घर में किलकारी की ख़ुशी

घर में किलकारी की ख़ुशी


हम सभी जानते हैं कि हर दिन उजालों का मेला नहीं होता।  दुर्दिन हर आदमी को इस संसार की यथार्थता का ज्ञान देर सवेर करा ही देते हैं। मैं समझती हूँ इससे हमारी दुःख की अग्नि का मैल ही कटता है जिससे हम परिस्थितियों के अनुकूल चलने की कला सीखने में सक्षम हो पाते हैं. शीतल छाया का वास्तविक आनंद उसी को प्राप्त होता है, जो धूप की गर्मी सह चुकता है। विवाह के कई बरस बाद घर में गूंजती किलकारी की ख़ुशी का मायना उस हर माँ की आँखों में कोई भी सहज रूप से देख सकता है, जिसने उसे अपने ही घर परिवार और नाते रिश्‍तेदारों से मिले तानों के कडुवे घूँट पीते हुए दिन काटते देखा हो। उनका दुःख समझा हो।
      मैं यह बात अच्‍छी तरह समझ सकती हूं कि किसी भी दम्‍पति के भाग्‍य में जब मां-बाप बनना लिखा होता है तभी होता है। लेकिन आज के पढ़े-लिखे सभ्‍य समझे जाने वाले समाज में मां-बाप की लाडली समझी जाने वाली बेटी बहू बनती है, तो अगले एक-दो साल में मां न बनने पर उसे अपने घर-परिवार और परिचितों में तमाम तरह के ताने सुनने पड़ते हैं। उसे जिस अनावश्‍यक कोप का भाजन बनना पड़ता है, वह किसी त्रासदी से कम नहीं है।  अपने सबसे करीबी लोगों को कई अवसरों पर समझाना कुछ कठिन अवश्‍य होता है, लेकिन मैं बेटी-बहू के प्रति ऐसा नजरिया रखने वाले लोगों के सुख-दुख में शरीक होकर उनके नजरिए को बदलने का भरसक प्रयास करती रहती हूं। इस प्रयास में कभी कभी अप्रिय संवाद के दौर से भी गुजरना पड़ता है। बावजूद इसके जब कभी मैं इसका सकारात्‍मक प्रभाव खुद अपनी आंखों से देखती हूं तो मुझे वह मेरी बड़ी उपलब्धि दिखती है।
     12 बरस बाद इस 12 जुलाई का दिन मेरे लिए एक विशेष खुशी का पैगाम लेकर आया। इस दिन मेरी छोटी बहन की गोद में एक हंसता-खेलता बच्‍चा आया और उसके चेहरे पर न कटने वाले असहनीय पीड़ादायक लम्‍बे क्षणों के गुजरने के बाद खुशी की लहर। असहनीय पीड़ादायक इसलिए कह रही हूं क्‍योंकि मैं स्‍वयं भी 10 बरस के लम्‍बी अवधि के बाद ही मां बनने का गौरव हासिल कर पाई थी। डॉक्‍टर ने ऑपरेशन के बाद जब बच्‍चे की खुशखबरी दी तो अस्‍पताल में डेरा डाले घर के सभी लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सच कहूं तो मुझे भी मासी बनने की कुछ ज्‍यादा ही खुशी है। अपनी इस खुशी को मैं आप सबके साथ भी बांट रही हूं।


कविता रावत 

गाँव में देवी पूजन : अष्टबलि

गाँव में देवी पूजन : अष्टबलि

इस बार गर्मियों की छुट्टियों में बच्‍चे  गाँव जाने के लिए बेहद उतावले थे। क्योंकि घर में आपसी चर्चा में वे जान गए थे कि  इस बार गाँव में देवी पूजन (अष्टबलि) का आयोजन पक्‍का है। इसे देखने और इसके बारे में जानने की  जिज्ञासा उनमें कुछ ज्‍यादा ही थी।  भोपाल निवास के बाद भी हमारा किसी न किसी कारण से गाँव आना-जाना लगा ही रहता है, बावजूद इसके गाँव की सामूहिक देवी पूजन (अष्टबलि) को देखने-समझने का यह दुर्लभ संयोग मुझे २0-२2 वर्ष बाद अब जाकर मिल पाया। बचपन में मुझमें देवी-देवताओं के नाम पर होने वाले इस तरह के धार्मिक पूजा-पाठ जिसमें पशुबलि दी जाने की परम्परा सदियों से जस-तस चली आ रही है, को गहराई से समझने की समझ कतई नहीं थी। लेकिन आज जब मैं इस बारे में कुछ समझ रखती हूं तब मेरी उत्सुकता देवी पूजन से ज्यादा इस बात में थी कि देवी पूजन के बहाने आस-पास के गाँव के भूले-बिसरे और देश-विदेश से आए परिचितों,नाते-रिश्तेदारों से मेल-मुलाकात संभव हो सकेगी। प्राय: ऐसे धार्मिक अवसर वर्षों से गाँव से दूर निवासरत लगभग सभी लोगों को आपस में मिलाने का एक सबसे अच्छा माध्यम बनता है इस तरह के विशिष्ट देवी पूजन में आस-पास के गाँवों को भी आमंत्रित किया जाता है, जो गाजे-बाजों सहित इसमें शामिल होकर आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।
भोपाल से ट्रेन द्वारा दिल्ली और फिर दिल्ली से बस द्वारा गाँव तक की दुरूह यात्रा (इसलिए क्योंकि बस से गाँव की यात्रा करते समय गर्मियों में क्‍या कम पापड बेलने पड़ते हैं)। दिल्ली से रामनगर (नैनीताल) तक के सफ़र में कोई खास परेशानी नहीं हुई। लेकिन जब ३० सीटर बस ने जो अन्दर और बाहर यानी छत दोनों जगह ठूस-ठूस कर भरी थी, रवानगी भरी तो ४ बार खराब होने के बाद ३ घंटे बिलम्ब से लेकिन सही सलामत हमें गाँव पहुंचाकर ही दम लिया। सच मानिए उस वक्त मुझे अपार ख़ुशी हुई। सभी जानते हैं कि आजकल गाँव की खतरनाक उबड़-खाबड़ पहाड़ी सड़कों पर डीजल कम मिट्टी के तेल से बेख़ौफ़ धुक-धुक कर चलने वाली शहर में कंडम घोषित अधिकांश बसें और जीपें देवभूमि में ईश्वरीय कृपा और दयादृष्टि के बलबूते ही लोगों को सही सलामत अपने ठौर-ठिकाने पर पहुंचा पा रही हैं।  मेरे लिए इसके अतिरिक्त बस के सफ़र में प्रकृति के अनमोल धरोहर   पहाड़ों का अद्भुत सौन्दर्य और गाँव के लोगों का मधुर हास-परिहास इस भयावहता को भूलने के लिए कम नहीं था, जिसमें मैं बार-बार खो जाती।
रात को चूल्हे के पास बैठ कई दिन बाद पोदीने की चटनी के साथ देशी घी में चुपड़ी कोदो (मंडुआ) की गर्मागर्म रोटी का स्वाद लेने के बाद जब मैंने पहले जागर गीतों के साथ देवी के नियत स्थान के घर के अन्दर देवी-देवताओं का डमरू और कांसे की थाली  के साथ नृत्य और बाद में घर के बाहर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी-देवताओं का अद्भुत नृत्य देखा, तब सचमुच मन को कुछ पल ही सही लेकिन आलौकिक आनंद की अनुभूति हुई। सुबह जब सारे गाँव के लोग इकठ्ठा होकर ढोल-दमाऊं की ताल पर देवी  माँ की जय-जयकार कर नाचते-गाते गाँव से लगभग २ किलोमीटर दूर जंगल में बने  देवी मंदिर के लिए रवाना हुए तो संकरी ऊँची-नीची पहाड़ी पगडंडियों  को  हमने  छोटे बच्चों सहित कब नाप लिया, पता ही नहीं चला। इधर एकतरफ गाँव से दूर चीड़ के पेड़ों से घिरी मोहक प्रकृति की गोद में बने देवी मंदिर के चौक में बिना किसी उंच-नीच व भेदभाव के सभी जाति विशेष के देवी-देवताओं के ढोल-दमाऊं की ताल पर सामूहिक नृत्य का क्रम  तो दूसरी तरफ  देश-विदेश और दूर-दूर से आये नाते-रिश्तेदारों से  गाँव  के बड़े-बुजुर्गों का परस्पर खैर-ख़बरों के आदान-प्रदान का सिलसिला जारी था। इन सबसे हटकर मंदिर के ठीक पीछे की ओर जहाँ खाने-पीने के शौकीनों लोगों का गर्मागर्म जलेबी और चाउमिन का लुत्फ़ उठाने के लिए जमवाड़ा लगा था, वहीँ दूसरी ओर मनौतियों के पूर्ण होने के प्रतीक रूप अपनी बलि से सर्वथा बेखबर अपनी खूंटी के आस-पास की हरी-भरी घास खाने के लालच में आपस में एक दूसरे से  भिड़ते भेड़ों का नज़ारा भी बहुत कुछ देखने/समझने के लिए कम न था!  इसके अलावा दूसरे गाँव के लोगों को एक के बाद एक कतारबद्ध सुन्दर पहाड़ी घाटियों से गाजे बाजों सहित अपने सारे दुखड़ों की पोटली ताक़ पर रख नाच-गाकर मंदिर की ओर बढ़ते देख मन उमंग से भर उठता मुझे इस अवसर पर देवी-देवताओं के साथ-साथ सभी लोगों का आपस में बिना छुआछूत और भेदभाव का मेल-मिलाप सबसे सुखकर लगा। क्योंकि सभी जानते हैं बार-बार ऐसे धार्मिक आयोजनों के बाद भी ऐसी भावना को देखने के लिए अक्सर ऑंखें तरस कर रह जाती हैं! 
देवी-देवताओं के नृत्य के अंतिम पड़ाव में जब देवी को अर्पित की जाने वाली ८ बलि जिसमें भैंसा मुख्य और भेड़ आदि बाद में आते हैंकी बलि देने का समय नजदीक आया तो मैं देवी-देवताओं में अपार श्रृद्धा के बावजूद  चिरकाल से लोगों की अपनी मनौतियों और गाँव की खुशहाली और मंगलकामना के नाम पर बिना किसी सामाजिक बदलाव के इस मूक पशुबलि के नज़ारे को खुली आँखों से  देखने की हिम्मत नहीं जुटा पायी।  मंदिर से लौटते समय जब मैंने गाँव के लोगों की स्थिति पर विचार किया तो मुझे साफ़ दिखाई दिया कि गाँव में आज भी कुछ ही लोगों के स्थिति ठीक-ठाक है, अधिकांश की स्थिति को ठीक कहना किसी भी तरह से मैं उचित नहीं समझती इस विषय पर सोचने लगी काश गाँव के लोग इस बात को गहराई से समझकर बलि के इन पशुओं को यदि इन गरीब लोगों को उनकी आजीविका के लिए देवी-देवताओं के माध्यम से भेंट करते तो एक नयी स्वस्थ धार्मिक परंपरा की खुशहाल धारा बहने के साथ ही  हमारी देवभूमि का एक सन्देश दुनिया भर में फैलता। पर  मुझे पता था कि पशुबलि के स्थान पर इस तरह की नयी स्वस्थ परंपरा के लिए धार्मिक भावना से भरे लोगों को मेरा समझाना बहुत टेढ़ी खीर है, फिर भी जब मैंने मानवीय नेक भावना के चलते गाँव  आए हुए देश-विदेश और गाँव के बहुत से लोगों के इस विषय में विचार जानने चाहे तो मुझे बहुत मायूस नहीं होना पड़ा। इस क्रम में जब मुझे कई लोगों ने यह जानकारी दी कि हमारे अधिकांश गाँवों में लोगों ने आपस में मिल-बैठ गहन विचार-विमर्श कर राजी ख़ुशी से अब पशुओं के बलि पर प्रतिबन्ध लगा रखा है तो मुझे यह सुनकर बहुत आत्मसंतुष्टि मिली।
आधुनिक बदलते परिवेश में आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में इस तरह देवी-देवताओं के पूजन में पशुबलि की परम्परा बदस्तूर जारी है, इसका नया स्वरुप कैसा हो; इस बारे में आप भी जरूर कुछ कहना चाहेगें।  इस विषय पर आपके बहुमूल्य विचार/सुझावों का मुझे इन्तजार रहेगा।

...कविता रावत