अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है....

जहाँ उत्कृष्टता पाई जाती है वहाँ अभिमान आ जाता है।
अभिमान आदमी की अपनी त्रुटियों का मुखौटा होता है।।

बन्दर के हाथ हल्दी की गांठ लगी वह पंसारी बन बैठा।
अंधे के पांव तले बटेर आया वह शिकारी बन बैठा ।।

बन्दर बहुत ऊँचा चढ़ने पर अपनी दुम ज्यादा दिखाता है ।
ऊँची डींग हांकने वाला कभी कुछ करके नहीं दिखाता है ।

बन्दर को अधिकार मिला वह नदी प्रवाह के विरुद्ध तैरने चला ।
गधा पहाड़ पर क्या चढ़ा वह पहाड़ को छोटा समझने लगा ।।

अंडे से निकला चूज़ा वह उसे ही हिकारत से देखने चला।
वह घोड़े पर क्या सवार हुआ बाप पहचानना भूल गया ।।

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है ।
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है।।

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है।
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है ।।


....कविता रावत

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November 11, 2011 at 10:13 AM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है
Badee pate kee baat kahee hai!

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November 11, 2011 at 10:25 AM

कविता का संदेश प्रेरक है। जैसे अहंभाव से घमण्ड पैदा होता है वैसे ही विभ्रम मोह का परिणाम है।

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November 11, 2011 at 11:02 AM

बहुत ही बढि़या ...प्रेरणात्‍मक प्रस्‍तुति ।

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November 11, 2011 at 12:22 PM

अभिमान ही पतन का कारण होता है

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November 11, 2011 at 2:23 PM

आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है
sarvsaty.........
bahut sundar prernadayi rachna..

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November 11, 2011 at 2:24 PM

बहुत अच्छा व्यंग्य लिए रचना ।


अपने विचारों से अवगत कराएँ !
अच्छा ठीक है -2

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November 11, 2011 at 2:42 PM

अभिमान ही जड़ है समस्त समस्यायों की...

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November 11, 2011 at 3:03 PM

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है
..बिंदास रचना ..

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November 11, 2011 at 3:21 PM

फल भरी डाल सदा ही झुक जाती है।

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November 11, 2011 at 3:28 PM

गहरा व्‍यंग्‍य।
मौजूदा दौर में प्रासंगिक रचना।

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November 11, 2011 at 3:33 PM

बन्दर के हाथ हल्दी की गांठ लगी वह पंसारी बन बैठा
अंधे के पांव तले बटेर आया वह शिकारी बन बैठा ........................... बुद्धि और प्रेम कभी बर्बाद नहीं करते . अभिमान तो बस अधजल गगरी के समान है

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November 11, 2011 at 4:28 PM

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है
अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है

.........
aapne to kamal ki baat kahi di ...aaj jameenon aur kamino ka hi jamana hai ..
sadar prastut

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November 11, 2011 at 5:33 PM

बन्दर के हाथ हल्दी की गांठ लगी वह पंसारी बन बैठा
अंधे के पांव तले बटेर आया वह शिकारी बन बैठा
बन्दर बहुत ऊँचा चढ़ने पर अपनी दुम ज्यादा दिखाता है
ऊँची डींग हांकने वाला कभी कुछ करके नहीं दिखाता है
.....
बन्दर राज और बन्दर बाँट ही आजकल जोर शोर से चल रहा है और दुम दिखाने वाले बंदरों की देश में कोई कमी नहीं लेकिन दुम खींचने की फौज भी कुछ कम नहीं...
व्यवस्था पर सटीक कथन ... बहुत आभार

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November 11, 2011 at 5:45 PM

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! सूचनार्थ!

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November 11, 2011 at 5:57 PM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है

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November 11, 2011 at 6:04 PM

वाह --कविता और कहावतें ।
बहुत सुन्दर समागम है ।

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November 11, 2011 at 6:05 PM

Waah! Bahut kaam ki batein kahin aapne...

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November 11, 2011 at 6:24 PM

"घमंडी का सर नीचा "यह कहावत हैं भी याद है

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November 11, 2011 at 7:17 PM This comment has been removed by the author.
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November 11, 2011 at 7:18 PM

वह बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति मेरा ऐसा मानना है कि भगवान ने घमंड तो राजा रावण का नहीं रखा तो यह इंसान क्या चीज़ है। मगर आपका लिखा भी बहुत खूब और सटीक है कि आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है।
समय मिले कभी तो आयेगा ज़रूर मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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November 11, 2011 at 8:05 PM






आदरणीया कविता रावत जी
सादर प्रणाम !

जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है
:)
क्या बात है !

# अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है
रचना की सबसे ख़ूबसूरत पंक्ति !

प्रेरक विचारों की प्रस्तुति के लिए आभार !

बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

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November 11, 2011 at 8:16 PM

बन्दर के हाथ हल्दी की गांठ लगी वह पंसारी बन बैठा
ऐसे पंसारी आज तो हर ओर विद्यमान हैं
सुन्दर भाव

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November 11, 2011 at 8:18 PM

अभिमान ऐसा फूल है जो शैतान की बगिया में उगता है....
वाह! वाह! अलग अंदाज की सार्थक रचना...
सादर...

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November 11, 2011 at 8:19 PM

आदमी प्रेम से नहीं
मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है ...
बिलकुल सही कहा ....बधाई

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November 11, 2011 at 8:24 PM

कविता के तेवर काबिले तारीफ हैं।

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November 11, 2011 at 9:07 PM

सूक्तियों की नव-प्रस्तुति रोचक लगी!!

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Anonymous
November 11, 2011 at 9:42 PM

कविता जी जी
सुन्दर भाव
अभिमान आदमी की अपनी त्रुटियों का मुखौटा होता है
अशोक कुमार शुक्ला
स्व0 अमृता प्रीतम जी के निवास के25 हौज खास को बचाकर उसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संजोने के लिये अनेक साहित्य प्रेमियों द्वारा माननीय राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य एवं दिल्ली सरकार से अनुरोध किया है। ऐसा विश्वास है कि इस मुहिम का असर अवश्य ही होगा । फिलहाल इस मुहिम में शामिल लोगों के प्रयासों का हाल लिंक के रूप में आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ साथ ही यह भी उम्मीद करूँगा कि आप भी अपना अमूल्य सहयोग देकर इस मुहिम को आगे बढाते हुये महामहिम से इस प्रकरण में हस्तक्षेप का अनुरोध अवश्य करेंगें। कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें यहाँ महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है ।!!!!

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November 11, 2011 at 10:07 PM

bahut khoob.har line me prerak sootr. vadhai.

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November 11, 2011 at 10:44 PM

कविता जी ..बहुत ही सही लिखा है आपने....शानदार।

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November 11, 2011 at 11:06 PM

ना था कुछ तो ख़ुदा था...कुछ ना होता तो ख़ुदा होता...
डुबोया मुझको होने ने...न होता गर तो क्या होता...

अभिमान मिथ्या है...अगर बच सको...

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November 12, 2011 at 9:07 AM

अभिमानी लोग अपना प्रभाव खो बैठते हैं !
शुभकामनायें आपको !

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November 12, 2011 at 10:21 AM

सभी पंक्तियाँ हकीकत से रूबरू कराती हुई !
बहुत सुन्दर ...
बधाई !

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November 12, 2011 at 2:16 PM

सच्ची बात सुनता कौन है
पढते सब हैं ,मानता कौन है ...? ईमानदारी भरा प्रयास ?
शुभकामनाएँ!

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November 12, 2011 at 2:55 PM

सही आंकलन,इंसानी फ़ितरत का.

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November 12, 2011 at 4:50 PM

aapne sahee likhaa hai


मेरी "मैं" ने
मुझ को मारा
ख्याल करो
तुम्हारी "मैं"
तुम्हें मारेगी
bas itnaa saa dhyaan kar lo

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RAJ
November 12, 2011 at 4:53 PM

अंडे से निकला चूज़ा वह उसे ही हिकारत से देखने चला!
वह घोड़े पर क्या सवार हुआ बाप पहचानना भूल गया !!

..आजकल यही हालात हरतरफ नज़र आते है.....

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है !
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है!!
...सही कहा ..बहुत ऊँचे है आज के समय में जमीनों और कमीनो के भाव.. और बढ़ते ही जा रहे है.....
सुन्दर रचना ..

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November 12, 2011 at 4:59 PM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!
..बहुत दूर और बड़े पते के बात....

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November 12, 2011 at 5:17 PM

सच है ये अभीमान पतन से पहले अपने शबाब पर होता है.....बहुत सुन्दर

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November 12, 2011 at 5:19 PM

sahee likhaa hai aapne
saaree samasyaaon kee jad hai "main" "aham" ,

मेरी "मैं" ने
मुझ को मारा
ख्याल करो
तुम्हारी "मैं"
तुम्हें मारेगी

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November 12, 2011 at 6:59 PM

जहाँ उत्कृष्टता पाई जाती है वहाँ अभिमान आ जाता है!
अभिमान आदमी की अपनी त्रुटियों का मुखौटा होता है!!
अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है
दूर की कौड़ियाँ समेट ली!!

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November 12, 2011 at 7:04 PM

बहुत सुन्दर बेजोड़ रचना..
लोकोक्तियों का कविता के माध्यम से अनुपम उपहार ...
बहुत आभार!!!

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November 12, 2011 at 7:33 PM

आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !बहुत सुन्दर.

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November 12, 2011 at 10:23 PM

अच्छी लगी रचना..

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November 12, 2011 at 11:07 PM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

सार्थक सन्देश देती अच्छी प्रस्तुति

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November 13, 2011 at 12:37 AM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

बहुत सुन्दर रचना..
लोकोक्तियों के माध्यम से बहुत अच्छा सन्देश दिया है आपने...

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November 13, 2011 at 9:34 AM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

..बहुत बढ़िया सन्देश दिया है ..

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November 13, 2011 at 12:48 PM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

सुंदर रचना के माध्यम से अच्छा सन्देश.

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November 13, 2011 at 4:57 PM

जी ऐसा व्यंग कभी कभी ही पढने को मिलता है।
बहुत सुंदर

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November 14, 2011 at 8:42 AM

ऊँची डींग हांकने वाला कभी कुछ करके नहीं दिखाता है !
बिल्कुल सही कहा है आपने ! बहुत ही सुन्दर, सटीक और सार्थक प्रस्तुती!

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November 14, 2011 at 2:13 PM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

...बहुत सटीक और प्रेरक प्रस्तुति..

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November 15, 2011 at 3:58 PM

सार्थक सन्देश देती अच्छी प्रस्तुति...

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November 16, 2011 at 10:34 AM

सुन्दर रचना !!
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए
manojbijnori12 .blogspot .कॉम

अगर पोस्ट सही लगे तो फोलोवर बनकर हमको मार्गदर्शित करे और हमारा उत्साह बढाए .

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November 17, 2011 at 4:35 PM

रावत जी आप की शुरुवाती और अंतिम कड़ी में बहुत दम है ! बिलकुल सच !सुन्दर व्यवहार ! बहुत बधाई

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November 18, 2011 at 8:39 PM

सुन्दर बहुत सटीक और प्रेरक प्रस्तुति.

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November 19, 2011 at 10:13 PM

सार्थक सन्देश देती अच्छी प्रस्तुति...

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November 21, 2011 at 2:54 PM

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है !
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है!!
बहुत सटीक रचना

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November 22, 2011 at 8:14 AM

आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है..
सच..सुन्दर सच और खरी बात..

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November 22, 2011 at 3:03 PM

दमदार सार्थक सन्देश देती सुंदर रचना बहुत अच्छी लगी..
बेहतरीन पोस्ट
मेरे नए पोस्ट पर आइये स्वागत है ...

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November 23, 2011 at 7:19 AM

Hi..

Pichhle kai maheene daure main guzrr. Ab main punah lauta hun to aapki yah kavita padhi..

Kavita kya lokoktiyon aur muhavaron ka sarthak sammishran kar aapne vyakti ke aham ka vishleshan kiya hai..

Nisandeh aapki kavita prashansneey aur prerak hai..yah kavita apne table par sheeshe ke neeche rakhne layak hai..

Aapka dhanyawad ki aapne hame humare aham ka parichay karaya..

Deepak Shukla..

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November 23, 2011 at 9:59 AM

अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!
.....
very very nice
..

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November 23, 2011 at 4:20 PM

जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है!!
अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !

PRATYEK PANKTI EK SOOTRA KI TARAH JEEVNOPYOGI HAI.

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November 25, 2011 at 6:57 AM

पतन से पहले इंसान में मिथ्या अभिमान आ जाता है !
जमीनों और कमीनों का भाव कभी कम नहीं होता है!!
अभिमान ऐसा फूल जो शैतान की बगिया में उगता है!
आदमी प्रेम से नहीं मिथ्या अभिमान से बर्बाद होता है !!

सच..सुन्दर सच और खरी बात..............
सटीक रचना

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November 26, 2011 at 11:22 AM

aham aur ahankaar
sambhavtah manushy kaa sabse badaa avgun hai

bahut saartha vichaar

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November 29, 2011 at 7:07 PM

बहुत ही बढि़या ...प्रेरणात्‍मक प्रस्‍तुति ।

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December 1, 2011 at 4:24 PM

आदरणीया कविता रावत जी को वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक बधाइयाँ...!

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December 1, 2011 at 7:16 PM

कविता जी ,आपकी यह कविता कर रही है कमाल
धोती को फाड फाड बना रही है सुन्दर रूमाल
अभिमान का भी ऐसा ही हश्र होना चाहिये.
नित गलाते जाएँ अंत जो हो वह सुखद होना चाहिये.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

वैवाहिक वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.

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December 4, 2011 at 1:16 PM

कविता जी,मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार है.
हनुमान लीला पर अपने अमूल्य विचार और
अनुभव प्रस्तुत कर अनुग्रहित कीजियेगा.

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December 7, 2011 at 7:45 PM

आपको बहुत-बहुत बधाई!
हमारे साथ यह घटना 5 दिसम्बर को हुई थी!

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January 19, 2012 at 4:37 PM

बहुत ही बढि़या

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