ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Tuesday, February 8, 2011

हर तरफ शोर आई बसंत बहार


दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहा
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

यूँ तो जुगुनुओं सी चमक वाले
हर दिन दिखते नज़ारे जहाँ कहीं
पर चांद सी हँसती खिलखिलाती
हरतरफ नजर आती सिर्फ तुम्हीं!

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
          
     ....कविता रावत

62 comments:

  1. आदरणीय कविता रावत जी
    नमस्कार !
    बसंत के आगमन पर लिखी आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी ...आपका आभार

    ReplyDelete
  2. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी

    रुत परिवर्तन पर आधारित इस सुमधुर रचना के साथ ही वसंत आगमन पर आपको शुभकामनाएं...

    ReplyDelete
  3. बढ़िया, बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ...

    ReplyDelete
  4. शहरों में प्रकृति के उत्साह को भी नज़र लग जाती है आधुनिकता की।

    ReplyDelete
  5. ......मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी......
    बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ...आभार.........

    ReplyDelete
  6. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
    yun to tu khilkhilati hui aati hai
    per pradushan ke shor me....
    per haule se tu chhu leti hai
    aur wah waqt basanti ho jata hai

    ReplyDelete
  7. बहुत सुंदर ...जीवंत मनोभावों का चित्रण .......... स्वागत बसंत

    ReplyDelete
  8. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
    आपने बहुत कुशलता से बसंत आगमन का चित्रण किया है ...शुक्रिया

    ReplyDelete
  9. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी
    ..प्रकृति का यह अद्वितीय मानवीकरण बहुत ही प्रभावशाली लगा .... मन को छू गयी आपकी यह रचना ..आपको बसंत की बहुत शुभकामना

    ReplyDelete
  10. pyari si rachna...:)
    बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

    ReplyDelete
  11. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

    .. हमको तो प्यार का इज़हार सी करती प्रेमिका का यह बासंती रंग भा गया ....बसंत की इस शुभबेला की आपको बधाई

    ReplyDelete
  12. यूँ तो जुगुनुओं सी चमक वाले
    हर दिन दिखते नज़ारे जहाँ कहीं
    पर चांद सी हँसती खिलखिलाती
    हरतरफ नजर आती सिर्फ तुम्हीं!

    प्यार का बसंती रंग जब सर चढ़कर बोलता है तो सब जगह अपना ही प्रेम नज़र आता है| वाह कितनी खूबसूरती से आपने एक साथ फिजा में बसंती रंग घोल दिया है...तस्वीर का आकर्षण भी लाजवाब है| बहुत बधाई आपको बसंत पंचमी की|

    ReplyDelete
  13. उलझनें अपनी जगह हैं, आगतें अपनी जगह.
    बसंत आगमन पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित...

    ReplyDelete
  14. हर तरफ शोर आई बसंत बहार
    चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!
    बहुत सुन्दर । बसंत के आगम पर बधाई । सुशील जी का शेर पसंद आया

    ReplyDelete
  15. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस रचना में ।

    ReplyDelete
  16. कित्ती सुन्दर रचना ....वसंत पंचमी तो बहुत प्यारा त्यौहार है..इसके साथ मौसम भी कित्ता सुहाना हो जाता है. वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई !!

    _______________________
    'पाखी की दुनिया' में भी तो वसंत आया..

    ReplyDelete
  17. कविता जी शहर में तो न कहीं बाग, न बागवानी ना फुलवारी की जगह बची हुई है तो वहI वसंत ऋतू ठिठकी ही दृष्टिगत होगी सच ही लिखा आपने .

    ReplyDelete
  18. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी

    कविता जी! कितनी मासूमियत से आपने बसंत के आने की खबर दी! ......शहर की प्रदुषण भरी जिंदगी में बसंत कहीं एक कोने में ठिठक कर रह गया है ..... एक गहरे चिंतन को बखूबी पेश किया है आपने... आपकी लेखनी के कायल है हम.. ब्लॉग पर यूँ ही आप लिखती रही, बसंत सदा आप पर मेहरबान रहे, ऐसी मनोकामना है ..

    ReplyDelete
  19. दर्द कितना छुपा हर जिगर में
    बताती हैं किसी की खामोशियाँ
    हर तरफ शोर आई बसंत बहार
    चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

    ..आपका छुपे दर्द को बसंत के माध्यम से बयां करने का यह अद्भुत अंदाज लगा है. बसंत के शोर में अपने मन की तन्हाईओं को हम कुछ कम जरुर करेंगें. बसंत ऋतू के आगमन पर आपको बहुत बधाई ..आप यूँ ही लिखते रहें आप सरस्वती माँ से यही प्रार्थना है

    ReplyDelete
  20. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी

    बहुत अच्छी कविता.
    वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई.

    ReplyDelete
  21. दर्द कितना छुपा हर जिगर में
    बताती हैं किसी की खामोशियाँ
    हर तरफ शोर आई बसंत बहार
    चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!
    बहुत सुन्दर कविता जी , मगर क्या यह सचमुच इतना आसान है ?

    ReplyDelete
  22. कविता जी! एक अनोखे दर्द से परिचय हुआ... प्रारम्भमें लगा कि यह कविता आपके मनोभाव के विपरीत है, लेकिन अंत तक भूल का पता चल गया और तब लगा कि यह अपका परिचय पत्र लिये है!!

    ReplyDelete
  23. बहुत ही बढ़िया.आपकी कलम को ढेरों बसंतई सलाम.

    ReplyDelete
  24. बहुत सुंदर रचना,आप को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  25. दर्द कितना छुपा हर जिगर में , बताती हैं किसी की खामोशिया...
    पढने वाले कम होते हैं ...
    गाँव तो ठीक , शहर की बगिया में क्यूँ दिखती ठिठकी सी ...
    बता दिया क्या ??
    वसंत के शोर ने कुछ तो कम की तन्हाई , जो इतनी प्यारी कविता मिली !

    ReplyDelete
  26. कविता जी आपकी कविता ने दबे पाँव से रंगों की छटा बिखेर ली |

    बसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनायें |

    ReplyDelete
  27. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
    कविता रावत जी , बहुत ही गहरा सा भाव लिये बेहतरीन कविता .......... . सुंदर प्रस्तुति.
    .
    सैनिक शिक्षा सबके लिये

    ReplyDelete
  28. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

    मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी


    बसंत का तो शहर में शोर ही शोर है यहाँ तो वेलनटाइन डे की धूम रहती है बसंत की इस आहट में कुछ प्यार करने वालों के लिए भी आपने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन बहुत कुछ कहा लगता है ... आपकी रचनाओं में बहुत से अर्थ छुपे रहते है, पाठक जो जैसे समझे आप उसे उस तरह समझने के लिए उस पर छोड़ देती हैं, आपका यह प्यारा अंदाज बार बार आपका ब्लॉग पढने के लिए प्रेरित करता रहती है खींचता है अपनी ओर.... बसंत की बसंती रंगों भरी लाजवाब रचना के लिए शुक्रिया

    ReplyDelete
  29. Hi..

    Kavitaon main jab vasant ke...
    rang samate hain...
    shabd bhav se oot-prot ho..
    judte jaate hain...

    Sundar kavita...

    Deepak...

    ReplyDelete
  30. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
    ..shahar mein vasant ke aane kee khabar kahan hoti hai, kisi baag bageeche mein kuch vasant rang dikh gaye mana liya vasant bas.. gaon mein jisne vasant kee bahar dekhi ho waha kahan shahar mein vasant kee kalpna kar sakta hai use to newspaper TV aadi se pata chalta hai...
    bahut se arth samet diye hain aapne aur bahut vasant ne kam se kam aapko itne sundar kavita lkhne ke liye prerit kiya aur aapne bakhubi wah kaam kiya dhanyavad aapko ji!!

    ReplyDelete
  31. मनोभावों का सुन्दर चित्रण......बेहद पसंद आया।

    ReplyDelete
  32. मुकम्मल जहां की तलाश में ही तो युगों से भटकता रहा है आदमी-प्रायः गांव से शहर और यदा-कदा शहर से गांव भी।

    ReplyDelete
  33. .... हर तरफ शोर "आई बसंत बहार,चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!" ....... एक बेहतरीन कविता...... चार पदों में ही आपने जिंदगी के तमाम पहलुओं से रू-ब-रू करा दिया. आभार.

    ReplyDelete
  34. बसंत के आगमन की शुभकामनाएँ. सुंदर कविता है, बसंत सी सुंदर!
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  35. सुन्दर रचना ।
    ये बसंत यूँ ही खिला रहे ।

    ReplyDelete
  36. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (12.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    ReplyDelete
  37. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

    bahut badhiya.........

    ReplyDelete
  38. बहुत ही गहरे और अद्भूत भाव संजोय है आपने कविता जी इस रचना मेँ । आभार ।

    " देखे थे जो मैँने ख़्वाब.........गजल "

    ReplyDelete
  39. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

    बिलकुल ठीक बात -
    सटीक सुंदर कविता .

    ReplyDelete
  40. सुन्दर और भावपूर्ण कविता । बधाई।

    ReplyDelete
  41. कविता जी खूबसूरत कविता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई |

    ReplyDelete
  42. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी

    ....भावपूर्ण ..... बहुत सुन्दर...

    ReplyDelete
  43. बसंती बयार ठिठकी सी नहीं...क्या खूब झोंके के साथ आई है...और इस खुशबू से हमें भी सराबोर कर गयी
    सुन्दर कविता

    ReplyDelete
  44. कविता जी बगिया है ही नहीं................मात्र उसकी समाधियाँ बची हैं............तो भला वसन्त की बयार क्यों न ठिठक जाये........................अपने कल्लोल से उसे आगे बढ़ाने वाले नव पल्लव............नव किसलय अब कहाँ.............................जो कुछ भी बचे दिख रहे हैं..वे मात्र धरोहर हैं....प्राचीन इमारतों की तरह।


    बसन्त की बयार के लिये प्रकृति का शृंगार चाहिए।
    ये शृंगार वृक्षों से होगा। अतः वृक्ष स्वयं लगाइये................अन्य लोगों को भी प्रेरित कीजिये..............तथा इसकी सूचना हमें दीजिये।
    इस पावन यज्ञ में आपकीभी कम से कम एक आहुति अपेक्षित है।

    ReplyDelete
  45. दर्द कितना छुपा हर जिगर में
    बताती हैं किसी की खामोशियाँ
    हर तरफ शोर आई बसंत बहार
    चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

    ये पंक्तियाँ लाजवाब लगीं .......

    ReplyDelete
  46. दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  47. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

    दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति.
    आपकी लेखनी के कायल है हम.. ब्लॉग पर यूँ ही आप लिखती रही, बसंत सदा आप पर मेहरबान रहे, ऐसी मनोकामना है ..

    ReplyDelete
  48. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!


    वसंत का स्वागत करती बेहतरीन प्रस्तुति ।
    आभार ।

    .

    ReplyDelete
  49. sir ji aaj ke liye nahi likh rahe ho kya...

    ReplyDelete
  50. तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
    तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
    हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
    अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
    ..aapne bahut hi badiya tareeke se vasant ka swagat kiya hai .valentine day ke liye bhi yah tofa kama nahi! behtreen prastuti ke liye aabhari hain

    ReplyDelete
  51. अंतिम पंक्तियाँ काफी कुछ कहती हैं।

    ReplyDelete
  52. kavita ji
    basantibayaar ke khusbhari rango ke saath hi saath aapne kitni kushalta se badhte hue pradushan ki taraf bhi ishhar kar diya hai jiske badhte tej kadmose prakriti ki hariyaali bhithithak kar rah gai hai. man ko behad prabhavit kar gai aapki basanti post.
    bahut bahut badhai
    poonam

    ReplyDelete
  53. "दर्द कितना छुपा हर जिगर में
    बताती हैं किसी की खामोशियाँ
    हर तरफ शोर आई बसंत बहार
    चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!"

    समसामयिक भाव तथा सन्देश भी

    ReplyDelete
  54. बहुत खूब .....!
    शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  55. सुन्दर,भावपूर्ण कविता !
    बसंत ऋतु की शुभकामनाएँ !

    ReplyDelete
  56. मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
    भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
    गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
    क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
    बहुत सुन्दर पंक्तियां हैं कविता जी.

    ReplyDelete
  57. bahut hi badiya rachna.. kavita ji ab hamen aapki agli post ka itzaar hai....

    ReplyDelete
  58. Kavitaji,
    Khub fali phuli.
    par apna muluk ki yaad kabhi na bhuli.

    ReplyDelete