क्या रखा है जागने में

क्या रखा है जागने में

जो जागत है वो खोवत है
जो सोवत है वो पावत है

सोओ-सोओ सोते सोते ही
नित नए सपने बोओ
सो सोकर ही तुम नित
मन में रामनाम को लाओ
सो सोकर मजे उडाओ
भला क्या रखा है भजने में
वो मजा कहाँ जगने में
जो मजा है चैन से सोने में

करो रतजगा जाओ दफ़्तर
जाकर कुछ फाईल टटोलो
जब नींद का आए झौंका
बैठ बैठ झपकी ले लो
अब भला कौन सगा है
इन फाईलों के पन्ने में
वो मजा कहाँ इन्‍हें पलटने में
जो मजा है झपकने में !

इधर-उधर बेमतलब जाना छोड़ो
सीधे घर नित अपने दौड़ो
छोड़ आपस की चिकचिक
चादर तान के घर में सोओ
भला क्या बनता है इस कदर
हरदिन यहां वहां भटकने में
वो मजा कहाँ चप्‍पल चटकाने में
जो मजा है नित खर्राने में !

सबसे सदा मिलजुल रहा करो
ज्यादा ऊंची मत दिया करो
गप्पें मारो जब न आये निंदिया
आते ही निदिंया तुरंत सो जाओ
अब भला क्या होता गप्पियाने से
वो मजा कहाँ गप्पियाने में
जो मजा है नींद में बड़बड़ाने में!
        
           @ Kavita Rawat
हर तरफ शोर आई बसंत बहार

हर तरफ शोर आई बसंत बहार

दर्द कितना छुपा हर जिगर में
बताती हैं किसी की खामोशियाँ
हर तरफ शोर आई बसंत बहा
चलो छोडो जिंदगी की तन्हाईयाँ!

यूँ तो जुगुनुओं सी चमक वाले
हर दिन दिखते नज़ारे जहाँ कहीं
पर चांद सी हँसती खिलखिलाती
हरतरफ नजर आती सिर्फ तुम्हीं!

तुम्‍हारा यूँ दबे पाँव न होता आना
तो कहाँ संभव था तुमसे मिल पाना
हम कहाँ कोई ताना बाना बुन पाते
अपनी ही उलझनों में सिर खपाते!

मुझे बता बासंती खुशरंग बयार तू
भला क्यों रहती है कटी-कटी सी
गाँव तो ठीक, शहर की बगिया में
क्यों मुझे दिखती है ठिठकी सी
          
     ....कविता रावत