मैं और मेरा कंप्यूटर

कभी कभी 
मेरे कंप्यूटर की
सांसें भी हो जाती हैं मद्धम
और वह भी बोझिल कदमों को
आगे बढ़ाने में असमर्थ  हो जाता है
मेरी तरह

और फिर
चिढ़ाता है मुझे
जैसे कोई छोटा बच्चा
उलझन में देख किसी बड़े को
मासूमियत से मुस्कुराता है
चुपचाप !

कभी यह मुझे 
डील डौल  से चुस्त -दुरुस्त
उस बैल के तरह
दिखने लगता है जो बार-बार
जोतते ही बैठ जाता है अकड़कर
फिर चाहे कितना ही कोंचो
पुचकारो
टस से मस नहीं होता!

कभी जब काफी मशक्कत के  बाद
चलने लगता है
तो  दिल  सोचता है
शायद  वह भी समझ गया है
हम दोनों की नियति
चलते रहने की है

कभी सोच में डूबती हूँ कि
इसकी किस्‍मत मेरे साथ जुड़ी है
या कि मेरी इसके साथ
तय नहीं कर पाती

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है  
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?

अब दोनों को एक आदत सी हो चली है
निरंतर साथ-साथ रहने की
सरपट दौड़ लगाकर नहीं तो
कम से कम एक दूजे का 
यूँ ही साथ निभाते चलने की 

  ... कविता रावत 

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April 15, 2012 at 9:59 AM

कभी जब काफी मशक्कत के बाद
चलने लगता है
तो दिल सोचता है
शायद वह भी समझ गया है
हम दोनों की नियति
चलते रहने की है
बहुत सुंदर रचना...
आपने सही कहा नियति तो एक है ....कविता जी,...
.
MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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April 15, 2012 at 10:23 AM

वाह...........

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?

क्या अद्भुत कल्पना है कविता जी..
बहुत खूब.

अनु

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April 15, 2012 at 10:56 AM

कभी यह मुझे
डील डौल से चुस्त -दुरुस्त
उस बैल के तरह
दिखने लगता है जो बार-बार
जोतते ही बैठ जाता है अकड़कर
फिर चाहे कितना ही कोंचो
पुचकारो
टस से मस नहीं होता!

बार बार ख़राब होते कंप्यूटर की जोत से जूते हुए अड़ियल बैल से तुलना बड़ा ही रोमांचकारी है...
खूब! बहुत खूब! लिखा है .....

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April 15, 2012 at 11:07 AM

कम्पूटर भी अब जीवन का अभिन्न अंग बन गया है जिसके बिना सब कुछ अधूरा लगता है.

बहुत सुंदर.

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April 15, 2012 at 11:13 AM

आज के इस व्यस्त जीवन में कम्प्यूटर सबसे वफ़ादार साथी की तरह है। हम उसे उसके मनोभावों को अगर समझें तो वह बढिया साथ निभाता है।

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April 15, 2012 at 11:38 AM

कल 16/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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April 15, 2012 at 11:52 AM

चलो ये भी अच्छा है ... रूठना और मनाना

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April 15, 2012 at 11:55 AM

बहुत सुन्दर. सही में कंप्यूटर के बगैर दो चार दिन भी गुजारना पड़े तो बहुत तकलीफ होती हैं

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April 15, 2012 at 12:10 PM

Computer pe aisee kavita likhi ja sakti hai socha na tha! Bahut khoob!

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April 15, 2012 at 12:11 PM

अब दोनों को एक आदत सी हो चली है
निरंतर साथ-साथ रहने की
सरपट दौड़ लगाकर नहीं तो
कम से कम एक दूजे का
यूँ ही साथ निभाते चलने की
.....
बेचारगी भरे दिनों में जो काम आवे वही सबसे अच्छा
बेचारा कंप्यूटर करे भी तो क्या करे कितना झेलता है बिना कुछ कहे!
बहुत सुंदर रचना!!

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April 15, 2012 at 12:18 PM

कभी जब काफी मशक्कत के बाद
चलने लगता है
तो दिल सोचता है
शायद वह भी समझ गया है
हम दोनों की नियति
चलते रहने की है
...........
किन परिस्थितियों में घर चलाना पड़ता है और यदि थोड़े से प्रयास से बिना कुछ लगे काम बनता है तो अच्छा तो लगता ही है
खुद को समझने समझाने से सुन्दर परिणति!

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April 15, 2012 at 12:47 PM

कंप्यूटर रूठ जाए तो मनाना मुश्किल हो जाता है. बहुत खूब :))

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April 15, 2012 at 12:52 PM

एकदम जीवन की तरह व्यवहार करता है कम्प्यूटर..

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April 15, 2012 at 1:05 PM

कम्प्युटर रूठे अगर, दुनिया जाए रूठ.... :))
बढ़िया रचना...
सादर.

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April 15, 2012 at 3:26 PM

अब तो कंप्यूटर बिना सब अधूरा सा लगता है ...

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April 15, 2012 at 3:33 PM

कम से कम एक दूजे का
यूँ ही साथ निभाते चलने की
IT HAPPENS SOMETIMES WE ARE IN FIX AND HELPLESS
BUT WE ARE MOOVING TOGETHER OR STAYING.
NICE POST VERY VERY NEAR TO HEART.

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April 15, 2012 at 4:20 PM

बहुत सुन्दर वाह!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 16-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-851 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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April 15, 2012 at 4:48 PM

समझ सकता हूँ इस पोस्ट की प्रेरणा श्रोत रहा है आपका कम्प्यूटर .....
एक रूठे हुए कम्प्यूटर के मान जाने पर ख़ुशी तो होती ही है.....

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April 15, 2012 at 7:17 PM

वाकई आज के समय में कंप्यूटर बिना सब अधूरा सा लगता है
अब दोनों को एक आदत सी हो चली है
निरंतर साथ-साथ रहने की
सरपट दौड़ लगाकर नहीं तो
कम से कम एक दूजे का
यूँ ही साथ निभाते चलने की
...............सुंदर शब्दावली....रचना के लिए बधाई स्वीकारें...!!!

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April 15, 2012 at 7:18 PM

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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April 15, 2012 at 7:44 PM

कंप्यूटर भी अब जीवन का एक अंग ही है उसके रूठने पर मनाना बस जरा ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

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April 15, 2012 at 8:48 PM

यह समस्या तो कमोबेश सबके साथ ही है और आपने इसे सुन्दर शब्दों की अभिव्यक्ति दी है. यही आपकी कला है जिसके कायल आपके सभी प्रशंसक है. आभार !

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April 15, 2012 at 8:49 PM This comment has been removed by the author.
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April 15, 2012 at 9:24 PM

मानव और मशीन के दर्द को समझने की अच्‍छी कोशिश

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April 15, 2012 at 10:42 PM

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?

bahut hi sundar rawat ji ....abhar.

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April 15, 2012 at 10:59 PM

यक़ीनन आप चाहें तो प्रोसेस्सर की स्पीड या कोई अच्छा सा एंटी-वाइरस डाल सकतीं हैं...कंप्यूटर की स्पीड बढ़ाने को...पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है काम्पैटीबिलिटी...पुरानी चीजों से जुडाव का अपना अलग आनंद है...

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April 15, 2012 at 11:25 PM

बहुत खूब... कंप्यूटर पर कविता......

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April 16, 2012 at 7:06 AM

bahut khub....aaj ki jarurat..computer

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April 16, 2012 at 9:49 AM

बिना कंप्यूटर के अब बहुत सूना सा लगता है |
बहुत खूब

Learnings: भिखारी का धर्मसंकट

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April 16, 2012 at 12:18 PM

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...वास्तव में कंप्यूटर हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है ....हमारे शरीर से जुदा फिर भी जुड़ा...!!!!

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April 16, 2012 at 12:32 PM

बढ़िया लिखा है...हमारे दैनिक जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अंग कंप्यूटर के बारे में.

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April 16, 2012 at 1:08 PM

सच कहा ……सुन्दर प्रस्तुति।

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April 16, 2012 at 1:22 PM

कभी वाइरस कभी हैंग .... :)

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April 16, 2012 at 2:35 PM

वाह ...बहुत ही बढि़याद्य

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April 16, 2012 at 3:22 PM

लगता है आपकी और मेरी स्थिति लगभग एक सी है... :) समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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April 16, 2012 at 5:06 PM

डील डौल से चुस्त -दुरुस्त
उस बैल के तरह
दिखने लगता है जो बार-बार
जोतते ही बैठ जाता है अकड़कर
फिर चाहे कितना ही कोंचो
पुचकारो
टस से मस नहीं होता!
कविता जी सुन्दर और नया अंदाज ...कहता होगा कम्प्यूटर ..चैन से रहने दो मुझे ..थोडा उसको और खुद को भी आराम दिया करें .... जय श्री राधे
भ्रमर ५

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April 16, 2012 at 5:54 PM

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?
कविता जी बिलकुल सही कहती है आप
आदमी पर आज किसका कितना जोर चलता है यह हम सभी बखूबी जानकार भी अनजान रहते है... भला हो इस कंप्यूटर बनाने वाले का जो हमारा अपना कहलाता है..
बहुत सुन्दर मनभावन कविता .. ...

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April 16, 2012 at 8:02 PM

किसी से जुड़ पाना ही तभी संभव है जब सामंजस्य बिठाना आता हो।

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April 16, 2012 at 9:07 PM

सही कहा , अब तो साथ चलने की आदत सी पड़ गई है ।
सुन्दर प्रस्तुति ।

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RAJ
April 17, 2012 at 3:30 PM

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?

हाँ और किसी जीवित जीव पर इतना बस चल चलाना संभव है ही नहीं

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April 17, 2012 at 3:34 PM

कंप्यूटर पर बहुत सुन्दर कविता

इसलिए कहते है-
जहाँ न पहुंचे रवि
वहां पहचे कवि

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April 17, 2012 at 4:36 PM

आज कल ऐसी बेजान चीजें तो साथ दे देती हैं ... पर इंसान साथ नहीं देते ...
भाव जुड गएँ आज सभी के कम्पुटर के साथ ...

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April 17, 2012 at 4:46 PM

कविता जी कंप्यूटर के साथ अपनी व्यथा कथा का सुन्दर मिश्रण किया है ..बहुत खूब

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April 17, 2012 at 5:37 PM

कभी सोच में डूबती हूँ कि
इसकी किस्‍मत मेरे साथ जुड़ी है
या कि मेरी इसके साथ
तय नहीं कर पाती.....सब किस्मत का खेल है जो जिसकी किस्मत में लिख दिया ऊपर वाले ने वह एक दुसरे का भाग्य बन जाता है.
बहुत बढ़िया जानदार शानदार कविता बिलकुल आपने नामानुकूल ..बधाई

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April 17, 2012 at 5:48 PM

computer ko ya to update kar lo ya naya badal do tabhi pareshani se chhutkara milega.

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April 18, 2012 at 7:29 PM

कंप्यूटर के बिना आज जिंदगी अधूरी है..
आपने इसी बहाने अपने दिल का दर्द बड़ी खूबसूरती से बयां कर दिया..

अब दोनों को एक आदत सी हो चली है
निरंतर साथ-साथ रहने की
सरपट दौड़ लगाकर नहीं तो
कम से कम एक दूजे का
यूँ ही साथ निभाते चलने की

जो भाग्य में लिखा होता है वही मिलता है उसे उसके नसीब से......

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April 19, 2012 at 8:05 PM

जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव
GAJAB KI RACHANA ANTAH KARAN KE MARM TK SAMVEDNAON SE BHRPOOR ...BADHAI RAWAT JI.

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April 19, 2012 at 9:51 PM

फिर सोचती हूँ
चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?

Hun... Sach Kaha Apne

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April 19, 2012 at 11:32 PM

बहुत सुंदर साम्यता, वाह!!!!!!!!!!!!!!

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April 21, 2012 at 5:31 PM

और फिर
चिढ़ाता है मुझे
जैसे कोई छोटा बच्चा
उलझन में देख किसी बड़े को
मासूमियत से मुस्कुराता है
चुपचाप !
...........
वाह! क्या सुन्दर कल्पना है! कविता जी लगता है इस पोस्ट को आपने दिल की बात कहने का माध्यम बनाया है ...
अति सुन्दर पोस्ट ...

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April 21, 2012 at 6:00 PM

और फिर
चिढ़ाता है मुझे
जैसे कोई छोटा बच्चा
उलझन में देख किसी बड़े को
मासूमियत से मुस्कुराता है
चुपचाप !
vaah kavita jii kyaa khuub likha hae,

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April 21, 2012 at 6:00 PM

"चलो जैसा भी है
है तो मेरा अपना
जिस पर मैं अपना पूरा हक़ जताती हूँ
निर्विरोध, निसंकोच, निर्विकार होकर
जो संसार में अन्यत्र कहाँ संभव?"

गहरे भाव.... वाह.

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April 21, 2012 at 8:48 PM

अब दोनों को एक आदत सी हो चली है
निरंतर साथ-साथ रहने की
सरपट दौड़ लगाकर नहीं तो
कम से कम एक दूजे का
यूँ ही साथ निभाते चलने की

....ज़िंदगी इसी तरह गुज़र जाती है..बहुत गहन और सुन्दर अभिव्यक्ति...

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April 21, 2012 at 8:53 PM

कोई तो मजबूरी होगी, बेचारे कम्प्यूटर की।
उसकी निष्ठा में कमी नहीं हो सकती।
क्योंकि वह इन्सान नहीं है।
सुन्दर कविता।

आनन्द विश्वास।

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April 21, 2012 at 9:22 PM

'कभी सोच में डूबती हूँ कि
इसकी किस्‍मत मेरे साथ जुड़ी है
या कि मेरी इसके साथ
तय नहीं कर पाती'
सुन्दर अभिव्यक्ति है ...

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April 22, 2012 at 7:06 AM

यह हमारी और उसकी नियति ही है कविता जी कि हम 'गरियार-बैल' की तरह भी खिंचे चले जा रहे हैं !!

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April 24, 2012 at 11:40 PM

सुन्दर अभिव्यक्ति है

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April 26, 2012 at 5:50 PM

आप की कविता पढ़ कर अच्छा लगा-

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April 26, 2012 at 8:59 PM This comment has been removed by the author.
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April 26, 2012 at 9:02 PM

आपकी रचना पढकर लगता है कि आपका और आपके कंप्यूटर का तालमेल बहुत ही अच्छा है...

आपसी सामंजस्य को व्यक्त करती हुई बहुत सुन्दर रचना!!

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April 27, 2012 at 9:24 PM

कविता के भाव अच्छे लगे । समय इजाजत दे तो मेरे नए पोस्ट पर आकर मुझे प्रोत्साहित करने की कोशिश करें । धन्यवाद ।

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April 29, 2012 at 5:12 PM

आह! से निकला होगा गान।
कवि जब चोट खाता है तो बड़ी बढ़िया कविता लिखता है!
बहुत सुंदर कविता है और भाव तो कमाल के हैं!.. बधाई।

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April 29, 2012 at 8:33 PM

आंटी जी बहुत बढ़िया

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April 29, 2012 at 8:36 PM

वाह वाह!
बहुत सुन्दर

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April 30, 2012 at 11:15 AM

वाह ..बहुत अच्छा..

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July 8, 2012 at 8:17 PM

कंप्यूटर की अठखेलियों को काव्यांजलि में पिरोकर उसे अच्छी अभिव्यक्ति दी है.

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