तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है

जो अपने आप गिर जाता है वह चीख़-पुकार नहीं मचाता है। 
जो धरती पर टिका हो वह कभी उससे नीचे नहीं गिरता है। । 

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं। 
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं। । 

सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है । 
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है। । 

जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने से डर लगता है। 
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना रहता है । । 

मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है। 
गड्ढे में गिरे हाथी को भी चमगादड़ लात मारता है । ।  

बड़े-बड़े भार छोटे-छोटे तारों पर लटकाए जाते हैं । 
बड़े-बड़े यंत्र भी छोटी से धुरी पर घूमते हैं । । 

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है । 
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है। । 

एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है। 
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है। । 
           
    ..कविता रावत 

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August 23, 2011 at 10:33 AM

सुन्दर रचना

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August 23, 2011 at 11:15 AM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है...
bahut hi badhiyaa

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August 23, 2011 at 12:11 PM

शाश्वत सत्य. मन को आलोड़ित करता एक सुन्दर आलेख. बहुत बहुत आभार !

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August 23, 2011 at 1:06 PM

मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है?
गड्ढे में गिरे हाथी को भी चमगादड़ लात मारता है !

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है

...बहुत दूर की कौड़ी बटोर लाई हैं आप ...
लाजवाब समसामयिक प्रासंगिक सटीक रचना के लिए बधाई!.

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August 23, 2011 at 2:09 PM

हर स्थिति बदलती है. सकारात्मक सोच होनी चाहिए. बढ़िया रचना.

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August 23, 2011 at 2:31 PM

बहुत सुंदर,मनोभावों और शब्दों का कमाल चित्रण किया है.

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August 23, 2011 at 2:34 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है

sach mei bohot sunder likha h aapne

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August 23, 2011 at 2:57 PM

जीवन दर्शन से परिपूर्ण सुंदर रचना के लिए बधाई।

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August 23, 2011 at 3:38 PM

सुन्दर रचना

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August 23, 2011 at 5:20 PM

सार्थक भावाभिव्यक्ति के लिए आभार

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August 23, 2011 at 5:53 PM

बेहतरीन रचना ....

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August 23, 2011 at 5:54 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है

सार्थक प्रस्तुति...
सादर बधाई...

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August 23, 2011 at 6:01 PM

कविता में बहुत सही बातें कही हैं ।
बढ़िया ।

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August 23, 2011 at 6:45 PM

सुन्दर व सार्थक रचना..आभार

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August 23, 2011 at 7:44 PM

बेहद सुंदर रचना बहुत बढ़िया ....

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August 23, 2011 at 8:10 PM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है...
...अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति..

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August 23, 2011 at 8:16 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है
एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है
..यही एकता की शक्ति आज देश में हर तरफ नज़र आ रही है.. शानदार रचना

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August 23, 2011 at 9:29 PM

"श्रीमती कविता रावत जी"...आपने मेरी रचना "सदा तुम नज़र आये" मे अपनी प्रतिक्रिया में बहुत बड़ी बात कह दी...समझ नही आ रहा आपको कैसे आभार प्रकट करूँ...किन्तु आपने जो बात कही है उसे मैं जीवन भर याद रखुंगा..बहुत-बहुत धन्यवाद....मेरे ब्लाग पर आपका सदैव स्वागत है...

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August 23, 2011 at 9:34 PM

रचना तो आपने बहुत सुन्दर लिखी है।
मगर तीन तार के जनेऊ को तो लोग त्याग ही चुके हैं।

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August 23, 2011 at 10:11 PM

इसमें आपका चिन्तन मुखर हुआ है।

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August 23, 2011 at 11:33 PM

सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है

जीवन दर्शन से भरी पंक्तियाँ ....!

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August 24, 2011 at 6:29 AM

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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August 24, 2011 at 8:05 AM

बहुत सुन्दर , गतिशील विचारों का प्रवाह अच्छा लगा ...
बधाईयाँ जी .../

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Anonymous
August 24, 2011 at 9:05 AM

Abhaar uprokt post hetu........

P.S.Bhakuni

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August 24, 2011 at 12:38 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है
बहुत सुन्दरसार्थक प्रस्तुति...
सादर बधाई

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August 24, 2011 at 2:00 PM

Hi I really liked your blog.

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August 24, 2011 at 2:18 PM

एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना रहता है
मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है?
..सत्य वचन ..बहुत बधाई

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August 24, 2011 at 2:22 PM

मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है?
गड्ढे में गिरे हाथी को भी चमगादड़ लात मारता है !
..बुरे वक्त पर सबकुछ उल्टा होता है कोई नहीं पूछता किसी को..
बढ़िया सीख भरी रचना हेतु बधाई

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August 24, 2011 at 2:36 PM

जो अपने आप गिर जाता है वह चीख़-पुकार नहीं मचाता है
जो धरती पर टिका हो वह कभी उससे नीचे नहीं गिरता है
नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
..its so really nice poem mam!
Thanks

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August 24, 2011 at 7:45 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है
एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है

bahut sahi kaha aapne...

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August 24, 2011 at 9:41 PM

कवित जी
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगसपाट डाट काम" के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

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August 24, 2011 at 9:43 PM

संघे शक्ति कलियुगे।

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August 24, 2011 at 10:44 PM

सुंदर सन्देश देती रचना और आज की जरूरत भी.

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August 25, 2011 at 2:43 AM

ताकत की अहमियत जताती हुई बहुत सुंदर रचना लिखी है, कविता जी.

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August 25, 2011 at 10:41 AM

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August 25, 2011 at 3:00 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है
एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है
...very nice creation........ thanks

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August 25, 2011 at 3:10 PM

सही तथा अच्छी बातें

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August 25, 2011 at 3:52 PM

जो अपने आप गिर जाता है वह चीख़-पुकार नहीं मचाता है
जो धरती पर टिका हो वह कभी उससे नीचे नहीं गिरता है
नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
..सुंदर सुंदर सन्देश देती रचना...

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August 25, 2011 at 6:57 PM

सच है हर चीज़ ला अपना अपना महत्व है .... कोई भी वस्तु छोटी नहीं है ... सुन्दर सन्देश छिपा है ...

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August 25, 2011 at 10:54 PM

कविता जी आपका परिचय पढ़ कर मन भावुक सा हो गया.
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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August 26, 2011 at 10:02 AM

कविता जी सब कुछ समझ आया , पर तीन धागे का मतलब क्या समझू ? ब्रह्मा , विष्णु और महेश या और कुछ ?

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August 26, 2011 at 10:46 AM

Beautiful n useful information.

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August 26, 2011 at 7:51 PM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है
जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने से डर लगता है
..सही तथा सुन्दर सन्देश देती रचना आज की जरूरत है..

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August 26, 2011 at 10:49 PM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है..
baat pate ki hai aur sundar bhi .

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August 27, 2011 at 2:58 PM

जो शेर पर सवार हो उसे नीचे उतरने से डर लगता है
एक बार डंक लगने पर आदमी दुगुना चौकन्ना रहता है
मजबूरी के आगे किसी का कितना जोर चल पाता है?
गड्ढे में गिरे हाथी को भी चमगादड़ लात मारता है !
..सही लिखा आपने.. बढ़िया प्रशंनीय रचना
बधाई

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August 27, 2011 at 10:30 PM

जन लोकपाल के पहले चरण की सफलता पर बधाई.

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August 28, 2011 at 12:11 AM

बेहतरीन रचना है......बधाई......

मेरे अनुसार भी ...

रह अभय क्यू भय से यू भवभीत होता है....
एकाकी है तो अम्बर भी हमारा मीत होता है....
भला क्यू हम अँधेरी कोठरी में बैठ के रोयें....
सत्य पर चलने वालों हित विजय का गीत होता है....

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August 28, 2011 at 11:39 AM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है
एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है

प्रेरणा देने वाली सशक्त कविता।

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August 29, 2011 at 1:47 PM

" संघे शक्ति कलियुगे " की सुंदर व्याख्या करती एक सशक्त प्रस्तुति !

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August 29, 2011 at 3:39 PM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है...
...शाश्वत सत्य वचन
सुन्दर...बधाई

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August 30, 2011 at 3:29 PM

सुंदर सन्देश देती सार्थक रचना ......

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August 30, 2011 at 10:47 PM

बहुत सुंदर प्रस्तुति,


एक चीज और, मुझे कुछ धर्मिक किताबें यूनीकोड में चाहिये, क्या कोई वेबसाइट आप बता पायेंगें,
आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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September 1, 2011 at 12:17 PM

badiya baaton ka samavesh kiya hai aapne..badhai

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September 1, 2011 at 2:31 PM

‘सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है ’

सच कहा, वक्त अच्छा हो तो कोई कुछ नहीं बिगाड सकता- किसी की बद्दुआ भी नहीं॥

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September 2, 2011 at 7:47 AM

एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है

ek ek pankti saarthak achchha chintan

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September 3, 2011 at 8:45 AM

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना!
आपको एवं आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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September 3, 2011 at 12:55 PM

बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने..
बहुत दिन से फेसबुक पर नज़र नहीं आयी आप..व्यस्त हैं शायद...
गणेश चतुर्थी की शुभकामना

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September 4, 2011 at 12:01 PM

निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है

कविता में यथार्थ के तत्व मौजूद हैं।

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September 4, 2011 at 7:16 PM

सच कहा आपने तिहरे धागे को तोडना आसान नही होता है।

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September 5, 2011 at 11:23 AM

solah aane sach sabhee baate.
sathak lekhan.
aabhar

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September 5, 2011 at 2:06 PM

kavita mein bahut achha moral dekhne ko mila..
Madam Happy Teacher's day........

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September 5, 2011 at 6:53 PM

Very well written, strikes the heart...
Lovely blog, my first visit, I loved it!!
Have a wonderful day:)

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September 6, 2011 at 8:47 AM

बहुत सुन्दर कहावतें !

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September 6, 2011 at 11:00 AM

bahut umda rachna badhai..........

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September 6, 2011 at 11:39 AM

बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने.......प्रशंनीय रचना

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September 6, 2011 at 8:09 PM

kavita ji
bahut hi shandar prastuti lagi aapki .sach ko darshati hui tatha darshnikta se bhari post bahut se bhao ko man me jagrit karta hai .
bahut hi badhiya abhivykti
badhai-------
poonam

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September 7, 2011 at 12:31 AM

"निर्बल वस्तु जुड़कर कमजोर नहीं रहती है
एकता निर्बल को भी शक्तिशाली बना देती है"
क्या बात है !

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September 9, 2011 at 2:02 PM

सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है
...बहुत सुन्दर..

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September 9, 2011 at 3:01 PM

नदी पार करने वाले उसकी गहराई बखूबी जानते हैं
सदा लदकर चलने के आदी बेवक्त औंधे मुहं गिरते हैं
सही वक्त पर बददुआ भी दुआ का काम कर जाता है
वक्त आने पर छोटा पत्थर भी बड़ी गाडी पलटा देता है
..bilkul sahi baat likhi hai apne..

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September 10, 2011 at 12:09 PM

सच्ची, अच्छी और गहरी बात

बहुत सुंदर

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November 7, 2011 at 11:09 PM

सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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January 10, 2012 at 4:40 PM

बहुत सुन्दर बेजोड़ रचना..

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