तुमको सोचने के बाद

तुमको
सोचने के बाद
जाने क्यों
तुमसे बात करने की प्रबल इच्छा
जाग उठती है
तुमको
सोचने के बाद

डरती हूँ
कहीं जुबाँ पर
आ न जाएं वे बातें
जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको
फूलों से लदी खुशगवार डाली देख


सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
मुहं फेर बढ़ लेगा कोई अपना
जो आता था कभी करीब
अपना समझ प्यार भरे कदमों से
और चुन ले जाता कुछ फूल
मान,सम्मान, पूजा की खातिर
बेधड़क, बेरोकटोक

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
पर अंतर्मन रोकता है बमुश्किल
फिर चेहरा तुम्हारा
झूम आता है आँखों में
तुम उतरते हो
दिल की अतल गहराईयों में
जिसके छोर को पकड़ पाना
नामुमकिन सा लगता है

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
फिर कभी अचानक ही
बदली बन गरज-चमक कर
प्रेम बगिया पर आ
बरसने लगता है
तुमको
सोचने के बाद
जाने क्यों!

   ...कविता रावत

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November 13, 2010 at 8:56 AM

आदरणीय कविता रावत जी
नमस्कार !
सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
बहुत बढ़िया,
बड़ी खूबसूरती से कही अपनी बात आपने.....

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November 13, 2010 at 9:22 AM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसताए रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है

दिल की गहराइयों से उपजी एक अत्यंत प्रभावशाली कविता।

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November 13, 2010 at 9:27 AM

yh kahin swyam se vartalaap ka koi naya or khubsurat andaaz to nahi.....bhrhaal uprokt sunder rachna hetu abhaar.

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November 13, 2010 at 9:27 AM

जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
खुबसुरत ख्याल, सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग ...सुंदर बिम्ब ...पूरी कविता सोचने पर विवश करती है ...तुमको सोचने के बाद ..शुभकामनायें

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November 13, 2010 at 9:36 AM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसताए रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
मन की कशमकश को सुन्दर शब्दों मे पिरोया है
अच्छी लगी रचना। बधाई।

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November 13, 2010 at 10:06 AM

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
यही उहापोह और अंतर्द्वन्द ही तो है जो कभी प्रतिगामी, कभी अनुगामी तो कभी ऊर्ध्वगामी बनाता है और फिर शायद यही जीवन है

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November 13, 2010 at 10:16 AM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसताए रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
जीवन की कशमकश को बड़ी खूबसूरती से पिरोया...... सुंदर कविता

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November 13, 2010 at 11:14 AM

इस क्यूँ का जवाब तो किसी के पास नहीं होता कविता जी .... बहुत खूबसूरत भाव है रचना का .. शुभकामनाएं ...

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November 13, 2010 at 11:36 AM

tumko sochne ke baad
shabd bhi os kee bundon se dikhne lagte hain...

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November 13, 2010 at 12:02 PM

"....कहीं जुबाँ पर
आ न जाएं वे बातें
जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको
फूलों से लदी खुशगवार डाली देख......."

दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ.मन के अंतर्द्वंद का बेहतरीन चित्रण.

सादर.

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November 13, 2010 at 12:40 PM

अंतर्द्वंद को कहती अच्छी रचना ..

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November 13, 2010 at 2:26 PM

5/10

कविता का पहला आधा हिस्सा बहुत सुन्दर लगा.
बाद में असर कम हो गया है.

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November 13, 2010 at 5:10 PM

अंतर्द्वन्द को बखूबी उकेरा है।

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November 13, 2010 at 5:24 PM

बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको


अन्तर्द्वन्द की सुगढ़ अभिव्यक्ति है आप की कविता..नाम को सार्थक करती एक रचना!

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November 13, 2010 at 7:17 PM

man ki vedna ka achchha chitran hai.... bahoot khoob

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November 13, 2010 at 7:58 PM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
अन्तर्द्वन्द को अभिव्यक्त करने की प्रभावोत्पादक शैली. ..............एक मार्मिक कविता. .......वधाई.

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November 13, 2010 at 8:33 PM

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
इस कविता में संवेदना का विस्तार व्यापक रूप से देखा जा सकता है।

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November 13, 2010 at 11:38 PM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
द्वंद से गुज़रते मन की सुन्दर अभिव्यक्ति.

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November 14, 2010 at 10:43 AM

फिर कभी अचानक ही
बदली बन गरज-चमक कर
प्रेम बगिया पर आ
बरसने लगता है
तुमको
सोचने के बाद

बहुत सशक्त तरीके से मन की कश्मोकाश को सुंदर रूप दिया इस रचना के जरिये.

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November 14, 2010 at 11:59 AM

क्या करें जिस से जितना ज्यादा प्रेम होता है मन उसी के बारे सोचता रहता है और तरह तरह के अच्छे बुरे विचार जन्म लेते हैं अच्छा द्वन्द है मन और विचारों का

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November 14, 2010 at 2:29 PM

सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
मुहं फेर बढ़ लेगा कोई अपना
जो आता था कभी करीब
अपना समझ प्यार भरे कदमों से
और चुन ले जाता कुछ फूल
मान,सम्मान, पूजा की खातिर
बेधड़क, बेरोकटोक
..बहुत प्रभावोत्पादक शैली से मन की सुगढ़ अभिव्यक्ति
दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ.....बधाई।

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November 14, 2010 at 5:17 PM

मन के अंतर्द्वंद को आपने सुन्दर तरीके से दिखाया है ...
बाल दिवस की शुभकामनायें !

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November 14, 2010 at 10:23 PM

अच्छी लगी कविता की कविता \
शुभकामनाये

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November 14, 2010 at 10:28 PM

हम भी यही कहते हैं कि है अच्‍छी है कविता।

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November 15, 2010 at 2:48 AM

मेरी तो यही कामना है कि भगवान न करे कि किसी कि जिदगी में बिना फूलों वाली डाली जैसी हालत हो। आकर्षण तन से बढ़कर मन को हो सभी का। पर आंख बंद कर देने से बिल्ली नहीं भागती। सच का रंग काफी कड़वा होता है अक्सर।

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November 15, 2010 at 8:20 AM

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
पर अंतर्मन रोकता है बमुश्किल
फिर चेहरा तुम्हारा
झूम आता है आँखों में
तुम उतरते हो
दिल की अतल गहराईयों में
जिसके छोर को पकड़ पाना
नामुमकिन सा लगता है
...bahad prabhavshali dhang se aapne pyar ke is antardhwandh ko shabdon mein dhala hai... Dil mein utar gayee... aap kee kavitayen padhkar bahut hi achha lagta hai..bahut asarkari rachnayen likhti hai aap..aabhar

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November 15, 2010 at 8:50 AM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
..मन के अंतर्द्वंद द्वंद से गुज़रते मन की सुन्दर अभिव्यक्ति

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November 15, 2010 at 1:04 PM

मनोभावों की हलचल लिये एक सुन्दर सशक्त रचना. आपने सच ही कहा है कि कभी कभी व्यक्ति जो कहना चाहता है शायद इसीलिये नहीं कह पाता कि वह नहीं जानता सामने वाला क्या प्रतिक्रिया करेगा और इसी उहापोह में कही बार तो उम्र गुजर जाती है और फ़िर हाथ लगता है सिर्फ़ एक अफ़सोस कि काश अपनी बात उस समय कह दी होती. बेबाकी के बुरे परिणाम हो सकते हैं परन्तु शायद चुप रहने के अतिबुरे परिणाम.... लिखते रहिये

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November 15, 2010 at 5:27 PM

एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसता, रुलाता

....यह जीवन ही इक दंद है...सुन्दर व सार्थक कविता..बधाई.



_________________
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November 16, 2010 at 4:48 PM

डरती हूँ
कहीं जुबाँ पर
आ न जाएं वे बातें
जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको
...मन के अंतर्द्वंद को आपने सुन्दर तरीके से दिखाया है ..बधाई

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November 16, 2010 at 4:52 PM

आ न जाएं वे बातें
जो पसंद न हों तुमको
बेचैन कर दें
मन को
भाव की भाषा चेहरे पर
दिखने न लगें
कहीं सबको
....दिल को छू लेने वाली मन के अंतर्द्वंद का बेहतरीन चित्रण.
सुन्दर व सार्थक कविता......बधाई

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November 17, 2010 at 10:57 AM

दूर था इसलिये देर हुई.. पहले भी कहा था और आज भी कहता हूँ कि आपके कहने का अंदाज़ अलग है.. अपकी कविता में उत्तराखण्ड की निस्छल पहाड़ियों की अतल गहराई दिखती है. बहुत ही सुंदरता से भाव पिरोये हैं आपने.

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November 17, 2010 at 5:29 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है! हार्दिक शुभकामनाएं!
लघुकथा – शांति का दूत

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November 17, 2010 at 5:40 PM

सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
...मन के अंतर्द्वंद की बहुत बढ़िया प्रस्तुति...
हार्दिक शुभकामनाएं!

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November 17, 2010 at 11:28 PM

कविता जी, मानसिक उथल पुथल की आपने सुन्दर अभिव्यक्ति की है---बहुत ही सहजता पूर्वक।

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November 18, 2010 at 4:10 PM

सोचती हूँ डाली के बारे में
तब क्या गुजरेगी डाली पर
जब फूलों से वीरान
आकर्षित न कर पाएगी
मुहं फेर बढ़ लेगा कोई अपना
जो आता था कभी करीब
अपना समझ प्यार भरे कदमों से...
..बहुत चंगा है जी
बल्ले-बल्ले ..

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November 19, 2010 at 4:50 PM

मन दो कदम पीछे हटता है
दिल दो कदम आगे बढ़ता है
पर अंतर्मन रोकता है बमुश्किल
फिर चेहरा तुम्हारा
झूम आता है आँखों में
तुम उतरते हो
दिल की अतल गहराईयों में
.... मन और विचारों का बहुत अच्छा द्वन्द ....
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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November 19, 2010 at 4:55 PM

कविता जी, प्रेमरस से सराबोर एक शानदार कविता पढवाने के लिए शुक्रिया।

---------
वह खूबसूरत चुड़ैल।
क्‍या आप सच्‍चे देशभक्‍त हैं?

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November 19, 2010 at 8:02 PM

सोच जब भी गहरी हुई है कहीं कोई अंदेशा भी जन्मता है। सोच का विस्तार है यह। और जब किसी प्रेम के सन्दर्भ में होता है तो कई कई तरह से वो मन के तूफान को बांधने के यत्न में ज्यादा मचलता है। यहां हृदय और मन के बीच का संघर्ष है। पर यह संघर्ष भी कितना सरल, कितना अबोध सा...। दिल और मन की इस रस्साकशी में बेचारी आंखे भी नम होती है और दिमाग का हाल हजारो-हजार विचारों से मेघों को उद्वेलित करता रहता है। रचना में 'सोच' ने अपने अर्थों के साथ न्याय किया है जो मुझे काफी अच्छा लगा।

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November 20, 2010 at 4:55 PM

फिर कभी अचानक ही
बदली बन गरज-चमक कर
प्रेम बगिया पर आ
बरसने लगता है
तुमको
सोचने के बाद
....प्रेमभरी मन:स्थिति के द्वन्द को आपने बहुत ही खूबसूरती से बयाँ किया है.. लाजवाब शुद्ध सात्विक प्रेमाभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद!

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November 21, 2010 at 11:58 AM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसताए रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है

दिल की गहराइयों से उपजी एक अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति
एक शानदार कविता पढवाने के लिए शुक्रिया

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November 21, 2010 at 2:30 PM

Kavita ji bahut sundar antardwand hai..
aur aapka dhanyvaad ..aap hamare blog me aayi..
aik baat bataiye.. kya me sahi hoon.. aapki profile picture me aapke pichey jo pahad hai uska naam HATHI Parvat hai.. Joshimath me.. galat sahi jo bhi hoga chalega .. antardwand me nahi rahungi.. aapse pooch lungi.. :))

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November 21, 2010 at 6:57 PM

बहुत सुन्दर ...

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RAJ
November 22, 2010 at 7:22 PM

बस एक द्वंद्ध चलता है
बस मन यूं ही तपता है
कभी हँसताए रुलाता
कभी अनजान बन
दुनिया की भीड़ में खो जाता है
....आप के नामानुकूल सार्थक अन्तर्द्वन्द की सुन्दर सुगढ़ अभिव्यक्ति ....

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