ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Thursday, September 30, 2010

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है


एक जगह पहुंचकर अच्छे और बुरे में बहुत कम दूरी रह जाती है
इने-गिने लोगों की दुष्टता सब लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है !

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!

चूने से मुहँ जल जाने पर दही देखकर  डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना हो जाता है !

जिसका जहाज डूब चुका हो वह हर समुद्र से खौफ़ खाता है
जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने में डर लगता है!

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं!

                    ..कविता रावत

Sunday, September 26, 2010

अपनेपन की भूल


जिन्हें हम अपना समझते हैं
गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
तो दिखता क्यों नहीं हरदम
आँखों में उनके पहला सा प्यार?
एक पल तो सब अपने से लगते हैं
पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
सोचकर आघात लगता दिल को कि
जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
ढूँढो तो सबकुछ मिल सकता है
देखो अगर अपनेपन से तो
सबकुछ अपना सा लगता है
पर कविता समझी नहीं कि
अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

         ......कविता रावत

Saturday, September 18, 2010

भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है



गम का एक दिन हँसी-ख़ुशी के एक महीने से भी लम्बा होता है
दुःखी आदमी का समय हमेशा बहुत धीरे-धीरे बीतता है !

जो दर्द के मारे जागता रहे उसकी रात बहुत लम्बी होती है
हल्की व्यथा बताना सरल है पर गहरी व्यथा मूक रहती है!

बड़े-बड़े दुःख के आने पर आदमी छोटे-छोटे दुखों को भूल जाता है
पहले से भीगा हुआ आदमी वारिश को महसूस नहीं करता है!

हँसी-ख़ुशी कभी टिक कर नहीं वह तो पंख लगाकर उड़ जाती है
सुखभरी मधुर घड़ियाँ बड़ी जल्दी-जल्दी बीत जाया करती है!

ऐसा कोई आदमी नहीं जो दुःख व रोग से अछूता रह पाता है
भाग्य हमें कुछ भी दान नहीं देता वह तो केवल उधार देता है!

.....कविता रावत

Friday, September 10, 2010

गणेशोत्सव : सबको भाता गणपति बप्पा


भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू १० दिवसीय ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि के प्रथम पूज्य देव गणेश जी के जन्मोत्सव का बड़ों को ही नहीं वरन बच्चों को भी कुछ ज्यादा ही बेसब्री से इंतज़ार रहता है। बच्चों का गणेश जी से सहज लगाव शायद उनकी चंचल, लुभावनी मूर्तियों, नटखट से भरी प्यारी-प्यारी कहानियों और विविध रूप, आकार की आकृतियों को लेकर अधिक रहता है  जहाँ मेरा बचपन से ही शिव-पूजन से बेहद जुड़ाव रहा है, वहीँ आज जब मैं अपने बेटे जो अभी-अभी इसी वर्ष से स्कूल जा रहा है, का गणेश प्रेम देखकर कभी-कभी बहुत हैरान-परेशान हो जाती हूँ   हैरान-परेशान इसलिए क्योंकि अभी से आये दिन स्कूल से उसकी यह शिकायत आती है कि वह कक्षा में बैठकर आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से गणेश के चित्र बनाता रहता है
          घर में भी बहुत डांटने-फटकारने के बावजूद भी वह दीवार से लेकर जो भी कोरा पन्ना मिला उसमें आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से गणेश के चित्र उकेरना बैठ जाता है उसे दूसरे बच्चों की तरह खिलोंनों के बजाय गणपति जी से सम्बंधित किसी भी वस्तु/चीज आदि से खेलना बेहद भाता है. दूसरे बच्चों के साथ भी वह गणपति का खेल शुरू कर देता है, जिसे देख लोग हँसकर रह जाते हैं. रास्ते में या कहीं भी बाजार में जहाँ कहीं भी उसके नज़र गणेशनुमा चीज पर पड़ी नहीं कि फिर तो हाथ धोकर उसे लेने के पीछे पड़ जाता है यही नहीं संस्कृत के श्लोक "वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा" और 'गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्जम्बू फलचारूभक्षणं, उमासुतं शोकविनाशकारम नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम" जैसे कठिन वाक्य भी बड़ी सरलता से बिना अटके कहा देता है गणेश जी की कोई किताब हाथ लगी नहीं कि एक ही रट लगा बैठता है कि सुनाओ/बताओ क्या लिखा है इसमें, मना करने पर मुहं लटकाकर एक कोने में बैठ 'कट्टी' कहकर मौन धारण कर लेता है, और भी बहुत सी बातें जो मैं बाद में कभी बताऊँगी फिलहाल इस अवसर पर मैं उसकी आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से बनाई कुछ गणेश आकृति और गणपति प्रेम प्रस्तुत कर रही हूँ 
         अगले वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक बोले : "गणपति बप्पा मोरया, पुरछिया वर्षी लौकरिया"

सभी  ब्लॉगर्स और सुधि पाठकों को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!

                                                                        ....कविता रावत

Saturday, September 4, 2010

कौन हो तुम


कौन हो तुम!
पहले पहल प्यार करने वाली
शीत लहर सी
सप्तरंगी सपनों का ताना-बाना बुनती
चमकती चपला सी
शरद की चांदनी सी
गुलाब की पंखुड़ियों सी
काँटों की तीखी चुभन से बेखबर
मरू में हिमकणों को तराशती
कौन हो तुम!

अधर दांतों में दबाती
नयन फैलाती
घनघोर घटाओं में सूरज का
इन्तजार करती
अरमानों को
आंचल बांधे
मिलन की तीव्र
साधना में रत
प्रेम उपासना को उद्धत
जिंदगी के सुहावने सपनों में
खोई-सोई दिखने वाली
कौन हो तुम!

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

             ......कविता रावत