भूलते भागते पल

सुबह बच्चों का टिफिन तैयार करते समय किचन की खुली खिड़की से रह-रहकर बरसती फुहारें सावन की मीठी-मीठी याद दिलाती रही। सावन आते ही आँगन में नीम के पेड़ पर झूला पड़ जाता था। मोहल्ले भर के बच्चों के साथ स्कूल से लौटने के बाद 'पहले मैं', पहले मैं' की चकल्लस में झूलते-झूलते कब शाम उतर आती , इसका पता माँ-बाप की डांट पड़ने के बाद ही चलता था । आज जब उस नीम के पेड़ को देखती हूँ तो महसूस करती हूँ उसकी जिन टहनियों पर कभी सावन आते ही झूले डल जाया करते थे अब उपेक्षित सा ठूंठ बन खड़ा अपनी बेबसी के मारे आकाश निहारता रहता है। उसकी छाया तले घर वालों ने वाहनों के लिए एक शेड बना लिया है, उसकी यह बदली तस्वीर खटके बिना नहीं रहती। समय के साथ कितना कुछ बदल जाता है। अब तो उसकी झरती पत्तियां भी आँगन बुहारने वालों को सबसे बेगार का काम लगने लगा है। अपनी ओर देखती हूँ तो अपना भी हाल कुछ दयनीय बन पड़ा है। सुबह कच्‍ची नींद से जागने के बाद बच्चों के लिए टिफिन, उनके नाज-नखरे सहते हुए उनकी रवानगी और फिर अपने ऑफिस के लिए कूच। फिर शाम को बच्चों को झूलेघर से लेना, उनके होमवर्क की माथापच्ची के साथ अपने होमवर्क यानी खाना पकाने की जद्दोजहद के बीच झूलती जिंदगी सावन के झूले से कमतर नहीं है।
सावन तो आकर चला गया। मन घर से बाहर की ताजी सावनी बयार के लिए बस तरस कर रह गया। भादों भी कहीं यूँ ही फिसल न जाए इसलिए भादों की शुरूवात में ही एक दिन हम सब रिमझिम बरसती बूंदों में बड़े तालाब के किनारे-किनारे शहर की शान मरीन ड्राइव कहलानी वाली वीआईपी रोड पर निकल पड़े। जब कभी थोडा समय होता है तो यही वह जगह है जब प्रकृति को करीब से देखने और अनुभव करने का मौका मिलता है। इस बार सामान्य से अच्छी बारिश के चलते लबालब हुए जा रहे तालाब और आस पास के हरे-भरे नज़ारों को देखने का कुछ अलग ही आनंद आया। 
     जिस दिन भी जमकर बारिश होती है और सड़क, नाले छोटी सी नदी के आकार में बहते दिखते हैं तो मुझे गाँव की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों के बीच बहते निर्मल जलस्रोत याद आने लगते हैं। और याद आने लगता है गाँव के निकट बहती दो नदियों का संगम। जिसमें एक छोटी सी नदी में साफ़ पानी और दूसरी बड़ी नदी में चाय सा बहता पानी मिलकर एक बड़ी नदी का विकराल रूप ले लेता है।  तीव्र गति से अपनी यात्रा शीघ्र पूर्ण करने को तत्पर दिखती वे नदी, बरबस ही याद आने लगती है। हम बचपन में इसी नदी में जब भी बाढ़ आती थी तो उसमें बहकर आयी लकड़ियों को बटोरने के लिए तैयार रहते थे। बरसात थमते ही हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों के बीच से बनी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से गिरते-पड़ते, भीगते-ठिठुराते दौड़े चले जाते थे । घंटों उसके उतार की राह ताकते रहते थे। इस बीच न जाने कितनी बार अचानक बादल गरज-बरस कर हमारे प्रयास को विफल करने का भरसक प्रयास करते रहते, जिनसे हम बेपरवाह रहते थे। 
पिछले बार जब बरसात में गाँव जाना हुआ तो नदी में आयी बाढ़ देखने का मौका मिला, बचपन जैसा उत्साह तो मन में नहीं था लेकिन बचपन के दिन रह-रह कर याद आते रहे। अब तो बचपन अपने बच्चों में ही दिखने को रह गया है। उनको हम लाख चाहने पर भी इस शहरी आपाधापी के चलते प्रकृति को करीब से दिखाने और समझाने में असमर्थ से हो रहे हैं। कोई भी प्रकृति के अन्तःस्थल में छुपी आनंद की धाराओं को तब तक कहाँ अनुभव कर पाता है जब तक वह स्वयं इनके करीब न जाता हो।   भादों की बरसती काली घटाओं की ओट से निकलकर अब तो अक्सर जीवन के चारों ओर संघर्षों, दुर्घटनाओं, दुर्व्यवस्थाओं की व्यापकता देख हरपल उपजती खीज, घुटन और बेचैनी से राहत पहुँचाने आकुल-व्याकुल मन जब-तब अबाध गति से बहती नदी धार में जीवन प्रवाह का रहस्य तलाशने सरपट भागा चला जाता है।

.....कविता रावत




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September 11, 2011 at 10:25 AM

सावन तो आकर चला गया। मन घर से बाहर क ताजी सावनी बयार के िलए बस तरस कर रह गया।
Bahut khoob. Yeh to kavyamay prastuti jaisi hai.sundar vicharo ko saajha karne ke liye dhanyawaad.

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September 11, 2011 at 10:31 AM

bahati dhara aur jeene ki chaah ...sach me milti julti baten hain ...
sunder bhavpoorn alekh...

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September 11, 2011 at 10:37 AM

गाँव के सावन के झूले तो झूल लिए । अब मेट्रो , मॉल , मोबाईल आदि का लुत्फ़ उठाइए ।
वक्त ही एक ऐसी चीज़ है जो कभी ठहरता नहीं ।
सुन्दर यादों को संजोये हुए वर्तमान को एन्जॉय करते रहना चाहिए ।

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September 11, 2011 at 10:41 AM

यह सब बदलते वक्त का असर है लेकिन अपना गाँव अपनी मिटटी की महक कभी नहीं जाती , आपने मेरे बचपन की याद दिलादी

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September 11, 2011 at 10:53 AM

कोई भी प्रकृति के अन्तःस्थल में छुपी आनंद की धाराओं को तब तक कहाँ अनुभव कर पाता है जब तक वह स्वयं इनके करीब न जाता हो।

यथार्थ है और परिवर्तन भी अवश्यम्भावी है ।

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September 11, 2011 at 10:57 AM

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 12-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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September 11, 2011 at 12:03 PM

स्मृतियों के झूले संग संवेदनशील लेखन....
बहुत सार्थक...
सादर...

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September 11, 2011 at 12:46 PM

मौसम इसी तरह यादें ले आता है...मन को छू लेने वाला संस्मरणात्मक लेख...

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September 11, 2011 at 12:50 PM

मुझे आपके गाँव को देखकर अपने गाँव की याद आ गई . देखती हूँ कब जा पाती हूँ .

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September 11, 2011 at 1:09 PM

bahut khoobsurat sansmaran uttrakhand kii pahadiya aawaz deti prteet ho rahi hain hai

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September 11, 2011 at 2:59 PM

मन को छू लेने वाला लेख.

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September 11, 2011 at 5:28 PM

यादों का संसार भी अत्यंत मजेदार है. सुंदर संस्मरण.

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September 11, 2011 at 5:47 PM

yaaden kabhi nahi mit ti aur jahan apna bachpan khela ho vo to kabhi nahi.aapka sansmaran man choo gaya.

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September 11, 2011 at 6:06 PM

बेहतरीन आलेख |

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September 11, 2011 at 6:13 PM

अच्छा और प्रकृति से जुडाव का अहसास कराता आलेख

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September 11, 2011 at 6:22 PM

मन को छू लेने वाला संस्मरणात्मक लेख|धन्यवाद|

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September 11, 2011 at 7:09 PM

अद्भुत शब्दचित्र.. मानो घटनाएँ और स्थान सजीव हो उठे हों!!

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September 11, 2011 at 7:55 PM

अब तो बचपन अपने बच्चों में ही दिखने को रह गया है। उनको हम लाख चाहने पर भी इस शहरी आपाधापी के चलते प्रकृति को करीब से दिखाने और समझाने में असमर्थ से हो रहे हैं। ... dukhad satya

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September 11, 2011 at 8:52 PM

गांव से लेकर शहर तक के यथार्थ को आपने रेखांकित कर दिया, एक एक शब्द बोल रहे हैं व्यवस्था की वास्तविकता को।

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September 11, 2011 at 10:20 PM

बचपन की यादों के साथ सुन्दर संस्मरण ..

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September 12, 2011 at 6:38 AM

आदरणीय कविता जी!
नमस्कार !
.....सुन्दर संस्मरण
आपकी लेखनी का इंतज़ार रहता है,कलम का जादू देखने के लिए

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September 12, 2011 at 8:57 AM

गर्मी, जाड़ा, बरसात, जीवन का क्रम चलता रहेगा।

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September 12, 2011 at 10:38 AM

sach mei , wo bachpan ab jane kaha kho gaya, saheripan hum logo pe hawi nahi bohot jada hawi ho gaya hai jisne hume un sunheri yado se dur kar diya hai

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September 12, 2011 at 11:30 AM

समय और स्थान एक से नहीं रहते. इनमें हो रहे निरंतर परिवर्तन को जीते रहना जीवन का महत्वपूर्ण लक्षण हैं.

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September 12, 2011 at 3:38 PM

अग्रिम आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं आज हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए..
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BINDAAS_BAATEN कृपया यहाँ चटका लगाये

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September 12, 2011 at 4:03 PM

जिसका बचपन प्रकृति की गोद में पला हो, उसे वो दिन सबसे ज्यादा कचोटते हैं. और फिर आप तो देवस्थली हिमालय की खूबसूरत वादियों की हैं, आपको कैसा महसूस होता होगा, ये मैं समझ सकती हूँ. बरसात में पहाड़ों पर बहने वाली बरसाती नदियाँ और झरने देखे हैं मैंने, पर आपने तो उनके बीच अपना बचपन गुजारा है, उन्हें जिया है, उनसे दोस्ती की है. कैसी टीस उठती होगी मन में?

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September 12, 2011 at 5:31 PM

प्रकृति का सुन्दर चित्रण.. तस्वीर भी लाजवाब....पढ़कर गाँव याद आने लगा ..
धन्यवाद

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September 12, 2011 at 6:16 PM

परिवर्तन का सुख लो .परिवर्तन ही शाश्वत है .जड़ता नाशक है .

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September 12, 2011 at 6:22 PM

परिवर्तन का सुख लो .परिवर्तन ही शाश्वत है .जड़ता नाशक है .अतीत तो पिरा रहता है गुम्फित रहता है वर्तमान में भले स्वरूप बदल जाता है जीवन का .

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September 12, 2011 at 6:22 PM

परिवर्तन का सुख लो .परिवर्तन ही शाश्वत है .जड़ता नाशक है .अतीत तो पिरा रहता है गुम्फित रहता है वर्तमान में भले स्वरूप बदल जाता है जीवन का .

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September 12, 2011 at 8:50 PM

जिस प्रकार कुदरत भी अपना रूप बदल रही है उससे तो एक दिन ऐसा आयेगा कि लोग भूल जायेंगे कि सावन के मायने क्या है. इंसानों की तो बाते ही क्या....
छोटे और एकल परिवार तथा महानगरी संस्कृति के चलते ऐसा भी तो होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि ये मौसा-मौसी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, आँगन, तुलसी चौरा, नीम/बरगद की छांव और और ..... क्या होता है. यह हकीकत है...... अधिक बारिस के चलते आसाम में गेंहू और गन्ना नहीं होता है. तो वहां पर किसी स्थानीय निवासी ने कभी वर्षों पहले किसी से जिज्ञासावश पूछ लिया होगा कि "चीनी का पेड़ कैसा होता है और आटे का पेड़ भी कैसा होता है." तो वहां पर यह कहावत खूब चल पड़ी...
भोपाल पर केन्द्रित लेख के साथ अपने इलाके की फोटो का अच्छा संगम बन पड़ा है. आभार.

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September 12, 2011 at 9:07 PM

प्रकृति की सुन्दर छटा देखने और पढ़ने को मिला..मन को छू लेने वाला सुन्दर संस्मरणात्मक....आभार

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September 12, 2011 at 10:29 PM

हम लाख चाहने पर भी इस शहरी आपाधापी के चलते प्रकृति को करीब से दिखाने और समझाने में असमर्थ से हो रहे हैं।

सही कहा आपने.....बहुत ही सार्थक और सारगर्भित पोस्ट.

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September 13, 2011 at 1:21 PM

तीव्र गति से अपनी यात्रा शीघ्र पूर्ण करने को तत्पर दिखती वे नदी, बरबस ही याद आने लगती है। हम बचपन में इसी नदी में जब भी बाढ़ आती थी तो उसमें बहकर आयी लकड़ियों को बटोरने के लिए तैयार रहते थे। बरसात थमते ही हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों के बीच से बनी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से गिरते-पड़ते, भीगते-ठिठुराते दौड़े चले जाते थे । घंटों उसके उतार की राह ताकते रहते थे। इस बीच न जाने कितनी बार अचानक बादल गरज-बरस कर हमारे प्रयास को विफल करने का भरसक प्रयास करते रहते, जिनसे हम बेपरवाह रहते थे।
....प्रकृति की सुन्दर छटा को संस्मरण के रूप में पढना और देखना बहुत अच्छा लगा.. कुछ न कुछ सार्थक सन्देश आपकी ब्लॉग पोस्ट पर देखना सुखकर लगता है... .धन्यवाद

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September 13, 2011 at 1:27 PM

सावन तो आकर चला गया। मन घर से बाहर की ताजी सावनी बयार के लिए बस तरस कर रह गया। भादों भी कहीं यूँ ही फिसल न जाए इसलिए भादों की शुरूवात में ही एक दिन हम सब रिमझिम बरसती बूंदों में बड़े तालाब के किनारे-किनारे शहर की शान मरीन ड्राइव कहलानी वाली वीआईपी रोड पर निकल पड़े।
..हम भी वीआईपी रोड पर घूमना फिरना बहुत पसंद करते हैं ...बच्चों के साथ घुमने का अलग ही मजा है पर समय ही तो है जो रुला देता है....आपका यह सजीव चित्रण मन को भा गया...प्रशसनीय लेख के लिए आपका आभार

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September 13, 2011 at 1:47 PM

भादों की बरसती काली घटाओं की ओट से निकलकर अब तो अक्सर जीवन के चारों ओर संघर्षों, दुर्घटनाओं, दुर्व्यवस्थाओं की व्यापकता देख हरपल उपजती खीज, घुटन और बेचैनी से राहत पहुँचाने आकुल-व्याकुल मन जब-तब अबाध गति से बहती नदी धार में जीवन प्रवाह का रहस्य तलाशने सरपट भागा चला जाता है।
..प्रकृति का सुन्दर चित्रण ...प्रकृति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है लेकिन आज के भागदौड़ अखरती हैं..
बढ़िया सुन्दर रंचना पढवाने के लिए आभार

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September 14, 2011 at 4:01 PM

उम्र के साथ ... समय के सार्थ साथ बदलाव आते रहते हैं ... प्राकृति कभी आशा बंधाती है कभी वास्तविकता में ला पटकती है ... पर ऐसे पल जीवन को हमेशा उत्साह देते अहिं ...

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September 15, 2011 at 3:33 PM

प्रकृति का सुन्दर चित्रण ..
बहुत ही सार्थक और सारगर्भित पोस्ट.

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September 15, 2011 at 10:48 PM

आपकी प्रस्तुति और चित्र दोनों ही लाजबाब हैं.
प्रकृति का अनोखा अहसास कराती सुन्दर
प्रस्तुति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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September 16, 2011 at 9:55 AM

प्रकृति का अनोखा अहसास कराती सुन्दर और सारगर्भित पोस्ट.

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September 17, 2011 at 5:58 AM

शनिवार १७-९-११ को आपकी पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया पधार कर अपने सुविचार ज़रूर दें ...!!आभार.

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September 18, 2011 at 9:17 PM

यादों की मनोहर झांकी

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September 20, 2011 at 7:23 PM

aapki lekhni me drshya utpan karne ki takat hai .sunder varnan kiya hai .abhar
rachana

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September 21, 2011 at 1:35 PM

जब मैं फुर्सत में होता हूँ , पढ़ता हूँ और तहेदिल से इन भावनाओं का शुक्रगुज़ार होता हूँ ....

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September 21, 2011 at 2:36 PM

जिंदगी की भागदौड़ के बीच इतना सुन्दर चित्रण पढना मन प्रसन्न हुआ.. सुन्दर लेखन के लिए बधाई

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September 23, 2011 at 1:34 PM

ham padhkar gaon kee beeti yaadon mein doob gaye.. barsati nadi ki teevra dhar ka tede-medhe rahon se gujna kabhi nahi bhool pate hain aur nahi bhoolinge...
bahut bahut dhanyavaad aapka...

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RAJ
September 23, 2011 at 2:56 PM

मन को छू लेने वाला यादों की मनोहर झांकी.. ..

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September 23, 2011 at 11:40 PM

क्या कहें ..........

बहुत ही अच्छी रचना है.....जो की खूबसूरत शब्दों के ताने बाने में बुनी गई है......

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September 24, 2011 at 9:01 PM

समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। कई बार तो इंसानो की मूल फितरत भी... जबकि कहा जाता है कि आदमी की मूल प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती।

जिन्दगी की भगदड के बीच फुरसत से बिताए पल अच्छे लगे।

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September 27, 2011 at 1:21 PM

यथार्थ का सुन्दर चित्रण ...
प्रकृति को करीब से देखना बहुत भाया..

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September 27, 2011 at 3:40 PM

बहुत बढ़िया लगा ! बेहतरीन प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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September 28, 2011 at 11:15 AM

... नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं....
आपका जीवन मंगलमयी रहे ..यही माता से प्रार्थना हैं ..
जय माता दी !!!!!!

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September 29, 2011 at 10:53 AM This comment has been removed by the author.
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September 29, 2011 at 2:05 PM

आजकल कुछ निजी व्यस्तताओं के कारन ब्लॉग जगत में पर्याप्त समय नहीं दे पा रहा हूँ जिसका मुझे खेद है, बावजूद इसके आपको स:परिवार नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ ,
जय माता दी ...........

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September 29, 2011 at 2:35 PM

KAVITA JI
Pranam. main bhi uttrakhand se hoon. apke es post me uttrakhand ki photos dhekh kar aisa laga jaise ye photo mere aangan se hi khichi ho.apnapan mahsus hua hai..

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September 29, 2011 at 6:42 PM

बहुत ही मनभावन यादों के इन्द्रधनुषी रंगों को समेटे ...माटी कि सुगंध बिखेरती अनुपम प्रस्तुति ....आपको सपरिवार मित्रों सहित नवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं !!!

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September 29, 2011 at 7:13 PM

आपके लेख से बहुत सारी यादें ताजा हो गयी कविता जी दिल को छू लेने वाली लेख धन्यवाद दुबारा से यादों को याद दिलाने के लिए
MADHUR VAANI
BINDAAS_BAATEN
MITRA-MADHUR

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September 29, 2011 at 7:48 PM

नवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं !

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September 30, 2011 at 5:30 PM

बारिश की बूंदों की तरह बहाते हुए ले गईं आप यादों के गलियारे से.

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September 30, 2011 at 7:19 PM

आज हम दौड़ भाग की ज़िन्दगी जी रहे हैं .....
समय कम है ...
जगह कम है ...
एक दुसरे के लिये समय कम है ....
प्रकृति को बैठ कर निहारना तो बस स्वप्न की सी बातें रह गयी हैं ...वो हम तब करतें है जब पैसे खर्च करके कहीं घूमने जायें ....लेकिन अपने आस पास इसे देखने की फुर्सत ही नहीं .....
एक रोचक और मन छु लेने वाला लेख ....
आपको पहली बार पढ़ा .... क्या आप भी मुझ तक आयेंगी ?

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October 1, 2011 at 5:30 PM

तीव्र गति से अपनी यात्रा शीघ्र पूर्ण करने को तत्पर दिखती वे नदी, बरबस ही याद आने लगती है। हम बचपन में इसी नदी में जब भी बाढ़ आती थी तो उसमें बहकर आयी लकड़ियों को बटोरने के लिए तैयार रहते थे। बरसात थमते ही हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों के बीच से बनी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से गिरते-पड़ते, भीगते-ठिठुराते दौड़े चले जाते थे । घंटों उसके उतार की राह ताकते रहते थे। इस बीच न जाने कितनी बार अचानक बादल गरज-बरस कर हमारे प्रयास को विफल करने का भरसक प्रयास करते रहते, जिनसे हम बेपरवाह रहते थे.................


प्रकृति का सजीव चित्रण पढ़कर गाँव की ओर हमारा मन भी भागने लगा है.............. बीते दिनों की याद यूँ ही जीवन में उमड़-घुमड़कर शहर में मन की कुछ तो बेचैनी कम करने में सफल हो ही जाती हैं ऐसा मैं भी अक्सर सोचता हूँ........................

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October 1, 2011 at 5:38 PM

तीव्र गति से अपनी यात्रा शीघ्र पूर्ण करने को तत्पर दिखती वे नदी, बरबस ही याद आने लगती है। हम बचपन में इसी नदी में जब भी बाढ़ आती थी तो उसमें बहकर आयी लकड़ियों को बटोरने के लिए तैयार रहते थे। बरसात थमते ही हरे-भरे सीढ़ीदार खेतों के बीच से बनी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से गिरते-पड़ते, भीगते-ठिठुराते दौड़े चले जाते थे । घंटों उसके उतार की राह ताकते रहते थे। इस बीच न जाने कितनी बार अचानक बादल गरज-बरस कर हमारे प्रयास को विफल करने का भरसक प्रयास करते रहते, जिनसे हम बेपरवाह रहते थे.................


प्रकृति का सजीव चित्रण पढ़कर गाँव की ओर हमारा मन भी भागने लगा है.............. बीते दिनों की याद यूँ ही जीवन में उमड़-घुमड़कर शहर में मन की कुछ तो बेचैनी कम करने में सफल हो ही जाती हैं ऐसा मैं भी अक्सर सोचता हूँ........................

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October 1, 2011 at 8:26 PM

बेहतरीन प्रस्तुती.

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October 2, 2011 at 5:13 AM

पनीला, तरल, भीगा-भीगा सा.

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October 10, 2011 at 5:57 PM

Some truly nice and useful info on this internet site , likewise I think the design has got fantastic features.

जगजीत सिंह आधुनिक गजल गायन की अग्रणी है.एक ऐसा बेहतरीन कलाकार जिसने ग़ज़ल गायकी के सारे अंदाज़ बदल दिए ग़ज़ल को जन जन तक पहुचाया, ऐसा महान गायक आज हमारे बिच नहीं रहा,
उनके बारे में और अधिक पढ़ें : जगजीत सिंह

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