आस्थाओं का गिरता स्तर

आस्थाओं का गिरता स्तर















चिंतन और व्यवहार बनाता है आचरण
और वातावरण से निर्मित होती है परिस्थितियाँ
जो निर्धारक है सुख-दुःख और उत्थान-पतन की
आज बहुधा यही सुनने में आता है
कि जमाना बुरा है, कलयुगी दौर है
परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं
और भाग्य चक्र उल्टा है
और इसी उधेड़बुन में बिना जड़ों को सींचे
सूखे मुरझाये पेड़ों को हरा-भरा बनाने की
कोशिश जारी है
आस्थाओं का स्तर गिरना जारी है
और संकीर्ण स्वार्थपरता का विलासी परितोषण
बनता जा रहा है जीवन लक्ष्य
वैभव भा रहा है हर किसी को
इसके साथ ही बढ़ रही है समृद्धि
पर रोग-कलह, पशु-प्रवृत्ति, अपराध-वृत्ति व मनोरोग वृद्धि
दुगुनी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं
और धीरे-धीरे मानव स्वयं दस्तक दे रहा है
महाविनाश युद्ध की विभीषिकाओं के द्वार पर

-कविता रावत
श्रीराम के आदर्श शाश्वत और मूल्य कालजयी  हैं

श्रीराम के आदर्श शाश्वत और मूल्य कालजयी हैं


मनुष्य की श्रेष्ठता उसके शील, विवेक, दया, दान, परोपकार धर्मादि सदगुणों के कारण होती है. इसलिये जीवन का मात्र पावन ध्येय "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" होता है. मानव की कीर्ति उनके श्रेष्ठ गुणों और आदर्श के कार्यान्वयन एवं उद्देश्य के सफल होने पर समाज में स्वतः प्रस्फुटित होती है जैसे- मकरंद सुवासित सुमनों की सुरभि! मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सा लोकरंजक राजा कीर्तिशाली होकर जनपूजित होता है, जबकि परनारी अपहर्ता, साधु-संतों को पीड़ित करने वाला वेद शास्त्रज्ञाता रावण सा प्रतापी नरेश अपकीर्ति पाकर लोकनिन्दित बनता है. इसी प्रसंग में कहा गया है-

"रामवत वर्तितव्यं न रावणदिव" अर्थात राम के समान आचरण करो, रावण के समान नहीं.

श्रीराम का त्रेतायुग में दिया गया भावी शासकों के प्रति सन्देश आज भी कितना सार्थक है-
"भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला: नत्वान्नत्वा याच्तेरारामचंद्र
सामान्योग्य्म धर्म सेतुर्नराणा काले-काले पालनियों भवदभि:"

अर्थात हे! भारत के भावी पालो! मैं तुमसे अपने उत्तराधिकार के रूप में यही चाहता हूँ की वेदशास्त्रों के सिंद्धांतों की रक्षा हेतु जिस मर्यादा को मैंने स्थापित किया उसका तुम निरंतर पालन करना. वस्तुत: नीतिभ्रष्टता के समकालीन बवंडर में समाज को स्वामित्व प्रदान करने के लिए सनातन धर्म के चिरंतन आदर्शों के प्रतीक श्रीराम के चरित्र से ही प्रेरणा प्राप्त करना चाहिए क्योंकि श्रीराम के आदर्श शाश्वत हैं उनके जीवन मूल्य कालजयी होने के कारण आज भी प्रासंगिक हैं.

-कविता रावत
सौभाग्य जब भी आए वही उसका सही समय होता है

सौभाग्य जब भी आए वही उसका सही समय होता है

मामूली दुश्मन या घाव की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए
दुश्मन अगर चींटीं भी हो तो उसे हाथी समझना चाहिए

भेड़िये की मौत पर भेड़ अपनी खैर मनाता है
कुत्ते की मौत पर भेडिया नहीं रोया करता है

शैतान की मौत से इंसान को सुकूं मिलता है
दुश्मनी में अक्सर आदमी दिन-रात जागता है

अक्ल की बात दुश्मन से भी सीखी जा सकती है
अक्सर दुश्मनी आदमी को समझदार बना देती है

बिगाड़ने में नहीं बनाने में बहुत समय लगता है
शुभ कार्य हेतु कोई मुहूर्त नहीं निकाला जाता है

सौभाग्य जब भी आए वही उसका सही समय होता है
उसी की हँसी सबको भली लगे जो अंत में हँसता है

                                                  -कविता रावत
सब चलता रहता है

सब चलता रहता है

गाँव हो या शहर आज जब भी कोई घटना, दुर्घटना या सामाजिक सरोकार से सम्बंधित कुछ अहम् बातें सामने आती है तो अक्सर बहुत से लोगों को बड़े सहजता से यह कहते सुनकर कि 'यह सब तो चलता रहता है' मन को विचलित कर सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह किसी सभ्य समाज की त्रासदी नहीं तो और क्या?..... देखिये आस-पास की कुछ झलकियाँ ........ आप क्या कहना चाहेंगे................


दिन-रात की किचकिच, पिटपिट से तंग भागी बीबी
वह अपना दुखड़ा सबको सुनाता फिरता है
'चिंता मत कर आ जायेगी एक दिन घर'
पास बैठ कोई अपना समझाने लगता है
ऊँच-नीच की चलती दो चार बातें
फिर होता गला तर, गम धुएं में उड़ता है
है अच्छा दस्तूर गम गफलत का
यह सब  चलता रहता है!

जब संत-स्वामी खूब रंग जमाकर
खबरी चैनलों पर आकर छा जातें हैं
तब जनता, सरकार हमारी बड़ी श्रद्धालु
समझ चमत्कार बड़े जतन से देखते हैं
'कब समझेगें चमत्कार चक्कर इनका'
देख करतूत जब कोई कुछ कहना चाहता है
तो पास बैठा उसी को आंख दिखाता?'
यह सब चलता रहता है!

जब दबंगों ने बेक़सूर दलित बुजुर्ग को
पीट-पीट कर सरेआम सारे गाँव घुमाया
तब किसी ने अमानवीय कृत्य कह पला झाड़ा
तो किसी ने महज राजनीतिक हाथकंडा बताया
बात न बिगड़े उठ खड़ा कोई समझदार
घुड़क कर सबको सब समझा देता है
'किसी ने न कुछ देखा न सुना'
यह सब  चलता रहता है!

छोटी सी जिंदगी में खूब मौज-मस्ती कर ली
कच्ची-पक्की जैसे मिली सब हजम कर ली
पर जब फेफड़ों ने फडकना बंद किया
तो कमबख्त शरीर ने भी साथ छोड़ दिया
देख हश्र हर दिन खाने-पीने वाला साथी
इसे 'ऊपर वाले की मर्जी' घोषित करता है
'ख़ुशी- गम की अचूक दवा बनी सोमरस'?
यह सब चलता रहता है!

किसी को रुखी-सूखी कौर भी हजम नहीं यहाँ
पर कोई चट लाखों-करोड़ों हजम कर जाता है
'नहीं नसीब में जिसके तो कहाँ से मिलेगा भैया'?
यह सब  चलता रहता है!

पढने-लिखने घर से निकला बन-ठन लाड़ला
जाकर पार्क, इन्टरनेट में डेटिंग-चेटिंग करता है!
देख फुर्सत किसको क्या पड़ी समझा दे भैया'?
यह सब चलता रहता है!

घरेलू हिंसा, दहेज़, ज्यादती, अपमान, भुखमरी, गुंडागर्दी
कमी कहाँ? जिनके मन हरदम यह सब रमता है
'चलो छोड़ो दुनियाभर की बेमतलब चिकचिक'!
यह सब तो चलता रहता है!
                           
- कविता रावत