दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है!

सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है 
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है

कोई जंजीर सबसे कमजोर कड़ी से ज्यादा मजबूत नहीं होती है
हर कोई भाग खड़ा होता जहाँ दीवार सबसे कमजोर दिखती है

जब बड़े घंटे बजने लगे तब छोटी घंटियों की आवाज दब जाती है 
जब घर में सांप घुस आये तब बोलती बंद होते देर नहीं लगती है

अपनी गलती का पता लगा लेना बहुत बड़ी समझदारी होती है
वक्त को पहचानने के लिए समझदारी की जरुरत पड़ती है

जहाज डूब जाने के बाद हर कोई बचाने का उपाय जानता है 
अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!  

    ...कविता रावत 

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March 15, 2012 at 10:27 AM

वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है! very good.

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March 15, 2012 at 11:07 AM

वक्त को पहचानने के लिए समझदारी की जरुरत पड़ती हैsarv saty baat...

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March 15, 2012 at 11:42 AM

सुन्दर. नासमझ बने रहें तो ज़िन्दगी आसान होती है.

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March 15, 2012 at 12:47 PM

हर कोई भाग खड़ा होता जहाँ दीवार सबसे कमजोर दिखती है

बहुत बहुत सार्थक अभिव्यक्ति....
सादर.

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March 15, 2012 at 1:34 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
बहुत बढ़िया सार्थक सुंदर रचना,...

RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

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March 15, 2012 at 2:03 PM

अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है ...

सच कहा है ... बहुत आसान होता है ऐसा करना ... हर पंक्ति सटीक है ... दुनियादारी की बातों से लबरेज है ये रचना ...

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March 15, 2012 at 3:11 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!

वाह क्या बात है !
बहुत खूब, जोरदार लिखा है

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March 15, 2012 at 3:16 PM

कोई जंजीर सबसे कमजोर कड़ी से ज्यादा मजबूत नहीं होती है
हर कोई भाग खड़ा होता जहाँ दीवार सबसे कमजोर दिखती है
जब बड़े घंटे बजने लगे तब छोटी घंटियों की आवाज दब जाती है
जब घर में सांप घुस आये तब बोलती बंद होते देर नहीं लगती है
/////
बहुत सुन्दर गंभीर व विचारणीय रचना

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March 15, 2012 at 3:24 PM

कमाल की ज्ञान की बातें!!

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March 15, 2012 at 3:48 PM

पैसा/सत्‍ता की बोली में व्‍याकरण की गलतियां नहीं देखी जातीं.

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March 15, 2012 at 4:30 PM

जब बड़े घंटे बजने लगे तब छोटी घंटियों की आवाज दब जाती है

बहुत सुन्दर सृजन !
आभार !

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March 15, 2012 at 4:52 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
एकदम सटीक हालात बयां किये हैं.....आपने कविता जी

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March 15, 2012 at 4:56 PM

सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है
......
पर देश में सयानों को कमी कहाँ है एक से एक बढ़कर पटे पड़े हैं ..
अति सुन्दर सार्थक सृजन ...

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March 15, 2012 at 5:35 PM

सच कहा, अपने व्यक्तित्व के गढ्ढे कहाँ दिखते हैं।

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March 15, 2012 at 7:00 PM

वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!...

सही कहा आपने, बहुत खूब.

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March 15, 2012 at 7:09 PM

सही कहा आपने ....
शुभकामनायें !

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RAJ
March 15, 2012 at 7:43 PM

जब बड़े घंटे बजने लगे तब छोटी घंटियों की आवाज दब जाती है
जब घर में सांप घुस आये तब बोलती बंद होते देर नहीं लगती है

वाह भई क्या जबरदस्त बात कही आपने....बहुत अच्छे

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March 15, 2012 at 9:05 PM

बहुत सार्थक लोकोक्तियाँ लिखी हैं ।

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March 15, 2012 at 9:30 PM

SACH ...BAHUT SAHI LIKHA HAI AAPNE ,BADHAI:)

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March 15, 2012 at 9:55 PM

दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है!
बहुत ही बढ़िया बात कही है अपने..
नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
एकदम सटीक और बेहतरीन सुवाक्य....
बहुत बढ़िया रचना....

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March 15, 2012 at 10:44 PM

waah itani sari uktiyon ko ek sath padhna bhi ruchikar lga .....

aabhar...........!!

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March 15, 2012 at 10:45 PM

हकीकत को बयां करता एक करारा व अच्छा व्यंग्य. आभार !

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March 15, 2012 at 11:48 PM

रचना का संदेश लाजवाब है।

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March 16, 2012 at 5:43 AM

वहां बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मुर्खता से काम चलता है !
एक- एक पंक्ति सार्थक है !

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March 16, 2012 at 7:20 AM

बहुत ही सुंदर

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March 16, 2012 at 11:09 AM

बरछी सी तीखी , निशाने पर लगती हुई..

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March 16, 2012 at 11:13 AM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
..बहुत खूब!
हर एक पंक्ति सुन्दर और सार्थक .

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March 16, 2012 at 12:09 PM

पूरा का पूरा झक्कास ..
लिखा है लाजवाब!!

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March 16, 2012 at 3:52 PM

यह मौका कोई गंवाना नहीं चाहता

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March 16, 2012 at 4:59 PM

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

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March 16, 2012 at 5:50 PM

बहुत सुन्दर लिखा है...हर पंक्ति में एक कशिश भी एक कटाक्ष भी

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March 16, 2012 at 7:37 PM

bahut badhiya likha hai aapne ...
http://jadibutishop.blogspot.com

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March 16, 2012 at 7:40 PM

सार्थक अभिव्यक्ति...

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March 17, 2012 at 5:35 AM

बहुत सुन्दर!!

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March 17, 2012 at 12:15 PM

वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है! ..

और अगर वहां बुद्धिमानी दिखाई तो मूर्खों की जमात में बैठा दिए जाओगे :)

बहुत खूब

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March 17, 2012 at 3:07 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है.......
प्रेरक प्रस्तुति .........

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March 17, 2012 at 3:09 PM

जहाज डूब जाने के बाद हर कोई बचाने का उपाय जानता है
अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है

....बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति...

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March 17, 2012 at 5:24 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
PAR UPADESH KUSHAL BAHUTERE.

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March 17, 2012 at 8:58 PM

waah bahut sunder वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है! ..............sunder satik kataksh

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March 18, 2012 at 8:42 AM

सभी वाक्य सुन्दर और शिक्षाप्रद !

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March 18, 2012 at 11:04 AM

सुन्दर प्रस्तुति.....बहुत बहुत बधाई...

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March 18, 2012 at 6:20 PM

अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है
नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है.सुन्दर प्रस्तुति.

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March 18, 2012 at 6:58 PM

वहां बुद्दिमानी किस काम की जहां मूर्खता से काम चलता है। वाह! क्या आनंददायक बात कही आपने।

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March 19, 2012 at 3:22 PM

वहां बुद्दिमानी किस काम की जहां मूर्खता से काम चलता है।
wah
bahut khoob likha hai

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March 19, 2012 at 3:24 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
सभी वाक्य सुन्दर और शिक्षाप्रद !

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March 19, 2012 at 6:56 PM

अफ़सोस की यह जंगल राज शहर में भी चलता है

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March 20, 2012 at 3:03 AM

आप के शब्दों के पीछे जो भाव है वो व्यथित कर देनेवाला भाव है.

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March 20, 2012 at 4:12 PM

अपनी गलती का पता लगा लेना बहुत बड़ी समझदारी होती है
वक्त को पहचानने के लिए समझदारी की जरुरत पड़ती है
बहुत बहुत सार्थक अभिव्यक्ति....
सादर.

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March 20, 2012 at 8:44 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!

कविता जी बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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March 21, 2012 at 6:49 PM

वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
vaah prajatantra me ek murkhta karte han (vot nahi dalne ki) phir sari budimani dhari rah jati hai jangal raj ho jata hai. bahut khoob

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March 23, 2012 at 6:59 AM

कोई जंजीर सबसे कमजोर कड़ी से ज्यादा मजबूत नहीं होती है

सच कहा आपने

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March 23, 2012 at 10:04 AM

बहुत बहुत धन्यवाद् की आप मेरे ब्लॉग पे पधारे और अपने विचारो से अवगत करवाया बस इसी तरह आते रहिये इस से मुझे उर्जा मिलती रहती है और अपनी कुछ गलतियों का बी पता चलता रहता है
दिनेश पारीक
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http://vangaydinesh.blogspot.com/2012/03/blog-post_15.html?spref=bl

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March 23, 2012 at 1:11 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
बहुत बढ़िया सार्थक सुंदर रचना,...

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March 26, 2012 at 9:25 AM

बहुत बढ़िया,बेहतरीन करारी अच्छी प्रस्तुति,..
नवरात्र के ४दिन की आपको बहुत बहुत सुभकामनाये माँ आपके सपनो को साकार करे
आप ने अपना कीमती वकत निकल के मेरे ब्लॉग पे आये इस के लिए तहे दिल से मैं आपका शुकर गुजर हु आपका बहुत बहुत धन्यवाद्
मेरी एक नई मेरा बचपन
कुछ अनकही बाते ? , व्यंग्य: मेरा बचपन:
http://vangaydinesh.blogspot.in/2012/03/blog-post_23.html
दिनेश पारीक

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March 27, 2012 at 12:58 PM

" नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है! "

या यों कहें :
" कद्र दानों की तबियत का अजब रंग है आज,
बुलबुलों को है यह हसरत कि हम उल्लू न हुए "

उत्तम कविता !

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RAJ
March 27, 2012 at 2:11 PM

जहाज डूब जाने के बाद हर कोई बचाने का उपाय जानता है
अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है
नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
..........
.बहुत खूब!

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March 27, 2012 at 3:30 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!

बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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March 28, 2012 at 1:04 AM

बहुत खूब लिखा है
नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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March 29, 2012 at 5:41 AM

अति सुन्दर प्रस्तुति। अनुभब व
अनुभूति का सुन्दर समन्वय।
बहुत अच्छा सन्देश देती रचना।
धन्यवाद

आनन्द विश्वास

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March 29, 2012 at 4:22 PM

कविता जी
नमस्कार.
नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
सच्ची... तल्ख़ बात मगर सच यही है.....वाह वाह !!!!

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March 29, 2012 at 5:10 PM

वाह!!
विरोधाभाष की विडम्बना!!
सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है

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April 4, 2012 at 7:53 PM

जब बड़े घंटे बजने लगे तब छोटी घंटियों की आवाज दब जाती है
जब घर में सांप घुस आये तब बोलती बंद होते देर नहीं लगती है
_______
समय की सही पहचान बताती सार्थक रचना..

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April 5, 2012 at 1:38 PM

अच्‍छे शब्‍द संयोजन के साथ सशक्‍त अभिव्‍यक्ति।

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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April 5, 2012 at 1:39 PM

पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

....... रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

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Anonymous
April 5, 2012 at 6:54 PM

हमारा भी यही हाल है... क्षमा जैसी कोई बात नहीं ...
Kavita Rawat

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April 5, 2012 at 8:51 PM

बहुत सुंदर । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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April 5, 2012 at 9:47 PM

जहाज डूब जाने के बाद हर कोई बचाने का उपाय जानता है
कथनी और करनी ...
बहुत सुन्दर

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April 6, 2012 at 5:01 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है! ................मजा आ गया .............कोई हमारे ब्लॉग पर भी आ जाए

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April 8, 2012 at 9:44 PM

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से शुभकामनाएँ।

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April 9, 2012 at 8:07 AM

sach kaha दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है!..bahut khoob

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April 9, 2012 at 8:57 AM

सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है

आजकी बात बहुत सुन्दर धाग से कही है आपने

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April 9, 2012 at 9:56 AM

शत प्रतिशत सच....

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April 11, 2012 at 1:46 PM

सच कहा आपने...
सटीक बात...सुंदर विचार। गहन चिन्तन के लिए बधाई।

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April 13, 2012 at 6:37 AM

अक्सर दूसरों के मामले में समझदार बनना आसान होता है

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April 13, 2012 at 5:45 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!

खूब कहा आपने...

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April 14, 2012 at 5:25 PM

अपनी गलती का पता लगा लेना बहुत बड़ी समझदारी होती है
वक्त को पहचानने के लिए समझदारी की जरुरत पड़ती है

very nice!

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April 14, 2012 at 7:55 PM

"सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है"
बहुत सही कहा आपने ! जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला मंजर ही हर जगह नज़र आता है! सारगर्भित प्रस्तुति !

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April 15, 2012 at 9:36 AM

आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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April 16, 2012 at 8:06 PM

सचमुच,हम सबके जीवन का यही फलसफा है।

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April 21, 2012 at 5:33 PM

सत्ता के सामने कभी सयानापन नहीं चलता है
जिसके हाथ बाजी उसकी बात में दम होता है"

बहुत सही
सारगर्भित प्रस्तुति !

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May 6, 2012 at 6:12 PM

नासमझ लोग बाज़ार गए तो घटिया माल भी खूब बिकता है
वहाँ बुद्धिमानी किस काम की जहाँ मूर्खता से काम चलता है!
सुंदर...! सारगर्भित...!

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December 26, 2012 at 10:55 AM

बहुत सटीक प्रस्तुति.वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार

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