घर सारा बीमार है

एक बार आकर देख जा बेटे
घर को तेरा इन्तजार है
घर सारा बीमार है.

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

भाई तेरा रोज दुकान पर खटता
देर रात नशे में धुत लौटता
उस पर किसी का जोर न चलता
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

       ....कविता रावत

     गाँव मुझे हरदम अपनी ओर आकर्षित करते हैं इसलिए जब भी मौका मिलता है निकल पड़ती हूँ भले ही दो-चार दिन के लिए ही सही। लेकिन जितने समय वहां रहती हूँकई घर-परिवारों की दशा देखकर शहर में आकर भी मन वहीँ बार-बार भटकने लगता है. पिछली बार जब गाँव जाना हुआ तो गाँव के एक परिवार की दशा देख जब उसके परदेशी बेटे से जो 3 साल से घर नहीं आया था; हो सकता है उसकी भी कुछ मजबूरी रही होगी। उसकी माँ से मैंने अपने मोबाइल से बात करवाई तो वह माँ रुंधे कंठ से जिस तरह एक झीनी उम्मीद से अपना दुखड़ा सुना रही थी, वही बीते पलों की यादें व्यथित हो छलक उठे हैं कविता के रूप में.. 

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May 20, 2011 at 8:14 AM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

सच में यही हालात हैं..... बहुत सही शब्द चुने आपने

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May 20, 2011 at 8:46 AM

भाई तेरा रोज दुकान पर खटता
देर रात नशे में धुत लौटता
उस पर किसी का जोर न चलता
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है
....कमोवेश शहर की स्लम बस्तियों को तो छोडो बहुत से अच्छे खासे दिखने वाले कई परिवारों की औलादों का भी यही हाल है... संवेदना से परिपूर्ण तस्वीर और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत आभार....

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May 20, 2011 at 8:56 AM

बहुत ही बेहतरीन भाव लिए हुए रचना है... बहुत पसंद आई कविता जी.

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May 20, 2011 at 9:22 AM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!


sach me ek gaon ki kahani kah di aapne..!!
aisa hi to hota hai...!!
bahut marmsparshi abhivyakti..

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May 20, 2011 at 9:25 AM

dil tak seedhe pahuchee ye rachana.......
marmik prastuti.
nagreekaran ka kaduva sach hai ye ....

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May 20, 2011 at 9:29 AM

सीधे दिल में उतर जाने वाली रचना

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May 20, 2011 at 10:20 AM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
...............
शहर में अपनी घर गृहस्थी में रम चुके घर परिवार के यही हाल है... एक बार अपना घर परिवार शहर क्या लाते हैं कि घर में बूढ़े माँ-बाप और घर की सुध लेना ही भूल जाते है .. माना की शहर में घर परिवार चलाना दुश्वार होता जा रहा लेकिन इसके बावजूद गाँव को और विशेषकर अपने माँ-बाप भूल जाना सच में आज बेहद दुखदायी बनता जा रहा है ......
संवेदना से भरी प्रस्तुति के लिए बहुत आभार..धन्यवाद

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May 20, 2011 at 10:27 AM

Nice post.

लौट कर वापस सफ़र से जब घर आते हैं हम
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ

ऐसा लगता है कि जैसे आ गए फ़िरदौस में
भींचकर बाहों में जब सीने से लिपटाती है माँ

देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब हमें
रेत पर मछली हो जैसे ऐसे घबराती है माँ

मरते दम बच्चा न आ पाए अगर परदेस से
अपनी दोनों आँखें चैखट पे रख जाती है माँ

बाद मर जाने के फिर बेटे की खि़दमत के लिए
भेस बेटी का बदल कर घर में आ जाती है माँ

http://pyarimaan.blogspot.com/2011/02/mother.html

अल्लाह का फ़रमान है कि 'मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी'

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May 20, 2011 at 11:13 AM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना के लिए साधुवाद....

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May 20, 2011 at 11:54 AM

बहुत मार्मिक प्रस्तुति ...

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May 20, 2011 at 11:57 AM

हृदय विदीर्ण करती यह पुकार है,
घर सारा बीमार है

नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है

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May 20, 2011 at 12:07 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
dard hi dard hai rachna me

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May 20, 2011 at 1:04 PM

बहुत द्विविधापूर्ण स्थिति है. जब बच्चे बाहर जाते है सबको शुरू में बहुत अच्छा लगता है परन्तु बाद में सब बेमजा हो जाता है.
संवेदनाएं ऐसे परिवारों के प्रति.

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May 20, 2011 at 2:43 PM

घर सारा बीमार है, संवेदनायें जगा गयी।

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May 20, 2011 at 2:51 PM

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

गहन संवेदना से उपजी गहरे मर्म को छूती मन को झकझोर करने वाली प्रभावकारी कृति ... पढ़कर मन में गहरी हलचल से मच गयी.... आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार .............

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May 20, 2011 at 3:30 PM

गरीबी , भुखमरी , बेरोजगारी --गाँव में रहकर घर सारा बीमार होना लाजिमी है । ऐसे में पलायन होना भी ज़रूरी है । लेकिन एक बार शहर या विदेश जाने के बाद कौन वापस लौटता है ।
सही कशमकश को दर्शाती रचना , कविता जी ।

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May 20, 2011 at 3:59 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
..dard se sarobaar kar dene wali anoothi rachna...

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May 20, 2011 at 4:00 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है...रचना में बहुत दर्द है … सोचने को मजबूर हुए होंगे सब….

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May 20, 2011 at 7:16 PM

यह स्थिति कमोबेश सभी जगह है कविता जी, आपने सुन्दर शब्दों का रूप देकर मर्मस्पर्शी बना दिया. आभार.

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May 20, 2011 at 7:33 PM

हृदय विदीर्ण करती यह पुकार है,
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.
घर सारा बीमार है
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है

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May 20, 2011 at 7:41 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है...रचना में बहुत दर्द है …
अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना के लिए साधुवाद....

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May 20, 2011 at 8:45 PM

'एक बार आकर देख जा बेटे
घर को तेरा इन्तजार है
घर सारा बीमार है'.
हकीकत और पीड़ा से भरी एक बहुत ही उम्दा प्रस्तुति |

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May 20, 2011 at 9:05 PM

abhinav kavita ........

umda post !

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May 20, 2011 at 10:23 PM

दिल को छूने वाली रचना!

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May 20, 2011 at 10:34 PM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

मन द्रवित कर गयी यह रचना....कई घरों का यही हाल है.

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May 20, 2011 at 10:35 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
Kitna dard chhupa hai....ubhar aayaa hai!

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May 20, 2011 at 11:31 PM

घर से दूर बसे हर इंसान को झकझोरने के लिए काफी हैं ये पंक्तियाँ...कुछ तो मजबूरियां रही होंगी...यूं ही कोई बेवफा नहीं होता...फँस गये ओबामा की तरह recession का मारा होगा बेटा...

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May 21, 2011 at 8:26 AM

आमतौर पर कहे जाने वाले शब्‍द होते हैं- 'तू अच्‍छे से रहना' और इसी कथन में ये सारे भाव छुपे होते हैं, जो यहां मुखर हैं.

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May 21, 2011 at 10:12 AM

very touching creation Kavita ji . It made me sad.

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May 21, 2011 at 1:29 PM

आदरणीयकविता रावत जी
नमस्कार !
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है रचना में बहुत दर्द है
..........अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना

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May 21, 2011 at 1:31 PM

पहाड़ का दर्द अक्षरश झकझोर कर व्यक्त कर गयी ये कविता !

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May 21, 2011 at 2:22 PM

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

गहन संवेदना से उपजी गहरे मर्म को छूती मन को झकझोर करने वाली प्रभावकारी कृति ...
पढ़कर मन में गहरी हलचल से मच गयी....
आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार ....

कृपया मेरे ब्लॉग पर आयें http://madanaryancom.blogspot.com/

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May 21, 2011 at 3:15 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
..गहन संवेदना से उपजी पहाड़ का दर्द अक्षरश झकझोर कर व्यक्त कर गयी ये कविता !
आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार ....

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May 21, 2011 at 7:36 PM

जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
.. दर्द जब गहराता है तो ऐसी ही दर्द भरी दास्ताँ बनकर उभरती है और आपकी संवेदनशील लेखनी से दर्द बाहर निकलकर मन द्रवित न हो, यह कैसे हो सकता है..... कविता पढ़कर लगा जैसे यह तो अपने किसी अपने का ही दर्द है ....
बेहतरीन रचना के लिए साधुवाद....

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May 22, 2011 at 8:59 AM

एक बार आकर देख जा बेटे
घर को तेरा इन्तजार है
घर सारा बीमार है.
........
मन को द्रवित करने वाली इस अनुपम कृति के माध्यम से आपने अनगिनत घरों की दर्द भरी कहानी बयां कर दिल को झकझोर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया... आपका बहुत बहुत शुक्रिया ..

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May 22, 2011 at 11:10 AM

दोष माँ-बाप का हो या औलाद का|
नस्ल तो - अस्ल में - मतलबी रह गई||

बहुत ही अच्छी कविता प्रस्तुत की है आपने| बधाई|

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May 22, 2011 at 2:05 PM

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

.....गहन संवेदना से उपजी गहरे मर्म को छूती मन को झकझोर करने वाली प्रभावकारी कृति ...

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May 22, 2011 at 5:44 PM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

मार्मिक रचना।
बूढ़े मां-बाप की उपेक्षा तो हो ही रही है , अब गांव भी बूढ़े हो गए हैं, कोई ध्यान नहीं देता उसकी ओर।

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May 22, 2011 at 7:20 PM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
सच्चाई को वयां करती रचना सुंदर अभिव्यक्ति , बधाई...

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May 22, 2011 at 7:47 PM

ग्रामीण अंचल के दुखी लोगों का थेाडा सा भी कष्ट कम कर दिया और उनके दुखी चेहरेां पर मुस्कान लादी तो इससे बडा पुण्य कार्य कोई हो नहीं सकता और जब भी हम सोचते है हमने ऐसा किया एक संतोष होता है कि हम इन्सान है।

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May 22, 2011 at 11:22 PM

वाकई मार्मिक चित्रण ।

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May 23, 2011 at 2:43 AM

हृदय विदीर्ण करने वाली पुकार!

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May 23, 2011 at 9:08 AM

दर्द भरी रचना सोचने पर मजबूर करती हुई ...आपका आभार

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May 23, 2011 at 3:06 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
..सच्चाई को वयां करती हृदय विदीर्ण करने वाली पुकार!

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May 23, 2011 at 3:35 PM

पहाड़ का दर्द अक्षरश झकझोर कर व्यक्त कर गयी ये कविता
बेहतरीन मार्मिक चित्रण के लिए साधुवाद....!

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May 23, 2011 at 3:54 PM

बहुत बढिया मार्मिक चित्रण !
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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May 24, 2011 at 11:14 AM

बहुत ही भावपूर्ण लेखन है आपकी इस रचना में .......एक एक शब्द सच्चाई है कई घरों की !!

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May 24, 2011 at 1:18 PM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!

बहुत मर्मस्पर्शी रचना...आज यह अनेक घरों का दर्द है...बहुत भावुक कर दिया..

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May 24, 2011 at 4:13 PM

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ! उम्दा प्रस्तुती!

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May 24, 2011 at 9:43 PM

बहुत ही भाव पूर्ण रचना ...पलायन से उपजी अंतहीन ब्यथा ..सूना आकाश सूना मन ...सूना आँगन....

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May 25, 2011 at 9:44 AM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
..आज यह अनेक घरों का दर्द है...बहुत भावुक कर सच्चाई को वयां करती हृदय विदीर्ण करने वाली पुकार!
May 23, 2011 3:06 PM
आज यह अनेक घरों का दर्द है...बहुत भावुक कर दिया..

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May 25, 2011 at 10:02 AM

खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
...
Pahad ke dard ko aaine mein utar kar dil mein ek gahree uthal-puthal macha gayee aapki yah kativa......ek sachai jiske ham kitne kareeb hokar bhi usse kitne beparwah ho jaate hain, kisi ka dard ek samvedansheel insaan ko kitna vyathit karta hai yah aapki es kavita mein saaf jhalakata hai.... utkrisht maarmik rachna ke liye aapka bahut bahut aabhar......

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May 25, 2011 at 4:45 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है...

बहुत भाव पूर्ण रचना ... एक मा के दिल के ज़ज्बात खोल कर रख दिए हैं ... आज न जाने कितनी माएँ ऐसे ही तड़पति हैं ... भोतिकता वाद छाता जा रहा है ...

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May 25, 2011 at 8:24 PM

एक बार आकर देख जा बेटे
घर को तेरा इन्तजार है
घर सारा बीमार है!

सरल शब्दों में सुंदर रचना!
एहसासों को मुश्किल शब्दों की मोहताजी नही....
खुश रहो !
आशीर्वाद !

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May 25, 2011 at 11:22 PM

दिल को गहरे तक छूने वाली रचना ...आभार !!

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May 26, 2011 at 3:55 AM

सरल शब्दों में पूरा दर्द गा देने वाली रचना.

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May 26, 2011 at 12:25 PM

छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.....

behtareen rachna hai...

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May 26, 2011 at 6:54 PM

बाप के तेरे खांस-खांस कर
हुआ बुरा हाल है
छूटी लाठी, पकड़ी खटिया
बिन इलाज़ बेहाल है
तेरे नाम के रटन लगी
जान जर्जर सूखी डार है
घर सारा बीमार है.

सच में बहुत सुंदर रचना है

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May 26, 2011 at 7:03 PM

भावुक कर गई आपकी कविता ....

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May 26, 2011 at 7:05 PM

आपने भरोसा दिलाया की नहीं , कि बेटा जरूर आएगा.

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May 26, 2011 at 9:22 PM

बहुत ही बेहतरीन भाव लिए हुए रचना है| धन्यवाद|

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May 26, 2011 at 9:34 PM

ग्रामीण जीवन की साकार प्रस्तुति - बधाई तथा धन्यवाद्

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May 26, 2011 at 11:32 PM

बिल्कुल सही लिखा आपने। बहुत तकलीफ देता है, अपनों का न होना। लेकिन और भी तकलीफ देता है अपनों का दूर होना।
फिल्म नाम में इसी दर्द को चिट्टी आई है के माध्यम से दर्शाया गया था।

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May 26, 2011 at 11:34 PM

मैं इस ब्लॉग को फालो कर रहा हूं। अगर आप चाहें तो मेरा ब्लॉग फालो कर सकते हैं।

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May 27, 2011 at 8:20 AM

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

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May 27, 2011 at 8:49 AM

Mere ganv ka bhi kuchh aisa hi haal hai...aah.....

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May 27, 2011 at 9:21 AM

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

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May 27, 2011 at 1:19 PM

अपनों से दूर होने का दुःख वही जानता है जो इसे भोगता है !
कविता की गहरी अभिव्यक्ति दिल को छूकर आँखों में उभर आती है आँसू बनकर !

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RAJ
May 27, 2011 at 2:45 PM

यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
..Mujhe apna gaon yaad aa gaya, main kho gaya gaon kee galiyaron mein, kuch aisi hi dasha hai bahut saare ghar-pariwar kee..... ek kadwi sachhi kee hradyavidarak abhivykti ke liye dhanyavaad....

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May 28, 2011 at 10:43 AM

ग्रामीण जीवन की र्मस्पर्शी साकार प्रस्तुति - बधाई तथा धन्यवाद्!

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May 28, 2011 at 4:35 PM

कविता जी बहुत ही सटीक रचना गाँव की स्थिति आज जो है बिलकुल सच उकेरा आप ने -काश लोग- हमारी सरकार इस स्थिति से उबारे-रोजगार के लिए बच्चों का पलायन बूढ़े माँ बाप का अकेले पड़ा रहना बहुत ही चिंतनीय है बच्चे उनकी लाठी -सहारा होते हैं और जब उनमे ताकत नहीं रही तो वे बेहाल -
बधाई हो आप को निम्न बहुत ही देखा जा रहा है आज कल

भाई तेरा रोज दुकान पर खटता
देर रात नशे में धुत लौटता
उस पर किसी का जोर न चलता
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

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May 29, 2011 at 11:59 AM

संवेदनशील रचना!

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May 29, 2011 at 1:46 PM

मर्मस्पर्शी रचना...

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May 30, 2011 at 6:17 AM

यही तो हमारे देश का भी हाल है ,घर सारा बीमार है ,असली झांकी एक और हिन्दुस्तान की दिखलाई दी .

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May 30, 2011 at 8:43 PM

भाई तेरा रोज दुकान पर खटता
देर रात नशे में धुत लौटता
उस पर किसी का जोर न चलता
नशे में भूला घर परिवार है
घर सारा बीमार है
...gaon hi shahar mein bhi aise haalat hai....

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May 31, 2011 at 12:11 AM

बहुत अच्छी कविता। सच्चाई को बयां करती हुई ....

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May 31, 2011 at 5:47 AM

kavita ji
bahut hi samvedana bhari hai aapki kavita me jo dil ko andar tak ek maa ke dil ke hal ko mahsus kara kar bahut hi jhakjhor gai .
sach maa ke ye bol kitna dard smete hue hai apne aap me ------
यह निशानी पुरखों के घर की
वह भी अपनी नियति पर रोती है!
झर-झर कर कंकाल बन बैठी
जाने कब तक साथ निभाती है?
खंडहर हो रही हैं जिंदगियां
कहने भर को बचा यह संसार है
घर सारा बीमार है!
bahut hi saral shabdo me samvedan -sheel prastuti
bahut bahut badhai
poonam

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May 31, 2011 at 2:13 PM

बहुत ही अच्छे पोस्ट है आपके !मेरे ब्लॉग पर जरुर आए ! आपका दिन शुब हो !
Download Free Music + Lyrics - BollyWood Blaast
Shayari Dil Se

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May 31, 2011 at 5:28 PM

गाँव -गरीब की शाश्वत वेदना को सहजता से अभिव्यक्त करती आपकी रचना .....
सच्चाई को स्वर देती , मन को उद्वेलित करती आपकी भावपूर्ण रचना....................वाकई मर्म को छू गयी

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May 31, 2011 at 11:58 PM

बेटो की जरुर कोई मजबुरी होगी... जो गांव मे मां बाप के पास नही जा पा रहे, हो सकता हे नालयक हो, राम जाने, आप की इस कहानी ने भावूक कर दिया, बहुत सुंदर लिखा आप ने धन्यवाद

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June 6, 2011 at 9:32 AM

सच्चाई को बयां करती हुई ..वाकई मर्म को छू गयी ...सच में बहुत सुंदर रचना है ...

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June 20, 2011 at 1:29 PM

सीधे दिल में उतर जाने वाली रचना

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July 28, 2011 at 12:58 AM

Very beautifully written......I have also added one Stanza......Do tell me how it is ?????

मंहगाई के जाल में उलझा जीवन सारा
कर्ज़दार ने जी भर करके सबको मारा
नैनों से भी नीर चुक गए अब आ आ के
इच्छा सभी की जीवन त्यागें हम कुछ खा के
अब भी तो घर आजा बावरे जो थोडा भी प्यार है...
घर सारा बीमार है.........

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July 28, 2011 at 11:33 AM

एक माँ की व्यथा को सुंदर कविता का रूप दिया है आपने . यथार्थ का अच्छा रेखांकन !

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July 30, 2011 at 4:30 PM

आपकी इस कविता ने अन्तह मान को छुआ है,
हमारे देश में ज्यादातर घरों की यही दशा होती जा रही है.
अच्छी कविता के लिए आभार एवं धन्यवाद.

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July 30, 2011 at 4:33 PM This comment has been removed by the author.
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September 30, 2011 at 5:06 PM

गाँव मुझे हरदम अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
muihe bhI.

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Anonymous
September 17, 2014 at 8:42 AM

I couldn't resist commenting. Perfectly written!

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