अपनेपन की भूल

जिन्हें हम अपना समझते हैं
गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
तो दिखता क्यों नहीं हरदम
आँखों में उनके पहला सा प्यार?
एक पल तो सब अपने से लगते हैं
पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
सोचकर आघात लगता दिल को कि
जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
ढूँढो तो सबकुछ मिल सकता है
देखो अगर अपनेपन से तो
सबकुछ अपना सा लगता है
पर कविता समझी नहीं कि
अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

         ......कविता रावत

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September 26, 2010 at 12:23 PM

आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

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September 26, 2010 at 12:24 PM This comment has been removed by the author.
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September 26, 2010 at 12:42 PM

अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!
क्या कहें पर यही है आज का सच, अच्छी प्रस्तुति

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September 26, 2010 at 12:54 PM

मासूम मन की परेशानी को सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है आपने ..
आभार ...;.

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September 26, 2010 at 2:07 PM

dil ke udgaro kee sunder abhivykti...

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September 26, 2010 at 2:11 PM

कविता अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-3)-काव्य-लक्षण (काव्य की परिभाषा), आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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September 26, 2010 at 2:14 PM

हमे अपनओ से ज्यादा धोखा मिलता है बेगानो से तो हम चुस्त होते है, बहुत भाव पुर्ण कविता धन्यवाद

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September 26, 2010 at 2:23 PM

बेहतरीन अभिव्यक्तियाँ...लाजवाब प्रस्तुति...बधाई.

__________________________

'शब्द-शिखर' पर बेटियों के प्रति नजरिया बदलने की जरुरत (डाटर्स-डे पर विशेष)

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September 26, 2010 at 3:19 PM

खूबसूरत अभिव्यक्ति ...

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September 26, 2010 at 5:47 PM

सुन्दर भाव की बेहद सुन्दर रचना

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September 26, 2010 at 6:27 PM

करीबी ही वक्त पर मुख मोडते है कोई दूसरा थोडे ही आयेगा मुख मोडने उसके क्या अपने करीबी नहीं है। यह भी बिल्कुल सत्य है कि अपने पन से देखा जाये तो सब अपने लगते हैं । वर्तमान में सच्चा दोस्त या हितैषी या अपना उसे कहते है जो उसकी जरुरत पर हमारे पास आजाये

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September 26, 2010 at 7:48 PM

अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!
आपेक्षा तो अपनो से ही होती है। दिल के करीब रहने वालों के लिये ही तो सभी अच्छी बुरी संवेदनायें उठती है। अच्छी लगी रचना। शुभकामनायें

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September 26, 2010 at 9:03 PM

यथार्थपरक कविता ... सच्चाई को आपने बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है।

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September 26, 2010 at 9:20 PM

पर कविता समझी नहीं कि
अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

सच कहा आपने हम इतनी अपेक्षाएं रख लेते हैं..एक बार सोचे की हम अपेक्षाएं ना रखे..सिर्फ और सिर्फ देना जाने लेने की उम्मीद ना करे तो शायद खुश रह पाए.
सुंदर अभिव्यक्ति.

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September 26, 2010 at 10:17 PM

जिन्हें हम अपना समझते हैं
गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
तो दिखता क्यों नहीं
आँखों में उनके प्यार?
Jivan bhi kya birodhabhas hai, Shayad yehi kehna chahti hain aap, Dekhne main to yeh duniya bahut khubsurat pratit hoti hai per yeh itni khubsurat hai nahi....
inhi bhabon ki lajbab abhibyakti is kavita main hui hai
HARDIK BADHAI

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September 26, 2010 at 10:32 PM

बेहतरीन अभिव्यक्तियाँ.....

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September 27, 2010 at 1:48 AM

आज के दौर का कड़वा सच जिसे आपने बहुत अच्छे और भावपूर्ण ढंग से सामने रखा .....

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September 27, 2010 at 8:34 AM

दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
.... taki apni aankhon se dard bahta rahe

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September 27, 2010 at 9:55 AM

बहुत ही बेहतरीन रचना.

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September 27, 2010 at 1:25 PM This comment has been removed by the author.
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September 27, 2010 at 1:26 PM

ADARNIYA KAVITA JI
BAHUT PASAND AAI ISILIYE DOBARA PADHNE CHALA AAYA

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September 27, 2010 at 1:32 PM

एक पल तो सब अपने से लगते हैं
पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
सोचकर आघात लगता दिल को कि
जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
....यथार्थपरक कविता
.....बेहतरीन अभिव्यक्ति

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September 27, 2010 at 2:21 PM

bahut hi lajawab prastuti.....

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September 27, 2010 at 9:24 PM

कविता जी,
आपकी कविता पर बशीर बद्र साहब की एक शायरी बतौर कमेंट पोस्ट कर रहा हूँ, शायद इसी में आपके सवाल का जवाब होः
कोई हाथ भी न मिलाएगा,
जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है,
ज़रा फासलों से मिला करो!!

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September 27, 2010 at 10:00 PM

bahut hi khubsurat rachna....
yun hi likhte rahein...

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September 27, 2010 at 10:44 PM

वही तेरी खलिश है ...
वही तेरे दर्द का ज़िक्र ....
वही गिला है सभी का ....

मुहब्बत तू इतनी जल्द मर क्यूँ जाती है ....?

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September 28, 2010 at 3:42 AM

सामाजिक व्यथा की सच्ची प्रस्तुति! सुन्दर

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September 28, 2010 at 1:30 PM

मन के भाव अच्छे से प्रस्तुत किए हैं ...

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September 28, 2010 at 2:28 PM

दिल को छू लेने वाली रचना,

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September 28, 2010 at 6:23 PM

अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

बस यही तमन्ना तो जीने की वजह बन जाती है...बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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September 28, 2010 at 7:13 PM

अच्छा विचार है ।

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September 29, 2010 at 5:39 PM

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है!बधाई!

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September 29, 2010 at 10:01 PM

यह निश्चित ही बदलती दुनिया में बदलती महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है,जहां एक पल में धूप और छांव का अहसास हो उठता है। तब तमन्नाओं का जगना कोई आश्चर्य नहीं।

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October 2, 2010 at 7:17 AM

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है, मगर अपनी बातें, अपनी पीड़ा, अपने अनुभव सहज-सरल बहने लगते है...
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!

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March 29, 2012 at 11:34 AM

कल 30/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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March 30, 2012 at 7:54 AM

सुंदरता से अभिव्यक्त भाव.... सबके मन की...
सादर बधाई।

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March 30, 2012 at 9:28 AM

बस यही जिंदगी है कभी अपनी कभी बेमानी है ...बहुत सुन्दर रचना !

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March 30, 2012 at 9:39 AM

बहुत सुन्दर ....
दिल को कहीं छू गयी....

सादर
अनु

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