सदियों से फलता-फूलता कारोबार : भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

कौन मिटा सकेगा हस्ती तेरी
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!


... कविता रावत

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April 26, 2011 at 10:41 AM

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार

Nice post.
Please yh bhi dekhen

http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/04/blog-fixing_25.html

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April 26, 2011 at 10:42 AM

अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे बेकार.

सत्य वचन... बस नमस्कार, नमस्कार !

होनहार

सार्वजनिक जीवन में अनुकरणीय कार्यप्रणाली

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April 26, 2011 at 11:07 AM

भ्रष्टाचार ही सचमुच धर्मनिरपेक्ष और गरीबी अमीरी का भेद मिटाता है भारतवर्ष में !

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April 26, 2011 at 11:27 AM

बिलकुल सही व्यंग्य किया है आपने इस कविता के माध्यम से.

सादर
---------
भ्रम की परतें उधड़ रही हैं

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April 26, 2011 at 11:49 AM

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!
....sateek prahaar...
sabhi namaskar bhar hi to karte dikhte hain.. dikhawa bhar hai ki bhrastachar ko door karne ka!
Saadar

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April 26, 2011 at 12:01 PM

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

बहुत खूब ।

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April 26, 2011 at 12:11 PM

भ्रष्टाचार न होता तो देश आज न जाने कितनी ज़्यादा तरक्की कर चुका होता| पर ये भ्रष्ट आचार तो जैसे युगों युगों से अमरत्व का वरदान पाए हुए है

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April 26, 2011 at 12:55 PM

वाह..भ्रष्टाचार पर आपकी रचना बहुत सटीक और सार्थक है...व्यंग का तड़का क्या खूब लगाया है इसमें...
नीरज

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April 26, 2011 at 12:57 PM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !
..............
लम्बे अंतराल बाद आपकी पोस्ट पढने को मिली सबसे पहले इसके लिए शुक्रिया की आप अपनी व्यस्त जिंदगी से कुछ समय निकालकर ब्लॉग पर सामाजिक सरोकार से सरोबार पोस्ट लिखती रहती हैं....
आज की सचाई यही है की भ्रस्टाचार शासन प्रशासन में बैठे सूरमाओं का सबसे बड़ा कारोबार है, जिसके बदोलत जनता हर तरह से गुलामी भरी जिंदगी जीने पर मजबूर हैं.. आजाद में गुलामी की मानसिकता के बीच जीते लोगों को जी हुजूरी से निजात कहाँ! छोटे मोटे काम निकलवाकर अहसान समझ जिंदगी भर मुहं पर ताला फिट करवा लेते है और जय-जैकार करने से बाज नहीं आते है.... हल्ला बहुत है लेकिन अपनी आत्मा जाग्रत कर कितने इस भ्रस्टाचार को दूर करना चाहते है कोई कुछ नहीं कह सकता.. आपका आभार भ्रष्टाचार को नमस्कार!!!

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April 26, 2011 at 1:15 PM

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!... bilkul sahi

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April 26, 2011 at 1:31 PM

शायद ही कोई इसे मिटा सके। अपनी भी नमस्कार ही है। शुभकामनायें।

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April 26, 2011 at 2:38 PM

नमस्‍कार, नमस्कार
अति सुन्दर!

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April 26, 2011 at 3:07 PM

तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!..............
मैडम जी! सच कहें अपन को फूटी आँख नहीं सुहाता ये काला-सफ़ेद रंगने वाला फटे मुहं का भ्रस्टाचार... पर क्या करें कभी न कभी ऐसा कोई काम फंस ही जाता है की चक्कर काटने की हिम्मत नहीं रह जाती ... बिना लें-दें के कोई कहीं भी करवाना नामुमकिन सा हो जाता है ..... अब का करें हम गरीब की कौन सुने ..... थोडा बहुत ले दे कर बढ़ावा तो हम ही दे रहें हैं न? अब इसके चक्कर में फंसे तो रोजी रोटी भी जाती रहेगी... इसलिए हमारा भी भ्रस्टाचार को नमस्कार! और आपको सादर प्रणाम!...

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April 26, 2011 at 4:06 PM

भ्रष्टाचार तो parasite है और जो हम host हैं तो हमें भी तो नमस्कार न, कविता जी ?
इस प्रस्तुति के लिए आभार....... शुभकामनायें.

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April 26, 2011 at 5:21 PM

bahut sashakt rachana hai . bhrashtacharye kod se kum nahee.......
ise nikalna hee hai...sabhee ko Annajee ka sath dena hai.......hum kisee ko rishvat nahee denge kisee keemat par yahee se shuruaat karnee hai........


अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार fir bhee koshish to karnee hee hogee......
aur kaisee ho?
baccho kee chutteeya chal rahee hongee ?
shubhkamnae....
tum bhee blog par shayad vyastta kee vajah se nahee aa paee.

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April 26, 2011 at 5:34 PM

सही है राजसी ठाटबाट कौन करेगा वहिष्कार , क्या बात है सरकार भी तुझी से दौड रही है या कहेें सरकार सरक नहीं है, जिसकी रोटिया काले और परतदार तवे पर सिक रहीं हों उसे नमस्कार है नाते रिश्तों की भरमार है । आरती है ये भृष्टाचार की

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April 26, 2011 at 5:51 PM

भ्रष्टाचार पर बढ़िया व्यंग ।
जो मिटा सके इसकी हस्ती , उस हस्ती का इंतजार है ।

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April 26, 2011 at 10:35 PM

Kya zabardast wyang hai! Rachana kee geytaa use aur bhee sashakt banatee hai!

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April 26, 2011 at 10:38 PM

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार

बेहतरीन अभिव्यक्ति ...यही होता है....

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April 26, 2011 at 11:00 PM

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!
इन सब का नाश तो जनता ही करेगी , जनता यानि हम तुम सब मिल कर... जय हिन्द

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April 27, 2011 at 12:01 AM

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

क्या व्यंग किया है इस कविता में. अभी तो भ्रष्टाचार जिंदाबाद ही चल रहा है.

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April 27, 2011 at 6:29 AM

सोने की चमक से अछूता कौन रहना चाहता है। सुन्दर रचना!

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April 27, 2011 at 7:49 AM

भ्रष्टाचार पर व्यंगात्मक चोट करती हुई आपकी यह बेहतरीन रचना बहुत पसंद आई!

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April 27, 2011 at 4:58 PM

भ्रष्टाचार!
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार!
बस नमस्कार, नमस्‍कार!

जो मिटा सके इसकी हस्ती, उसी का है इन्तजार!

प्रशंसनीय प्रस्तुति

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April 27, 2011 at 6:49 PM

कौन मिटा सकेगा हस्ती तेरी
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्कार !
बस नमस्कार, नमस्कार!
.....................

कल तक हम फटेहाल घूमते थे
मारे बेरोजगारी के भटकते थे
कोई भी हमें नहीं पूछते थे
बड़ी जोड़-तोड़ से हमने सत्ता में बिठाएं है अपने नाते रिश्तेदार
उसी मेहनत से आज हमारी घर आयी है बहार
एक बार बड़ी हस्ती बन गया मैं
फिर जरुर झंडे डंडे लेकर करुगा भ्रष्टाचार का बहिष्कार
फिलहाल बनने मेरी हस्ती
फिलहाल मुझे कहना है सिर्फ नमस्कार! नमस्कार!!!!!

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April 27, 2011 at 8:14 PM

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

बहुत खूब ।

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April 28, 2011 at 1:46 PM

वर्तमान का यथार्थ है आपकी कविता में .
लिए हार्दिक बधाई...

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April 28, 2011 at 2:20 PM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !


इसके सिवा हम और क्या करे सोते हुयो को कैसे उठाये ,..... बस नमस्कार

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April 28, 2011 at 4:52 PM

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

Beautiful Satire !

.

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April 28, 2011 at 10:26 PM

सब तेरे पीछे पड़ते हैं,
अपनों से अपने लड़ते हैं।

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April 29, 2011 at 4:22 PM

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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April 29, 2011 at 9:19 PM

वर्तमान युग के संदर्भ में सत्य को उद्भाषित करती आपकी कविता के लिए मेरे पास कोई विशेषण नही हैजिससे मैं इसे अलंकृत कर सकूं धन्यवाद।

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April 30, 2011 at 11:41 AM

दोस्तों, क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना.........
भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से (http://sach-ka-saamana.blogspot.com/2011/04/blog-post_29.html )

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April 30, 2011 at 3:12 PM

रुखी-सूखी खाने वालों को मिला
बनकर अचार
इतना लजीज बन तू थाली में सजा
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!
...जो मिटा सके इसकी हस्ती, उसी का है इन्तजार!
प्रशंसनीय प्रस्तुति

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April 30, 2011 at 5:38 PM

सच कहा ... आज इसके बिना किसी का काम नही चलता ... साँसों के साथ इसे पीते हैं हम ....

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May 1, 2011 at 4:53 AM

कविता जी प्रणाम !
भ्रष्टाचार अब आम आदमी के जीवन का अंग बन गया है ....उस की राग राग में बस गया है....गोया की कोई नशा हो जिसे छोड़ भी नहीं सकते ...और जिस से परेशां भी खुद ही हैं ......
भ्रष्टाचार को सचमुच नमस्कार है....

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May 1, 2011 at 6:35 PM

दोस्तों, क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से (http://sach-ka-saamana.blogspot.com/2011/04/blog-post_29.html )

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May 1, 2011 at 8:57 PM

भ्रष्टाचार पर ज़बरदस्त चोट करती सटीक रचना.

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May 2, 2011 at 1:51 PM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !

कविता जी! सबसे पहले तो आपकी लेखनी को नमस्कार फिर एकदम सटीक चोट करती रचना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आभार!!
सच तो यही है कि देश में आज भ्रस्टाचार से बड़ा दूसरा कारोबार नज़र ही नहीं आता! इसे देख बस नमस्कार ही कर सकता है आम पीड़ित जनता और करती भी क्या है?????????

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May 2, 2011 at 6:30 PM

कौन मिटा सकेगा हस्ती तेरी
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार...........................................................................................
भ्रष्टाचार!
जनता के काम होते है इससे हजार
फिर क्यों करें हम इसका बहिष्कार
बहुत मेहनत और दिमाग का खेल है यह
जो न कर पाता वह वही है बेकार
डॉक्टर, इंजिनियर बन जाते हैं इसके बलबूते
इसी के बलबूते दौड़ता प्रशासन चल रही है सरकार
फिर क्या खाकर करेंगें हम इसका बहिष्कार
बस नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार
आपको भी कोटि-कोटि नमस्कार!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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May 2, 2011 at 10:53 PM

यह पूजा अवश्यक है :-) शुभकामनायें आपको !

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May 3, 2011 at 2:52 PM

अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे बेकार.

सत्य वचन... बस नमस्कार, नमस्कार !

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May 3, 2011 at 6:53 PM

बहुत सुन्दर!
आज तो भ्रष्टाचारी देशभक्त बने बैठे हैं!

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May 3, 2011 at 7:26 PM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !
कविता जी भ्रष्टाचार पर यह एक दमदार कविता है बधाई और शुभकामनाएं |

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May 4, 2011 at 5:13 PM

बहुत अच्छी कविता।

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May 4, 2011 at 6:13 PM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !

कविता जी! भ्रष्टाचार पर ज़बरदस्त चोट करती सटीक रचना है...
आपको बधाई और शुभकामनाएं |

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May 4, 2011 at 6:30 PM

ऊँच-नीच, जात-पात से परे
राजा-रंक सभी पर सम अधिकार
प्रशासन को रखे चुस्त-दुरुस्त
तुझसे बनती सरपट दौड़ती सरकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!

भारतवर्ष में भ्रष्टाचार ही सचमुच धर्मनिरपेक्ष और गरीबी अमीरी का भेद मिटाता है!
भ्रष्टाचार को सचमुच नमस्कार है!!!!!!

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May 5, 2011 at 6:42 AM

श्रीमान जी, मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

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May 5, 2011 at 8:50 AM

भ्रष्टाचार!
तेरे रूप हजार
सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्कार, नमस्‍कार !
..
इसे कोई नहीं झुठला सकता की आज बिना इन भ्रष्टाचारियों के न तो सरकार चल रही और नहीं प्रशासन.... बहुत बड़ी बिडम्बना है प्रजातंत्र की... हिटलर या मुसोलिनी में से किसी ने प्रजात्रंत्र के बारे में कहा था "प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है, जहाँ सौ मुर्ख मिलकर एक निर्णय नहीं ले पाते" आज के हालातों में यही सच साबित हो रहा है......
आज तो भ्रष्टाचारी देशभक्त बने बैठे हैं!
भ्रष्टाचार को सचमुच नमस्कार है?

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May 5, 2011 at 7:19 PM

जी भ्रष्टाचार पर लेख और कविताएं इसलिए लिखी जा रही हैं कि नेताओं और हुक्मरानों ने भ्रष्टाचार को भी भ्रष्ट कर दिया। इसमें भी ईमानदारी नहीं रही। उदाहरण के तौर पर नेता किसी काम को कराने के लिए पैसे लेते हैं, ये तो हुआ भ्रष्टाचार और पैसे लेने के बाद भी काम नहीं करते तो यही ना कहेंगे कि भ्रष्टाचार को भी भ्रष्ट कर दिया।
आपकी रचना वाकई बहुत अच्छी है।

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May 5, 2011 at 8:45 PM

kavita ji
kya karara prhaar kiya hai bhrashtachar par --bahut hi badhiya v samyik post
तेरी आंच पर सिंक रही रोटियां
तवा तेरा मोटा काला परतदार
इतना पक्का रंग है तेरा
जिसके आगे दुनिया के सब रंग हैं बेकार
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!
bilkul sateek chitran
bahut bahut badhai
poonam

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May 6, 2011 at 7:11 AM

कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !
बस नमस्‍कार, नमस्कार!
jabardast rachna
aapka aabhar

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May 6, 2011 at 5:25 PM

श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी कल ही लगाये है. इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.

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May 6, 2011 at 11:28 PM

सदियों से फलता-फूलता कारोबार
देख तेरा राजसी ठाट-बाट
कौन करेगा तेरा बहिष्‍कार !

सही कहा है आपने.

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May 7, 2011 at 3:11 PM

कविता जी सुन्दर रचना सार्थक भी -निम्न पंक्तियाँ बिलकुल सत्य हैं लेकिन देर है अंधेर नहीं आओ सब मिल अपना अपना योगदान देते रहें बालू पर खड़े महल ज्यादा नहीं टिकते अभेद्य तो हो ही नहीं सकते कभी भी धराशायी हो सकते हैं -अभी भी इस चरम सीमा के दौर में आप ने देखा होगा चप्पल जूते तो वे खा ही रहे भला सोचिये उनके बेटे स्कुल कालेज में क्या मुह दिखाते होंगे उनकी पत्नी और रिश्तेदार भी शायद आज साथ न चले सड़कों पर उनके ---
जब नाते-रिश्तेदारों की है भरमार
तेरा किला ढहाने को आतुर है जनता
अभेद इतना है किला तेरा
ब्रह्मास्त्र भी हो रहे हैं बेकार
शुक्ल भ्रमर ५

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May 7, 2011 at 3:13 PM

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
आप भी बन सकते इस ब्लॉग के लेखक बस आपके अन्दर सच लिखने का हौसला होना चाहिए.
समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
.
जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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May 7, 2011 at 10:37 PM

चमत्कार को नमस्कार।

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May 7, 2011 at 11:19 PM

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
आप भी बन सकते इस ब्लॉग के लेखक बस आपके अन्दर सच लिखने का हौसला होना चाहिए.
समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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May 8, 2011 at 7:31 AM

bhrashtachar ko nahi aapko itni sarthak prastuti hetu NAMASKAR.

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