वर्ना मेरे गाँव में इतनी वीरानियाँ नहीं होती......

वर्ना मेरे गाँव में इतनी वीरानियाँ नहीं होती......

जिंदगी में हमारी अगर दुशवारियाँ नहीं होती
हमारे हौसलों पर लोगों को हैरानियाँ नहीं होती

चाहता तो वह मुझे दिल में भी रख सकता था
मुनासिब हरेक को चार दीवारियाँ नहीं होती

मेरा ईमान भी अब बुझी हुई राख की तरह है
जिसमें कभी न आंच और न चिंगारियाँ होती

कुछ कम पढ़े तो कुछ अधिक ही पढ़ गए हम
वर्ना मेरे गाँव में इतनी वीरानियाँ नहीं होती

कुछ तो होता होगा असर दुआओं का भी
सिर्फ दवाओं से ठीक बीमारियाँ नहीं होती

देखते हैं बिगबॉस की कहानियाँ बच्चे टीवी पर
शायद घरों में अब वे दादी-नानियाँ नहीं होती


कोई कहकहा लगाओ के अब सन्नाटा खत्म हो
एक-दो बच्चों से अब किलकारियाँ नहीं होती

.........कविता रावत
त्रासदी भरी याद....

त्रासदी भरी याद....

पिछले १५-२० दिन से भोपाल से बाहर रहने के कारण नेट से दूरी बनी रही. अभी दिसंबर माह शुरू हुआ तो भोपाल गैस त्रासदी का वह भयावह मंजर आँखों में कौंधने लगा. अपनी आँखों के सामने घटी इस त्रासदी के भयावह दृश्य कई वर्ष बाद भी दिन-रात आँखों में उमड़ते-घुमड़ते हुए मन को बेचैन करते रहे. उस समय अपनी भूल अक्सर उन पीड़ित घर-परिवारों की  दशा देख-सुनकर मन बार-बार उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम-घूम कर व्यथित हुए बिना नहीं रह पाता था और जब-जब कोई भी पीड़ित व्यक्ति अपनी व्यथा सुनाता था तो मन गहरी संवेदना से भर उठता और क्या करें, क्या नहीं की उधेड़बुन में खोकर बेचैन हो जाता . कई बार सोचा कि उस घटना का अपने ब्लॉग पर विस्तृत वर्णन करुँगी लेकिन अब तो आलम यह है व्यस्तता के चलते कब दिसंबर का माह आ जाता है पता ही नहीं चलता.  फ़िलहाल ऐसे ही हालातों में उन दिनों की लिखी एक आँखों देखी त्रासद भरी जीवंत घटना का काव्य रूप प्रस्तुत कर रही हूँ... 

वो पास खड़ी थी मेरे
        दूर कहीं की रहने वाली,
दिखती थी वो मुझको ऐसी
        ज्यों मूक खड़ी हो डाली।
पलभर उसके ऊपर उठे नयन
       पलभर नीचे थे झपके,
पसीज गया यह मन मेरा
      जब आँसू उसके थे टपके।
वीरान दिखती वो इस कदर
      ज्यों पतझड़ में रहती डाली,
वो मूक खड़ी थी पास मेरे
      दूर कहीं की रहने वाली।।
समझ न पाया मैं दु:ख उसका
     जाने वो क्या चाहती थी,
सूनापन दिखता नयनों में
     वो पल-पल आँसू बहाती थी।
निरख रही थी सूनी गोद वह
    और पसार रही थी निज झोली
जब दु:ख का कारण पूछा मैंने
      तब वह तनिक सहमकर बोली-
'छिन चुका था सुहाग मेरा
     किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
     खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
     गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी 
      दूर कहीं की रहने वाली।।

...कविता रावत 
अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है....

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है....

जहाँ उत्कृष्टता पाई जाती है वहाँ अभिमान आ जाता है।
अभिमान आदमी की अपनी त्रुटियों का मुखौटा होता है।।

बन्दर के हाथ हल्दी की गांठ लगी वह पंसारी बन बैठा।
अंधे के पांव तले बटेर आया वह शिकारी बन बैठा ।।

बन्दर बहुत ऊँचा चढ़ने पर अपनी दुम ज्यादा दिखाता है ।
ऊँची डींग हांकने वाला कभी कुछ करके नहीं दिखाता है ।

बन्दर को अधिकार मिला वह नदी प्रवाह के विरुद्ध तैरने चला ।
गधा पहाड़ पर क्या चढ़ा वह पहाड़ को छोटा समझने लगा ।।

अंडे से निकला चूज़ा वह उसे ही हिकारत से देखने चला।
वह घोड़े पर क्या सवार हुआ बाप पहचानना भूल गया ।।

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है ।
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है।।

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है।
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है ।।


....कविता रावत
दीप बन जग में उजियारा फैलाएं....

दीप बन जग में उजियारा फैलाएं....


दीपावली की गहन अंधियारी रात्रि में
जब हरतरफ पटाखों के शोरगुल
और धुएं से उपजे प्रदूषण के बीच
अन्धकार को मिटाने को उद्धत
छोटे से टिमटिमाते दीप को
निर्विकार भाव से निरंतर
जलते देखती हूँ
तो भावुक मन सोचने लगता है कि
जीवन भर आलोक बिखेर कर
दूसरों का पथ प्रदर्शन करने वाला
मानव को समभाव का पाठ पढाता
यह नन्हा सा दीपक किस तरह
अपने क्षणिक जीवन में
वह सब समझ लेता है
जो हम जीवन भर नहीं समझ पाते
तभी तो वह अपनी जीवन की
मूल्यवान घड़ियों को व्यर्थ नहीं गवांता
प्राणयुक्त तेल चुक जाने के बाद भी
अपनी आखिरी दम तक जलकर
मंद-मंद प्रकाश बिखेरना नहीं छोड़ता
सूरज के निरंतर चलते रहने के व्रत को
अंधियारी रात्रि में निरंतर जलकर
प्रकाश के क्रम को टूटने नहीं देता है
इस भौतिक जगत में जो भी आया
वह एक न एक दिन जाएगा जरुर
यह तथ्य वह हमसे पहले जान लेता है
क्यों न हम भी छोटे-छोटे कदमों से
अँधेरे कोनों में भी दीप जलाते रहें
दीप बन जग में उजियारा फैलाएं

सबको दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं सहित..
                                        ..कविता रावत 
गरीब, कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है!

गरीब, कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है!


स्वर्ण लदा गधा किसी भी द्वार से प्रवेश कर सकता है।
शैतान से न डरने वाला आदमी धनवान बन जाता है ।।

अक्सर धन ढेर सारी त्रुटियों में टांका लगा देता है । 
गरीब मामूली त्रुटि के लिए जिंदगी भर पछताता है ।। 

यदि धनवान को काँटा चुभे तो सारे शहर को खबर होती है। 
निर्धन को साँप भी काटे तो भी कोई खबर नहीं पहुँचती है ।। 

अक्सर गरीब की जवानी और पौष की चांदनी बेकार जाती है । 
गर आसमान से बला उतरी तो वह गरीब के ही घर घुसती है ।।

गरीबी के दरवाजे पर दस्तक देते ही प्रेम खिड़की से कूद जाता है। 
निर्धन सुंदरी को प्रेमी बहुत लेकिन कोई पति नहीं मिल पाता है ।। 

गरीब, कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है! 
अमीरों की बजाई धुन पर गरीबों को नाचना पड़ता है!!


......कविता रावत
बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अवतार प्रयोजन  : विजयादशमी

बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अवतार प्रयोजन : विजयादशमी


बदलती परिस्थितियों में बदलते आधार भगवान को भी अपनाने पड़े हैं। विश्व विकास की क्रम व्यवस्था के अनुरूप अवतार का स्तर एवं कार्यक्षेत्र भी विस्तृत होता चला गया है। भगवान् श्रीराम भी दस दिशाओं में फैले रावण के अविवेक, अनाचार रुपी आतंक को मिटाने हेतु उस समय अवतरित हुए जब कोई सोच भी नहीं सकता था कि अहंकार, प्रपंच और स्वार्थ के प्रतिनिधि रावण का विरोध-प्रतिरोध किया जा सकता है। अनीति जब चरम सीमा पर पहुंची तो भगवान राम ने मनुष्य रूप में जन्म लिया। राम सीता का विवाह गृहस्थोपभोग के लिए नहीं, किसी प्रयोजन के लिए एक अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित कर समय की महती आवश्यकता को पूरी करने के लिए हुआ। वनवास हुआ, सीता हरण हुआ व असुर रावण के पास पहुँच गयी। सीता हरण न होता तो अनाचार रुपी रावण का अंत न हो पाता। प्रजापति ब्रह्मा ने देवताओं को एकत्र कर भिन्न-भिन्न रूपों में धरती पर जागृत आत्माओं के रूप में अवतार प्रयोजन की पूर्ति हेतु रीछ, वानर, गिद्ध आदि रूपों में भगवान राम की सहायता के लिए भेजा जिन्होंने अपने अदम्य शौर्य, दुस्साहस का परिचय देते हुए धर्म युद्ध लड़ा और मायावी रावण के आतंकवाद को समाप्त कर ही दम लिया, जिसकी प्रभु ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। जब भी आतंक को चीरते हुए अप्रत्याशित रूप से सत्साहस उभरे, समझना चाहिए की दैवी चेतना काम कर रही है। चेतना प्रवाह का प्रत्यक्ष प्रमाण है- आदर्शवाद और दुस्साहस का परिचय देते हुए घाटे का सौदा स्वीकार करना। आदर्शवादी दुस्साहस की हमेशा प्रशंसा होती है, वह सत्साहस के रूप में उत्पन्न होकर असंख्य को अनुप्रमाणित करता है। श्रेय किस व्यक्ति को मिला या नितांत गौण है। यह तो झंडा आगे चलने वाले की फोटो के समान है, जबकि उस सैन्य दल में अनेकों का शौर्य, पुरुषार्थ झंडाधारी के तुलना से कम नहीं, अधिक होता है।
          वर्तमान परिस्थितियों में सिर्फ दशहरा के दिन अधर्म, अनीति, आतंक के पर्याय रावण रुपी बुराई को बड़े-बड़े पुतले के रूप में जगह-जगह प्रतिस्थापित कर बारूद भरकर धमाके करते हुए जनमानस को उस धुएं से ढांकते हुए इतिश्री समझ लेने से जन साधारण का भला नहीं होने वाला, अपितु इसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब मानस में फैले आतंक, बुराई को मिटाने, असमर्थों को समर्थता, साधनहीनों को साधन की उपलब्धता तथा असहायों को सहायता के लिए अनुकूलताएँ उपस्थित करने के निमित्त जागृत आत्मा के रूप में आगे बढ़कर काम किया जाय। क्योंकि जो सोये रहते हैं, वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी नहीं देख पाते। जागृत आत्मा प्रसंग में देखिये जटायु का प्रसंग कितना सार्थक और प्रासंगिक बन पड़ा है- पंख कटे जटायु को गोद में लेकर स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरकर और आंसुओं से अभिषेक करते हुए जब भगवान राम ने मरणासन्न स्थिति में पड़े जटायु से कहा- "तात! तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया?" तो अपनी आँखों में मोती ढुलकते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा- "प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती।" यह सुनकर भगवान राम ने कहा- "तात! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसे संस्कारवान आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।"
          हर युग में बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ही भगवान अवतरित हुए हैं, जहाँ एक ओर भगवान राम ने अपने अवतार में "प्राण जाय पर वचन न जाय" और मर्यादाओं का पालन कर बुराई के प्रतीक रावण का धीर-गंभीर समुद्र की भांति अविचल होकर दृढ़तापूर्वक नाश कर अच्छाई की धर्म पताका फहराते हुए रामराज्य की स्थापना की वहीँ दूसरी ओर कृष्ण अवतार में भगवान ने अपने समय की धूर्तता और छल-छदम से घिरी हुई परिस्थितियों का दमन 'विषस्य विषमौषधम' की नीति अपनाकर किया। उन्होंने कूटनीतिक दूरदर्शिता से तात्कालिक परिस्थितियों में जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलती नज़र आयी तो कांटे से काँटा निकालने का उपाय अपनाकर अवतार प्रयोजन पूरा किया।

आप वर्तमान परिस्थितियों में इस विषय में क्या सोचते हैं, इस पर आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।

दुर्गानवमी और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित......
                                                        - कविता रावत
  भूलते भागते पल

भूलते भागते पल

सुबह बच्चों का टिफिन तैयार करते समय किचन की खुली खिड़की से रह-रहकर बरसती फुहारें सावन की मीठी-मीठी याद दिलाती रही। सावन आते ही आँगन में नीम के पेड़ पर झूला पड़ जाता था। मोहल्ले भर के बच्चों के साथ स्कूल से लौटने के बाद 'पहले मैं', पहले मैं' की चकल्लस में झूलते-झूलते कब शाम उतर आती , इसका पता माँ-बाप की डांट पड़ने के बाद ही चलता था । आज जब उस नीम के पेड़ को देखती हूँ तो महसूस करती हूँ उसकी जिन टहनियों पर कभी सावन आते ही झूले डल जाया करते थे अब उपेक्षित सा ठूंठ बन खड़ा अपनी बेबसी के मारे आकाश निहारता रहता है। उसकी छाया तले घर वालों ने वाहनों के लिए एक शेड बना लिया है, उसकी यह बदली तस्वीर खटके बिना नहीं रहती। समय के साथ कितना कुछ बदल जाता है। अब तो उसकी झरती पत्तियां भी आँगन बुहारने वालों को सबसे बेगार का काम लगने लगा है। अपनी ओर देखती हूँ तो अपना भी हाल कुछ दयनीय बन पड़ा है। सुबह कच्‍ची नींद से जागने के बाद बच्चों के लिए टिफिन, उनके नाज-नखरे सहते हुए उनकी रवानगी और फिर अपने ऑफिस के लिए कूच। फिर शाम को बच्चों को झूलेघर से लेना, उनके होमवर्क की माथापच्ची के साथ अपने होमवर्क यानी खाना पकाने की जद्दोजहद के बीच झूलती जिंदगी सावन के झूले से कमतर नहीं है।
सावन तो आकर चला गया। मन घर से बाहर की ताजी सावनी बयार के लिए बस तरस कर रह गया। भादों भी कहीं यूँ ही फिसल न जाए इसलिए भादों की शुरूवात में ही एक दिन हम सब रिमझिम बरसती बूंदों में बड़े तालाब के किनारे-किनारे शहर की शान मरीन ड्राइव कहलानी वाली वीआईपी रोड पर निकल पड़े। जब कभी थोडा समय होता है तो यही वह जगह है जब प्रकृति को करीब से देखने और अनुभव करने का मौका मिलता है। इस बार सामान्य से अच्छी बारिश के चलते लबालब हुए जा रहे तालाब और आस पास के हरे-भरे नज़ारों को देखने का कुछ अलग ही आनंद आया। 
     जिस दिन भी जमकर बारिश होती है और सड़क, नाले छोटी सी नदी के आकार में बहते दिखते हैं तो मुझे गाँव की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों के बीच बहते निर्मल जलस्रोत याद आने लगते हैं। और याद आने लगता है गाँव के निकट बहती दो नदियों का संगम। जिसमें एक छोटी सी नदी में साफ़ पानी और दूसरी बड़ी नदी में चाय सा बहता पानी मिलकर एक बड़ी नदी का विकराल रूप ले लेता है।  तीव्र गति से अपनी यात्रा शीघ्र पूर्ण करने को तत्पर दिखती वे नदी, बरबस ही याद आने लगती है। हम बचपन में इसी नदी में जब भी बाढ़ आती थी तो उसमें बहकर आयी लकड़ियों को बटोरने के लिए तैयार रहते थे। बरसात थमते ही हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों के बीच से बनी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से गिरते-पड़ते, भीगते-ठिठुराते दौड़े चले जाते थे । घंटों उसके उतार की राह ताकते रहते थे। इस बीच न जाने कितनी बार अचानक बादल गरज-बरस कर हमारे प्रयास को विफल करने का भरसक प्रयास करते रहते, जिनसे हम बेपरवाह रहते थे। 
पिछले बार जब बरसात में गाँव जाना हुआ तो नदी में आयी बाढ़ देखने का मौका मिला, बचपन जैसा उत्साह तो मन में नहीं था लेकिन बचपन के दिन रह-रह कर याद आते रहे। अब तो बचपन अपने बच्चों में ही दिखने को रह गया है। उनको हम लाख चाहने पर भी इस शहरी आपाधापी के चलते प्रकृति को करीब से दिखाने और समझाने में असमर्थ से हो रहे हैं। कोई भी प्रकृति के अन्तःस्थल में छुपी आनंद की धाराओं को तब तक कहाँ अनुभव कर पाता है जब तक वह स्वयं इनके करीब न जाता हो।   भादों की बरसती काली घटाओं की ओट से निकलकर अब तो अक्सर जीवन के चारों ओर संघर्षों, दुर्घटनाओं, दुर्व्यवस्थाओं की व्यापकता देख हरपल उपजती खीज, घुटन और बेचैनी से राहत पहुँचाने आकुल-व्याकुल मन जब-तब अबाध गति से बहती नदी धार में जीवन प्रवाह का रहस्य तलाशने सरपट भागा चला जाता है।

.....कविता रावत



तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है

तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है

जो अपने आप गिर जाता है वह चीख़-पुकार नहीं मचाता है। 
जो धरती पर टिका हो वह कभी उससे नीचे नहीं गिरता है। । 

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं। 
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं। । 

सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है । 
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है। । 

जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने से डर लगता है। 
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना रहता है । । 

मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है। 
गड्ढे में गिरे हाथी को भी चमगादड़ लात मारता है । ।  

बड़े-बड़े भार छोटे-छोटे तारों पर लटकाए जाते हैं । 
बड़े-बड़े यंत्र भी छोटी से धुरी पर घूमते हैं । । 

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है । 
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है। । 

एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है। 
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है। । 
           
    ..कविता रावत 
घर में किलकारी की ख़ुशी

घर में किलकारी की ख़ुशी


हम सभी जानते हैं कि हर दिन उजालों का मेला नहीं होता।  दुर्दिन हर आदमी को इस संसार की यथार्थता का ज्ञान देर सवेर करा ही देते हैं। मैं समझती हूँ इससे हमारी दुःख की अग्नि का मैल ही कटता है जिससे हम परिस्थितियों के अनुकूल चलने की कला सीखने में सक्षम हो पाते हैं. शीतल छाया का वास्तविक आनंद उसी को प्राप्त होता है, जो धूप की गर्मी सह चुकता है। विवाह के कई बरस बाद घर में गूंजती किलकारी की ख़ुशी का मायना उस हर माँ की आँखों में कोई भी सहज रूप से देख सकता है, जिसने उसे अपने ही घर परिवार और नाते रिश्‍तेदारों से मिले तानों के कडुवे घूँट पीते हुए दिन काटते देखा हो। उनका दुःख समझा हो।
      मैं यह बात अच्‍छी तरह समझ सकती हूं कि किसी भी दम्‍पति के भाग्‍य में जब मां-बाप बनना लिखा होता है तभी होता है। लेकिन आज के पढ़े-लिखे सभ्‍य समझे जाने वाले समाज में मां-बाप की लाडली समझी जाने वाली बेटी बहू बनती है, तो अगले एक-दो साल में मां न बनने पर उसे अपने घर-परिवार और परिचितों में तमाम तरह के ताने सुनने पड़ते हैं। उसे जिस अनावश्‍यक कोप का भाजन बनना पड़ता है, वह किसी त्रासदी से कम नहीं है।  अपने सबसे करीबी लोगों को कई अवसरों पर समझाना कुछ कठिन अवश्‍य होता है, लेकिन मैं बेटी-बहू के प्रति ऐसा नजरिया रखने वाले लोगों के सुख-दुख में शरीक होकर उनके नजरिए को बदलने का भरसक प्रयास करती रहती हूं। इस प्रयास में कभी कभी अप्रिय संवाद के दौर से भी गुजरना पड़ता है। बावजूद इसके जब कभी मैं इसका सकारात्‍मक प्रभाव खुद अपनी आंखों से देखती हूं तो मुझे वह मेरी बड़ी उपलब्धि दिखती है।
     12 बरस बाद इस 12 जुलाई का दिन मेरे लिए एक विशेष खुशी का पैगाम लेकर आया। इस दिन मेरी छोटी बहन की गोद में एक हंसता-खेलता बच्‍चा आया और उसके चेहरे पर न कटने वाले असहनीय पीड़ादायक लम्‍बे क्षणों के गुजरने के बाद खुशी की लहर। असहनीय पीड़ादायक इसलिए कह रही हूं क्‍योंकि मैं स्‍वयं भी 10 बरस के लम्‍बी अवधि के बाद ही मां बनने का गौरव हासिल कर पाई थी। डॉक्‍टर ने ऑपरेशन के बाद जब बच्‍चे की खुशखबरी दी तो अस्‍पताल में डेरा डाले घर के सभी लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सच कहूं तो मुझे भी मासी बनने की कुछ ज्‍यादा ही खुशी है। अपनी इस खुशी को मैं आप सबके साथ भी बांट रही हूं।


कविता रावत 

गाँव में देवी पूजन : अष्टबलि

गाँव में देवी पूजन : अष्टबलि

इस बार गर्मियों की छुट्टियों में बच्‍चे  गाँव जाने के लिए बेहद उतावले थे। क्योंकि घर में आपसी चर्चा में वे जान गए थे कि  इस बार गाँव में देवी पूजन (अष्टबलि) का आयोजन पक्‍का है। इसे देखने और इसके बारे में जानने की  जिज्ञासा उनमें कुछ ज्‍यादा ही थी।  भोपाल निवास के बाद भी हमारा किसी न किसी कारण से गाँव आना-जाना लगा ही रहता है, बावजूद इसके गाँव की सामूहिक देवी पूजन (अष्टबलि) को देखने-समझने का यह दुर्लभ संयोग मुझे २0-२2 वर्ष बाद अब जाकर मिल पाया। बचपन में मुझमें देवी-देवताओं के नाम पर होने वाले इस तरह के धार्मिक पूजा-पाठ जिसमें पशुबलि दी जाने की परम्परा सदियों से जस-तस चली आ रही है, को गहराई से समझने की समझ कतई नहीं थी। लेकिन आज जब मैं इस बारे में कुछ समझ रखती हूं तब मेरी उत्सुकता देवी पूजन से ज्यादा इस बात में थी कि देवी पूजन के बहाने आस-पास के गाँव के भूले-बिसरे और देश-विदेश से आए परिचितों,नाते-रिश्तेदारों से मेल-मुलाकात संभव हो सकेगी। प्राय: ऐसे धार्मिक अवसर वर्षों से गाँव से दूर निवासरत लगभग सभी लोगों को आपस में मिलाने का एक सबसे अच्छा माध्यम बनता है इस तरह के विशिष्ट देवी पूजन में आस-पास के गाँवों को भी आमंत्रित किया जाता है, जो गाजे-बाजों सहित इसमें शामिल होकर आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।
भोपाल से ट्रेन द्वारा दिल्ली और फिर दिल्ली से बस द्वारा गाँव तक की दुरूह यात्रा (इसलिए क्योंकि बस से गाँव की यात्रा करते समय गर्मियों में क्‍या कम पापड बेलने पड़ते हैं)। दिल्ली से रामनगर (नैनीताल) तक के सफ़र में कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन जब ३० सीटर बस ने जो अन्दर और बाहर यानी छत दोनों जगह ठूस-ठूस कर भरी थी, रवानगी भरी तो ४ बार खराब होने के बाद ३ घंटे बिलम्ब से लेकिन सही सलामत हमें गाँव पहुंचाकर ही दम लिया। सच मानिए उस वक्त मुझे अपार ख़ुशी हुई। सभी जानते हैं कि आजकल गाँव की खतरनाक उबड़-खाबड़ पहाड़ी सड़कों पर डीजल कम मिट्टी के तेल से बेख़ौफ़ धुक-धुक कर चलने वाली शहर में कंडम घोषित अधिकांश बसें और जीपें देवभूमि में ईश्वरीय कृपा और दयादृष्टि के बलबूते ही लोगों को सही सलामत अपने ठौर-ठिकाने पर पहुंचा पा रही हैं।  मेरे लिए इसके अतिरिक्त बस के सफ़र में प्रकृति के अनमोल धरोहर   पहाड़ों का अद्भुत सौन्दर्य और गाँव के लोगों का मधुर हास-परिहास इस भयावहता को भूलने के लिए कम नहीं था, जिसमें मैं बार-बार खो जाती।
रात को चूल्हे के पास बैठ कई दिन बाद पोदीने की चटनी के साथ देशी घी में चुपड़ी कोदो (मंडुआ) की गर्मागर्म रोटी का स्वाद लेने के बाद जब मैंने पहले जागर गीतों के साथ देवी के नियत स्थान के घर के अन्दर देवी-देवताओं का डमरू और कांसे की थाली  के साथ नृत्य और बाद में घर के बाहर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी-देवताओं का अद्भुत नृत्य देखा, तब सचमुच मन को कुछ पल ही सही लेकिन आलौकिक आनंद की अनुभूति हुई। सुबह जब सारे गाँव के लोग इकठ्ठा होकर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी  माँ की जय-जयकार कर नाचते-गाते गाँव से लगभग २ किलोमीटर दूर जंगल में बने  देवी मंदिर के लिए रवाना हुए तो संकरी ऊँची-नीची पहाड़ी पगडंडियों  को  हमने  छोटे बच्चों सहित कब नाप लिया, पता ही नहीं चला। इधर एकतरफ गाँव से दूर चीड़ के पेड़ों से घिरी मोहक प्रकृति की गोद में बने देवी मंदिर के चौक में बिना किसी उंच-नीच व भेदभाव के सभी जाति विशेष के देवी-देवताओं के ढोल-दमाऊं की ताल पर सामूहिक नृत्य का क्रम  तो दूसरी तरफ  देश-विदेश और दूर-दूर से आये नाते-रिश्तेदारों से  गाँव  के बड़े-बुजुर्गों का परस्पर खैर-ख़बरों के आदान-प्रदान का सिलसिला जारी था। इन सबसे हटकर मंदिर के ठीक पीछे की ओर जहाँ खाने-पीने के शौकीनों लोगों का गर्मागर्म जलेबी और चाउमिन का लुत्फ़ उठाने के लिए जमवाड़ा लगा था, वहीँ दूसरी ओर मनौतियों के पूर्ण होने के प्रतीक रूप अपनी बलि से सर्वथा बेखबर अपनी खूंटी के आस-पास की हरी-भरी घास खाने के लालच में आपस में एक दूसरे से  भिड़ते भेड़ों का नज़ारा भी बहुत कुछ देखने/समझने के लिए कम न था!  इसके अलावा दूसरे गाँव के लोगों को एक के बाद एक कतारबद्ध सुन्दर पहाड़ी घाटियों से गाजे बाजों सहित अपने सारे दुखड़ों की पोटली ताक़ पर रख नाच-गाकर मंदिर की ओर बढ़ते देख मन उमंग से भर उठता मुझे इस अवसर पर देवी-देवताओं के साथ-साथ सभी लोगों का आपस में बिना छुआछूत और भेदभाव का मेल-मिलाप सबसे सुखकर लगा। क्योंकि सभी जानते हैं बार-बार ऐसे धार्मिक आयोजनों के बाद भी ऐसी भावना को देखने के लिए अक्सर ऑंखें तरस कर रह जाती हैं! 
देवी-देवताओं के नृत्य के अंतिम पड़ाव में जब देवी को अर्पित की जाने वाली ८ बलि जिसमें भैंसा मुख्य और भेड़ आदि बाद में आते हैंकी बलि देने का समय नजदीक आया तो मैं देवी-देवताओं में अपार श्रृद्धा के बावजूद  चिरकाल से लोगों की अपनी मनौतियों और गाँव की खुशहाली और मंगलकामना के नाम पर बिना किसी सामाजिक बदलाव के इस मूक पशुबलि के नज़ारे को खुली आँखों से  देखने की हिम्मत नहीं जुटा पायी।  मंदिर से लौटते समय जब मैंने गाँव के लोगों की स्थिति पर विचार किया तो मुझे साफ़ दिखाई दिया कि गाँव में आज भी कुछ ही लोगों के स्थिति ठीक-ठाक है, अधिकांश की स्थिति को ठीक कहना किसी भी तरह से मैं उचित नहीं समझती इस विषय पर सोचने लगी काश गाँव के लोग इस बात को गहराई से समझकर बलि के इन पशुओं को यदि इन गरीब लोगों को उनकी आजीविका के लिए देवी-देवताओं के माध्यम से भेंट करते तो एक नयी स्वस्थ धार्मिक परंपरा की खुशहाल धारा बहने के साथ ही  हमारी देवभूमि का एक सन्देश दुनिया भर में फैलता। पर  मुझे पता था कि पशुबलि के स्थान पर इस तरह की नयी स्वस्थ परंपरा के लिए धार्मिक भावना से भरे लोगों को मेरा समझाना बहुत टेढ़ी खीर है, फिर भी जब मैंने मानवीय नेक भावना के चलते गाँव  आए हुए देश-विदेश और गाँव के बहुत से लोगों के इस विषय में विचार जानने चाहे तो मुझे बहुत मायूस नहीं होना पड़ा। इस क्रम में जब मुझे कई लोगों ने यह जानकारी दी कि हमारे अधिकांश गाँवों में लोगों ने आपस में मिल-बैठ गहन विचार-विमर्श कर राजी ख़ुशी से अब पशुओं के बलि पर प्रतिबन्ध लगा रखा है तो मुझे यह सुनकर बहुत आत्मसंतुष्टि मिली।
आधुनिक बदलते परिवेश में आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में इस तरह देवी-देवताओं के पूजन में पशुबलि की परम्परा बदस्तूर जारी है, इसका नया स्वरुप कैसा हो; इस बारे में आप भी जरूर कुछ कहना चाहेगें।  इस विषय पर आपके बहुमूल्य विचार/सुझावों का मुझे इन्तजार रहेगा।

...कविता रावत
खुशमिजाज बुलबुल का मेरे घर आना

खुशमिजाज बुलबुल का मेरे घर आना

जेठ की तन झुलसा देने वाली दुपहरी में लू की थपेड़ों से बेखबर मेरे द्वार पर मनीप्लांट पर हक़ जमाकर उसके झुरमुट में अपना घरौंदा बनाकर बैठी है-खुशदिल बोली और खुशमिजाज स्वामिनी बुलबुल पिछले चार वर्ष से लगातार हमारे घर के द्वारे आकर कर्मणेवादिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का मर्म समझाती आ रही हैअपने बच्चों को प्राकृतिक खतरे आंधी-पानी के अलावा  बिल्लियों, छिपकलियों, चूहों, साँपों, कौओं और दूसरे शिकारी पक्षियों से बचाकर अपनी अगली पीढ़ी को जीवित रखने के लिए प्राणों की भी परवाह न करते ये पक्षी अभिभावक होने का पूर्ण  दायित्व निर्वहन तो करते हैं, लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई अपेक्षा नहीं रखते फलतः उपेक्षा जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं
जिस तरह गर्मियों में किसी प्रिय चिर प्रतीक्षित मेहमान के आने की ख़ुशी घर में सबको रहती है उसी तरह इन नवागत मेहमानों का भी हम सभी घर के सदस्य स्वागत करने से नहीं चूकते हैं बुलबुल के घोंसला बनाने से लेकर अंडे देने, उन्हें सेने और फिर बच्चों के अण्डों से बाहर निकलने की प्रक्रिया के बाद किस तरह बुलबुल चोंच में भोजन दबाकर लाकर उन्हें खिलाती  है, वह देखते ही बनता है। सारी गतिविधि देखकर ऐसा लगता है जैसे वे अपने घर के ही सदस्‍य  हैंमुझे भी सुकून मिलता है मैं पानी की घोर किल्लत के  बावजूद गमलों में पेड़-पौधे उगाकर प्रकृति से जुडी रहने के लिए प्रयासरत  रहती हूँ बुलबुल की व्ही ट्वीट व्हिरी-व्हिरी जैसी सुमधुर धुन और  बच्चों की चीं-चीं से मेरा प्रयास सार्थक हो उठता है। 
गर्मियों की तपन भरी दुपहरी में हम बड़ों को घर में दुबककर दरवाजे-खिड़की बंद करके पंखे, कूलर की हवा में भी चैन नहीं मिलता। ऐसे में घर में गर्मी से बेपरवाह छोटे बच्चों की घींगा मस्ती और बुलबुल का दूर से अपने बच्चों को भोजन लाकर बिना रुके, थके खिलाते जाना बहुत सोचने पर मजबूर करता  है लगता जैसे हमसे ज्यादा सहनशीलता इन बच्चों और इन परिदों में  हैं अण्डों से निकले बुलबुल के बच्चों को ५-6 दिन हो चुके हैं बस और ३-४ दिन बाद सभी अपना घोंसला छोड़ चुके होंगें और जब ये घोंसला छोड़ते हैं तो फिर उसमें दुबारा नहीं बैठते क्रम से जो बच्चा पहले बाहर की दुनिया में आता है, वह उसी क्रम से घोंसला छोड़ता है।  पिछली बार जब एक एक बच्चा घोंसले से बाहर निकल गया था तो मैंने बहुत कोशिश की उसे वापस घोंसले में रखने की लेकिन वह बाहर ही बैठा रहा और फिर दूसरे दिन सुबह उड़ गया। अपने हाथों से मैंने कई बार उन्हें नीचे से घोंसले में रखा, कुछ लोगों ने मना किया कि नहीं पकड़ना चाहिए लेकिन मुझे उनकी यह धारणा बिलकुल गलत लगी। उन्हें इससे कोई हानि नहीं पहुंची, वे बहुत स्वस्थ थे छोटे में बुलबुल के बच्चे बिलकुल गौरैया जैसे लगते हैं(आप भी देखिये तस्वीर)
सच कहूँ बुलबुल का घरोंदा मुझे अपना सा लगता है, इन्हें देख बार-बार सोचती हूँ काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते! आपने भी यदि कभी इन्हें गौर से देखा होगा तो निश्चित ही आपके मन में ऐसे ही न जाने कितने ही नेक ख़यालात होंगें, है न!  शेष फिर कभी....और अब मैं भी उड़ चली १५ दिन के लिए अपने गाँव आप मेरे मोबाइल से खिंची कुछ तस्वीरों में देखिये, ये प्रकृति हमको कितना कुछ सिखाती है!.
..... कविता रावत

घर सारा बीमार है

घर सारा बीमार है

एक बार आकर देख जा बेटे
घर को तेरा इन्तजार है
घर सारा बीमार है.

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

भाई तेरा रोज दुकान पर खटता
देर रात नशे में धुत लौटता
उस पर किसी का जोर न चलता
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

       ....कविता रावत

     गाँव मुझे हरदम अपनी ओर आकर्षित करते हैं इसलिए जब भी मौका मिलता है निकल पड़ती हूँ भले ही दो-चार दिन के लिए ही सही। लेकिन जितने समय वहां रहती हूँकई घर-परिवारों की दशा देखकर शहर में आकर भी मन वहीँ बार-बार भटकने लगता है. पिछली बार जब गाँव जाना हुआ तो गाँव के एक परिवार की दशा देख जब उसके परदेशी बेटे से जो 3 साल से घर नहीं आया था; हो सकता है उसकी भी कुछ मजबूरी रही होगी। उसकी माँ से मैंने अपने मोबाइल से बात करवाई तो वह माँ रुंधे कंठ से जिस तरह एक झीनी उम्मीद से अपना दुखड़ा सुना रही थी, वही बीते पलों की यादें व्यथित हो छलक उठे हैं कविता के रूप में.. 
हर दिन माँ के नाम

हर दिन माँ के नाम

वह माँ जो ताउम्र हरपल, हरदिन अपने घर परिवार की बेहतरी के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर अपनों को समाज में एक पहचान  देकर खुद अपनी पहचान घर की चार दीवारी में सिमट कर रख देती है और निरंतर संघर्ष कर उफ तक नहीं करती, ऐसी माँ का एक दिन कैसे हो सकता है! घर-दफ्तर के जिम्मेदारी के बीच दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच अपने आप जब भी मैं कभी मायूस पाती हूँ तो मुझे अपनी माँ के संघर्ष के दिन जिसने अभी भी ६० साल गुजर जाने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा है और उन्होंने भी कभी कठिनइयों से मुहं नहीं मोड़ा और न कभी हार मानी, देखकर मुझे संबल ही नहीं बल्कि हर परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा मिलती है. गाँव से १७-१८ साल के उम्र में शहर में आकर घर परिवार की जिम्मेदारी संभालना सरल काम कतई नहीं था. पिताजी जरुर सरकारी नौकरी करते थे लेकिन वे नौकरी तक से सीमित थे, घर परिवार की जिम्मेदारी से कोसों दूर रहते थे. ऐसे में हम ३ बहनों और २ भाईयों की पढाई-लिखाई से लेकर सारी देख-रेख माँ ने खुद की. पढ़ी लिखी न होने की बावजूद उन्हें पता था कि एक शिक्षा ही वह हथियार है जिस पर मेरे बच्चों का भविष्य बन सकता है और उसी का नतीजा है कि आज हम सब पढ़-लिख कर घर से बाहर और अपनी घर-परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों को बहुत हद तक ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं . माँ का संघर्ष आज भी जारी है भोपाल गैस त्रासदी से लेकर ५ शारीरिक ऑपरेशन के त्रासदी से जूझते हुए वह आज भी यूटरस कैंसर से पिछले ६ साल से बहुत ही हिम्मत और दिलेरी से लड़ रही है. पिताजी को गुजरे अभी ३ साल हुए हैं, उन्हें भी लंग्स कैंसर हुआ था, वे सिर्फ २ माह इस बीमारी को नहीं झेल पाए थे, वहीँ माँ खुद कैंसर से जूझते हुए हमारे लाख मना करने पर भी घर पर नहीं रुकी और हॉस्पिटल में खुद पिताजी की देख रेख करती रही. भले ही पिताजी नहीं रहे लेकिन उन्होंने सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, हर दिन उनके साथ थी. आज जहाँ बहुत से लोग कैंसर का नाम सुनकर ही हाथ पैर छोड़ लेते हैं वहीँ मेरी माँ बड़ी हिम्मत और दिलेरी से खुद इसका डटकर सामना कर अपनी चिंता छोड़ आज भी खुद घर परिवार को संभाले हुए है.
        मेरा सौभाग्य है कि मेरी माँ हमेशा मेरे नजदीक ही रही है और मेरी शादी की बाद भी मैं उनके इतनी नजदीक हूँ कि मैं हर दिन उनके सामने होती हूँ. एक ओर जहाँ उनको देख-देख मुझे हरपल दुःख होता है कि उन्होंने बचपन से ही संघर्ष किया और उन्हें कभी सुख नसीब नहीं हुआ और हम भी उनके इस दुःख को कुछ कम नहीं कर पाए,  वहीँ दूसरी ओर वे आज भी हमें यही सिखा रही हैं कि हर हाल में जिंदगी से हार नहीं मानना.  मैंने माँ के संघर्ष में अपना संघर्ष जब भी जोड़कर देखने की कोशिश की तो यही पाया कि जिस इंसान की जिंदगी में बचपन से ही संघर्ष लिखा हो उसे संघर्ष से कभी नहीं घबराना चाहिए, क्योंकि शायद इसके बिना उसकी जिंदगी अधूरी ही कही जायेगी?
           माँ के साथ घर से बाहर घूमना सबकी तरह मुझे भी बहुत अच्छा लगता है, पर क्या करूँ? हर दिन एक से कहाँ रहते हैं. माँ आज घर से बाहर जाने में असमर्थ हैं.  अभी हम पिछले माह ही उनके साथ भोजपुर गए थे. वहीँ एक फोटो मोबाइल से खींच ली थी, आज अपने ब्लॉग परिवार के साथ शेयर करना का मन हुआ, थोडा बहुत लिखने का मन हुआ, लिख दिया. बहुत सोचती हूँ लेकिन सामने हूँ न इसलिए शायद बहुत कुछ लिखने का मन होते हुए भी नहीं लिख पाती हूँ, बस उन्हें महसूस करती रहती हूँ.
          आइए सभी हर माँ के दुःख-दर्द को अपना समझ इसे हरपल साझा करते हुए हर दिन माँ को समर्पित कर नमन करें !
         ..कविता रावत

सदियों से फलता-फूलता कारोबार : भ्रष्टाचार

सदियों से फलता-फूलता कारोबार : भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

कौन मिटा सकेगा हस्ती तेरी
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!


... कविता रावत
धुन के पक्के इन्सां ही एक दिन चैंपियन बनते हैं

धुन के पक्के इन्सां ही एक दिन चैंपियन बनते हैं

जीत और हार के बीच
झूलते, डूबते-उतराते
विपरीत क्षण में भी
अविचल, अविरल भाव से
लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना बहुत मुश्किल
पर नामुमकिन नहीं
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर- सीढ़ी
चढ़ने के उपरान्त
चिर प्रतीक्षा
चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर  ख़ुशी
बेजोड़ व अनमोल होती है
इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर पाते हैं
जो हर हाल में निरंतर
सबको साथ लेकर लक्ष्य प्राप्ति हेतु
हरक्षण संघर्षरत रहते हैं
और मुकाम हासिल कर ही
दम लेते हैं सगर्व, सम्मान 
जिसके वे हक़दार होते हैं
अनुकूल मौसम में तो हर कोई नाव चला सकते  हैं
पर तूफां में कश्ती पार लगाने वाले विरले ही होते हैं
कठिन राह को जो आसाँ बना मंजिल तक पहुँचते हैं
वही धुन के पक्के इन्सां एक दिन चैंपियन बनते हैं
                                  ...कविता रावत


जल बिन भर पिचकारी  कैसे खेलें होली ........

जल बिन भर पिचकारी कैसे खेलें होली ........

बच्चों की परीक्षा समाप्ति के दो दिन बाद ही परिणाम भी। और फिर होली के दूसरे दिन से ही नए सत्र का आरंभ, मतलब भागम-भागम नहीं तो और क्या! सोचा था दो चार दिन सुकून और फिर बच्चों के साथ होली का धमाल कर कुछ पल ख़ुशी के अपने नाम कर लिए जाएँगे, पर शायद आराम नाम की चिड़िया अब नजर ही नहीं आएगी। सबकुछ भुलाकर बच्चों की किताब-कापी, यूनिफ़ॉर्म के साथ-साथ बच्चों की होली पर विशेष फ़रमाइश। ब्लॉग पर कुछ रंगारंग प्रस्तुति की उधेड़बुन में भूली-बिसरी होली के रंगों में डूब हिचकोले खाने लगी हूँ. बहुत समझाईश के बाद भी जब ऑफिस से लौट बच्चों को मौसी के घर से वापस लेकर आती हूँ तो हर दिन रास्ते में बड़ी-बड़ी पिचकारी देख दुकान के पास ठिठक रूठकर रोना धोना शुरू कर देते हैं. समझाती हूँ कि देखो हमारा घर चौथी मंजिल पर है, जहाँ दो दिन बाद २०-२५ मिनट पानी आता है, जैसे कोई दमे से पीड़ित जान पहचान वाला बड़ी हिम्‍मत कर चौथे माले पर आकर बड़ी-बड़ी सिसकियाँ भर बेदम होकर फिर दुबारा आने न के लिए माफ़ी मांगने लगता है. ऐसे में हालत में भला पिचकारियाँ किस काम की, होली खेले तो कैसे खेलें? बिना पानी बच्चों को क्या बड़ों को भी होली खेलने का कहाँ मजा आता है! 
         वैसे तो पानी की यह समस्या निरंतर बनी है, पर होली के बहाने हम सभी मोहल्ले वालों ने भी मिलकर एक संगोष्ठी का आयोजन कर 'तिलक होली' खेलने का निर्णय लिया. इसमें बच्चों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया था, क्योंकि बच्चों को समझाना अच्छे-अच्छों के बूते की बात नहीं होती है. संगोष्ठी में बच्चों का विद्रोही रूप तो सामने आया ही लेकिन शेष सभी बड़े-बुजुर्गों का एक मंतव्य था. शायद इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं. जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल-आपूर्ति आज के युग की गंभीर समस्या बन गयी है. अब वातानुकूलित कमरों में बैठकर बैठक, सेमिनार में पानी की तरह पैसा बहाते हुए मिनरल वाटर और चाय-कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ गंभीर मुद्रा में बड़ी-बड़ी बातें, घोषणाएं और वायदों करने वालों की खबर लेने के लिया सबको आगे आना ही होगा. बिना एकजुट होकर जागरूक न होने से इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती है. हमें अब यह समझ लेना बहुत जरुरी है कि इस समस्या के लिए सिर्फ सरकार व उसके नुमाईंदे या कोई वर्ग विशेष ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि गाहे-बगाहे हम लोग भी तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जाने-अनजाने जिम्मेदार हैं. तालाबों, कुओं का गहरीकरण, झील, बावड़ी व पोखरों के जल को प्रदूषण मुक्त कराने हेतु हम स्वयं कितने जागरूक हैं. यह बताने की बात नहीं! गाँव व शहर से सभी लोगों को जल के स्रोत में गंदें पानी, कागज़, पोलीथिन, सड़े-गले पौधे और कूड़े-कचरे का ढेर जमा करते देख हम कितना चेत पायें हैं यह आये दिन हमारे घरों में नल के माध्यम से आने वाले प्रदूषित जल, जो हमारे लिए अमृततुल्य है, आज प्रदूषित होकर मनुष्य तो क्या अपितु जीव-जंतुओं के लिए भी प्राणघातक बनता जा रहा है.
शायद यह समस्या आज भले ही विकराल न दिखती हो लेकिन घर में पानी की समस्या के चलते और भीषण गर्मी में लोगों को पानी के लिए लिए भटकते, लड़ने-मरने की खबर भर से रोंगटे खड़े होने लगे हैं . यह सोचकर तो और भी बुरा हाल हो रहा है कि कहीं समय रहते यदि जल संकट के प्रति हम सचेत और दृढ संकल्पित होकर आगे नहीं आये तो वैज्ञानिक आइन्स्टीन की कही बात सच होती नजर आती है। जिन्होंने कहा था की तीसरा महायुद्ध चाहे परमाणु अस्त्रों से लड़ लिया जाय पर चौथा महायुद्ध यदि होगा तो पत्थरों से लड़ा जायेगा। और इससे एक कदम आगे बढ़कर नास्त्रे [Michel de Nostredame] ने भविष्यवाणी की थी कि चौथा महायुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा ? यदि इस भविष्यवाणी को झुठलाना है तो होली के नाम पर व्‍यर्थ पानी बहाने की बजाय इसे गंभीरता से लेते हुए 'तिलक होली' खेलें और सबको इसके लिए प्रेरित करें.
अब हमें तो बच्चों ने सुझाया है कि पहले घर में बड़ों की तिलक होली हो जाय और फिर दिन में बड़े तालाब की सैर करते हुए वहीँ किनारे बड़ी-बड़ी पिचकारी भर भर हम बच्चों की होली भी हो जाय! अब आप बुरा न माने हमें तो अबकी बार बच्चों की इस जिद्द के आगे बेवस होकर बड़े ताल में होली खेलने जाना होगा! नहीं तो हमारी खैर नहीं! बाकी फिर कभी......
सभी ब्लोग्गर्स और सुधि पाठकों को होली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें.
-कविता रावत
      
प्रभु! अपना तो  कैलाश ही भला.....

प्रभु! अपना तो कैलाश ही भला.....

सभी ब्‍लागर साथियों और सुधि पाठकों को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। इन दिनों आप  सबके ब्लॉग पर न आ पाने  के लिए क्षमा चाहती हूँ।  स्कूल तो बच्‍चे जाते हैं लेकिन परीक्षा मेरी चल रही है। बच्चों को साथ बिठाकर पढ़ाना, समझाना बहुत  सरल काम नहीं है आप भी जानते हैं! खैर बच्चों की माथा-पच्ची पर फिर कभी बात करेंगे।  फिलहाल आप मेरे लिए अपने ब्लॉग से कुछ दिन का आकस्मिक अवकाश स्वीकृत करते हुए प्रस्तुत शिव-पार्वती प्रसंग पर  विचार-मंथन कर अपने विचार व्यक्त कीजियेगा ...
कुछ समय पहले शिवजी-पार्वती कैलाश पर  पृथ्वीवासियों के धार्मिक कर्मकांड के विषय पर गहन चर्चा कर रहे थे। पार्वती ने शिवजी से पूछा- "भगवन! पृथ्वी पर लोग इतना कर्मकांड करते हैं फिर भी उन्हें इसका लाभ क्यों नहीं मिलता!"  शिवजी गंभीर होकर बोले- "आज मनुष्य के जीवन में आडम्बर छाया है।  लोग धार्मिकता का दिखावा करते हैं, उनके मन वैसे नहीं हैं। वे आस्‍था प्रगट जरूर करते हैं, पर वास्‍तव में अनास्‍था में जीते हैं।"
       पार्वती ने कहा मुझे इस बात पर विश्‍वास नहीं होता। शिवजी  ने कहा  इसकी पुष्टि हेतु धरती पर चलते हैं।  पार्वती ने सुंदरी साध्वी पत्नी और शिवजी ने कोढ़ी का रूप धारण किया और कैलाश पर्वत से उतरकर एक विशाल शिव मंदिर की सीढियों के समीप बैठ गए।
        मंदिर में जाने वाले  धर्मप्रिय भक्त, दानी दाता  पार्वती जी का रूप देखकर  आह भरकर नजर डालते और फिर मन मसोसकर सिक्के, रुपये डालते हुए आगे बढ़ जाते। कोढ़ी बने शिवजी को तो कोई देखना भी नहीं चाहता था। उनके  सामने बिछे कपड़े पर इक्का-दुक्का सिक्‍के ही  नजर आ रहे थे।   पार्वती जी  जैसे-तैसे इसका सामना करती रहीं। हद तो तब हो गई जब कुछ मनचले पार्वती जी को यह कहने से भी बाज नहीं आए कि- 'कहाँ इस कोढ़ी के साथ बैठी हो, चलो हमारे साथ रानी बनाकर रखेंगे।"
         शिवजी पार्वती को देखकर मुस्‍कराए।  पार्वती उनकी मुस्‍कान में छिपा कटाक्ष समझ गईं। वे हारकर  शिवजी से बोली - "प्रभु! लौट चलिए। अपना तो कैलाश ही भला।  सहन नहीं होता इन पाखंडियों का यह कुत्सित स्वरुप! क्या यही मनुष्य हमारी सर्वोत्कृष्ट संरचना और शक्तिशाली कृति हैं?"
यह सवाल केवल शिवजी से नहीं हम सबसे है।

        आईए इस महाशिवरात्रि के अवसर पर धार्मिक आडम्बर से दूर रहने और इसे मिटाने के लिए निरंतर प्रयास करते हुए  अपने  मनुष्य होने को सार्थक करने का संकल्‍प करें।

  ...कविता रावत