ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Sunday, October 31, 2010

गाँव छोड़ शहर को धावै


गाँव छोड़ शहर को धावै
करने अपने सपने साकार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निरख शहर में जन-जन को
बिखरते सपने टूटता दिल
भटक रहें हैं शहर-शहर
पर पा न सके मंजिल

कदाचार व्याप्त दिखे हरतरफ
जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार
तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार

अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

          ........कविता रावत

Thursday, October 21, 2010

मरना आसान लेकिन जीना बहुत कठिन है


पिछले सप्ताह एक के बाद एक तीन निकट सम्बन्धियों के मृत्यु समाचार से मन बेहद व्यथित है. कभी घर कभी बाहर की दौड़-भाग के बीच दिन-रात कैसे गुजर रहे हैं, कुछ पता नहीं चलता. मन में दुनिया भर की बातें घर करने लगती हैं. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है, थोडा मन हल्का हो यही सोच ब्लॉग पर अपने मन का कुछ गुबार बाहर निकाल कर सहज होने का प्रयत्न कर रहूँ हूँ. जानती हूँ की जीना-मरना जीवन चक्र है, फिर भी जब-जब शोक संतप्त परिवारों की हालातों को देखती हूँ तो मन में एक गहरी टीस उठने लगती है. जाने वाले चले जाते हैं लेकिन जीने वालों के लिए जीना कितना कठिन हो जाता है, यही सोच बार-बार मन उद्धिग्न होकर जिंदगी के भंवर जाल उलझने लगता है. सोचती हूँ....


जिंदगी को क्या कहूँ?
अतीत का खंडहर
या फिर
भविष्य की कल्पना!
भविष्य की आशा में अटका आदमी
उठता, बैठता, काम करता
बड़ी हड़बड़ी में भागता रहता
कुछ निश्चित नहीं किसलिए?
जिंदगी में कितने झूठ
बना लेता है एक आदमी-
लड़का बड़ा होगा, शादी होगी
बच्चे होंगे, धन कमाएगा
नाम रोशन करेगा, खुशहाल रखेगा
और यही सब करते-करते
मर जाता है बेटे के नाम
और बेटा बेटे के लिए
ऐसे ही मरते चले जाते है
एक-दूसरे के नाम पर!
गलत कहते है लोग
की मौत दुस्तर है?
भला मौत में क्या दुस्तरता?
क्षण भर में मर जाते हैं
सबकुछ धरा रह जाता है यहीं
खाली हाथ आया, खाली हाथ गया
जन्म लेता है तो किसी और के हाथ में
और मरता है तो भी किसी दूसरे के हाथ में
बीच की थोड़ी-बहुत घड़ियों में
अपने लिए कितना जी पाता है?
सच में मरना बहुत आसान है
लेकिन जीना बहुत कठिन!

          ....कविता रावत

Friday, October 8, 2010

नवरात्रि : भक्ति और शक्ति का उत्सव


सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे देवि नमोsस्तु ते ।।

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोsस्तु ते ।।

गणेशोत्सव के बाद नौ दिन तक चलने वाला शक्ति और भक्ति का अनुपम उत्सव दुर्गोत्सव सर्वाधिक धूम-धाम से मनाया जाने वाला उत्सव है। अकेले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में दुर्गा उत्सव के अवसर पर लगभग डेढ़ हजार स्थानों पर माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं आकर्षक साज-सज्जा के साथ स्थापित की जाती हैं। वहीँ दुर्गा मंदिरों में नौ दिन तक माता रानी की अखंड ज्योत जलाकर पूजा अर्चना, हवनादि होता रहता है। नवरात्र उत्सव का विशेष आकर्षण भव्यतम झाँकियाँ जो पौराणिक गाथाओं के साथ-साथ सामयिक सामाजिक व्यवस्थाओं को प्रदर्शित कर नव जागरण का सन्देश देती हैं, सभी जाति, धर्म सम्प्रदाय के लोगों को समान रूप से आकृष्ट करती है। शाम ढलते ही माँ दुर्गे की भव्य प्रतिमाओं और आकर्षक झाँकियों के दर्शन के लिए जन समूह एक साथ उमड़ पड़ता है। जगह-जगह नौ दिन तक हर दिन मेला लगा रहता है।
नवरात्र में यंत्रस्थ कलश, गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तर्षि, सप्तचिरंजीव, ६४ योगिनी, ५० क्षेत्रपाल तथा अन्यान्य देवताओं की वैदिक विधि के साथ पूजा करने का विधान है। अखंड दीप की व्यवस्था के साथ देवी प्रतिमा की अंग-न्यास और अग्नुत्तारण आदि विधि के साथ विधिवत पूजा का भी विधान प्रचलित है। नव दुर्गा पूजा,ज्योतिपूजा, वटुक-गणेशादि सहित कुमारी पूजा, अभिषेक, नान्दीश्राद्ध, रक्षाबंधन, मंगलपाठ, गुरुपूजा, मंत्र-स्नान आदि के अनुसार अनुष्ठान होता है। इस प्रकार विस्तृत विधि से पूजा करने वाले भक्तों पर भगवती अपनी असीम कृपा कर उनके दुःख, भय, रोग, शोकादि दूर कर शक्ति और समृद्धि प्रदान करती है।

सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा प्रतिपादित नौ देवियों का स्वरुप 'नवदुर्गा' कहलाती हैं, जिनको पृथक-पृथक शक्ति रूप से जाना जाता है। माँ दुर्गा की प्रथम शक्ति है शैलपुत्री :  माता  सती के अगले जन्म मैं शैलराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनकी स्तुति शैलपुत्री के रूप में करते हैं । माता शैलपुत्री की आराधना से आत्मसम्मान, चिंतन और उच्च विचारों का आविर्भाव होता है। माँ की दूसरी शक्ति है ब्रह्मचारिणी :  सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ब्रह्मचारिणी कहलाई। माँ की तीसरी शक्ति है चंद्रघंटा : इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है, इसलिए इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान चमकीला है। दस हाथ वाली खडग और अन्य अस्त्र=शस्त्र से सज्जित सिंह पर सवार यह देवी युद्ध के लिए उद्धत मुद्रा में विराजमान रहती हैं। इनके दर्शन से अलौकिक वस्तु दर्शन, दिव्य सुगंधियों का अनुभव और कई तरह की घंटियाँ सुनायी देती हैं। इनकी आराधना से साधक  में वीरता, निर्भयता के साथ सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। माँ की चौथी शक्ति है कूष्मांडा : यह देवी चराचर जगत की अधिष्ठात्री है। अष्टभुजा युक्त होने से इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है। इस देवी की आराधना से अधियों-व्याधियों से मुक्ति और सुख- समृद्धि की प्राप्ति होती है।  माँ की पांचवीं शक्ति है स्कंदमाता:  भगवती शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, उनकी माता होने से वे स्कंदमाता कहलाई। माँ की छठवीं शक्ति है कात्यायनी :  देवताओं के कार्यसिद्धि हेतु महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई, जिससे उनके द्वारा अपने पुत्री मानने से कात्यायनी नाम से प्रसिद्द हुई. माँ की सातवीं शक्ति है कालरात्रि : काल की भी रात्रि (विनाशिका) होने से उनका नाम कालरात्रि कहलाई. माँ की आठवीं शक्ति हैमहागौरी : तपस्या के द्वारा महान  गौरवर्ण प्राप्त करने से महागौरी कहलाई। माँ की नौवीं शक्ति है सिद्धिदात्री : सिद्धि अर्थात मोक्षदायिनी होने से सिद्धिदात्री कहलाती है।
नाना प्रकार के आभूषणों और रत्नों से सुशोभित ये देवियाँ क्रोध से भरी हुई और रथ पर आरूढ़ दिखाई देती हैं. ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मुसल, खेटक, तोमर, परशु, पाश, कुंत, त्रिशूल एवं उत्तम शांर्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण किए रहती हैं, जिसका उद्देश्य दुरात्माओं का नाश कर भक्तों को अभयदान देते हुए उनकी रक्षा कर लोक में शांति व्याप्त करना है।

नवरात्रि के अवसर पर भक्तों का शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा की आराधना के मूल में शक्तिशाली और विजयी होने की भावना के साथ-साथ विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश और भय-नाश ही सर्वोपरि परिलक्षित होती है।

माँ दुर्गा अपने नामानुकूल सभी पर माँ जैसी समान कृपा बनाये रखे इसी नेक भावना के साथ मेरी ओर से सभी को भक्ति और शक्ति के द्योतक दुर्गोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।


Monday, October 4, 2010

संघर्ष की सुखद अनुभूति


आशा और निराशा के बीच
झूलते-डूबते-उतराते
घोर निराशा के क्षण में भी
अविरल भाव से लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना
बहुत मुश्किल पर नामुमकिन नही
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी
चढ़ने के उपरांत
चिर प्रतीक्षा चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर ख़ुशी
बेजोड़ व अनमोल है
क्योंकि इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर सकता है
जिसने हर हाल में रहकर
अपना सघर्ष जारी रखकर
कोशिश की सबको साथ लेकर
निरंतर बने रहने की
कभी भाग्य के भरोसे नहीं बैठे
लगे रहे कर्म अपना मानकर
और सफलता के मुकाम पर पहुचे
सगर्व, सम्मान
तभी तो कहा जाता है
आदमी अपने भाग्य से नहीं
अपने कर्म से महान होता है
छोटी-छोटी लड़ाईयां जीतने के बाद ही
कोई बड़ी जंग जीतता है

               .....कविता रावत