कौन हो तुम

कौन हो तुम!
पहले पहल प्यार करने वाली
शीत लहर सी
सप्तरंगी सपनों का ताना-बाना बुनती
चमकती चपला सी
शरद की चांदनी सी
गुलाब की पंखुड़ियों सी
काँटों की तीखी चुभन से बेखबर
मरू में हिमकणों को तराशती
कौन हो तुम!

अधर दांतों में दबाती
नयन फैलाती
घनघोर घटाओं में सूरज का
इन्तजार करती
अरमानों को
आंचल बांधे
मिलन की तीव्र
साधना में रत
प्रेम उपासना को उद्धत
जिंदगी के सुहावने सपनों में
खोई-सोई दिखने वाली
कौन हो तुम!

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

             ......कविता रावत








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September 4, 2010 at 8:52 AM

सुंदर शब्दों एवं भावाभिव्यक्ति से बुनी एक बहुत अच्छी कविता।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

स्‍वच्‍छंदतावाद और काव्‍य प्रयोजन , राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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September 4, 2010 at 9:12 AM

khubsurat shabdon main piroi gai ek sunder kavita......nice

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September 4, 2010 at 9:27 AM

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!
bahut khoobsurat dil tak indradhanushi chhata bikherte ehsaas

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September 4, 2010 at 10:45 AM

जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!


पहचान को तलाशती बढ़िया भाव-पूर्ण कविता !











Posted by कविता रावत at 8:39 AM 3 comments:
राजभाषा हिंदी said...
सुंदर शब्दों एवं भावाभिव्यक्ति से बुनी एक बहुत अच्छी कविता।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

स्‍वच्‍छंदतावाद और काव्‍य प्रयोजन , राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

September 4, 2010 8:52 AM
P S Bhakuni (Paanu) said...
khubsurat shabdon main piroi gai ek sunder kavita......nice

September 4, 2010 9:12 AM
रश्मि प्रभा... said...
खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

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September 4, 2010 at 10:47 AM

सुंदर शब्दों में पिरोये गुलाबी अहसास

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September 4, 2010 at 11:26 AM

आप का समर्थ सर्जक हैं।
आपके संकल्‍प और चयन की क्षमता से आपकी रचनाधर्मिता ओत-प्रोत है।

फ़ुरसत में .. कुल्हड़ की चाय, “मनोज” पर, ... आमंत्रित हैं!

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September 4, 2010 at 12:21 PM

हमारा सवाल भी यही है। कौन हो तुम।
ब्‍लाग टेम्‍पलेट का परिवर्तन भी अच्‍छा लगा।

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September 4, 2010 at 12:26 PM

इस तलाश को मंज़िल चाहें जब मिलें, पर यह तलाश बहुत
खूबसूरत है, आपकी कविता की तरह!!

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September 4, 2010 at 12:53 PM

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

अति सुन्दर मन भावन रचना है आपकी

हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया

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September 4, 2010 at 1:24 PM

सतरंगी सी ..एक तलाश ...कौन हो ? सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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September 4, 2010 at 1:49 PM

अधर दांतों में दबाती
नयन फैलाती
घनघोर घटाओं में सूरज का
इन्तजार करती
अरमानों को
आंचल बांधे
मिलन की तीव्र
साधना में रत
प्रेम उपासना को उद्धत
जिंदगी के सुहावने सपनों में
खोई-सोई दिखने वाली
कौन हो तुम!
....सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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September 4, 2010 at 5:14 PM

कौन हो तुम!
पहले पहल प्यार करने वाली
शीत लहर सी
सप्तरंगी सपनों का ताना-बाना बुनती
चमकती चपला सी
शरद की चांदनी सी
गुलाब की पंखुड़ियों सी
काँटों की तीखी चुभन से बेखबर
मरू में हिमकणों को तराशती
कौन हो तुम!
....so nice love emotion

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September 4, 2010 at 5:41 PM

कौन हो तुम...सुन्दर अभिव्यक्ति!

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September 4, 2010 at 9:28 PM

अरे वाह! बहुत ही बेहतरीन रचना...


मेरी ग़ज़ल:
मुझको कैसा दिन दिखाया ज़िन्दगी ने

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September 4, 2010 at 11:32 PM

सुंदर शब्दों से सजाया है इस कौन को...प्रभावशाली अभिव्यक्ति ...जो मजबूर कर रही है सोचने पर....कौन हें वो ?

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September 5, 2010 at 8:46 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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September 5, 2010 at 4:35 PM

ये तो जीवन की आशा की महक है शायद ...
बहुत सुंदर रचना है ...

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September 5, 2010 at 6:17 PM

बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुती !

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September 5, 2010 at 6:59 PM

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!
एक अच्छी सतरंगी तलाश. शब्दों का सुन्दर संयोजन.भावपूर्ण प्रस्तुती

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September 6, 2010 at 10:51 AM

बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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September 6, 2010 at 7:03 PM

इस बार के ( 7 सितम्बर , मंगलवार ) साप्ताहिक चर्चा मंच पर आप विशेष रूप से आमंत्रित हैं ...आपके लिए कुछ विशेष है ....आपकी उपस्थिति नयी उर्जा प्रदान करती है .....मुझे आपका इंतज़ार रहेगा....
शुक्रिया

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September 7, 2010 at 12:22 PM

तस्वीर दिल्ली मेट्रो की है ना !

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September 7, 2010 at 1:54 PM

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम
..बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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September 7, 2010 at 8:41 PM

Read it again and found it all the more beautiful.

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September 8, 2010 at 8:26 AM

sabhi kisi na kisi tlaash me hai....

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September 8, 2010 at 1:13 PM

खुद से बेखबर
उबड़-खाबड़ राहों से जानकर अनजान
कठोर धरातल पर नरम राह तलाशती
जिंदगी के आसमान को
चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

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September 8, 2010 at 7:52 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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September 9, 2010 at 8:32 AM

पहले पहल प्यार करने वाली
शीत लहर सी
सप्तरंगी सपनों का ताना-बाना बुनती
चमकती चपला सी
शरद की चांदनी सी
गुलाब की पंखुड़ियों सी
काँटों की तीखी चुभन से बेखबर
मरू में हिमकणों को तराशती
कौन हो तुम!
wah shraddhaji kitane sunder upman aur utanihi sunder rachna.

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September 9, 2010 at 6:43 PM

कविता जी,
नमस्ते!
कोई गूढ़ बात समझने की मेरी हैसियत नहीं....
अपने लेवल पे यही कह सकता हूँ, बेहतरीन शब्द संयोजन...
चित्र उकेरने में सक्षम!
आशीष

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September 9, 2010 at 7:24 PM

बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती

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September 9, 2010 at 8:12 PM

बहुत सुंदर भावों को सजोती कविता |भाव पूर्ण अभिव्यक्ति|
आशा

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September 11, 2010 at 8:33 PM

कौन हो तुम! ek khubasurat jindagi !
arganikbhagyoday.blogspot.com

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September 12, 2010 at 7:06 PM

कविता जी,
बहुत अच्छी रचना पेश की है...
बधाई.

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Anonymous
September 13, 2013 at 3:36 PM

Criteria of those loans are actually easy and you take lower
than half an hour or so in meeting the approval not fake would you
realize if your person standing next to you was going to pull out a gun and shoot.

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