जिंदगी रहती कहाँ है

जिंदगी रहती कहाँ है















अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है!

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

है पता ख़ुशी से जी ले चार दिन
पर ख़ुशी से कितने जी पाते यहां हैं!
कौन कितना साथ होगा अपने
यह हम जान पाते कहाँ हैं!

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!

                      .... कविता रावत
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

अबकी बार राखी में जरुर घर आना


राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना
मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें हैं बुलाते
कभी खेले-कूदे अब क्यों हो भूले जाते
अपनी बारहखड़ी का स्कूल देखते जाना
बचपन के दिन की यादें साथ ले आना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का  है एक सपना
नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
लाना संग हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब मन कम लगता
गाँव में रह शहर का सपना दिखता
सूने घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे
कब सुध लोगे देख बागवाँ बुला रहे
आकर अपनी आखों से  देख जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

रह-रह कर आती गुजरे वर्षों की बातें
जब मीलों चल बातें करते न अघाते
वो सघन वन की पगडंडी सँकरी
सिर लादे घास-लकड़ी की भारी गठरी
आकर बिसरी यादें ताज़ी कर जाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना


गाँव के बड़े-बुजुर्ग याद करते रहते हैं
अपने-पराये जब-तब पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर अनजान बने हुए हो
आकर सबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

                   ......कविता रावत



बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन

बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन

शहर की महज औपचारिक दिशा की और निरंतर अग्रसर होती स्वत्रंत्रता दिवस की एक दिवसीय चकाचौध के बीच बचपन में गाँव के स्कूल में मनाये जाने वाले स्वत्रंत्रता दिवस की याद रह रह कर आ जाती है  जब गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी, संकरी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से प्रभात फेरी के लिए गाँव-गाँव, घर-घर जाकर देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम में अलख जागते थे, जिन्हें गाँव के नौजवान, बड़े,बुजुर्ग सभी बड़े जोश के साथ बड़ी उत्सुकता से स्वागत कर बड़े मग्न होकर सुनते थे एक गीत हमारे तिरंगे का जिसे मैं अब भी बच्चों से संग गाया करती हूँ जो मुझे बेहद प्यारा लगता है..

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा
इस झंडे के नीचे निर्भय
होये महान शक्ति का संचय
बोलो भारत माता की जय
....................

उस समय छोटे-छोटे कदमों से जंगल की संकरी डरावनी राह चलते यह गीत हौसला बुलंद करने के लिए कम नहीं था.............

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो
या सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं
तुम निडर हटो नहीं
...............

......अब तो शहरी हालातों को देश स्कूल में पढ़ी देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारी अमर वीर देशभक्तों का बलिदानी इतिहास धार्मिक पौराणिक कथा-कहानियों की तरह बनती जा रही हैं, जिसे पढ़ना-सुनना दुर्भाग्यवस उबाऊ, नीरस समझा जाने लगा है राजनीति शास्त्र की किताब में पढ़ा 'हमारा संविधान' जिसमें हमारा लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, मौलिक अधिकार व कर्तव्यों की बड़ी-बड़ी व्याख्याएं होती थी अब स्कूल के बस्तों और पुस्तकालयों में स्वयं ही घुट रहीं हैं और वर्तमान वास्तविक राजनीति तो हमारी संसद, विधान मंडलों की सुरक्षित, चाक-चौबंद समझी जानी वाली बंद कंदराओं से बाहर आकर स्कूल, कॉलेज में सीधे दाखिला लेकर सीधे-साधे, भोले-भाले, गरीब समझे जाने वाले ग्रामीणों के घर-घर में अपनी घुसपैठ करते हुए 'राजनीति' की एक खुली किताब बन गयी है, जिसमें सभी बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाते नज़र आने लगे हैं
..कविता रावत 

मनभावन वर्षा

मनभावन वर्षा

मुरझाये पौधे भी खिल उठते
जब उमड़- घुमड़ बरसे पानी,
आह! इन काली घटाओं की दिखती
हरदम अजब- गजब की मनमानी।
देख बरसते बादलों को ऊपर
मलिन पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं,
ज्यों बरसाये बादल बूंद- बूंद
त्यों नित ये अद्भुत छटा बिखेरते हैं।
अजब- गजब के रंग बिखरे
इस बर्षा से चहुंदिशि फैले हरियाली,
जब उमड़- घुमड़ बरसे बदरा
तब मनमोहक दिखती हरदम डाली!
आह! काले बादलों वाली बर्षा
तू भी क्या- क्या गुल खिलाती है,
हरदम बूंद-बूंद बरस-बरसकर
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है।
ये घनघोर काली घटाएं तो
बार- बार बरसाये बरसा की बौछारे
बरसकर भर देते मन उमंग तब
जब घर ऊपर घिर- घिर आते सारे।
धन्य - धन्य! वे घर सारे
जिनके ऊपर बरसे ऊपर का पानी,
धन्य- धन्य हैं वे जीव धरा पर
जिनको फल मिलता नित मनमानी।
कैसे कहें, कहां-कहां, कब-कब
बरस पड़ता यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

                                                      ........कविता रावत

मित्र और मित्रता :  एक नज़र

मित्र और मित्रता : एक नज़र















मैत्री बहुत उदार होती है पर प्रेम कृपण होता है
मित्र के घर का रास्ता कभी लम्बा नहीं होता है

मित्र के लिए जो भार उठाया वह हल्का मालूम होता है
जो मित्रों का भला करे वह अपना ही भला करता है

बिना विश्वास कभी मित्रता चिर स्थाई नहीं रहती है
मैत्री में महज औपचरिकता अधूरेपन को दर्शाती है

दूसरों से तुलना करने पर दोस्त भी दुश्मन बन जाता है
दो मित्रों के विवाद में निर्णायक बन एक गंवाना पड़ता है

मित्र वही जो भर्त्सना एकांत में पर प्रशंसा सबके सम्मुख करता है
सच्चा मित्र दूसरों को हमारे गुण पर अवगुण हमें बताता है

जो उपहार में मित्र खरीदते हैं उन्हें दूसरे कोई खरीद ले जाते हैं
मित्र सांरगी के तार हैं ज्यादा कसने पर टूटकर बिखर जाते हैं

अनपरखे मित्र अनतोड़े अखरोट के तरह होते हैं
विपत्ति में सच्चे-झूठे मित्र पहचान लिए जाते हैं

झूठे मित्रों की जुबाँ मीठी लेकिन दिल बहुत कडुवे होते हैं
झूठे मित्र व परछाई सूरज चमकने तक ही साथ रहते हैं

मित्रों का चयन थोड़े पर चुनिंदा पुस्तकों की भांति कर लिया
तो समझो जिंदगी में हमने एक साथ बहुत कुछ पा लिया

                             ......कविता रावत