अबकी बार राखी में जरुर घर आना


राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें हैं बुलाते
कभी खेले-कूदे अब क्यों हो भूले जाते
अपनी बारहखड़ी का स्कूल देखते जाना
बचपन के दिन की यादें साथ ले आना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का  है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब मन कम लगता
गाँव में रह शहर का सपना दिखता
सूने घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे
कब सुध लोगे देख बागवाँ बुला रहे
आकर अपनी आखों से  देख जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना


गाँव के बड़े-बुजुर्ग याद करते रहते हैं
अपने-पराये जब-तब पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर अनजान बने हुए हो
आकर सबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

                   ......कविता रावत




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August 20, 2010 at 7:52 AM

सुंदर प्रस्तुति!
राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

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August 20, 2010 at 8:34 AM

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति!

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August 20, 2010 at 8:44 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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August 20, 2010 at 8:44 AM

राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
........
bhaiya ko jana hoga

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August 20, 2010 at 8:48 AM

राखी पर भैया से प्यारी मनुहार अच्छी लगी ।

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August 20, 2010 at 9:07 AM

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति के साथ.... सुंदर पोस्ट...

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August 20, 2010 at 9:58 AM

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने राखी जैसे महत्वपूर्ण त्यौहार को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है!

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August 20, 2010 at 10:12 AM

ऐसे मनुहार पर कौन भाई ऐसा होगा जो बहन के यहा नही जायेगा।
अति सुन्दर अभिव्यक्ति। सादर शुभकामना

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August 20, 2010 at 10:13 AM

रिश्तों की प्रगाढ़ता को बताती सुन्दर अभिव्यक्ति

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RAJ
August 20, 2010 at 1:55 PM

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
.....गाँव से आकर शहर में बस चुके अधिकांश लोगों की कमोवेश यही स्थिति है के वे शहर में इतने रम चुके होते हैं कि उन्हें अपने गाँव में रह रहे माँ-बाप, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदारों की शहर की भौतिकवादी संस्कृति के चलते सुध लेने तक की फुर्सत नहीं रहती, उनके दुर्लभ दर्शन कभी ४-६ वर्ष बाद बहुत कहने-सुनने या कोई प्रिय-अप्रिय घटना घटने की बाद ही बमुश्किल हो पाते हैं.
ऐसे ही न जाने कितनी ही बहिनों की वेदना का आपने मनोहारी, दिल को छू जाने वाली कविता के माध्यम से जीवंत कर दिया, जिसे पढ़कर पाषण ह्रदय वाला प्राणी भी फिघलने लगेगा और मैं समझता हूँ कि कम से कम वे इस सन्देश को आत्मसात कर सकेंगें और एक बार खोज खबर लेने की स्थिति में आ पायेगें.
भाई बहन के अटूट बंधन का सन्देश देती सचित्र कविता प्रेषण के लिए कोटिश: धन्यवाद, आभार

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August 20, 2010 at 2:14 PM

कविता बहुत अच्छी लगी |बधाई
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार |मैने जो भी लिखा था बह केवल मेरी कल्पना मात्र थी|आप बहुत सम्वेदनशील हैं |आपसे मिलना बहुत अच्छा लगा |सच में आप बहुत अपनी लगीं |
आशा

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August 20, 2010 at 2:39 PM

इन्तज़ार में डूबी सुन्दर कविता.

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August 20, 2010 at 3:20 PM

कविता और फोटो का संयोजन सुंदर है।

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August 20, 2010 at 4:51 PM

sach me kavita me jaan daal di aapne.....bahut khubsurat rachna.........:)
upar se utna hi pyara photos......

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August 20, 2010 at 5:28 PM

बेहतरीन भावपूर्ण रचना कविता जी !

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August 20, 2010 at 6:39 PM

हर भाई-बहिन को समर्पित ये कविता बहुत बहुत बहुत पसंद आई... घर की याद दिला दी आपने कविता जी..

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August 20, 2010 at 7:41 PM

न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
सुन्दर अभिव्यक्ति। बहुत कुछ कह गई आपकी ये कविता बीते दिन बीती बातें फिर हलचल पैदा कर गईं

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August 20, 2010 at 8:49 PM

कविता जी..ऐसी कविता पर तो आप टिप्पणी की उम्मीद मत करें..ख़ास तौर पर मुझसे. मैं ख़ुद अपनी बहन से दूर हूँ और कई साल से डाक से मिलने वाली राखी ही बाँधता आया हूँ... आपने और नॉस्टैल्जिक कर दिया!!

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August 20, 2010 at 11:49 PM

बचपन से लेकर बड़े होने तक चाहे बहन कितनी भी बढ़ी हो जाये अपने भाई को इस त्यौहार पर अपने संग बीते पल सब याद कर लेती है ऐसे मौकों पर. बहुत अच्छी रचना.

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August 21, 2010 at 9:20 AM

बेहतरीन। लाजवाब।

*** हिन्दी प्रेम एवं अनुराग की भाषा है।

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August 21, 2010 at 2:06 PM

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
बहुत बार मजबूर हो जाते हैं भाई .... राखी के अलावा भी बहुत से रिश्ते नाते .... दुनिया डारी, ज़िम्मेवारी जो निभानी होती है ...
मार्मिक रचना ... भावुक कर गयी रचना ...

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August 21, 2010 at 4:18 PM

भाई-बहन के पवित्र संबंधों के बीच बेरोजगारी के संकट,प्रवास की विवशता और अपनी जड़ों के प्रति भावनात्मक लगाव का अंतर्द्वंद इस कविता में है। बचपन के वे दिन कोई नहीं भूल पाता।

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August 21, 2010 at 7:17 PM

Hi..

Ghar se main bhi, door bahut hun..
Yaad aa gaya apna ghar..
Aankhen sajal hui hain meri..
Aah hai aayi hothon par..

Kitne hi tyohaar hain aaye..
Jab na hum hain ghar ja paye..
Bhai dooj aur har Rakhi main..
Bahan bahut hi yaad hai aaye..

Aankhon main aansu aa chhalken..
Dil ke bhav hain dil main machlen..
Bachpan ki wo saari baatain..
Yaad hame aayen wo yaaden..

Kavita ji ki Kavita ke sang..
Hamen yaad sab aaye hain..
Tan se jinse door hue hain..
Yaadon main sang aaye hain..

Sundar kavita..

Eshwar kare har Rakhi aapke bhai avashya aayen..

Deepak..

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August 21, 2010 at 7:17 PM

Hi..

Ghar se main bhi, door bahut hun..
Yaad aa gaya apna ghar..
Aankhen sajal hui hain meri..
Aah hai aayi hothon par..

Kitne hi tyohaar hain aaye..
Jab na hum hain ghar ja paye..
Bhai dooj aur har Rakhi main..
Bahan bahut hi yaad hai aaye..

Aankhon main aansu aa chhalken..
Dil ke bhav hain dil main machlen..
Bachpan ki wo saari baatain..
Yaad hame aayen wo yaaden..

Kavita ji ki Kavita ke sang..
Hamen yaad sab aaye hain..
Tan se jinse door hue hain..
Yaadon main sang aaye hain..

Sundar kavita..

Eshwar kare har Rakhi aapke bhai avashya aayen..

Deepak..

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August 21, 2010 at 8:40 PM

न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना

सही कहा ......
एक बहन भाई के स्नेह की ही भूखी होती है न की पैसे की ......

रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं ......!!

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August 21, 2010 at 8:58 PM

बस मन भर आया पढ़कर...इतने सरल शब्दों में एक बहन की पुकार कह डाली...कि हर भाई सुनने को मजबूर हो जाए

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August 22, 2010 at 1:17 AM

बहुत ही खबूसूरत रचना लिखी है आपने। मन का हर दर्द समेटा है। सही है उम्र चाहे जितनी हो दूरी चाहे असीम हो....प्यार अमर रहता है।

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August 22, 2010 at 9:22 AM

न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना

भाई बहिन के प्यार और स्नेह के बीच धन दौलत तो आना ही नहीं चाहिए. सच्चे भावों को परोसती समसामयिक रचना

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August 22, 2010 at 7:27 PM

राखी पर सुन्दर पोस्ट..मन को छू गई .बधाई.

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August 23, 2010 at 3:07 PM

bahut khub...
lekin dukh ki baat ki ..... hamesha ki tarah is raakhi me bhi koi behan mera intzaar nahi kar rahi hogi...

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August 23, 2010 at 6:17 PM

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना

Achchhi kavita ke sath achchhe photo bhi

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August 24, 2010 at 11:57 AM

रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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August 25, 2010 at 1:19 AM

बहुत सुंदर रचना, आप को राखी की बधाई और शुभ कामनाएं.धन्यवाद

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August 25, 2010 at 1:14 PM

रिश्तों की प्रगाढ़ता को बताती सुन्दर अभिव्यक्ति
राखी की बधाई और शुभ कामनाएं.धन्यवाद

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August 25, 2010 at 9:22 PM

AAPKI PRASTUTI AUR SHABDO NE PATA NAHI KAISA ASAR DAALA, MAIN KUCH BHI KAH NAHI PAA RAHA HOON .. MERA SALAAM KABUL KARE..

VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

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August 26, 2010 at 5:18 PM

itna pyara nimntran pakar bhai jarur aavega .
shubhkamnaye

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August 26, 2010 at 9:38 PM

राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

सुंदर...प्यारी...भावुक कर देने वाली विचारशील रचना । उम्दा !!!

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August 28, 2010 at 5:02 PM

भाई बहन के अटूट बंधन का सन्देश देती सचित्र कविता

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August 1, 2012 at 10:49 AM

कल 02/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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August 2, 2012 at 7:00 AM

बहुत सुन्दर प्यारी रचना....
रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
:-)

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August 2, 2012 at 7:45 AM

बहुत ही प्यारी रचना... बिलकुल मन को छू गयी...
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ !!!

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August 2, 2012 at 1:28 PM

बहुत प्यारी कोमल भावों से सुसज्जित रचना बहुत पसंद आई

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August 9, 2014 at 2:39 PM

कल 10/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

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August 11, 2014 at 2:17 PM

बहुत सुंदर

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Anonymous
September 16, 2014 at 2:57 AM

Very good info. Lucky me I found your site by accident (stumbleupon).

I have saved as a favorite for later!

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