हर तरफ शोर आई बसंत बहार

दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहा
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

यूँ तो जुगुनुओं सी चमक वाले
हर दिन दिखते नज़ारे जहाँ कहीं
पर चांद सी हँसती खिलखिलाती
हरतरफ नजर आती सिर्फ तुम्हीं!

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
          
     ....कविता रावत

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February 8, 2011 at 8:17 AM

आदरणीय कविता रावत जी
नमस्कार !
बसंत के आगमन पर लिखी आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी ...आपका आभार

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February 8, 2011 at 8:19 AM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी

रुत परिवर्तन पर आधारित इस सुमधुर रचना के साथ ही वसंत आगमन पर आपको शुभकामनाएं...

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February 8, 2011 at 8:43 AM

बढ़िया, बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ...

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February 8, 2011 at 8:47 AM

शहरों में प्रकृति के उत्साह को भी नज़र लग जाती है आधुनिकता की।

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February 8, 2011 at 8:50 AM

Basant ka uttasav aap ko mubarak ho

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February 8, 2011 at 8:51 AM

......मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी......
बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ...आभार.........

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February 8, 2011 at 9:00 AM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
yun to tu khilkhilati hui aati hai
per pradushan ke shor me....
per haule se tu chhu leti hai
aur wah waqt basanti ho jata hai

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February 8, 2011 at 9:41 AM

बहुत सुंदर ...जीवंत मनोभावों का चित्रण .......... स्वागत बसंत

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February 8, 2011 at 9:48 AM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
आपने बहुत कुशलता से बसंत आगमन का चित्रण किया है ...शुक्रिया

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February 8, 2011 at 9:50 AM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी
..प्रकृति का यह अद्वितीय मानवीकरण बहुत ही प्रभावशाली लगा .... मन को छू गयी आपकी यह रचना ..आपको बसंत की बहुत शुभकामना

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February 8, 2011 at 9:51 AM

pyari si rachna...:)
बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

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February 8, 2011 at 9:58 AM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

.. हमको तो प्यार का इज़हार सी करती प्रेमिका का यह बासंती रंग भा गया ....बसंत की इस शुभबेला की आपको बधाई

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February 8, 2011 at 10:06 AM

यूँ तो जुगुनुओं सी चमक वाले
हर दिन दिखते नज़ारे जहाँ कहीं
पर चांद सी हँसती खिलखिलाती
हरतरफ नजर आती सिर्फ तुम्हीं!

प्यार का बसंती रंग जब सर चढ़कर बोलता है तो सब जगह अपना ही प्रेम नज़र आता है| वाह कितनी खूबसूरती से आपने एक साथ फिजा में बसंती रंग घोल दिया है...तस्वीर का आकर्षण भी लाजवाब है| बहुत बधाई आपको बसंत पंचमी की|

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February 8, 2011 at 10:25 AM

उलझनें अपनी जगह हैं, आगतें अपनी जगह.
बसंत आगमन पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित...

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February 8, 2011 at 10:26 AM

हर तरफ शोर आई बसंत बहार
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!
बहुत सुन्दर । बसंत के आगम पर बधाई । सुशील जी का शेर पसंद आया

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February 8, 2011 at 11:29 AM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस रचना में ।

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February 8, 2011 at 11:43 AM

कित्ती सुन्दर रचना ....वसंत पंचमी तो बहुत प्यारा त्यौहार है..इसके साथ मौसम भी कित्ता सुहाना हो जाता है. वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई !!

_______________________
'पाखी की दुनिया' में भी तो वसंत आया..

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February 8, 2011 at 11:50 AM

कविता जी शहर में तो न कहीं बाग, न बागवानी ना फुलवारी की जगह बची हुई है तो वहI वसंत ऋतू ठिठकी ही दृष्टिगत होगी सच ही लिखा आपने .

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February 8, 2011 at 5:52 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिटकी सी

कविता जी! कितनी मासूमियत से आपने बसंत के आने की खबर दी! ......शहर की प्रदुषण भरी जिंदगी में बसंत कहीं एक कोने में ठिठक कर रह गया है ..... एक गहरे चिंतन को बखूबी पेश किया है आपने... आपकी लेखनी के कायल है हम.. ब्लॉग पर यूँ ही आप लिखती रही, बसंत सदा आप पर मेहरबान रहे, ऐसी मनोकामना है ..

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February 8, 2011 at 6:02 PM

दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहार
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

..आपका छुपे दर्द को बसंत के माध्यम से बयां करने का यह अद्भुत अंदाज लगा है. बसंत के शोर में अपने मन की तन्हाईओं को हम कुछ कम जरुर करेंगें. बसंत ऋतू के आगमन पर आपको बहुत बधाई ..आप यूँ ही लिखते रहें आप सरस्वती माँ से यही प्रार्थना है

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February 8, 2011 at 7:09 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी

बहुत अच्छी कविता.
वसंत पंचमी पर ढेर सारी बधाई.

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February 8, 2011 at 7:21 PM

दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहार
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!
बहुत सुन्दर कविता जी , मगर क्या यह सचमुच इतना आसान है ?

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February 8, 2011 at 8:44 PM

कविता जी! एक अनोखे दर्द से परिचय हुआ... प्रारम्भमें लगा कि यह कविता आपके मनोभाव के विपरीत है, लेकिन अंत तक भूल का पता चल गया और तब लगा कि यह अपका परिचय पत्र लिये है!!

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February 8, 2011 at 9:27 PM

बहुत ही बढ़िया.आपकी कलम को ढेरों बसंतई सलाम.

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February 9, 2011 at 12:55 AM

बहुत सुंदर रचना,आप को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

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February 9, 2011 at 10:19 AM

दर्द कितना छुपा हर जिगर में , बताती हैं किसी की खामोशिया...
पढने वाले कम होते हैं ...
गाँव तो ठीक , शहर की बगिया में क्यूँ दिखती ठिठकी सी ...
बता दिया क्या ??
वसंत के शोर ने कुछ तो कम की तन्हाई , जो इतनी प्यारी कविता मिली !

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February 9, 2011 at 5:56 PM

कविता जी आपकी कविता ने दबे पाँव से रंगों की छटा बिखेर ली |

बसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनायें |

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February 10, 2011 at 4:25 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
कविता रावत जी , बहुत ही गहरा सा भाव लिये बेहतरीन कविता .......... . सुंदर प्रस्तुति.
.
सैनिक शिक्षा सबके लिये

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February 10, 2011 at 5:23 PM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी


बसंत का तो शहर में शोर ही शोर है यहाँ तो वेलनटाइन डे की धूम रहती है बसंत की इस आहट में कुछ प्यार करने वालों के लिए भी आपने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन बहुत कुछ कहा लगता है ... आपकी रचनाओं में बहुत से अर्थ छुपे रहते है, पाठक जो जैसे समझे आप उसे उस तरह समझने के लिए उस पर छोड़ देती हैं, आपका यह प्यारा अंदाज बार बार आपका ब्लॉग पढने के लिए प्रेरित करता रहती है खींचता है अपनी ओर.... बसंत की बसंती रंगों भरी लाजवाब रचना के लिए शुक्रिया

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February 10, 2011 at 5:27 PM

Hi..

Kavitaon main jab vasant ke...
rang samate hain...
shabd bhav se oot-prot ho..
judte jaate hain...

Sundar kavita...

Deepak...

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February 10, 2011 at 5:51 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
..shahar mein vasant ke aane kee khabar kahan hoti hai, kisi baag bageeche mein kuch vasant rang dikh gaye mana liya vasant bas.. gaon mein jisne vasant kee bahar dekhi ho waha kahan shahar mein vasant kee kalpna kar sakta hai use to newspaper TV aadi se pata chalta hai...
bahut se arth samet diye hain aapne aur bahut vasant ne kam se kam aapko itne sundar kavita lkhne ke liye prerit kiya aur aapne bakhubi wah kaam kiya dhanyavad aapko ji!!

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February 10, 2011 at 8:38 PM

मनोभावों का सुन्दर चित्रण......बेहद पसंद आया।

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February 10, 2011 at 10:25 PM

मुकम्मल जहां की तलाश में ही तो युगों से भटकता रहा है आदमी-प्रायः गांव से शहर और यदा-कदा शहर से गांव भी।

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February 11, 2011 at 12:02 AM

.... हर तरफ शोर "आई बसंत बहार,चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!" ....... एक बेहतरीन कविता...... चार पदों में ही आपने जिंदगी के तमाम पहलुओं से रू-ब-रू करा दिया. आभार.

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February 11, 2011 at 4:36 PM

बसंत के आगमन की शुभकामनाएँ. सुंदर कविता है, बसंत सी सुंदर!
घुघूती बासूती

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February 11, 2011 at 5:44 PM

सुन्दर रचना ।
ये बसंत यूँ ही खिला रहे ।

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February 11, 2011 at 6:33 PM

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (12.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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February 12, 2011 at 12:25 AM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

bahut badhiya.........

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February 12, 2011 at 9:48 AM

बहुत ही गहरे और अद्भूत भाव संजोय है आपने कविता जी इस रचना मेँ । आभार ।

" देखे थे जो मैँने ख़्वाब.........गजल "

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February 12, 2011 at 12:20 PM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

बिलकुल ठीक बात -
सटीक सुंदर कविता .

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February 12, 2011 at 12:54 PM

सुन्दर और भावपूर्ण कविता । बधाई।

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February 12, 2011 at 12:59 PM

कविता जी खूबसूरत कविता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई |

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February 12, 2011 at 2:03 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी

....भावपूर्ण ..... बहुत सुन्दर...

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February 12, 2011 at 3:52 PM

बसंती बयार ठिठकी सी नहीं...क्या खूब झोंके के साथ आई है...और इस खुशबू से हमें भी सराबोर कर गयी
सुन्दर कविता

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February 12, 2011 at 7:41 PM

कविता जी बगिया है ही नहीं................मात्र उसकी समाधियाँ बची हैं............तो भला वसन्त की बयार क्यों न ठिठक जाये........................अपने कल्लोल से उसे आगे बढ़ाने वाले नव पल्लव............नव किसलय अब कहाँ.............................जो कुछ भी बचे दिख रहे हैं..वे मात्र धरोहर हैं....प्राचीन इमारतों की तरह।


बसन्त की बयार के लिये प्रकृति का शृंगार चाहिए।
ये शृंगार वृक्षों से होगा। अतः वृक्ष स्वयं लगाइये................अन्य लोगों को भी प्रेरित कीजिये..............तथा इसकी सूचना हमें दीजिये।
इस पावन यज्ञ में आपकीभी कम से कम एक आहुति अपेक्षित है।

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February 12, 2011 at 8:43 PM

दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहार
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

ये पंक्तियाँ लाजवाब लगीं .......

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February 12, 2011 at 11:22 PM

दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

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February 13, 2011 at 4:28 PM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

दिल की गहराईयों को छूने वाली एक खूबसूरत, संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति.
आपकी लेखनी के कायल है हम.. ब्लॉग पर यूँ ही आप लिखती रही, बसंत सदा आप पर मेहरबान रहे, ऐसी मनोकामना है ..

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February 13, 2011 at 9:54 PM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!


वसंत का स्वागत करती बेहतरीन प्रस्तुति ।
आभार ।

.

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February 14, 2011 at 2:49 PM

sir ji aaj ke liye nahi likh rahe ho kya...

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February 14, 2011 at 5:18 PM

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!
..aapne bahut hi badiya tareeke se vasant ka swagat kiya hai .valentine day ke liye bhi yah tofa kama nahi! behtreen prastuti ke liye aabhari hain

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February 14, 2011 at 5:52 PM

अंतिम पंक्तियाँ काफी कुछ कहती हैं।

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February 14, 2011 at 7:57 PM

kavita ji
basantibayaar ke khusbhari rango ke saath hi saath aapne kitni kushalta se badhte hue pradushan ki taraf bhi ishhar kar diya hai jiske badhte tej kadmose prakriti ki hariyaali bhithithak kar rah gai hai. man ko behad prabhavit kar gai aapki basanti post.
bahut bahut badhai
poonam

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February 15, 2011 at 3:42 PM

"दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहार
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!"

समसामयिक भाव तथा सन्देश भी

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February 15, 2011 at 7:19 PM

बहुत खूब .....!
शुभकामनायें !

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February 16, 2011 at 4:20 PM

सुन्दर,भावपूर्ण कविता !
बसंत ऋतु की शुभकामनाएँ !

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February 16, 2011 at 11:38 PM

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
बहुत सुन्दर पंक्तियां हैं कविता जी.

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February 17, 2011 at 8:26 AM

bahut hi badiya rachna.. kavita ji ab hamen aapki agli post ka itzaar hai....

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Gaje Singh
July 23, 2011 at 12:40 PM

Kavitaji,
Khub fali phuli.
par apna muluk ki yaad kabhi na bhuli.

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