जल बिन भर पिचकारी  कैसे खेलें होली ........

जल बिन भर पिचकारी कैसे खेलें होली ........

बच्चों की परीक्षा समाप्ति के दो दिन बाद ही परिणाम भी। और फिर होली के दूसरे दिन से ही नए सत्र का आरंभ, मतलब भागम-भागम नहीं तो और क्या! सोचा था दो चार दिन सुकून और फिर बच्चों के साथ होली का धमाल कर कुछ पल ख़ुशी के अपने नाम कर लिए जाएँगे, पर शायद आराम नाम की चिड़िया अब नजर ही नहीं आएगी। सबकुछ भुलाकर बच्चों की किताब-कापी, यूनिफ़ॉर्म के साथ-साथ बच्चों की होली पर विशेष फ़रमाइश। ब्लॉग पर कुछ रंगारंग प्रस्तुति की उधेड़बुन में भूली-बिसरी होली के रंगों में डूब हिचकोले खाने लगी हूँ. बहुत समझाईश के बाद भी जब ऑफिस से लौट बच्चों को मौसी के घर से वापस लेकर आती हूँ तो हर दिन रास्ते में बड़ी-बड़ी पिचकारी देख दुकान के पास ठिठक रूठकर रोना धोना शुरू कर देते हैं. समझाती हूँ कि देखो हमारा घर चौथी मंजिल पर है, जहाँ दो दिन बाद २०-२५ मिनट पानी आता है, जैसे कोई दमे से पीड़ित जान पहचान वाला बड़ी हिम्‍मत कर चौथे माले पर आकर बड़ी-बड़ी सिसकियाँ भर बेदम होकर फिर दुबारा आने न के लिए माफ़ी मांगने लगता है. ऐसे में हालत में भला पिचकारियाँ किस काम की, होली खेले तो कैसे खेलें? बिना पानी बच्चों को क्या बड़ों को भी होली खेलने का कहाँ मजा आता है! 
         वैसे तो पानी की यह समस्या निरंतर बनी है, पर होली के बहाने हम सभी मोहल्ले वालों ने भी मिलकर एक संगोष्ठी का आयोजन कर 'तिलक होली' खेलने का निर्णय लिया. इसमें बच्चों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया था, क्योंकि बच्चों को समझाना अच्छे-अच्छों के बूते की बात नहीं होती है. संगोष्ठी में बच्चों का विद्रोही रूप तो सामने आया ही लेकिन शेष सभी बड़े-बुजुर्गों का एक मंतव्य था. शायद इस विषय पर आज सबको गहन मंथन की आवश्यकता है कि 'जल की एक-एक बूँद कीमती है, 'जल बचाओ' , जंगल बचाओ' , जल ही जीवन है' बिन पानी सब सून' - ये उक्तियाँ अब मात्र नारे नहीं बल्कि जीवन की आवश्यकता बन गई हैं. जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल-आपूर्ति आज के युग की गंभीर समस्या बन गयी है. अब वातानुकूलित कमरों में बैठकर बैठक, सेमिनार में पानी की तरह पैसा बहाते हुए मिनरल वाटर और चाय-कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ गंभीर मुद्रा में बड़ी-बड़ी बातें, घोषणाएं और वायदों करने वालों की खबर लेने के लिया सबको आगे आना ही होगा. बिना एकजुट होकर जागरूक न होने से इस समस्या से निजात नहीं मिल सकती है. हमें अब यह समझ लेना बहुत जरुरी है कि इस समस्या के लिए सिर्फ सरकार व उसके नुमाईंदे या कोई वर्ग विशेष ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि गाहे-बगाहे हम लोग भी तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जाने-अनजाने जिम्मेदार हैं. तालाबों, कुओं का गहरीकरण, झील, बावड़ी व पोखरों के जल को प्रदूषण मुक्त कराने हेतु हम स्वयं कितने जागरूक हैं. यह बताने की बात नहीं! गाँव व शहर से सभी लोगों को जल के स्रोत में गंदें पानी, कागज़, पोलीथिन, सड़े-गले पौधे और कूड़े-कचरे का ढेर जमा करते देख हम कितना चेत पायें हैं यह आये दिन हमारे घरों में नल के माध्यम से आने वाले प्रदूषित जल, जो हमारे लिए अमृततुल्य है, आज प्रदूषित होकर मनुष्य तो क्या अपितु जीव-जंतुओं के लिए भी प्राणघातक बनता जा रहा है.
शायद यह समस्या आज भले ही विकराल न दिखती हो लेकिन घर में पानी की समस्या के चलते और भीषण गर्मी में लोगों को पानी के लिए लिए भटकते, लड़ने-मरने की खबर भर से रोंगटे खड़े होने लगे हैं . यह सोचकर तो और भी बुरा हाल हो रहा है कि कहीं समय रहते यदि जल संकट के प्रति हम सचेत और दृढ संकल्पित होकर आगे नहीं आये तो वैज्ञानिक आइन्स्टीन की कही बात सच होती नजर आती है। जिन्होंने कहा था की तीसरा महायुद्ध चाहे परमाणु अस्त्रों से लड़ लिया जाय पर चौथा महायुद्ध यदि होगा तो पत्थरों से लड़ा जायेगा। और इससे एक कदम आगे बढ़कर नास्त्रे [Michel de Nostredame] ने भविष्यवाणी की थी कि चौथा महायुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा ? यदि इस भविष्यवाणी को झुठलाना है तो होली के नाम पर व्‍यर्थ पानी बहाने की बजाय इसे गंभीरता से लेते हुए 'तिलक होली' खेलें और सबको इसके लिए प्रेरित करें.
अब हमें तो बच्चों ने सुझाया है कि पहले घर में बड़ों की तिलक होली हो जाय और फिर दिन में बड़े तालाब की सैर करते हुए वहीँ किनारे बड़ी-बड़ी पिचकारी भर भर हम बच्चों की होली भी हो जाय! अब आप बुरा न माने हमें तो अबकी बार बच्चों की इस जिद्द के आगे बेवस होकर बड़े ताल में होली खेलने जाना होगा! नहीं तो हमारी खैर नहीं! बाकी फिर कभी......
सभी ब्लोग्गर्स और सुधि पाठकों को होली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें.
-कविता रावत
      
प्रभु! अपना तो  कैलाश ही भला.....

प्रभु! अपना तो कैलाश ही भला.....

सभी ब्‍लागर साथियों और सुधि पाठकों को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। इन दिनों आप  सबके ब्लॉग पर न आ पाने  के लिए क्षमा चाहती हूँ।  स्कूल तो बच्‍चे जाते हैं लेकिन परीक्षा मेरी चल रही है। बच्चों को साथ बिठाकर पढ़ाना, समझाना बहुत  सरल काम नहीं है आप भी जानते हैं! खैर बच्चों की माथा-पच्ची पर फिर कभी बात करेंगे।  फिलहाल आप मेरे लिए अपने ब्लॉग से कुछ दिन का आकस्मिक अवकाश स्वीकृत करते हुए प्रस्तुत शिव-पार्वती प्रसंग पर  विचार-मंथन कर अपने विचार व्यक्त कीजियेगा ...
कुछ समय पहले शिवजी-पार्वती कैलाश पर  पृथ्वीवासियों के धार्मिक कर्मकांड के विषय पर गहन चर्चा कर रहे थे। पार्वती ने शिवजी से पूछा- "भगवन! पृथ्वी पर लोग इतना कर्मकांड करते हैं फिर भी उन्हें इसका लाभ क्यों नहीं मिलता!"  शिवजी गंभीर होकर बोले- "आज मनुष्य के जीवन में आडम्बर छाया है।  लोग धार्मिकता का दिखावा करते हैं, उनके मन वैसे नहीं हैं। वे आस्‍था प्रगट जरूर करते हैं, पर वास्‍तव में अनास्‍था में जीते हैं।"
       पार्वती ने कहा मुझे इस बात पर विश्‍वास नहीं होता। शिवजी  ने कहा  इसकी पुष्टि हेतु धरती पर चलते हैं।  पार्वती ने सुंदरी साध्वी पत्नी और शिवजी ने कोढ़ी का रूप धारण किया और कैलाश पर्वत से उतरकर एक विशाल शिव मंदिर की सीढियों के समीप बैठ गए।
        मंदिर में जाने वाले  धर्मप्रिय भक्त, दानी दाता  पार्वती जी का रूप देखकर  आह भरकर नजर डालते और फिर मन मसोसकर सिक्के, रुपये डालते हुए आगे बढ़ जाते। कोढ़ी बने शिवजी को तो कोई देखना भी नहीं चाहता था। उनके  सामने बिछे कपड़े पर इक्का-दुक्का सिक्‍के ही  नजर आ रहे थे।   पार्वती जी  जैसे-तैसे इसका सामना करती रहीं। हद तो तब हो गई जब कुछ मनचले पार्वती जी को यह कहने से भी बाज नहीं आए कि- 'कहाँ इस कोढ़ी के साथ बैठी हो, चलो हमारे साथ रानी बनाकर रखेंगे।"
         शिवजी पार्वती को देखकर मुस्‍कराए।  पार्वती उनकी मुस्‍कान में छिपा कटाक्ष समझ गईं। वे हारकर  शिवजी से बोली - "प्रभु! लौट चलिए। अपना तो कैलाश ही भला।  सहन नहीं होता इन पाखंडियों का यह कुत्सित स्वरुप! क्या यही मनुष्य हमारी सर्वोत्कृष्ट संरचना और शक्तिशाली कृति हैं?"
यह सवाल केवल शिवजी से नहीं हम सबसे है।

        आईए इस महाशिवरात्रि के अवसर पर धार्मिक आडम्बर से दूर रहने और इसे मिटाने के लिए निरंतर प्रयास करते हुए  अपने  मनुष्य होने को सार्थक करने का संकल्‍प करें।

  ...कविता रावत