गाँव छोड़ शहर को धावै

गाँव छोड़ शहर को धावै
करने अपने सपने साकार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निरख शहर में जन-जन को
बिखरते सपने टूटता दिल
भटक रहें हैं शहर-शहर
पर पा न सके मंजिल

कदाचार व्याप्त दिखे हरतरफ
जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार
तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार

अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

          ........कविता रावत

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October 31, 2010 at 10:43 AM

samaj tut raha hai to kuchh aawaj to hogi ?

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October 31, 2010 at 10:47 AM

बहुत लाजवाब और उम्दा लिखा है......गहरी बात आसानी से कह दी आपने

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October 31, 2010 at 10:47 AM

आज की दुनिया का कटु शाश्वत वास्तविक सत्य ..

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October 31, 2010 at 11:14 AM

गांव में भी गुजर नहीं है..

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October 31, 2010 at 11:53 AM

एक कठिन सच्चाई!!

खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!

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October 31, 2010 at 12:56 PM

कविता जी, बहुत ही ख़ूबसूरत रचना...आज पलायन इतना ज्यादा हो गया है, कि गाँव की सीमाएं सिमटती जा रही हैं..

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October 31, 2010 at 1:29 PM

कविता जी लोग भुख ओर मजबुरी मे पलायन करते हे, सुख की चाह मे, बहुत अच्छी कविता धन्यवाद

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October 31, 2010 at 1:40 PM

कविता जी,
एक ओर जहाँ विरह, आँसू, टूटा दिल, बेवफाई आदि विषय पर कविताई हो रही हो, वहम आपकी कविताएँ समाजी सरोकार से जुड़ी होती हैं, जो सोचने पर विवश करती हैं, झकझोरती हैं और इंसान को आईना दिखाती प्रतीत होती हैं. आपकी यह कविता भी उसी की एक ठोस कड़ी है. ऐसे ही लिखते रहिये!!

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October 31, 2010 at 3:03 PM

पलायन पर आपकी कविता पढी, अच्छी लगी..........शब्दों का चयन इतना प्रभावोत्पादक तो नहीं किन्तु भावों में गंभीरता है ........पलायन पर आपकी सोच सकारात्मक है. ......... मुझे नहीं पता कि आपका गढ़वाल और गढ़वाली से कितना सम्बन्ध है किन्तु गढ़वाल के लोकप्रिय कवि/गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी की लगभग बीस साल पहले एक अल्बम आयी थी "छिबडाट " कभी मौका लगे तो अवश्य सुनना कविता जी. छिबडाट में एक कविता थी "...........को मलासलू लाटा मुंडी तेरी, को पेलू भुकि चौन्ठी पकड़ी! क्वी नी सुणदू खैरी कैकी ल्हीजा अपणा दुःख अफु दगडी! खोटी हैन्सी हंसदन भैर, छन पित्त पक्याँ यख जिकुडूयूँ म़ा, जा लौट जा डांडी कांठयूँ म़ा.........."

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October 31, 2010 at 3:31 PM

सच है न जाने कितने ख्वाब ले कर शहर आते हैं सब ... पर इंट पत्थर के शहर सब लो लील लेते हैं ...

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October 31, 2010 at 6:21 PM

वाकई भटक तो गये ही हैं..मगर कोई रास्ता लौटता नहीं दिखता.

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October 31, 2010 at 6:32 PM

तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार
अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
सच है. अपनापन तो दूर, कोई ठीक से बात ही कर ले, यही क्या कम है, लेकिन कहां? अपना घर-गांव छोड़ने की सज़ा सी है ये.

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October 31, 2010 at 6:47 PM

वर्तमान को देखते हुए बहुत ही सही बात कही आपने.

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October 31, 2010 at 7:38 PM

बिखरते सपने टूटता दिल
भटक रहें हैं शहर-शहर
पर पा न सके मंजिल
कदाचार व्याप्त दिखे हरतरफ
जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!
आज की चकाचौंध को देखकर हर कोई दिग्भ्रमित होता है , व्यक्ति हर तरह के संबंधों को त्यागकर जब उन्नति की चाह में शहर का रुख करता है तो उसे यह आभास होता है कि नेतिकता नाम कि भी कोई चीज होती है , आगे बढ़ने कि चाह और अनिश्चतता के कारण यह सब कुछ होता है ,
सुंदर पोस्ट ..शुभकामनायें

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October 31, 2010 at 8:25 PM

4.5/10

सार्थक सोच / सामान्य लेखन
सुख की खोज में....गाँव से पलायन...शहर में दर-बदर
यही नियति बन गयी है लाखों-करोड़ों की

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October 31, 2010 at 9:04 PM

सबकी यही कहानी है। कोई गांव से शहर आ रहा है तो कोई शहर से मेट्रो जा रहा है तो कोई मेट्रो से विदेश। पेट जा न कराए कम है।

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October 31, 2010 at 9:05 PM

पेट जो न कराए कम है।

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October 31, 2010 at 10:12 PM

यह दर्द अब टीस बनकर सता रहा है। बेहतरीन कविता।

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November 1, 2010 at 7:51 AM

गहरी बात ......बहुत अच्छी कविता.... धन्यवाद

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November 1, 2010 at 8:32 AM This comment has been removed by the author.
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November 1, 2010 at 8:34 AM

सार्थक प्रस्तुती....वास्तव में भ्रष्टाचार और बिल्डर माफिया की गुलामी कर रही इस देश की सरकार नीतियाँ ही ऐसी बना रही है की गांव का विकाश ना हो और शहरों में लोग जानवरों की तरह रहने और काम करने को मजबूर हों....गांवों में जिले का कलक्टर,SP और भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों के गठजोर से साडी विकाश योजनाओं को लूट लिया जाता है पढ़े-लिखे इमानदार लोगों को कोई सरकारी ऋण आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता है इतनी कुव्यवस्था और अराजकता है की अगर इस देश में ईमानदारी और सच्चाई से जाँच हो तो 90 प्रतिशत जनप्रतिनिधि,डीएम,SP अपराध और लूट में इस तरह लिप्त पाए जायेंगे की उनके लिए सरे आम फंसी की सजा भी कम ही लगेगी ...लेकिन जाँच कौन करे..आदर्श हाऊसिंग घोटाला हुआ है और सबसे भ्रष्ट मंत्री प्रणव मुखर्जी उसकी जाँच कर रहें हैं क्या एक भ्रष्ट व्यक्ति किसी भ्रष्टाचार की जाँच कर सकता है ......? इस भ्रष्ट सरकार को देश में जाँच के लिए किरण बेदी,अरविन्द केजरीवाल,अन्ना हजारे जैसे लोग दिखतें ही नहीं.....सोनिया गाँधी जैसी भ्रष्टाचार की देवी का ये सब प्रकोप है ...

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November 1, 2010 at 11:32 AM

बहुत खूब कविता जी ... आजकल तो गाँव देखने को ही नहीं मिलते .. और पलायन के बाद जो उनकी दश होती है वो और भी दुखदायी है

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November 1, 2010 at 11:53 AM

sarthak lekhan......aaj kee hakeekat bayan kar dee hai ise rachana ne........hamesha kee tarah badee hee sunder abhivykti........
Aabhar .

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November 1, 2010 at 1:51 PM

निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार
तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार
अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!
...ek dard bhari kasak ke saath shahar mein bhatkate berojgaaron ke maarmik abhivyakti ke liye aabhar

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November 1, 2010 at 1:54 PM

sahri jivan ka aakrshan or gaon main mulbhut subhidhaon ka aaabhav or berojgari se nijat paaney hetu jb koi yuva apney gaon ko chodkr sahar ko palayan kr jata hai to na jane kitney sapney uskey jehan main angrai ley rahey hotey hain or jb usko lagta hai ki uskey sapney mahaj sapney hi rh gaye to tb tk sahyad bahut der ho chuki hoti hai....

abhaar

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November 1, 2010 at 4:23 PM

Kaisa dil zarozaar rota hai,jab apnapan nahi milta!

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November 1, 2010 at 8:11 PM

अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!
आज की त्रासदी की सुन्दर शब्दों मेीअभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

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November 1, 2010 at 8:47 PM

शहर की चकाचौंद एक भूल भुलैया तमाम उम्र बनाये रखती है जो मृगतृष्णा से अपनी ओर खींचे रखती है और गाँव से निकला इंसान ना शहर का रहता है न गांव का. कितना अवसाद है.

सुंदर रचना.

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November 2, 2010 at 10:50 AM

marmik...palayan kadard to bhogane valaahi samajh sakata hai.....

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November 2, 2010 at 1:49 PM

शहर की चकाचौध युवाओ को अपनी तरफ खीच तो लाती है मगर इन सपनों के टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगता.... बहुत सच कहा है आप ने इस कविता के माध्यम से......

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November 2, 2010 at 4:19 PM

खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार
...बहुत सच कहा है आप ने....एक कठिन सच्चाई!!

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November 2, 2010 at 4:24 PM

बिखरते सपने टूटता दिल
भटक रहें हैं शहर-शहर
पर पा न सके मंजिल
कदाचार व्याप्त दिखे हरतरफ
जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार
.....आज की त्रासदी पर सोचने पर विवश करती अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

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November 2, 2010 at 5:17 PM

कविता जी, बहुत ही सही कहा है आपने। आज की पीढ़ी जिस तरह से गाँव छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर चुकी है, यह उनका दुर्भाग्य ही है कि उन्हें शहरों में जीवन यापन के लिए क्या क्या कर्म करने पड़ रहे हैं फिर भी उनका पेट खाली रह जाता है क्योंकि यहाँ उन्हें प्यार नहीं मिलता। इस अर्थपूर्ण रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई

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November 2, 2010 at 7:26 PM

फिल्म गमन के कई दृश्य याद आ गए।

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November 2, 2010 at 7:42 PM

एक बेरोजगार की मनोदशा का सही चित्रण किया है .....
आपकी रचनायें समाज से जुडी होती हैं कविता जी ....

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November 2, 2010 at 8:14 PM

कविता जी,
नमस्ते!
करेक्ट है!
आशीष
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पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

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November 3, 2010 at 7:20 AM

जाने कहाँ विलुप्त सदाचार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!
निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार

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Beautiful poem, revealing the bitter facts of life around.

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November 3, 2010 at 6:49 PM

निज स्वार्थपूर्ति में दिखे सब
अब कौन करे भला उपकार
तरस रहे शहर में अपनेपन को
पर मिलता कहाँ अपना सा प्यार
अरमानों की गठरी लादे फिरते
आकर शहर भटक रहे बेरोजगार
खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार!
...सपनों के टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगता.... बहुत सच कहा है आप ने ...
अर्थपूर्ण रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई

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November 4, 2010 at 11:10 AM

सार्थक सोच
सुख की खोज में....गाँव से पलायन...शहर में दर-बदर
यही नियति बन गयी है लाखों-करोड़ों की
..आज की त्रासदी पर सोचने पर विवश करती अभिव्यक्ति।

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November 4, 2010 at 3:08 PM

गहन संवेदना से भरा-पूरा दिल है आपका... यह सच्चाई आपकी इन लघु रचनाओं से उजागर हो रही है!

बहुत-बहुत बधाई...दीप-पर्व की!

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November 10, 2010 at 7:02 PM

खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में
आकर बन बैठें हैं लाचार..
सच है न जाने कितने ख्वाब ले कर शहर आते हैं सब ..यह सच्चाई आपकी इन लघु रचनाओं से उजागर हो रही है!

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November 12, 2010 at 7:50 PM

कविता जी आपने अपनी इस सुंदर लेख के द्वारा मेरे उत्तराखंड मे पलायन और बेरोजगारी की सबसे बड़ी बिडम्बना पर सजीव चित्रण किया है !! आप का लेख मन की गहरिएयों मे उतर कर एक टीश सी उत्पन कर देता है और दिमाग सोचने को मजबूर हो जाता है की हम भी इस पलायन और बेरोजगारी का एक नासूर अंग है ????

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November 22, 2010 at 7:34 PM

jabardasht rachna ..gaon se palayan nahi tham rahai hai... man ko andolit karti rachna..

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