गाँव में देवी पूजन : अष्टबलि

इस बार गर्मियों की छुट्टियों में बच्‍चे  गाँव जाने के लिए बेहद उतावले थे। क्योंकि घर में आपसी चर्चा में वे जान गए थे कि  इस बार गाँव में देवी पूजन (अष्टबलि) का आयोजन पक्‍का है। इसे देखने और इसके बारे में जानने की  जिज्ञासा उनमें कुछ ज्‍यादा ही थी।  भोपाल निवास के बाद भी हमारा किसी न किसी कारण से गाँव आना-जाना लगा ही रहता है, बावजूद इसके गाँव की सामूहिक देवी पूजन (अष्टबलि) को देखने-समझने का यह दुर्लभ संयोग मुझे २0-२2 वर्ष बाद अब जाकर मिल पाया। बचपन में मुझमें देवी-देवताओं के नाम पर होने वाले इस तरह के धार्मिक पूजा-पाठ जिसमें पशुबलि दी जाने की परम्परा सदियों से जस-तस चली आ रही है, को गहराई से समझने की समझ कतई नहीं थी। लेकिन आज जब मैं इस बारे में कुछ समझ रखती हूं तब मेरी उत्सुकता देवी पूजन से ज्यादा इस बात में थी कि देवी पूजन के बहाने आस-पास के गाँव के भूले-बिसरे और देश-विदेश से आए परिचितों,नाते-रिश्तेदारों से मेल-मुलाकात संभव हो सकेगी। प्राय: ऐसे धार्मिक अवसर वर्षों से गाँव से दूर निवासरत लगभग सभी लोगों को आपस में मिलाने का एक सबसे अच्छा माध्यम बनता है इस तरह के विशिष्ट देवी पूजन में आस-पास के गाँवों को भी आमंत्रित किया जाता है, जो गाजे-बाजों सहित इसमें शामिल होकर आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।
भोपाल से ट्रेन द्वारा दिल्ली और फिर दिल्ली से बस द्वारा गाँव तक की दुरूह यात्रा (इसलिए क्योंकि बस से गाँव की यात्रा करते समय गर्मियों में क्‍या कम पापड बेलने पड़ते हैं)। दिल्ली से रामनगर (नैनीताल) तक के सफ़र में कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन जब ३० सीटर बस ने जो अन्दर और बाहर यानी छत दोनों जगह ठूस-ठूस कर भरी थी, रवानगी भरी तो ४ बार खराब होने के बाद ३ घंटे बिलम्ब से लेकिन सही सलामत हमें गाँव पहुंचाकर ही दम लिया। सच मानिए उस वक्त मुझे अपार ख़ुशी हुई। सभी जानते हैं कि आजकल गाँव की खतरनाक उबड़-खाबड़ पहाड़ी सड़कों पर डीजल कम मिट्टी के तेल से बेख़ौफ़ धुक-धुक कर चलने वाली शहर में कंडम घोषित अधिकांश बसें और जीपें देवभूमि में ईश्वरीय कृपा और दयादृष्टि के बलबूते ही लोगों को सही सलामत अपने ठौर-ठिकाने पर पहुंचा पा रही हैं।  मेरे लिए इसके अतिरिक्त बस के सफ़र में प्रकृति के अनमोल धरोहर   पहाड़ों का अद्भुत सौन्दर्य और गाँव के लोगों का मधुर हास-परिहास इस भयावहता को भूलने के लिए कम नहीं था, जिसमें मैं बार-बार खो जाती।
रात को चूल्हे के पास बैठ कई दिन बाद पोदीने की चटनी के साथ देशी घी में चुपड़ी कोदो (मंडुआ) की गर्मागर्म रोटी का स्वाद लेने के बाद जब मैंने पहले जागर गीतों के साथ देवी के नियत स्थान के घर के अन्दर देवी-देवताओं का डमरू और कांसे की थाली  के साथ नृत्य और बाद में घर के बाहर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी-देवताओं का अद्भुत नृत्य देखा, तब सचमुच मन को कुछ पल ही सही लेकिन आलौकिक आनंद की अनुभूति हुई। सुबह जब सारे गाँव के लोग इकठ्ठा होकर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी  माँ की जय-जयकार कर नाचते-गाते गाँव से लगभग २ किलोमीटर दूर जंगल में बने  देवी मंदिर के लिए रवाना हुए तो संकरी ऊँची-नीची पहाड़ी पगडंडियों  को  हमने  छोटे बच्चों सहित कब नाप लिया, पता ही नहीं चला। इधर एकतरफ गाँव से दूर चीड़ के पेड़ों से घिरी मोहक प्रकृति की गोद में बने देवी मंदिर के चौक में बिना किसी उंच-नीच व भेदभाव के सभी जाति विशेष के देवी-देवताओं के ढोल-दमाऊं की ताल पर सामूहिक नृत्य का क्रम  तो दूसरी तरफ  देश-विदेश और दूर-दूर से आये नाते-रिश्तेदारों से  गाँव  के बड़े-बुजुर्गों का परस्पर खैर-ख़बरों के आदान-प्रदान का सिलसिला जारी था। इन सबसे हटकर मंदिर के ठीक पीछे की ओर जहाँ खाने-पीने के शौकीनों लोगों का गर्मागर्म जलेबी और चाउमिन का लुत्फ़ उठाने के लिए जमवाड़ा लगा था, वहीँ दूसरी ओर मनौतियों के पूर्ण होने के प्रतीक रूप अपनी बलि से सर्वथा बेखबर अपनी खूंटी के आस-पास की हरी-भरी घास खाने के लालच में आपस में एक दूसरे से  भिड़ते भेड़ों का नज़ारा भी बहुत कुछ देखने/समझने के लिए कम न था!  इसके अलावा दूसरे गाँव के लोगों को एक के बाद एक कतारबद्ध सुन्दर पहाड़ी घाटियों से गाजे बाजों सहित अपने सारे दुखड़ों की पोटली ताक़ पर रख नाच-गाकर मंदिर की ओर बढ़ते देख मन उमंग से भर उठता मुझे इस अवसर पर देवी-देवताओं के साथ-साथ सभी लोगों का आपस में बिना छुआछूत और भेदभाव का मेल-मिलाप सबसे सुखकर लगा। क्योंकि सभी जानते हैं बार-बार ऐसे धार्मिक आयोजनों के बाद भी ऐसी भावना को देखने के लिए अक्सर ऑंखें तरस कर रह जाती हैं! 
देवी-देवताओं के नृत्य के अंतिम पड़ाव में जब देवी को अर्पित की जाने वाली ८ बलि जिसमें भैंसा मुख्य और भेड़ आदि बाद में आते हैंकी बलि देने का समय नजदीक आया तो मैं देवी-देवताओं में अपार श्रृद्धा के बावजूद  चिरकाल से लोगों की अपनी मनौतियों और गाँव की खुशहाली और मंगलकामना के नाम पर बिना किसी सामाजिक बदलाव के इस मूक पशुबलि के नज़ारे को खुली आँखों से  देखने की हिम्मत नहीं जुटा पायी।  मंदिर से लौटते समय जब मैंने गाँव के लोगों की स्थिति पर विचार किया तो मुझे साफ़ दिखाई दिया कि गाँव में आज भी कुछ ही लोगों के स्थिति ठीक-ठाक है, अधिकांश की स्थिति को ठीक कहना किसी भी तरह से मैं उचित नहीं समझती इस विषय पर सोचने लगी काश गाँव के लोग इस बात को गहराई से समझकर बलि के इन पशुओं को यदि इन गरीब लोगों को उनकी आजीविका के लिए देवी-देवताओं के माध्यम से भेंट करते तो एक नयी स्वस्थ धार्मिक परंपरा की खुशहाल धारा बहने के साथ ही  हमारी देवभूमि का एक सन्देश दुनिया भर में फैलता। पर  मुझे पता था कि पशुबलि के स्थान पर इस तरह की नयी स्वस्थ परंपरा के लिए धार्मिक भावना से भरे लोगों को मेरा समझाना बहुत टेढ़ी खीर है, फिर भी जब मैंने मानवीय नेक भावना के चलते गाँव  आए हुए देश-विदेश और गाँव के बहुत से लोगों के इस विषय में विचार जानने चाहे तो मुझे बहुत मायूस नहीं होना पड़ा। इस क्रम में जब मुझे कई लोगों ने यह जानकारी दी कि हमारे अधिकांश गाँवों में लोगों ने आपस में मिल-बैठ गहन विचार-विमर्श कर राजी ख़ुशी से अब पशुओं के बलि पर प्रतिबन्ध लगा रखा है तो मुझे यह सुनकर बहुत आत्मसंतुष्टि मिली।
आधुनिक बदलते परिवेश में आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में इस तरह देवी-देवताओं के पूजन में पशुबलि की परम्परा बदस्तूर जारी है, इसका नया स्वरुप कैसा हो; इस बारे में आप भी जरूर कुछ कहना चाहेगें।  इस विषय पर आपके बहुमूल्य विचार/सुझावों का मुझे इन्तजार रहेगा।

...कविता रावत

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July 2, 2011 at 9:50 AM

परंपराये हजारो सालो मे विकसित होती है आधुनिकता के नाम पर उनका त्याग पशुओं पर अत्याचार आदि तर्क भी अपनी जगह सही हैं पर जिस देश मे लाखो बकरे प्रतिदिन भोजन के नाम पर कट रहे हो तो परंपरा के नाम पर भी कुछ काटे ही जा सकते है

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July 2, 2011 at 10:15 AM

बहुत दिन इंतज़ार करने के बाद आपके गाँव में हुई देवी पूजन की सचित्र प्रस्तुति पढ़कर बहुत अच्छा लगा... हम भी देवी माँ के भक्त हैं, हर दिन पूजा पाठ कर ही अपना काम करते है और मैं समझता हूँ जिन पर देवी माँ की कृपा होती है उन्हें दुनिया भर में कोई दिखावा करने के जरुरत नहीं है..... देवी माँ को बलि देने के प्रथा हमारे देश में अभी भी बहुत स्थानों में बे-रोक टोक चलती रहती है, विशेषकर जनजातीय पिछड़े इलाकों में यह बहुतायत रूप में विद्यमान है... इस बारे में मैंने भी बहुत सुना है और कभी कभी टीवी प्रोग्राम में देखा है कि किस तरह बहुत से गाँव के लोग अपनी पुरातन संस्कृति से हटकर देखने या समझने के लिए अपने आप को तैयार नहीं कर पाए हैं , लोगों की गरीबी के चलते जिसमें वे अपनी छोटी छोटी मुसीबतों से बाहर निकलने के लिए कोई उपाय न देख देवी माँ से वह मांग जिसमें यदि कोई बीमार है तो उसके ठीक होने के लिए, कभी २-३ साल बाद भी बहु की गोद नहीं भरी तो उसके पूर्ण होने पर बलि के लिए भेड़, भैंसा के बलि देते है... यह भले ही संस्कृति है लेकिन आज के समय में मेरे हिसाब से इसे बहुत अच्छा कृत्य नहीं कहा जा सकता... धार्मिक भावनाओं से हटकर गाँव में गरीबों को इन बलि के पशुओं को भेंट करने के पहल का जो आपने विकल्प दिया वह बेहतर है इससे लोगों के धार्मिक परम्परा का निर्वहन भी होगा और आपसी सहयोग की भावना से समाज का बेहतर विकास होगा..........
देवभूमि का नाम दुनिया भर में हो इसके लिए आपका यह प्रयास सराहनीय है....आपका बहुत बहुत आभार.

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July 2, 2011 at 11:08 AM

देवभूमि की यात्रा का आनन्द आपका यात्रा-संस्मरण पढ़ कर आ गया.

किन्तु पशुबलि की परम्परा के बारे में जानकर दुख हुआ. इस प्रकार की निर्मम परम्पराएं बंद होनी चाहिए.

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July 2, 2011 at 12:14 PM

yaatra vritaant achchha laga ...pashu bali par hi ek kavita likhi thi ...निरीहों को क्या मालूम
अय्यड़ को हाँका है शहर की ओर
निरीहों को क्या मालूम
चलना है सहर की ओर
भेँट चढ़ना है
धर्म का या स्वाद का जोर
poori kavita padhne ke liye link par ja sakti hain ...

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July 2, 2011 at 1:43 PM

बलि की प्रथा समाप्त हो।

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July 2, 2011 at 1:46 PM

paramparayen..kahin na kahin achchhi lagti hai, aur kuchh na kuchh unka kaaran khud ki khushi hota hai...achchha laga padh kar...fir inhi paramparaon ke karan ham apne gaaon se jud jate hain.........hai na!!

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July 2, 2011 at 2:38 PM

आपका लिख बहुत प्रभावशाली लगा । लेखनी पर आपकी पकड़ भी बहुत मज़बूत है ।
बेशक हमारे त्यौहार हमारे जीवन में रस घोलते हैं और पूरे परिवार और सम्बन्धियों से मिलने का अवसर देते हैं ।

लेकिन पशु बलि जैसी बेतुकी परंपरा से छुटकारा पाना बहुत ज़रूरी है । इसके लिए जन जाग्रति के साथ साथ सरकार को भी कोई प्रतिबन्ध रुपी कानून लागु करना चाहिए ।

खाने के लिए पशुओं का काटना अपनी जगह सही हो सकता है क्योंकि यह फ़ूड चेन का एक हिस्सा है ।

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July 2, 2011 at 2:50 PM

दृश्य अद्भुत और सुंदर, मनोरम है किन्तु देवभूमि ये जघन्य तब तक होता रहेगा जब तक शासन स्तर से बार बार इसे रोकने के प्रयास न किये जांय. ऐसा ही हमारे यहाँ बुन्खाल में काली का मेला नवम्बर दिसम्बर में लगता है और बलियाँ दी जाती हैं, शासन ने एडी चोटी का जोर लगा लिया, मुक़दमे तक दायर किये किन्तु श्रधा के आगे सब नत मस्तक . कमी थोड़ी बहुत बलि में जरुर हुई है लोगों का स्वविवेक जागना जरुरी है

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July 2, 2011 at 4:28 PM

ise main pratha nahi apitu kupratha hi kahunga or aisi kuprathaon ka virodh hona hi chahiye.
abhaar uprokt post hetu.........

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July 2, 2011 at 5:36 PM

देव भूमि की मनोरम झांकी - बलि प्रथा पर रोक लगनी चाहिए

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July 2, 2011 at 10:57 PM

आपका यात्रा संस्मरण बहुत रोचक लगा...हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त प्रथाएं लोगों को जोड़ने का काम करतीं हैं...ग्रामीण अंचल में अभी भी उन्हें पूरी शिद्दत से मनाया जाता है...बाहरी दुनिया का प्रभाव अभी वहां तक पहुँच भी नहीं पाया है...उनको ही निश्चय करना है कि उन्हें क्या करना है...धीरे-धीरे टीवी और अन्य माध्यमों से वहां भी जागरूकता बढ़ेगी...

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July 2, 2011 at 11:22 PM

एक प्रेरक संस्मरण।

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July 2, 2011 at 11:49 PM

अब 'कु-प्रथा' है तो समय तो लगेगा ही, जो जड़ें गहरी बैठी हुयी है उन्हें आप एक ही बार में कैसे उखाड़ सकते हैं. परन्तु समय बलवान है. बलि प्रथा बंद भी हो रही है. आप जानती ही हैं गंगोलीहाट (पिथोरागढ़ ), चन्द्रबदनी, सुरकंडा व कुंजापुरी (टिहरी गढ़वाल ), महासू (हनोल, देहरादून ) में भी तो यह बंद हो गयी. कांडा व बून्खाल (पौड़ी) में यह पूरी तरह बंद नहीं हुआ पर कम अवश्य हो गया है. यह आदिम संस्कृति है. वैसे इन मेले त्यौहारों में 'बलि प्रथा' का काला अद्ध्याय न होता तो ये त्यौहार व्यक्ति को, परिवार को, समाज को और गाँव को बिना किसी भेद भाव के जोड़ते थे. इन मेले त्यौहारों के बहाने लोग दूर-दूर से नियत तिथी को नियत स्थान पर इकट्ठे होते थे. मिलते थे, जुड़ते थे. परन्तु अब कहाँ? अब हम परिवार से, समाज से, गाँव से कटते हैं. दूर रहना चाहते हैं. ....... इसके बावजूद कुछ समाजों में आज भी जुड़ाव की परंपरा है. जैसे की बंगाली समाज में दुर्गा पूजा पर, असमिया समाज में रंगाली बिहू पर, मलयाली समाज में ओणम पर, पिथोरागढ़ के भोटिया समाज में कंडाळी त्यौहार पर, कुमाऊनी समाज में बिखोती और मकरैणी पर और और...... !!
आपका आलेख सार्थक व सुन्दर है. कविता जी, पढ़कर अच्छा लगा कि आप गाँव से अणसे, च्यूड़ा, बुखणो के साथ ये यादें भी गेड़ मार कर भोपाल ले गयी. आभार !

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July 3, 2011 at 1:36 AM

मूक जानवरों पर अत्याचार बलि के नाम पर हो या स्वाद नाम पर ..... बंद हो

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July 3, 2011 at 9:05 AM

बहुत अच्छा संस्मरण .. बलि प्रथा बंद होनी चाहिए .. आपका सुझाव प्रशंसनीय है

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July 3, 2011 at 9:20 AM

Devbhumi ke manoram jhankiyan dekh man ko bahut achha laga lekin jatigat bhedbhav aur chhuwachhut ke saath hi gaon mein kerosin se chal rahe vaahan logon ke jeewan se khilwad kar rahe yah dekhar behad afsos hua. Logon kee yah laparwahi jaagrukta ke bhari kami ko parlakshit karti hai... aur pashubali par SUBEER RAWAT ji ke kathan se itefaak rakti hun.....
Sundar jhankiyan kee jiwant aur logon ko jaagruk karne kee disha mein aapke is saarthak pryas ke liye meri shubhkamnayen!!

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July 3, 2011 at 10:00 AM

कोदो और मंडुआ, दो अलग अन्‍न हैं, संभव है उस क्षेत्र में समानार्थी हो.

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July 3, 2011 at 1:19 PM

मेरे हिसाब से गाँव में पंचायत स्तर पशुबलि रोकने के लिए शासन को इस दिशा में लोगों की धार्मिक भावना को समझते हुए जागरूकता अभियान चलने के लिए सार्थक पहल करना चाहिए.... सदियों पुरानी धार्मिक परम्परा सभ्यता के विकास के साथ धीरे-धीरे बदलाव की और अग्रसर होती है.....आपका यह संस्मरण जन जागरण के दिशा में बहुत सार्थक प्रयास है ... आशा है लोग आपके संस्मरण को सकारात्मक रूप में लेकर पशुबलि रोकने के लिए अपने अपने स्तर पर प्रयास करेंगे ....आभार

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July 3, 2011 at 1:29 PM

बढ़िया पहाड़ी झांकियां से भरा संस्मरण...
धार्मिक परंपरा के नाम पर पशु बलि परम्परा को रोकने के लिए सभी लोगों को अपने-अपने स्तर से और सामूहिक प्रयास से आगे बढ़कर काम करना होगा.. पशुबलि देश के किसी भी हिस्से में हो, यह कदापि उचित नहीं!

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July 3, 2011 at 1:32 PM

एक प्रेरक संस्मरण।
बलि प्रथा बंद होनी चाहिए इस दिशा में आपका सुझाव प्रशंसनीय है..

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July 3, 2011 at 5:32 PM

बलि प्रथा तो बंद होनी ही चाहिए .

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July 3, 2011 at 7:02 PM

पशु बलि के विरुद्ध आपके कोमल भाव वास्तव में सराहनीय है.
काश! ऐसे आयोजनों में अहिंसा और पवित्रता के ही दर्शन हों.
किसी भी मूक पशु की बलि दिल को बेचैन करती है.
आपकी पहल जरूर कामयाब होगी.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.नई पोस्ट जारी की है.

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July 3, 2011 at 8:15 PM

मेरे गाँव में भी लगभग १५-२० वर्षों पूर्व तक 'एक बेटा-नौ घेंटा' यानी एक पुत्र के जन्म से विवाह तक नौ पशुओं की बलि देने की पुरानी प्रथा चली आ रही थी जिसमे भैंसा तो नहीं किन्तु बकरा,भेंड,सूअर,मुर्गा आदि की बलि दी जाती थी किन्तु गाँव के लोगों ने मिल बैठकर ...कुलगुरु से सलाह लेकर इसे बंद करा दिया | साथ ही साथ यह भी व्यवस्था हुई कि इसके स्थान पर पक्की हवन(पांचो मेवा ) दक्षिणी जायफल के साथ करके कुल/ग्राम देवी को प्रसन्न किया जाए | तभी से बलि चढाने की परम्परा समाप्त हो गयी |

द्रष्टव्य है कि गाँव के बड़े बुजुर्गों के साथ कुलगुरु ,पुजारी और पुरोहित ने भी इसे अनुचित माना और बंद करवाया |

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July 4, 2011 at 12:06 PM

DEVBHUMI kahlayee jaane waali bhumi ke prakratik saundarya ko apni ankhon se dekhna apne aap mein swargik aanand ki anubhuti karne jaisa hai lekin yahan ke dharmik DEVI-DEVTA ke poojan mein pashubali bhale hi yahan ke log ek dharmik prampara samjhkar us par apni shrdha kee mohar lagakar itshri samjhte hain lekin jahan tak maine bhi aise aayojanon mein bahut pahle sirkat kee thi usse mujhe bhi ismein pooja-paath ke bahan logon ke swyam ke khaane-peene ka ek madhyam jarur laga,.... log bali ke bakron aur bhedon par kiskadar ladte jhagte hai is par shayad bahut kam kahne kee himmat dikhte hain... isske pare soch-vichar kar yadi aapke sujhav/vichar par gahanta se vichar to ho sach mein garhwal mein gareebon ko kuch to raahat jarur milegi....

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July 4, 2011 at 1:13 PM

आपने संस्मरण इतना सजीव लिखा है की लगता रहा की हम भी साथ ही यात्रा कर रहे हैं ... बहुत सी पुराणी मान्यताएं आज भी भारत के हर कोने में बसी हुयी हैं ... कुछ अच्छी कुछ गलत .. पर शायद समय के साथ इनमें बदलाव आता रहेगा क्योंकि सब कुछ परिवर्तन शील है ... और सहज आया परिवर्तन ही लंबे समय तक रह पाता है ...

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July 4, 2011 at 6:09 PM

एक सच्चे लेखक का यही गुण है कि वह अपने आस-पास समाज में व्याप्त बुराईओं, कुरीतियों को अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से समाज परिवर्तन के दिशा में आम लोगों को जागरूक करे और आपके इस संस्मरण में भी जगह-जगह यही बात परिलक्षित हो रही है जो हम जैसे अछूत समझे जाने लोगों की आवाज बनकर सामने आयी हैं| हमारे गढ़वाल में जातिवाद के कारण जो हम जैसे हरिज़नो के साथ छुवाछुत अभी तक जारी है, उससे हम और हम जैसे सभी परिवारों को बहुत मानसिक आघात पहुँचता है| देवी पूजन में सभी देवी-देवताओं को सब एक साथ नाचते हुए देखते हैं लेकिन कोई उसके बाद क्या होता है, इस बात पर एकपल भी ध्यान नहीं देता लेकिन आपके इस कथन से कि "मुझे इस अवसर पर देवी-देवताओं के साथ-साथ सभी लोगों का आपस में बिना छुआछूत और भेदभाव का मेल-मिलाप सबसे सुखकर लगा। क्योंकि सभी जानते हैं बार-बार ऐसे धार्मिक आयोजनों के बाद भी ऐसी भावना को देखने के लिए अक्सर ऑंखें तरस कर रह जाती हैं!"
मुझ जैसे छुवाछुत के शिकार होते लोगों के लिए एक बुलंद आवाज है| आशा करता हूँ आप हमारी आवाज को समय समय पर अपनी लेखनी के द्वारा उठाकर लोगों के दिलों से बेवजह के इस छुवाछुत को दूर करने के लिए हम पर उपकार करेंगी ........सादर

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July 4, 2011 at 11:36 PM

यह प्रथा सर्वोपरि अनुचित सा लगता है ! जिस जीव को इश्वर ने ही बनायी है उसे इश्वर मृत्यु देना कैसे स्वीकार करेगा ? सुन्दर प्रस्तुति

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July 5, 2011 at 6:05 AM

आप का सुझाव बहुत सटीक लगा। विचार उठाइये, क्या पता कब लोगों की समझ में आ जाये।

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July 5, 2011 at 9:15 AM

बलि के पक्ष मे तो नही हूँ लेकिन धार्मिक उत्सव आपस मे प्रेम भाईचारे का सन्देश तो देते ही हैं बेशक आज लोग इनकी मूल भावना से दूर हैं फिर भी इनका अपना ही महत्व है। खुशी उल्लास तो देते ही हैं। ाच्छा लगा यात्रा विवरण। शुभकामनायें।

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July 5, 2011 at 10:15 AM

धार्मिक उत्सव आपस मे प्रेम भाईचारे का सन्देश तो देते ही हैं लेकिन जिस जीव को इश्वर ने ही बनाय, उसकी बलि के पक्ष मे नही हूँ..
बलि प्रथा तो बंद होनी ही चाहिए ... इस दिशा में आपकी पहल प्रशंसनीय है..

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July 5, 2011 at 10:32 AM

गाँव जाते समय बसों और जीपों का जो हाल-बेहाल है और जिस तरह ये बेख़ौफ़ मिटटी के तेल से अटक अटक चल रही हैं उसको देखकर गाँव जाने में डर लगता है लेकिन यह सोचकर ही अपने भाई -बंधू तो रोज ही इन बसों और जीपों से चलते है, कभी कभार कोई दुर्घटना होती रहती है जिस पर किसका जोर...और जो लिखा है वह तो होकर ही रहेगा ......... कुछ ऐसे ही विचार से डर ख़त्म .... लोग बाग आजकल गाँव में पैदल जाना तो भूल ही गए हैं तो ठूस ठूस पर चाहे खटारा बस हो जीप चलेगी ही...... आपने लोगों को जागरूक करने के लिए सबका ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहा है, यह एकदम सही कदम है .... हम ही जरुर लोगों को समझाने का प्रयास करेंगे ...और गाँव में पशु बलि को रोकने के लिए भी आपके विचार/सुझाव से लोगों को समझने का प्रयास करते रहेंगे .....देखो कितने लोग मानते है... एक न एक दिन तो जब सभी समझने लायक हो जायेंगे तो जरुर सदियों पुराणी इस परम्परा पर विराम जरुर लग सकेगा ..मेरा भी ऐसा ही मानना है....... गाँव की तस्वीर देखकर तो फिर से गाँव जाने का मन होने लगा...आपको धन्यवाद जी!

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July 5, 2011 at 6:17 PM

बहुत ही रोचक विवरण दिया है आपने, बलि प्रथा उचित नहीं है,


विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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July 6, 2011 at 2:15 PM

पशु बलि के विरुद्ध आपके कोमल भाव वास्तव में सराहनीय है.
काश! ऐसे आयोजनों में अहिंसा और पवित्रता के ही दर्शन हों.
किसी भी मूक पशु की बलि दिल को बेचैन करती है.
आपकी पहल जरूर कामयाब होगी.
बलि प्रथा तो बंद होनी ही चाहिए .

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July 7, 2011 at 3:25 PM

बहुत अच्छा संस्मरण ....
बलि प्रथा बंद होनी चाहिए
आपका सुझाव प्रशंसनीय है!

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July 7, 2011 at 3:47 PM

जी बहुत सुंदर संस्मरण लिखा है आपने। लग रहा है मैं भी गांव के इस मंदिर के दर्शन के साथ ही स्थानीय परंपराओं में घुल मिल गया हूं।
हां बलि प्रथा को खत्म होनी ही चाहिए। मैं मिर्जापुर का रहने वाला हूं. हमारे यहां से विंध्याचल देवी का मंदिर काफी करीब है। वहां भी पहले काफी बलि चढाई जाती थी लेकिन अब बहुत कम हो गया है।
आपका बहुत बहुत आभार

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July 7, 2011 at 6:00 PM

जब गाँव में थे तो ऐसे धार्मिक अवसरों पर बहुत हुडदंग चलती रहती थी,,,,,,,,,,,, जतोड़ा (अष्टबलि) में तो भैंसा को सारे गाँव में दौड़ा-दौड़ा कर बुरा हाल कर देते थे और फिर जब उसकी बलि दी जाती थी तो हाथ जोड़कर खूब ख़ुशी मनाते थे ,,,,,,,,,,,,,,,,अब शहर में बीवी-बच्चों के साथ सब भूल भाल गए है कभी जब भी गाँव जाना होता है अब ये सब बलि देने का सिस्टम अच्छा नहीं लगता है,,,,,,. बड़े बुजुर्गों के सामने कुछ नहीं कह पाते हैं वे बहुत बुरा मानते हैं,,,,, खूब डराते हैं ,,,,,,,ये हो जाएगा ,,,,,,,,,,ओ हो जाएगा अगर ऐसा नहीं करोगे तो ,,,,,,,,,, बस सोचकर डर लग जात है,,,,,,,,,,,,, लेकिन आपकी हिम्मत की दाद देने पड़ेगी की आपने सही तरीका बताया है की इनको गरीबों को भेंट कर देना चाहिए ,,,,,,,,ब्लॉग पर अपनी गढ़वाली लोगों ने भी कई जगह इस प्रथा के बंद होने का उलेख किया है.. अब जब मैं भी गाँव जाऊँगा तो जरुर आपकी बात लोगों को कहूँगा ,,,,,थोड़ी हिम्मत आ गयी है,.,,,, बहुत अच्छा लिखती है आप .,,,,,,धन्यवाद जी

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July 7, 2011 at 6:51 PM

देवभूमि की यात्रा का आनन्द आपका यात्रा-संस्मरण पढ़ कर आ गया.
किन्तु पशुबलि की परम्परा के बारे में जानकर दुख हुआ. इस प्रकार की निर्मम परम्पराएं बंद होनी चाहिए.

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RAJ
July 7, 2011 at 7:09 PM

बलिप्रथा बन्द होनी चाहिए!

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July 8, 2011 at 11:24 AM

आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्छा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

बहुत ही रोचक विवरण दिया है आपने, बलि प्रथा उचित नहीं है,

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July 8, 2011 at 3:31 PM

पहले भी यह पोस्ट पढ़ कर गया था. कारणवश उस दिन टिप्पणी नहीं दे पाया. जन संस्कृति और मान्यताओं के बीच कहीं बली प्रथा जैसी चीज़ चल रही है. शिक्षा के साथ इसका प्रचलन घटेगा ऐसी उम्मीद है. आपका विवरण शब्द-चित्र उकेरता चलता है. आलेख सुंदर बन पड़ा है.

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July 8, 2011 at 4:06 PM

पशु बलि को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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July 8, 2011 at 4:20 PM

sachitra vernan bahut accha laga.........
bus kuch akher sa gaya (pashu bali pratha)

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July 8, 2011 at 5:27 PM

देव भूमि की मनोरम झांकी ..पशु बलि को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता.
बलि प्रथा पर रोक लगनी चाहिए

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July 8, 2011 at 5:55 PM

कविता जी हार्दिक अभिवादन बहुत ख़ुशी हुयी आप के साथ- हम भी आप की आँखों से भोपाल से आप के गाँव तक अष्ट बलि के मेले में शामिल हो बहुत कुछ जान पाए अच्छा लगा -बस की यात्रा और बस की खस्ता हालत आदि अच्छे मुद्दे शामिल सरकार को क्या पड़ी है इन सब से जोखिम उठा लोग पहाड़ियों में यात्रा को विवश हैं -केवल बलि के नाम से ही मन नहीं मानता -
जैसा की आप ने लिखा अब लोग सोचने लगे हैं इस मुद्दे पर बलि को बचाने के लिए बहुत ही अच्छा है सुन्दर विचार और सुन्दर कोशिश आप की -
शुक्ल भ्रमर ५

जब मुझे कई लोगों ने यह जानकारी दी कि हमारे अधिकांश गाँवों में लोगों ने आपस में मिल-बैठ गहन विचार-विमर्श कर राजी ख़ुशी से अब पशुओं के बलि पर प्रतिबन्ध लगा रखा है तो मुझे यह सुनकर बहुत आत्मसंतुष्टि मिली।

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July 8, 2011 at 8:34 PM

आदरणीय कविता रावतजी,
आपका संस्मरण बहुत रोचक लगा और चित्र भी बहगुत मनमोहक लगे..

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July 9, 2011 at 11:12 AM

Ripotarz badhiya ban pada hai lekin jahan tk maine dekha hai bali pratha men logon ki itni gahri aastha hai ki issko maanane ke liye katibddh hain . anytha devi-prakop se bhaybhit rahte hain.

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July 9, 2011 at 5:48 PM

आदरणीय कविता रावत जी,
नमस्कार !
गाँव की तस्वीर देखकर तो फिर से गाँव जाने का मन होने लगा.....यात्रा संस्मरण बहुत रोचक लगा

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July 9, 2011 at 5:49 PM

 अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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July 9, 2011 at 8:19 PM

महोदय/ महोदया जी,
अब आपके लिये एक मोका है आप भेजिए अपनी कोई भी रचना जो जन्मदिन या दोस्ती पर लिखी गई हो! रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है! आपकी रचना मुझे 20 जुलाई तक मिल जानी चाहिए! इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी! आप अपनी रचना हमें "यूनिकोड" फांट में ही भेंजें! आप एक से अधिक रचना भी भेजें सकते हो! रचना के साथ आप चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक(ब्लॉग लिंक), ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिख सकते है! प्रथम स्थान पर आने वाले रचनाकर को एक प्रमाण पत्र दिया जायेगा! रचना का चयन "स्मस हिन्दी ब्लॉग" द्वारा किया जायेगा! जो सभी को मान्य होगा! मेरे इस पते पर अपनी रचना भेजें sonuagra0009@gmail.com या आप मेरे ब्लॉग “स्मस हिन्दी” मे टिप्पणि के रूप में भी अपनी रचना भेज सकते हो.
हमारी यह पेशकश आपको पसंद आई?
नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
http://smshindi-smshindi.blogspot.com/2011/07/12.html
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है !

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July 9, 2011 at 8:31 PM

लेख कुछ लंबा नहीं लगा ..रंगीन पंक्तियों के साथ रोचक संस्मरण बहुत सुन्दर लगा... सही कहा - पहाड़ी रास्तो में आज भी सफर करना भगवान भरोसे है.. हां अष्टबलि यहाँ पौड़ी गडवाल में भी है... लेकिन लोगों ने मिल जुल कर पशुबलि की जगह नारियल चढाना शुरू किया है... फिर भी कुछ लोग पशुबलि पर अड् जाते हैं ..पशुबलि बिलकुल निषेध होनी चाहिए |

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July 11, 2011 at 3:06 PM

देवभूमि की यात्रा का आनन्द आपका यात्रा-संस्मरण पढ़ कर आ गया.
पशु बलि जैसी बेतुकी परंपरा से छुटकारा पाना बहुत ज़रूरी है । इसके लिए जन जाग्रति के साथ साथ सरकार को भी कोई प्रतिबन्ध रुपी कानून लागु करना चाहिए ।

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July 11, 2011 at 5:52 PM

देव भूमि की मनोरम झांकी ...रोचक यात्रा संस्मरण...
बलि प्रथा पर रोक लगनी चाहिए

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July 11, 2011 at 9:52 PM

पशुबलि की परम्परा के बारे में जानकर दुख हुआ. इस प्रकार की निर्मम परम्पराएं बंद होनी चाहिए.लेख रोचक बहुत सुन्दर लगा.

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July 12, 2011 at 1:01 PM

.

I'm a firm believer in God but strictly against such "karmkaands" . Lack of education , proper guidance and ignorance among people leads to such blind faith.

Education is the key to get rid of such meaningless rituals.

.

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July 12, 2011 at 6:24 PM

मूक जानवरों पर अत्याचार बलि के नाम पर हो या स्वाद नाम पर रोक लगनी ही चाहिए

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July 12, 2011 at 7:29 PM

बहुत ही रोचक विवरण दिया है आपने, बलि प्रथा उचित नहीं है.
यह प्रथा बन्द होनी चाहिए!

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July 13, 2011 at 4:37 PM

Gaon ke yaatra ka varnan bahut achha laga aur chitra bhi khoobsurat hain, kintu gaon mein pashbali pratha ka chalan kuch achha nahi laga. apka sujhav badiya hai logon ko iske liye prerit karte rahane se yah pratha band ho sakti hai...
bahut din se aap facebook par nazar nahi aa rahin hain..samay mile to facebook par aate jaate rahna!!!

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July 13, 2011 at 10:53 PM

देव भूमि की मनोरम झांकी..बधाई..बलि प्रथा उचित नहीं है.इसमें रोक लगनी चाहिए....

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July 14, 2011 at 6:06 PM

देव भूमि की मनोरम झांकी ...
पशुबलि की परम्परा के बारे में जानकर दुख हुआ. इस प्रकार की निर्मम परम्पराएं बंद होनी चाहिए...

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July 14, 2011 at 6:55 PM

yatra snsmrn ki sshkt prstuti .
htya to htya hoti hai chahe ise bli nam ka mukhauta kyo n phna diya jaye . chahe snskar ke nam pr chahe mansahariyo ki mang ke nam pr .

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July 16, 2011 at 1:45 PM

बहुत बढ़िया और शानदार संस्मरण! बलिप्रथा बंद होना बहुत ही आवश्यक है! बेहतरीन प्रस्तुती!

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July 16, 2011 at 4:20 PM

संस्मरण तो बहुत बढ़िया है पर पशु बलि बंद होनी चाहिए....

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July 16, 2011 at 6:21 PM

परंपरा के नाम पर बेजुबान पशुओं की हत्‍या बंद होनी चाहिए।
पहली बार आपने ब्‍लाग पर आना हुआ।
अच्‍छा लगा।
शुभकामनाएं...........

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July 17, 2011 at 11:50 AM

बहुत बढ़िया और शानदार संस्मरण!
पशु बलि जैसी बेतुकी परंपरा से छुटकारा पाना बहुत ज़रूरी है । इसके लिए जन जाग्रति के साथ साथ सरकार को भी कोई प्रतिबन्ध रुपी कानून लागु करना चाहिए ।

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July 17, 2011 at 7:35 PM

आराधना के लिए अपने इष्ट के लिए दूसरें जीवों का अनिष्ट कर हम अपने लिए किस फल की आशा कर रहे हैं ...मेरी समझ के परे हैं ! यह रूढिया और सोंच समाप्त होनी चाहिए !
हार्दिक शुभकामनायें ..

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July 18, 2011 at 10:17 AM

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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July 18, 2011 at 11:06 AM

कल 19/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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July 19, 2011 at 11:27 AM

कविता जी आपका लिखा पोस्ट देबी पूजन और अन्य लेखो को पड़ने में आनंद आया और ज्ञानबर्धक भी लगी.आपने मुझे मेरी घर (अल्मोरा ) की यद् दिला दी .

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July 20, 2011 at 5:43 PM

kavita ji
aapka yah lekh mujhe bahut bahut hi pasand aaya.
halanki main kabhi gaon gai nahi hun bachpan me gain to yaad nahi hai .
par mujhe gaon gaon se jude lig bahut hi achhe lagte hain .
mehanti aur seedhe sade.shari logo ki tarah unme makkari pan nahi dikhta.
han! aapne vishhay bahut hi badhiya uthaya hai .yah baat main bhi aksar sochti hun ki kya hamare devi -devta ki bali mangte hain /
aisa to ab tak kahin nahi padha
par ye rudhivadita ye purani sadiyon se chali aa rahi pratha itni aasani se nahi khatm hone wali.
hamare hi purani manytaon ko manane wale log hi is baat ka virodh karenge jabki nirih pashuon ki bali dene ka koi malab hi nahi .ye kupratha waqai me khtm honi chaihiye .main is baatkesakht kilaf hun par kahte hain ki akela chana bhad nahi fod sakta bas baat yahi atak jaati hai .
bahut hi badhiya prastuti
bahut bahut badhai
ponam

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July 20, 2011 at 10:53 PM

बहुत लोग बहुत कुछ कह गये कविता जी मेरा भी जवाब सम्मिलित हैं उन्ही में पशुबलि का तो हर हाल में विरोध होना ही चाहिये।

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July 21, 2011 at 12:07 PM

Hamne apne devi-devtaon ko bali dena aapsi vichar-vimarsh ke baad band kari diya hai, kyonki ham samjh gaye ki yah sab ham apne liye hi karte hain.... naahak hi devi-devtaon ke naam se swaym hi unka bhakshan karte hain................ lekin gaon mein RAJPOOT aur PANDA-PURARIYON ko yah baat samjhna aaj bhi bahut hi mushkil hain, kyonki aapko pata hi hai ki inko bina BALI Ke BAKRE ya KHADU (BHED) mein apni hissidari ke chalti lazeez swad jo chakhne kee bimari hai.... aapne mudda thaya bahut achha laga.. ek n din we bhi samjh hi jaayegen..dheere dheere kayee jagahon par yah pratha bandh hone lagi hai, yah jaankar khushi hoti hain.... Gaon kee es pratha ko naye roop mein dekhne kee pahal karne ke liye aapka bahut dhanyavaad.. ................

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July 21, 2011 at 5:22 PM

kavita ji jab ye sab dekhti hu log itne paashan hrudaya kse ho sakte hai...jab tak akela hota hai wo insaan rehta hai aur kuch logo ke sath hote hi wo bheed kyu ho jate hai?aur jese hi bheed hote hai aatmiyta,insaaniyat kaha chali jati hai?pashubali ke naam par ek nirih prani ki jaan lena kse kar lete hai log dharm ke naam par ye adharm....

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July 21, 2011 at 5:36 PM

बलि प्रथा पर रोक लगनी चाहिए

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July 21, 2011 at 6:09 PM

हुत अच्छा संस्मरण .......
परंपरा के नाम पर बेजुबान पशुबलि का तो हर हाल में विरोध होना ही चाहिये...

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July 21, 2011 at 9:31 PM

बहुत ही रोचक संस्मरण है....
बलि प्रथा बन्द होनी चाहिए!

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July 22, 2011 at 6:41 PM

Kavita ji Namskaar,

Mera Naam Vinod hai mein bhi uttarakhand ka hoon. Aaj Face Book ke madhayam se aapse parichay hua aapka blog pada (read)aapne apne ish blog mein hindi mein bahot si rachnayen, kavitayen or uttarakhand ki yatara ka virtaant likha hai, Aapki in rachnaon or Kavitayon mein aapke Bhasa Kaushal ka parichay mil raha hai ki aap hindi se kitni gahrahiyon se judi hai. Kavita ji mein bhi Hindi English Anuvad ka course kar raha hoon. Kavita ji mein bhi Ramnagar side ka hi hoon mere gaon ka naam Dungari hai mera gaon Dhumakot se thoda pahle hai. Aapke gaon ka kaya naam hai.
Aapne apne blog mein bahot saari rachnayen or kavitayen or anya lekh likhe hain sabko padunga or umid karta hoon aap nirantar ishi tarah likhti rahen or aapne sansmaran/virtant ish blog ke madhayam se hum logon or pure uttarakhand tak pahunchati rahen.

Dhyanbad

Vinod

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July 23, 2011 at 8:03 PM

hum sabhi devi maa ke bhakt hai aur is yatra varnan hame kai baate janne ko mili jiske liye main aabhari hoon aapki .jai mata ki .

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July 24, 2011 at 9:44 PM

रोचक और सुंदर संस्मरण...आभार.
सादर,
डोरोथी.

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July 25, 2011 at 6:34 AM

पशु बलि जैसी बेतुकी परंपरा से छुटकारा पाना बहुत ज़रूरी है|रोचक और सुंदर संस्मरण|

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July 25, 2011 at 1:34 PM

स्वस्थ परम्परा की और एक सार्थक कदम होगा ऐसा होना .आर्थिक मजबूती के लिए भी ज़रूरी .पशुओं का क्या इस देश के कई हिस्सों में ओझा फकीरों के जाल ए फंसे लोग बाल बलि ,नर बलि ,किसी अबला को डा -इन घोषित करवाने से भी नहीं चूक रहे .बहुत सार्थक पोस्ट .

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Anonymous
July 25, 2011 at 4:56 PM

बहुत ही रोचक विवरण दिया है आपने, बलि प्रथा उचित नहीं है!

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July 26, 2011 at 6:03 AM

rochak vivran .

dharm ke naam par PASHU BALI ye kookarm hee hai meree nazaro me.......

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July 28, 2011 at 10:45 AM

kavita ji ye lekh padh ke gaon ki yaad taza ho gai , aapne boht dur ka safar (bhopal se delhi fir delhi se uttrakhand) tak ka safar tah kiya , hum to jab delhi se uttrakhand tak jate h to boht thak jate h par sach kahu apni devbhumi mei kadam rakhte hi sari thakaan mano gayab ho jati hai ....

rahi baat pashu bali ki mai bhi iske sakt khilaf hu maine apne ghar se hi suru kia h or khushi h ki mere mayke mei sab log iske khilaaf h , ab hum koi bhi mannat magte h to isht dev pe bali ki jagah nariyal chdhate h, sab gaon walo ko samjhana boht mushkil h par suruwat to karni hi padegi

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July 28, 2011 at 11:11 AM

धार्मिक आस्था, पूजा पाठ , जागरण , कथा व्रत , यहाँ तक तो सब ठीक है किन्तु पशुबलि को मैं भी सर्वथा अनुचित मानता हूँ. अपने आप को बुद्धिमान कहने समझने वाले मनुष्यों के इस ( कु ) कृत्य या पाप कर्म से देवी देवता प्रसन्न होते होंगे, इसका न कोई आधार है , न कोई तर्क !
सुंदर आलेख, बधाई !

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August 2, 2011 at 9:57 AM

thanks kavita ji bahot badiya ....achha likha tumane .....pata ni last main itna bura kyon laga bali wala part dekh kar ...really ye sab astha ni majah dhinona kam hai ....kash main aimation kiya hota to shayad khub vedio uplod kar deta jismain ye nirjiv janvar dutkar deta hua bhag jata ...or bach nikalta jin jalimon ke chungal se ...pryas karo is traha ke vedio ko samne lane ka jinme nirjiv pashu main jan ho ...shayad hamara ye kadam samaj ke in darindon ke liye achha sabak hoga ...main ise aastha ni manta bakwas hai ...murkh hai ye log ,agyani hai...saza ke haqdar hai ....mujhe esa lagta hai ise jald ban hona hoga...

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August 2, 2011 at 10:01 AM

mere ghar ke log bhi ye kam karte hai to bhi darinde hi honge meri najar main ...unhen bhi saza milani chahiye ....ye astha nahin darindagi hai sirf or sirf ....Apka bahot bahot dhanyvad aapne in sabse pe apni kalam chalayi thanks kavita

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December 12, 2011 at 5:35 PM

SURESH CHAND DHYANI VILLAGE DHISWANI
TALLI POST OFFICE KOTA MAHADEV DISTRIC PAURI GARHWAL UTTRA KHAND GARHWALI SONG WRITER

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December 12, 2011 at 5:36 PM

SABSE BADIYA MERU GARHWAL MERU UTTRAKHAND

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July 13, 2012 at 7:36 PM

Apka post padha..
Apka shabd chayan sunder hai...
Dharmik kuritiyan ab bhi pair pasare hue hain..
inhe rokna hamari or apki jimmedari hai..
Dhayabad..

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Anonymous
December 30, 2014 at 11:41 AM

hum sub jaantey hai hi pasu bali theek nahi per ye barso se chal rahi param para hai. puraney logo ka maanna hai ki aisa jaruri hai tho ye hota aa raha hai. we respect huminity & also loves our animal. per ye uttarakhand ki bhumi devo ki hai. hum sabhi log paramparao se bandhey huye hai. shayad aage kuch badlav ho per abhi jo hota aa raha hai usse hi karna padtha hai.

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September 28, 2015 at 8:13 PM

पहली बार आपके ब्लाग से परिचित हुआ। बहुत ही अच्छा लगा। मैंने आज जो बात उठायी आपने चार साल पहले उस पर बहुत अच्छी तरह से अपनी भावनाएं व्यक्त कर दी था। आपने सही कहा ​है कि किसी निरीह पशु की बलि देने के बजाय क्यों न यह पैसा किसी गरीब को दिया जाए। मैं पहले भी गांवों में इसका विरोध करता रहा और दो साल पहले पूजा में इसी शर्त पर गया था कि पशु बलि नहीं दी जाएगी। जागरूकता लानी जरूरी है।

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February 12, 2016 at 2:02 AM

KAVITA JI HAMRE DEVI DEVTA BALI MANGTE HAIN YA N MUDDA A N HAI MUDDA A HAI KI 21 SADI ME JAB DUNIYA CHAND PAR PAHUNCH GAYEE HAI TO KYA A SAB ACCHA LAGTA HAI ME AAPKO BATANA CHAHUNGA KI MAY-2015 ME HAMARA MANDAN (DEVI DEVTON KA AAHWAN) THA JISME SEHAR SE BHI KUCH GARHWALI LOG AAYE THE TO UNKE BACHHE UN LOGON PAR HANS RAHE THE KI A LOG AISE KYON NAACH RAHE HAIN TO IS BARE ME KYA KAREN AUR KUCH LOGON KA BOLNA YA MANNA HAI KI DEVI DEVTA BALI N MANGTE GALAT MANGTE HAIN AUR POOJA BHI MANGTE HAIN AUR THODA VILAMB HO JAYE TO NASEEB KAHO YA UNKA PRAKOP SAB PRESHAAN MERE HISAB SE SAB MAN MAN ME DAR JATE HAIN AUR YAHI DAR KE KARAN UNKA HAR KAAM UNLTA HOTA HAI AUR WO KAHTE HAIN KI DEVI-DEVTA KA DOSH HAI TO 100 BAAT KI 1 BAAT KI INSAN NE HAR BIMARI KI DAWAI KHOJ LI PAR VAHAM KI DAWAI AAJ TAK N KHOJ PAYA

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February 12, 2016 at 2:03 AM

KAVITA JI HAMRE DEVI DEVTA BALI MANGTE HAIN YA N MUDDA A N HAI MUDDA A HAI KI 21 SADI ME JAB DUNIYA CHAND PAR PAHUNCH GAYEE HAI TO KYA A SAB ACCHA LAGTA HAI ME AAPKO BATANA CHAHUNGA KI MAY-2015 ME HAMARA MANDAN (DEVI DEVTON KA AAHWAN) THA JISME SEHAR SE BHI KUCH GARHWALI LOG AAYE THE TO UNKE BACHHE UN LOGON PAR HANS RAHE THE KI A LOG AISE KYON NAACH RAHE HAIN TO IS BARE ME KYA KAREN AUR KUCH LOGON KA BOLNA YA MANNA HAI KI DEVI DEVTA BALI N MANGTE GALAT MANGTE HAIN AUR POOJA BHI MANGTE HAIN AUR THODA VILAMB HO JAYE TO NASEEB KAHO YA UNKA PRAKOP SAB PRESHAAN MERE HISAB SE SAB MAN MAN ME DAR JATE HAIN AUR YAHI DAR KE KARAN UNKA HAR KAAM UNLTA HOTA HAI AUR WO KAHTE HAIN KI DEVI-DEVTA KA DOSH HAI TO 100 BAAT KI 1 BAAT KI INSAN NE HAR BIMARI KI DAWAI KHOJ LI PAR VAHAM KI DAWAI AAJ TAK N KHOJ PAYA

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