खुशमिजाज बुलबुल का मेरे घर आना

जेठ की तन झुलसा देने वाली दुपहरी में लू की थपेड़ों से बेखबर मेरे द्वार पर मनीप्लांट पर हक़ जमाकर उसके झुरमुट में अपना घरौंदा बनाकर बैठी है-खुशदिल बोली और खुशमिजाज स्वामिनी बुलबुल पिछले चार वर्ष से लगातार हमारे घर के द्वारे आकर कर्मणेवादिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का मर्म समझाती आ रही हैअपने बच्चों को प्राकृतिक खतरे आंधी-पानी के अलावा  बिल्लियों, छिपकलियों, चूहों, साँपों, कौओं और दूसरे शिकारी पक्षियों से बचाकर अपनी अगली पीढ़ी को जीवित रखने के लिए प्राणों की भी परवाह न करते ये पक्षी अभिभावक होने का पूर्ण  दायित्व निर्वहन तो करते हैं, लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई अपेक्षा नहीं रखते फलतः उपेक्षा जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं
जिस तरह गर्मियों में किसी प्रिय चिर प्रतीक्षित मेहमान के आने की ख़ुशी घर में सबको रहती है उसी तरह इन नवागत मेहमानों का भी हम सभी घर के सदस्य स्वागत करने से नहीं चूकते हैं बुलबुल के घोंसला बनाने से लेकर अंडे देने, उन्हें सेने और फिर बच्चों के अण्डों से बाहर निकलने की प्रक्रिया के बाद किस तरह बुलबुल चोंच में भोजन दबाकर लाकर उन्हें खिलाती  है, वह देखते ही बनता है। सारी गतिविधि देखकर ऐसा लगता है जैसे वे अपने घर के ही सदस्‍य  हैंमुझे भी सुकून मिलता है मैं पानी की घोर किल्लत के  बावजूद गमलों में पेड़-पौधे उगाकर प्रकृति से जुडी रहने के लिए प्रयासरत  रहती हूँ बुलबुल की व्ही ट्वीट व्हिरी-व्हिरी जैसी सुमधुर धुन और  बच्चों की चीं-चीं से मेरा प्रयास सार्थक हो उठता है। 
गर्मियों की तपन भरी दुपहरी में हम बड़ों को घर में दुबककर दरवाजे-खिड़की बंद करके पंखे, कूलर की हवा में भी चैन नहीं मिलता। ऐसे में घर में गर्मी से बेपरवाह छोटे बच्चों की घींगा मस्ती और बुलबुल का दूर से अपने बच्चों को भोजन लाकर बिना रुके, थके खिलाते जाना बहुत सोचने पर मजबूर करता  है लगता जैसे हमसे ज्यादा सहनशीलता इन बच्चों और इन परिदों में  हैं अण्डों से निकले बुलबुल के बच्चों को ५-6 दिन हो चुके हैं बस और ३-४ दिन बाद सभी अपना घोंसला छोड़ चुके होंगें और जब ये घोंसला छोड़ते हैं तो फिर उसमें दुबारा नहीं बैठते क्रम से जो बच्चा पहले बाहर की दुनिया में आता है, वह उसी क्रम से घोंसला छोड़ता है।  पिछली बार जब एक एक बच्चा घोंसले से बाहर निकल गया था तो मैंने बहुत कोशिश की उसे वापस घोंसले में रखने की लेकिन वह बाहर ही बैठा रहा और फिर दूसरे दिन सुबह उड़ गया। अपने हाथों से मैंने कई बार उन्हें नीचे से घोंसले में रखा, कुछ लोगों ने मना किया कि नहीं पकड़ना चाहिए लेकिन मुझे उनकी यह धारणा बिलकुल गलत लगी। उन्हें इससे कोई हानि नहीं पहुंची, वे बहुत स्वस्थ थे छोटे में बुलबुल के बच्चे बिलकुल गौरैया जैसे लगते हैं(आप भी देखिये तस्वीर)
सच कहूँ बुलबुल का घरोंदा मुझे अपना सा लगता है, इन्हें देख बार-बार सोचती हूँ काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते! आपने भी यदि कभी इन्हें गौर से देखा होगा तो निश्चित ही आपके मन में ऐसे ही न जाने कितने ही नेक ख़यालात होंगें, है न!  शेष फिर कभी....और अब मैं भी उड़ चली १५ दिन के लिए अपने गाँव आप मेरे मोबाइल से खिंची कुछ तस्वीरों में देखिये, ये प्रकृति हमको कितना कुछ सिखाती है!.
..... कविता रावत


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June 1, 2011 at 11:43 AM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"

कितनी गम्भीर शिक्षा दे दी!!

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June 1, 2011 at 12:13 PM

लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं

काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते

बहुत सुन्दर सुन्दर उद्गारों से शानदार प्रस्तुति की है आपने, वह भी सुन्दर चित्रों के साथ.

जब समय मिले मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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June 1, 2011 at 12:30 PM

पक्षियों की मानव से तुलना नये विषय को उकेरा है आपने , बधाई

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June 1, 2011 at 1:40 PM

मन को छू गयी आपकी रचना निसंदेह निस्वार्थ, एवं अपेक्षा रहित है ये प्राणी

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June 1, 2011 at 1:42 PM

प्यारा सा घरौंदा, बुलबुल का।

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June 1, 2011 at 1:44 PM

बुलबुल के माध्यम से मानव-जीवन को छूता आपका आलेख बहुत सुंदर बन पड़ा है.

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June 1, 2011 at 2:30 PM

अच्छा लगा पढ़ कर.
गांव का आनंद उठाएं

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June 1, 2011 at 2:55 PM

जेठ की तन झुलसा देने वाली दुपहरी में लू की थपेड़ों से बेखबर मेरे द्वार पर मनीप्लांट पर हक़ जमाकर उसके झुरमुट में अपना घरौंदा बनाकर बैठी है-खुशदिल बोली और खुशमिजाज स्वामिनी बुलबुल। पिछले चार वर्ष से लगातार हमारे घर के द्वारे आकर ‘कर्मणेवादिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का मर्म समझाती आ रही है
.........
कविता जी आपने परिंदों के माध्यम से जो गीता मंत्र की सीख की बात की है, वह बिलकुल सही है की हम इंसान कर्म की बात तो करते है लेकिन फल के पहले चिंता कर लेते है, बिना फल के कोई काम हम से होता ही नहीं, यही तो बिडम्बना है हम इंसानों की और आपने इसे बहुत ही खूबसूरती से पेश किया ..धन्यवाद..

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June 1, 2011 at 3:22 PM

बहुत सुन्दर और प्रेरक पोस्ट..

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June 1, 2011 at 3:39 PM

लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"
...
काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते!.....
ये प्रकृति हमको कितना कुछ सिखाती है!.
.....बहुत सुन्दर सुन्दर उद्गारों की शानदार प्रस्तुति ...सुन्दर चित्रों के साथ आलेख बहुत सुंदर बन पड़ा है...धन्यवाद..

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June 1, 2011 at 3:51 PM

बहुत अच्छा लगा यह प्रेरणादायक लेख पढ़कर... चित्र भी खूबसूरत लगे...




प्रेम रस

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June 1, 2011 at 4:56 PM

एकदम अनूठा प्रयास है आपका। ऐसी दुर्लभ तस्वीरें और जो आपने संस्मरण सुनाए वह काफ़ी अच्छा लगा।

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June 1, 2011 at 5:48 PM

पक्षियों और जानवरों से भी सीखने को मिलता है ।
प्रेरणात्मक पोस्ट ।

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June 1, 2011 at 7:56 PM

बहुत खूबसुरत लेख, मेरे घर मे भी तीन चार घोंसले हे, जो हर साल बनते हे, फ़िर बसते हे, फ़िर फ़ुर से उड जाते हे...

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June 1, 2011 at 8:08 PM

बहुत भावुक कर देने वाला वर्णन और कमाल के चित्र...
नीरज

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June 1, 2011 at 9:35 PM

बहुत सुन्दर बहुत भावुक आलेख....प्रकृति हमको बहुत कुछ सिखाती है.......धन्यवाद..

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June 1, 2011 at 9:38 PM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"

Sunder..... Bahut Bhavmayi post...

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June 1, 2011 at 11:36 PM

प्रकृति और सृष्टि के अन्य प्राणियों से बहुत कुछ सीख मिलती है...

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June 2, 2011 at 4:44 AM

आलेख और चित्र दोनों ही बढिया हैं। ये प्रकृति सचमुच हमें बहुत कुछ सिखाती है।

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June 2, 2011 at 9:45 AM

लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"... esi ke kaaran to ham insaan dukhi rahti hai... bahut hi badiya prerak aalekh...dhanyavaad

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June 2, 2011 at 9:48 AM

मन को छू गयी आपकी रचना निसंदेह निस्वार्थ, एवं अपेक्षा रहित है ये प्राणी ....आलेख और चित्र दोनों ही बढिया हैं। ये प्रकृति सचमुच हमें बहुत कुछ सिखाती ह.......धन्यवाद..

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June 2, 2011 at 11:00 AM

सुन्दर प्रस्तुति ...सुन्दर चित्रों के साथ ...धन्यवाद..

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June 2, 2011 at 12:51 PM

बहुत सुंदर। वैसे मैं आपको बताऊं मेरी बालकनी को इन दिनों कबूतरों ने डिलीवरी हाउस बना लिया है। अब तक पांच छह बच्चें यहां पैदा हो चुके हैं। सोचता हूं कि ये बच्चा जैसे ही उडा, इस घोसले को हटा दूंगा, पर अगले ही दिन दो नए अंडे दिखाई देते हैं। आपकी रचना के बाद तो अब बिल्कुल नहीं हटाऊंगा। हां पानी और खाने का इंतजाम भी देखता हूं।

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June 2, 2011 at 1:06 PM

बहुत सुन्दर और प्रेरक पोस्ट..

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June 2, 2011 at 1:27 PM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।" Laajawab prernadaayak ukti...

Kavita ji! aapki har post apne aap men anuthi hoti hai, jise baar-baar padhne ka man karta hai aur esi ke nateeja hai ki mujhe aapki post ka intzaar rahta hai..
.. .. aaki yah post bhi sirf ek aalekh matra nahi balki ek saarthak jiwan ka sandesh deti jeeti jaagti tasveer hai... aapka bahut bahut sukirya.

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June 2, 2011 at 1:44 PM

बहुत सुन्दर सुन्दर उद्गारों से शानदार प्रस्तुति| धन्यवाद|

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June 2, 2011 at 2:50 PM

बहुत सुन्दर बहुत भावुक आलेख....प्रकृति हमको बहुत कुछ सिखाती है....बहुत सुन्दर और प्रेरक पोस्ट....धन्यवाद..

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June 2, 2011 at 2:56 PM

सच कहूँ बुलबुल का घरोंदा मुझे अपना सा लगता है, इन्हें देख बार-बार सोचती हूँ काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते! ....bilkul sahi baat kahi aapne.प्रकृति हमको बहुत कुछ सिखाती है.... tab bhi ham seekhkar bhi bahut kuch nahi seekh paate... yahi to ham insaan ka bahut bada problem hai..........chitron se post padhne ka aanand aa gaya....aabhar

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June 2, 2011 at 2:59 PM

अपने बच्चों को प्राकृतिक खतरे आंधी-पानी के अलावा बिल्लियों, छिपकलियों, चूहों, साँपों, कौओं और दूसरे शिकारी पक्षियों से बचाकर अपनी अगली पीढ़ी को जीवित रखने के लिए प्राणों की भी परवाह न करते ये पक्षी अभिभावक होने का पूर्ण दायित्व निर्वहन तो करते हैं, लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।..
......बहुत सुन्दर सुन्दर उद्गारों से शानदार प्रस्तुति की है आपने, वह भी सुन्दर चित्रों के साथ.प्रेरक पोस्ट....धन्यवाद..

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June 2, 2011 at 3:20 PM

bahut sundr prastuti.hamare yahan to prakriti ka ye saundarya jab tab dikhai deta hi rahta hai abhi hamare yahan ek kabootri ne do bachche diye hain aur unki athkheliyan aanand dayak hain.

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June 2, 2011 at 9:15 PM

प्यारे पक्षियों की सुन्दर तस्वीरें और उतना ही सुन्दर शब्दचित्र...

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June 3, 2011 at 12:35 PM

बहुत सही कहा आपने, अगर इंसान भी पक्षियों के जैसे प्रेम सीख ले तो दुनिया ही बदल जाए !
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

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June 3, 2011 at 1:17 PM

Beautiful narration with a wonderful lesson-thanks.

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June 3, 2011 at 3:42 PM

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

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June 4, 2011 at 8:27 AM

बहुत उम्दा आलेख बुलबुल के माध्यम से

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June 4, 2011 at 9:33 AM

वाह वाह ! आनंद आ गया इन चित्रों को देख आपके स्नेहिल दिल को सलाम

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June 4, 2011 at 9:47 AM

http://shayaridays.blogspot.com

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June 4, 2011 at 5:11 PM

भावुकता से भरपूर ...लेख

जो दिल ने कहा ,लिखा वहाँ
पढिये, आप के लिये;मैंने यहाँ:-
http://ashokakela.blogspot.com/2011/05/blog-post_1808.html

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June 5, 2011 at 12:35 PM

बुलबुल का घरौंदा. पक्षियों से भी सीख मिलती है. सुंदर आलेख.

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June 5, 2011 at 3:04 PM

लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं..

बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट

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June 5, 2011 at 7:41 PM

wakai bahut hi prernadai rachanaa.hame in panchiyon se shikhnaa chahiye,ki wo kisi aasha,swaarth ke pre apne bachchon ko paalten hai.aur bade hone per unko jeevan jeene ke liye chod deten hai.aisi hi soch insaano ki bhi ho jaaye to jeevan main kuch dukh kam ho jaaye,itane achche lekh ke liye badhaai sweekaren.



please visit my blog thanks.

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June 5, 2011 at 8:39 PM

बढ़िया पोस्ट.Come back soon.

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June 5, 2011 at 9:44 PM

वाह, ये हुई न बात।
ऐसी प्रस्तुतियों से ही पठन की पिपासा शांत होती है।
बहुत बढ़िया।

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June 6, 2011 at 7:27 PM

"बुलबुल" नाम मैं ही विशेष आकर्षण है उसके माध्यम से प्रेरक और शिक्षाप्रद आलेख - बहुत सुंदर

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June 6, 2011 at 10:35 PM

कविता जी बड़ी प्यारी तसवीरें हैं आपके मित्रों की ....
बधाई आपको इन प्यारे प्यारे बच्चों की ......

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June 8, 2011 at 9:13 AM

बहुत ख़ूबसूरत और प्यारी तस्वीरें! बहुत ही भावुक, प्रेरक और संवेदनशील आलेख! उम्दा पोस्ट!

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June 8, 2011 at 5:51 PM

kavita ji... bahut sundar likha hai... Maa pita kis tarah apne bacchon kaa paalan karten hai... Bulbul bhi bahut pyaar se apne bacchon ko paalti hai.....mere ghar kee chhat khidki kee munder par aik kabutar kaa joda 3-4 pidi se reh raha raha hai... aur aik taraf bulbul ...maine bhi kai tarah se unkeee tasveer khinchi...aur aaapki post se unki bhi yaad aa gay.......

aaj aapka janm din hai......aapko meri taraf se JANMDIN PAR DHER SARI SHUBHKAAMNAYEN

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June 8, 2011 at 8:54 PM

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट है यहाँ पर कल ...........
नयी-पुरानी हलचल

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June 9, 2011 at 11:07 AM

बुलबुल तो अब बहुत कम ही दिखती है. यहाँ देख्गकर सुकून मिला...


********************
'यदुकुल' पर पढ़ें- सायकिल यात्री हीरालाल यादव के जुनून को सलाम !!

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June 9, 2011 at 12:31 PM

आदरणीय कविता जी
नमस्कार !
....बहुत सुन्दर बहुत भावुक आलेख

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June 9, 2011 at 1:02 PM

कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका

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June 9, 2011 at 8:15 PM

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

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June 10, 2011 at 6:58 AM

अपनी पंडुक के साथ अब यहां बुलबुल भी दिख गई. रोचक, आनंददायक.
''कुछ लोगों ने मना किया कि नहीं पकड़ना चाहिए लेकिन मुझे उनकी यह धारणा बिलकुल गलत लगी।''- यह स्थिति सभी पंछियों के साथ एक जैसी नहीं होती.

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June 10, 2011 at 5:15 PM

sarthak lekhan kavita ji

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June 13, 2011 at 7:33 PM

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

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June 14, 2011 at 1:06 PM

बहुत ख़ूबसूरत और प्यारी तस्वीरें! बहुत ही भावुक, प्रेरक,संवेदनशील और शिक्षाप्रद आलेख ..
लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं..
.पक्षियों की मानव से तुलना नये विषय को उकेरा है आपने!
बहुत बढ़िया। बधाई

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June 14, 2011 at 1:09 PM

अपनी अगली पीढ़ी को जीवित रखने के लिए प्राणों की भी परवाह न करते ये पक्षी अभिभावक होने का पूर्ण दायित्व निर्वहन तो करते हैं, लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।
प्रेरक और शिक्षाप्रद आलेख..बहुत सुंदर

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June 14, 2011 at 3:43 PM

Hamare ghar ke bagiche mein bhi bulbul ke jode kee chahalkadmi hamesha bani rahti hai lekin kabhi hamne unki activity ko dhyan se aur itni achhi tarah socha hi nahi! aapka aalekh padhkar panchiyon kee activities ke prati man mein utsah jaag gaya hai.... esi tarah pachniyon ke baaren mein aur bhi aalekh aapke blog ke madhyam se padhne ko mile, aise sadiccha hai....
Is anoothi aur bejod aalekh ke liye bahut-bahut dhanyavaad aur aabhar!!!

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June 15, 2011 at 5:22 PM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"

Itnee prerak post padhkar man mein bahut kuch halchal ho rahi hai............... aapko dhanyavad dete hue do line likh rahi hun....
ham insaanon ke yahi to sabse badi kamjori hai ki ham jo kuch bhi apni santaanon ke liye karte hai, badle men unse bahut jyada apeksha rakhte hain jo baad mein hamare dukh ka sabse bada kaaran ban jaata hai....bradha ashramon mein rote kalpte maa-baap ko dekhkar lagta hai hamse to achhe yahi jeev hain jo rog-shook se door khushmijaji ke jeewan bitate hain!!!!!!!!!

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Anonymous
June 17, 2011 at 11:30 AM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"

गम्भीर,प्रेरक और शिक्षाप्रद आलेख..बहुत सुंदर ....बधाई

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June 18, 2011 at 7:54 PM

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

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June 18, 2011 at 8:05 PM

उम्दा ..
अच्छी जानकारी
सटीक और सुन्दर चित्र

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June 19, 2011 at 9:45 AM

अजकल मै भी यही काम करती हूँ\ कल मैने देखा उसने जुगनू ला कर अपने घोंसले मे रखे। शायद बच्चों के देखने के लिये सोचती हूँ हम बच्चों से कितनी आपेक्षायें करने लगते हैं लेकिन इन पशु पक्षियों ने क्या लेना उनसे बस निस्वार्थ भाव से अपने कर्म करते हैं। शुभकामनायें।

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June 20, 2011 at 2:35 PM

"लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं।"

गम्भीर,प्रेरक और शिक्षाप्रद आलेख..बहुत सुंदर ....बधाई

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June 20, 2011 at 3:32 PM

बहुत ख़ूबसूरत और प्यारी तस्वीरें! बहुत ही भावुक, प्रेरक और संवेदनशील आलेख..शुभकामनायें।

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June 21, 2011 at 2:52 PM

मन को छू गयी आपकी रचना...बहुत सुंदर
..बधाई

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June 24, 2011 at 8:24 PM

हमें आपकी यह पोस्ट बहुत प्रेरणादायक लगी है और चित्र भी खूबसूरत है!

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June 25, 2011 at 10:35 AM

आपकी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

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June 26, 2011 at 2:54 PM

निसंदेह निस्वार्थ, एवं अपेक्षा रहित है ये प्राणी....
मन को छू गयी आपकी रचना

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June 26, 2011 at 11:36 PM

कविता जी आपका आलेख व चित्र बहुत खूबसूरत हैं । ऐसे अनुभव से मैं भी कई बार गुजरी हूँ और कहानी कविताओं का सृजन हुआ है । आजकल अमरूद के पेड में पंडुकी अपने अंडे सेने में व्यस्त है । और हम इस चिन्ता में कि उसे बिल्ली से कैसे बचाएं जो आजकल हमारे आँगन में ही डेरा जमा कर बैठी रहती है ।

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June 28, 2011 at 7:35 PM

लेकिन बदले में वे मनुष्यों से तरह अपने बच्चों से कोई ‘अपेक्षा’ नहीं रखते। फलतः ‘उपेक्षा’ जैसी भयावह स्थिति से भी दो-चार होने से बचे रहते हैं
काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते

बहुत सुन्दर सुन्दर उद्गारों से शानदार प्रस्तुति,वह भी सुन्दर चित्रों के साथ.
बहुत बढ़िया आलेख..शुभकामनायें।

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June 29, 2011 at 11:38 AM

बहुत ही सजीव वर्णन ................


अच्छा लगा आलेख...........

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July 2, 2011 at 7:19 AM

kavita ji bahut hi sundar lekh .subah subah padh kar aanand aa gaya.
aapne bahut hi yatharth prastut kiya hain in komal paxkhiyo ke dwara---

काश इनके जैसा आपसी ताल-मेल यदि हम सभी मनुष्य भी बिठा पाते, तो आज न जाने कितने ही घर बिखरते न दिखते.
vastav yadi aisa hota to aaj samaj me gharo ke bikharne ki noubat hi na aa paati .
kash! --------
bahut hi prerak post
bahut bahut badhai
poonam

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July 21, 2011 at 10:51 PM

आदरणीय कविता जी अभिवादन बहुत सुन्दर प्रेरणादायी और सुन्दर सन्देश देती बुलबुल की रचना -मनमोहक छवियाँ अच्छा लगा
धन्यवाद

शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ साहित्य प्रेमी मंच

ऐसे में घर में गर्मी से बेपरवाह छोटे बच्चों की घींगा मस्ती और बुलबुल का दूर से अपने बच्चों को भोजन लाकर बिना रुके, थके खिलाते जाना बहुत सोचने पर मजबूर करता है।

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October 13, 2011 at 2:09 PM

बहुत ही शानदार

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