वह राष्ट्रगान क्या समझेगा!

वह राष्ट्रगान क्या समझेगा!

गौरेया कितनी भी ऊँची क्यों न उड़े गरुड़ तो नहीं बन जाएगी
बिल्ली कितनी भी क्यों न उछले बाघ तो नहीं बन जाएगी!

घोड़े में जितनी  ताकत हो वह उतना ही बोझ उठा पायेगा
जिसे आदत पड़ गई लदने की वह जमीं पर क्या चलेगा!

जो अंडा नहीं उठा सकता है वह भला डंडा क्या उठाएगा
जो नहर पार नहीं कर सकता वह समुद्र क्या पार करेगा!

जो सीढ़ी नहीं चढ़ सकता वह भला पहाड़ पर क्या चढ़ेगा
जो फहरा के तिरंगा बुत खड़ा वह राष्ट्रगान क्या समझेगा!

                   ....कविता रावत 
अभी कितना चलना है

अभी कितना चलना है

न बुझते हुए दीपक को देखो
कि अभी उसे कितना जलना है
न उखडती हुई सांसों को देखो
कि अभी उन्हें कितना चलना है

गुजरा जो जिंदगी के हर मोड़ से
जिसके बोझिल कदम, ऑंखें नम हैं
उस से पूछो कहां गईं खुशियां
क्यों दफ़न दिल में अरमां हैं!

हर दिन किसी का उगता है सूरज
तो किसी की ढल जाती शाम है
जो मिट गए अपनों की खातिर
उनका देखो सुकूं भरा मुकाम है

   ..कविता रावत
निष्ठुर सर्द हवाओं से बेखबर........

निष्ठुर सर्द हवाओं से बेखबर........

जाड़ों की गुनगुनी धुप में
छत की मुंडेर पर
दिन-रात चुभती
निष्ठुर सर्द हवाओं से
होकर बेखबर
सूरज की रश्मि सी
बिखेर रही हो तुम
कच्ची, सौंधी, लुभावनी
प्यार भरी मुस्कान!
क्या पता है तुझे?
यह कीमती जेवर है तेरा 
इसे यूँ ही मत खो देना
जरा सम्भालकर कर रखना
बहुत आयेंगे करीब तेरे
अपना बन, अपना जताने
जो इस कीमती गहने को
चुराने को उद्यत मिलेंगे
लेकिन इतना याद रखना
कभी मत बिखेरना
अपने प्यार के मोती
अनजानी, बेखबर वीरान राह में
वर्ना छीन लेगा तुझसे
कोई अपना दुस्साहसी बन
खिलखिलाता जीवन
और तुम धूल धूसरित सी
बिखरी-बिखरी मिलो मुझे
छत के किसी कोने में!
           ....कविता रावत