मनभावन वर्षा

मुरझाये पौधे भी खिल उठते
जब उमड़- घुमड़ बरसे पानी,
आह! इन काली घटाओं की दिखती
हरदम अजब- गजब की मनमानी।
देख बरसते बादलों को ऊपर
मलिन पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं,
ज्यों बरसाये बादल बूंद- बूंद
त्यों नित ये अद्भुत छटा बिखेरते हैं।
अजब- गजब के रंग बिखरे
इस बर्षा से चहुंदिशि फैले हरियाली,
जब उमड़- घुमड़ बरसे बदरा
तब मनमोहक दिखती हरदम डाली!
आह! काले बादलों वाली बर्षा
तू भी क्या- क्या गुल खिलाती है,
हरदम बूंद-बूंद बरस-बरसकर
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है।
ये घनघोर काली घटाएं तो
बार- बार बरसाये बरसा की बौछारे
बरसकर भर देते मन उमंग तब
जब घर ऊपर घिर- घिर आते सारे।
धन्य - धन्य! वे घर सारे
जिनके ऊपर बरसे ऊपर का पानी,
धन्य- धन्य हैं वे जीव धरा पर
जिनको फल मिलता नित मनमानी।
कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

                                                      ........कविता रावत


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August 8, 2010 at 9:53 AM

कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।
Jab,jab ye jeevan dayini der lagati hai,rooth jatee hai,duniya mano mrityuke kagar pe khadi ho jati hai!

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August 8, 2010 at 10:11 AM

बहुत सुन्दर ....बर्षा आगमन का सभी को इंतज़ार रहता है ...

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August 8, 2010 at 12:27 PM

वाह बहुत सुंदर और चित्रों का भी खूबसूरत प्रयोग.

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RAJ
August 8, 2010 at 12:47 PM

कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।
..... आपने जिस तरह से बरसात के बहाने बहुत ही उम्दा ढंग से देश की वर्तमान स्थिति का चित्रण किया है वह अनुपम और काबिलेतारीफ है ... इसके लिए आभार .

आजकल राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में ऐसे ही बरसात की सम्पूर्ण देश में बौछारे जोर-शोर से हो रही है. सारा देश त्रस्त है ऐसी बरसात से ... न जाने हमारे देश पर ये मंडराते काले बादलों के कारनामे कब छटेंगे और विश्वपटल पर हम साफ़ सुथरी छबि बनाकर अपनी गरिमा बनेने रखने में सक्षम हो सकेंगें..

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August 8, 2010 at 2:17 PM

सुंदर रचना...सावन का मजा दुगुना हो गया.

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August 8, 2010 at 3:36 PM

सुन्दर रचना इस गीले मौसम पर ...

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August 8, 2010 at 4:51 PM

हरदम बूंद-बूंद बरस-बरसकर
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है।
----
Ati Sundar

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August 8, 2010 at 6:16 PM

अच्छी कविता है और चित्र भी बड़े अच्छे हैं. पर हम तो यहाँ तरस रहे हैं बारिश के लिए. बीच-बीच में थोड़ी बारिश होती भी है, तो दूसरे दिन फिर गर्मी और उमस.

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August 8, 2010 at 7:28 PM

...बहुत सुन्दर !!!

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August 8, 2010 at 7:45 PM

सुन्दर प्रस्तुति!

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August 8, 2010 at 11:41 PM

कविता जी आपकी कविता अगर चित्रोंके बिना पढी जाए तो अधूरी प्रतीत होगी... आज पहली बार किसी पोस्ट पर चित्रों को रचना का पूरक बनते देखा है.. गहरे भावों के साथ वर्त्तमान परिस्थिति पर कटाक्ष करती एक बेहतरीन रचना!!

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August 9, 2010 at 4:28 AM

अति सुन्दर प्रकॄति चित्रण.....सुखद अनुभूति हुई इस ब्लाग पर आ कर। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
................................
"जब जमाने को भानु खूब भून देते हैं।
तभी राहत सभी को मानसून देते हैं॥
लाखों तौफ़ीक़ से हासिल न हो वैसी राहत­-
हिज्र में मीठे-वचन जो सकून देते हैं॥"
-डॉ० डंडा लखनवी

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August 9, 2010 at 11:46 AM

kavita ji, aapki adbhut man bhav an kavita ne wawai me man moh liya.bahut hi khoob surati se varshha ka chitran.
poonam

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August 9, 2010 at 1:47 PM

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

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August 9, 2010 at 5:16 PM

बहुत सुन्दर कविता....
____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

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August 9, 2010 at 5:25 PM

manbhaavan varshaa kaa satik chitran. badhaai.

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August 9, 2010 at 8:57 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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August 9, 2010 at 9:53 PM

मंगलवार 10 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

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August 10, 2010 at 6:00 AM This comment has been removed by the author.
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August 10, 2010 at 6:02 AM

कविता जी
बरखा रानी का बखान करते करते आपके मन का बच्चा बार बार उछल कूद मचा रहा था न बाहर आने के लिए? पर कही कहीं पंक्तियों में परिपक्व इंसान दिख रहा है....हाय रे काहे नहीं मन बच्चों सा ही निश्छल हो जाता है बार बार....
पर क्या करं इतनी दुनियादारी है की पूछिए मत....चलिए अपने अंदर के बच्चे को देख ही लिया कुछ क्षण के लिए ही सही....इसके लिए धन्यवाद..

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August 10, 2010 at 1:10 PM

कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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August 10, 2010 at 1:25 PM

seeing this first time...good poems

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August 10, 2010 at 10:21 PM

बरखा रानी ...जरा जम के बरसो .....

आपको ये सावन की बरसात मुबारक ......
इधर तो गर्मी से बुरा हाल है .......

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August 10, 2010 at 10:38 PM

कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

बहुत सुन्दर प्रकॄति चित्रण अच्छी प्रस्तुति।

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August 11, 2010 at 12:39 AM

वाह सुन्दर बारिश. मन भावन दृश्य.

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August 11, 2010 at 12:46 PM

आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार ...अच्छी कविता हैं...बहुत अच्छी .

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August 11, 2010 at 12:46 PM

baarish to waise hi lubhawni hotih hain..aapki kavita ne aur bhilubhawni bna diya

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August 11, 2010 at 8:13 PM

लोग तो कहते हैं "बेमौसम बरसात" लेकिन आपकी मनभावन वर्षा!! तो मौसमी. दिल्ली में अभी अभी जोरदार बारिस हुई इसलिए कविता पढने का आनंद दुगना हो गया - धन्यवाद्

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August 12, 2010 at 12:36 PM

baarish ka sundar roop....acha laga pad kar....
Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

A Silent Silence : Zindgi Se Mat Jhagad..

Banned Area News : I'm terrified of sharks: Jessica Simpson

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August 12, 2010 at 7:32 PM

Hi..

"Kavita" ji ki sundar Kavita...
main aayi barkha manbhavan...
hariyaali lekar aati hai...
rituon main jyon ritu Sawan...

Chahun oor barkha ki boonden...
Kaare badra ghir ghir aayee..
sookhe taru bhi aanandit ho..
nav pallav ke sang muskaayen...

Saavan ki barkha main hum...
sada hi bheege poore man se...
shabdon ki baarish main bheege..
bhavon se antarman mahke..

Sundar Kavita...

Deepak

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August 13, 2010 at 9:52 AM

बहुत ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई !

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Anonymous
August 13, 2010 at 3:38 PM

Kavita Ji Vastav me aapki kavita bohut sunder hai.

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August 16, 2010 at 6:01 PM

आह! काले बादलों वाली बर्षा
तू भी क्या- क्या गुल खिलाती है,
हरदम बूंद-बूंद बरस-बरसकर
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है..

वाह ... क्या खूब वर्षा का बखान किया है ... सुंदर रचना के साथ सावन की फुहार छोड़ी है ....

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aamir
December 6, 2010 at 7:59 PM

awsum that 's the poem i want for project

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