दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है

एक जगह पहुंचकर अच्छे और बुरे में बहुत कम दूरी रह जाती है
इने-गिने लोगों की दुष्टता सब लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है !

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!

चूने से मुहँ जल जाने पर दही देखकर  डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना हो जाता है !

जिसका जहाज डूब चुका हो वह हर समुद्र से खौफ़ खाता है
जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने में डर लगता है!

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं!

                    ..कविता रावत

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September 30, 2010 at 8:19 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल, मनोज कुमार,द्वारा राजभाषा पर पधारें

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September 30, 2010 at 8:31 AM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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September 30, 2010 at 8:55 AM

bahut hi khubsurat prastuti....
saari panktiyaan yatharthta ke patal par likhi huyi...
bahut khub...

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September 30, 2010 at 8:57 AM

mere blog par thode se bargad ki chhaon me padharein...

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September 30, 2010 at 9:47 AM

वाह! क्या बात है! बहुत सुन्दर!

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September 30, 2010 at 9:55 AM

kavita bahut bahut sunder sandesh v chetavnee........
ati sunder abhivykti .

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September 30, 2010 at 10:05 AM

छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं...सार्थक सोच...आभार.

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September 30, 2010 at 10:32 AM

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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September 30, 2010 at 11:22 AM

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!
.....बहुत सार्थक प्रस्तुति।

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September 30, 2010 at 11:38 AM

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!

सटीक बात कही ...

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September 30, 2010 at 11:45 AM

"अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं!"

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति
आभार


मिलिए ब्लॉग सितारों से

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September 30, 2010 at 12:45 PM

सुन्दर बहुत सुन्दर!

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September 30, 2010 at 1:05 PM

वक्त से एक टांका लें तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं
खेल ख़त्म तो बादशाह और प्यादा एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं!
Kya baat kahi hai!

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September 30, 2010 at 1:34 PM

बहुत अच्छी सटीक प्रस्तुति। आपके भावों को प्रणाम!!

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September 30, 2010 at 2:05 PM

रचना में मौजूद उपदेश मंथन करने लायक है कविता जी !

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September 30, 2010 at 2:53 PM

chalo achchha huaa achchho me koi dusht to nikala agar sabhi hote achche to dusht kanah jate ?
chalo achchha huaa ujalo me andhera bhi mila agar charo taraf ujala hota to andhere kahan jate ?
arganik bhagyoday.blogspot.com

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September 30, 2010 at 3:09 PM

स्वार्थी लोगों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!
KAvita ji
Sach main aapki kavitaon main ek aisa dard chupa hota hai jiski taraf shayad humara dhyan nahi jaata, kisi bhav ko khuvsurti se pesh karna aapke shilp or soch ka kamal hai

Dhanyavaad

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September 30, 2010 at 4:10 PM

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं
गंभीर बात कह दी आपने.

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September 30, 2010 at 5:04 PM

हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!
सही बात
नेक बातें

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September 30, 2010 at 5:15 PM

कविता अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
चक्रव्यूह से आगे, आंच पर अनुपमा पाठक की कविता की समीक्षा, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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September 30, 2010 at 6:37 PM

स्वार्थी लोगों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!..

ज़मीनी बातों को बहुत लाजवाब और प्रभावी तरीके से रखा है आपने ....

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September 30, 2010 at 7:19 PM

अच्छी सोच..सुन्दर रचना.

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September 30, 2010 at 8:04 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।धन्यवाद

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September 30, 2010 at 8:30 PM

गज़ब किया कविता जी !

बहुत बहुत धन्यवाद इस सार्थक और अभिनव पोस्ट के लिए.........

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September 30, 2010 at 8:47 PM

एक से बढ़कर एक काम की बातें ।
सुन्दर भाव ।

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September 30, 2010 at 10:36 PM

सुन्दर बहुत सुन्दर!

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September 30, 2010 at 11:48 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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September 30, 2010 at 11:59 PM

कविता जी, सारी की सारी सूक्तियाँ हैं,पिरोई हुई,एक मालिका जैसी...बहुतसुंदर!!

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October 1, 2010 at 7:26 AM

बाकी सब तो ठीक,मगर शीर्षक से असहमति है। स्वार्थी होना बुरा नहीं है। आखिर हम यह क्यों सोचें कि कोई हमारे लिए कुछ करे? हर कोई पहले अपने लिए कुछ क्यों न करे? गौर कीजिएगा कि जिनके अपने जीवन में तमाम तत्वों की पूर्णता है,वही समाज को कुछ दे पाए हैं।

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October 1, 2010 at 11:16 AM

kavita ji
bahut hi sundar rachna.vaise to sabhi panktiyan bahut hi achhi lagin par is ek pankti ne bahut kuchh kah diya------

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है
छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख लें तो बड़ी-बड़ी बातें अपना ध्यान स्वयं रख लेती हैं!
poonam

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October 1, 2010 at 11:36 AM

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाए बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है ,
खूब लिखा है आपने.

कुँवर कुसुमेश
मोबा:09415518546
समय हो तो मेरा ब्लॉग देखें :kunwarkusumesh.blogspot.com

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October 1, 2010 at 6:42 PM

भाव अच्छे हैं। जीवन दर्शन छुपा है इस रचना मे। बधाई। कहाँ रहती हो आज कल बहुत दिन से बात नही हुयी? शुभकामनायें।

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October 1, 2010 at 11:32 PM

अच्छे भावो से भरी रचना.

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October 1, 2010 at 11:32 PM

कविता जी आपकी सीख बटोर ली है ....ध्यान रखेंगे ....!!

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October 2, 2010 at 7:19 AM

दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है
हर हिंसा सबसे पहले गरीब का घर उजाडती है!

Its true

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October 2, 2010 at 1:05 PM

चूने से मुहँ जल जाने पर दही देखकर डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना हो जाता है !

जिसका जहाज डूब चुका हो वह हर समुद्र से खौफ़ खाता है
जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने में डर लगता है!

.......बहुत अच्छी प्रस्तुति।धन्यवाद

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October 2, 2010 at 3:03 PM

अपनी मोमबत्ती को नुक्सान पहुंचाएं बिना दूसरे की मोमबत्ती जलाई जा सकती है.....
बहुत ही प्रेरणादायक अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर..आभार..

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October 14, 2010 at 4:40 PM

चूने से मुहँ जल जाने पर दही देखकर डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना हो जाता है !

वाह क्या बात है बहुत ही सुंदर रचना है आपकी कृपया निरंतरता बनाये रखे धन्यवाद.
अगर समय का आभाव न हो तो कृपया मेरा ब्लॉग http://deepakpaneruyaden.blogspot.com/ देखने का कष्ट करें

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November 8, 2010 at 12:20 PM

yatharth aur jeevan se judi hui sachchi baten....
itani si baate jeevan main utar jayen to...........

kaviji,abhi-abhi shuruaat ki hai,apka margdarshan chahiye....thoda samay chahoongi aapka.....

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November 26, 2010 at 4:22 PM

ज़मीनी बातों को बहुत लाजवाब और प्रभावी तरीके से रखा है आपने

बहुत ही सुंदर रचना है आपकी

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