।

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July 27, 2010 at 8:19 AM

आदरणीया कविता रावत जी
नमस्कार !
आपके यहां आ'कर बहुत प्रसन्नता हो रही है …
सुंदर रचनाओं का ख़ज़ाना है यहां तो !
सब एक से बढ़ कर एक !
प्रस्तुत रचना यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता में भी सरस भावों का सहज संप्रेषण हो रहा है ।
अन्य कविताओं ने भी प्रभावित किया ।
बधाई !
स्वागत !

हां , छंद को और साध लें , तो सोने पर सुहागा हो जाएगा ।
शरद कोकास जी के सुझाव पर भी गौर किया जा सकता है …
शुभकामनाओं सहित …

शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , अवश्य आइए…

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

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August 20, 2010 at 11:05 PM

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ..... कविता जी बहुत ही सुंदर लिखा है ..

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Anonymous
September 24, 2010 at 5:04 PM

Sabse pahle mai aapko Dhanyvad dunga jo aapne apne bichoro ko ek pahchan di,

App apne bicharo or samajik gatibidhiyon ka varan karke use logon ke samane prakat karo or tumahi ek din avashya safalta milegi,

Hemant

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RAJ
August 2, 2013 at 5:26 PM

यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
हां अवश्य ही कुछ न कुछ कारण होता है ..
.बहुत सुन्दर अनुपम कृति

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May 7, 2017 at 7:53 AM

आदरणीय ,अच्छी लेखनी ,सुन्दर रचना ! मानवीय मूल्यों को तोलती ,आभार। "एकलव्य"

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May 7, 2017 at 8:22 AM

यथार्थ को उकेरती सुन्दर रचना।

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