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Tuesday, April 26, 2011

सदियों से फलता-फूलता कारोबार : भ्रष्टाचार


भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

कौन मिटा सकेगा हस्ती तेरी
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!


... कविता रावत

Sunday, April 3, 2011

धुन के पक्के इन्सां ही एक दिन चैंपियन बनते हैं


जीत और हार के बीच
झूलते, डूबते-उतराते
विपरीत क्षण में भी
अविचल, अविरल भाव से
लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना बहुत मुश्किल
पर नामुमकिन नहीं
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर- सीढ़ी
चढ़ने के उपरान्त
चिर प्रतीक्षा
चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर  ख़ुशी
बेजोड़ व अनमोल होती है
इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर पाते हैं
जो हर हाल में निरंतर
सबको साथ लेकर लक्ष्य प्राप्ति हेतु
हरक्षण संघर्षरत रहते हैं
और मुकाम हासिल कर ही
दम लेते हैं सगर्व, सम्मान 
जिसके वे हक़दार होते हैं
अनुकूल मौसम में तो हर कोई नाव चला सकते  हैं
पर तूफां में कश्ती पार लगाने वाले विरले ही होते हैं
कठिन राह को जो आसाँ बना मंजिल तक पहुँचते हैं
वही धुन के पक्के इन्सां एक दिन चैंपियन बनते हैं
                                  ...कविता रावत