वह खुश हो लेता है

छोटू की कोई अपनी बपौती नहीं, वह हक़ से कूड़े के ढ़ेर पर भी अपना अधिकार नहीं जता पाता. जब कभी उसने ऐसी हिमाकत करने की कोशिश की तो मोहल्ले भर के भुक्कड़ कुत्तों ने उसे खदेड़ने की एकजुट होकर पुरजोर कोशिश कर डाली। लेकिन हर बार हर किसी की चल जाय, ऐसा प्राय:नहीं होता । छोटू भी हार मानने वालों में नहीं। उसने भी इन भुक्कड़ कुत्तों की औकात जल्दी ही नाप ली । वह बखूबी समझ गया है कि ये आवारा कुत्ते पालतू हाइब्रिड कुत्तों की तुलना में कहीं ज्यादा समझदार और संवेदनशील हैं। उसने बस दो-चार बार कूड़े के ढ़ेर से मिले चंद रोटी, ब्रेड के टुकड़े इनके आगे डालकर पुचकार भर लिया है, बस फिर हो गयी दांत काटी रोटी वाली दोस्ती।
छोटू की अपनी कोई दुकान नहीं है। वह तो हर दिन ठेले से चाय ले जाकर आस-पास के सरकारी, गैर सरकारी दफ्तरों में चाय पिलाने में मस्त रहता है। दफ्तरों में कौन क्या काम करता है, क्या सोचता-विचारता है, क्या क़ानून-कायदा बनाता बिगाड़ता रहता है, वह इन सबके तीन पांच में कभी नहीं पड़ता। वह इन दफ्तरों की भाषा शैली से भले वाकिफ न हो पाता हो लेकिन अपनी कट चाय, फुल चाय ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को पिलाने के लिए किस भाषा शैली का प्रयोग करना है, वह बखूबी जानता है। अपने काम में बंधे, जुटे कर्मचारी उसके लिए कभी सोचे-विचारे, किसी तरह की मदद करे, इसकी वह कोई अपेक्षा नहीं रखता. सबको वह खुशमिजाज दिखता है, सभी की जुबां पर उसका नाम है, बस यही सोच वह खुश हो लेता है। 

छोटू शहर के व्यस्ततम बाजार में अपना कोई चायनीज फ़ूड जैसा स्टाल भी नहीं लगाता, फिर भी वह तो स्टाल पर चाउमीन, सांभर-बड़ा, इडली-डोसा, चाट, फुलकी की रंगत में रंगा हर आने-जाने वाले ग्राहकों की सेवा में तत्पर रहता है।

          ....कविता रावत


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April 30, 2012 at 8:47 AM

भले इस छोटू से हमारा भी लगाव हो गया, सोचता हूँ पूरे भारत में ऐसे कितने छोटू होंगे जिन्हें समाज प्यार भी करता हो और वंचित भी रखे हुए है.

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April 30, 2012 at 8:47 AM

बहुत ही भावुक और समाज पर एक करारा व्यंग

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April 30, 2012 at 9:20 AM

समाज के ये सर्वथा उपेक्षित लोग मुफ्त में हमारा काम जो आसान करने में रात दिन लगे रहते हैं इसीलिए हमें इनकी चिंता क्यों होगी? मुफ्त का काम अच्छा ही लगता है आज सभी को !
हमारे आस की एक जबरदस्त सच्चाई को बड़ी ही मासूमियत से प्रस्तुत करने के लिए आपका शुक्रिया!!!

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April 30, 2012 at 9:25 AM

इस छोटू को मैंने हर जगह देखा है ....अक्सर बेमतलब पिटते रहने से उसकी खाल मोटी होती जा रही है ...छोटू वक़्त और किस्मत को कोसता नहीं ...वह मुसकुराता रहता है हर उस मुस्कुराहट को देख कर जो उसे देख कर मुसकुराती तो है लेकिन उसके मन को शायद महसूस नहीं कर पाती।



सादर

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April 30, 2012 at 9:27 AM

सच्चाई को बड़ी ही भावुकता से प्रस्तुत करने के लिए आपका.....आभार कविता जी./

MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

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April 30, 2012 at 9:34 AM

जिसमें ख़ुशी ढूंढ लें हम जीने के लिए ...

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April 30, 2012 at 9:41 AM

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति !

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April 30, 2012 at 9:55 AM

मुसीबत के मारे छोटू के पास कोई विकल्प नहीं.. कौन देगा उसे विकल्प..स्कूल से लेकर दफ्तर, देश विदेश सबकुछ उसका यही है तभी तो वह खुश रहता है और हम सबको कुछ लगता है ..हम खुश तो वह खुश!!!!!
अपनी ख़ुशी के आगे ..अपने लिए सोचने के अलावा आज हमारे पास कुछ और है ही नहीं .....
बहुत गंभीर विचारणीय पोस्ट..आपका आभार

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April 30, 2012 at 11:17 AM

.... छोटू...न जाने कितने छोटू....आह !

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April 30, 2012 at 11:34 AM

देश में करोड़ों बच्चों की शायद यही नियति है .
हम अभी भी आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से इथियोपिया जैसे देशों की श्रेणी में आते हैं .

लेकिन घुट घुट कर मरने से अच्छा तो अपने काम को एन्जॉय करना ही है .
बढ़िया लघु कथा .

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April 30, 2012 at 12:15 PM

भावमय करती छोटू की कहानी ...

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April 30, 2012 at 12:28 PM

Ye chhoti-si kahanee kitna kuchh sikha jatee hai!

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April 30, 2012 at 12:43 PM

bahut sundar kahaani......aise na jane kitne chhotu hume shahron me yahan-vahan bikhre kudon ke dheron ke aaspaas ghumte milte hain, jinhe dekhkar man me sahaanubhuti to paida hoti hai magar kuchh kar nahi pate aur apni raah pakad kar nikal padte hain aage, aisi chhoti-chhoti kahaniyan-kisse, man ko udwelit kar dete hain.......!

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RAJ
April 30, 2012 at 1:07 PM

वह बखूबी समझ गया है कि ये आवारा कुत्ते पालतू हाइब्रिड कुत्तों की तुलना में कहीं ज्यादा समझदार और संवेदनशील हैं।
..............................................
ऐसा मत कहिये इन राजसी ठाट-बाट वाले प्राणियों को ..एक तरह की गाली है यह उनके लिए...
.....
गरीब लाचार जब भूख प्यास से तड़फकर मरता है
तब तस्वीर में वह करोड़ों में खेलता नज़र आता है
..क्या कहिये..... लाजवाब

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April 30, 2012 at 1:48 PM

वर्तमान दशा का सटीक आकलन....

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April 30, 2012 at 1:55 PM

छोटू ! शभ्य एवं शिक्षित समाज का दायाँ हाथ ! या फिर उसकी हकीकत .....?
गंभीर विचारणीय पोस्ट हेतु आपका आभार.

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April 30, 2012 at 2:05 PM

chhootoo jaise bachchon ko insaf milna hi chahiye .is umr mr unka kaam karna samaj ke munh par tamacha hai .sarthak post .aabhar .

like this page and wish indian hockey team for London olympic

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April 30, 2012 at 2:53 PM

बेहतरीन रचना
अरुन (arunsblog.in)

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April 30, 2012 at 3:49 PM

har garib bache ko aakhir me haarkar chottu hi bnna pdta hai.. jo uska bhala sochta hai uske paas madad krne k liye kuch hota nahi.. jiske paas sab kuch hota hai wo sochta nhi...

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April 30, 2012 at 4:34 PM

बहुत कुछ दिखा और सीखा रही है यह छोटू की छोटी सी कहानी... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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April 30, 2012 at 4:45 PM

एक छोटू बेटे के हॉस्टल में भी है.......................
जो बड़ा होना चाहता है............
क्या छोटू कभी बड़ा बनेगा?????

सादर.

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April 30, 2012 at 7:38 PM

जहाँ भी जाते हैं, कोई न कोई छोटू दिख जाता है।

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April 30, 2012 at 8:02 PM

कौन ध्यान देगा इन छोटुओं के प्रति ?....कब हम बचपन को सिर्फ़ छोटू बनने से रोक पायेंगे ?...अंतस को झकझोरती प्रभावी प्रस्तुति...

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April 30, 2012 at 9:19 PM

छोटू कोई एक नहीं है बल्कि सब जगह मौजूद है और हर जगह इसी तरह मुसकुराते गालियाँ सुनने को मजबूर है.

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April 30, 2012 at 9:21 PM

हर जगह मौजूद है यह छोटू ...

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April 30, 2012 at 10:31 PM

इन छोटुओं के पास समाज को देने के लिए बहुत कुछ है।

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April 30, 2012 at 11:14 PM

इन छोटुओं की मेहरबानी से इस समाज में हम
बड़े बने हुए हैं .....???
आभार है इनका !

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May 1, 2012 at 12:37 AM

छोटुओं को लेकर वाजिब चिंता....

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May 1, 2012 at 6:58 AM

आशा है कि इस जद्दोजहद का परिणाम चमकीला होगा. छोटू एक दिन बड़ा होगा.

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May 1, 2012 at 2:25 PM

आज तो याद करने का दिन है..
सार्थक और सामयिक आलेख के लिए धन्यवाद

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May 1, 2012 at 4:49 PM

छोटू शहर के व्यस्ततम बाजार में अपना कोई चायनीज फ़ूड जैसा स्टाल भी नहीं लगाता, फिर भी वह तो स्टाल पर चाउमीन, सांभर-बड़ा, इडली-डोसा, चाट, फुलकी की रंगत में रंगा हर आने-जाने वाले ग्राहकों की सेवा में तत्पर रहता है।
..हर जगह है छोटू ,,,,, पर देखने वाला ...समझने वाला उसे कोई नहीं..
मजदूर दिवस पर सार्थक बहुत विचारनीय लेख ...
आपका बहुत आभार !

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May 1, 2012 at 5:56 PM

छोटू नहीं रहेगा तो हमारा क्या होगा! यही चिंता है सताती है हर किसी को ... में बैठकर गंभीर विचार मंथन चलता रहता है लेकिन छोटू बेटा कुछ नहीं देख पाता........... लगा है हमारे काम पर...

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Anonymous
May 1, 2012 at 6:30 PM

मैम आपको फेसबुक पर देखती हूँ आज ब्लॉग पर इधर उधर भटकते लिंक देख कर आयी हूँ
बहुत बहुत अच्छा लिखती है आप..............
मजदूर दिवस पर हम लोग जरुर एक दो दिन थोडा बहुत चिंता करते हैं लेकिन असली बात तो यही है की यह सिर्फ बंद कमरों के फाइलों में ही बंधुवा मजबूर बनकर रह जाता है.......................
छोटू की सच्ची तस्वीर दिखाकर लोगों को उनके प्रति सच्ची हमदर्दी का यह प्रयास बहुत अनुकर्णीय है .. surekha

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May 2, 2012 at 5:44 AM

निष्ठुर समाज में ये छोटू न जाने किस ज़ुर्म की सज़ा भुगत रहे हैं!

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May 2, 2012 at 7:56 PM

बधाई .
मार्मिक बुनावट है इस लघु कथा की जिसका भाव फलक बड़ा व्यापक है एक दृष्टि छिपाए है एक अंदाज़ खुश रहने अनुकूलन करने का .ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए ,न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढक लेंगें ...



बुधवार, 2 मई 2012
" ईश्वर खो गया है " - टिप्पणियों पर प्रतिवेदन..!
http://veerubhai1947.blogspot.in/

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May 2, 2012 at 8:21 PM

कविताजी, पहली बार आपका ब्लाग देखा अच्छा लगा। छोटू की जीवटता को पहचानने की नजर आपके पास है। बधाई, सवाल यही है कि हम और आप ऐसे छोटुओं के कितने आंसू पोछ पाते हैं।

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May 2, 2012 at 8:24 PM

कविताजी, पहली बार आपका ब्लाग देखा अच्छा लगा। छोटू की जीवटता को पहचानने की नजर आपके पास है। बधाई, सवाल यही है कि हम और आप ऐसे छोटुओं के कितने आंसू पोछ पाते हैं।

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May 3, 2012 at 10:41 AM

न जाने कितने छोटू है,अंतस को झकझोरती प्रभावी प्रस्तुति....

MY RECENT POST.....काव्यान्जलि.....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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May 3, 2012 at 3:22 PM

एक छोटू ढूढने पर जाने कितने ही छोटू बहुत आसानी से मिल जाते हैं ............... इनको पूछ परख वाला ऊपर वाला है ....
अभिजात्य वर्ग को यह छोटू बहुत पसंद है .... पर सिर्फ काम के लिए ....
ब्लॉग पोस्ट अच्छी लगी... .
सादर

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May 3, 2012 at 5:45 PM

छोटू के जीवन कों सही उकेरा है आपने इस पोस्ट में ... हजारों छोटू ऐसे भी व्यस्त हैं मस्त हैं अपने जीवन में ... पर काश कोइ कुछ प्रेरणा ले पाए उनसे ...

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May 4, 2012 at 2:56 PM

सार्थक और सामयिक आलेख
समाज पर एक करारा व्यंग

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May 4, 2012 at 3:45 PM

मजदूर की हक़ में कुछ नहीं ..खुश रहना के अलावा और चारा ही क्या है....हर हाल में खुश रहने की मजबूरी ...

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May 4, 2012 at 6:16 PM

कविता जी नमस्कार,
हमें बताते हुए हर्श् हो रहा है कि पूर्व में हुई चर्चा के अनुसार हम आपके ब्लाग पोस्ट में लिखे गए लेख को अपने दैनिक समाचार पत्र भास्कर भूमि में प्रकाशित कर रहे हैं। अखबार की प्रति आप तक भेजने के लिए अपना पता और ईमेल आईडी भास्कर भूमि के आईडी में प्रेशित करने की कृपा करें।
धन्यवाद

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May 4, 2012 at 6:34 PM This comment has been removed by the author.
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May 5, 2012 at 8:22 AM

यह रचना प्रभावशाली है कविता जी ...
शुभकामनायें आपको !

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May 5, 2012 at 5:19 PM

हर जगह हैं छोटू ........ इनके बिना काम नहीं चलता.... हँसते खेलते अपने काम में मस्त लेकिन उनके मन की थाह लेने को कोई तैयार नहीं .....
.................सादर

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May 5, 2012 at 11:04 PM

हमेशा से प्रासंगिक विषय ...........

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May 7, 2012 at 2:54 PM

नियति के हाथों मजबूर हो कर समय से पहले ही बडे हो गए छोटू ने "ईदगाह" के हामिद और " छोटा जादूगर" कहानी के छोटा जादूगर की याद दिला दी.
सुंदर, सामयिक आलेख

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May 7, 2012 at 6:24 PM This comment has been removed by the author.
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May 7, 2012 at 6:26 PM

जीवन कितना भी सम्पूर्ण क्यु न हो पर एक दूसरे से इस कदर जुडा हुआ है कि किसी एक कि कमी भी उसे आगे बढते रहने से रोक सकती है पर इंसान अपने मद में इतना चूर हो जाता है कि उसे आसपास के लोग दिखाई ही नहीं देते | गरीबी उन्हें इस कदर चुभती है जैसे वो एक गंभीर बीमारी हो जवकि सच तो ये है कि यही गरीब लोग इनको सहारा देकर उप्पेर उठने में मददगार होते हैं |
सार्थक लेख |

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May 8, 2012 at 8:48 PM

नमस्‍कार। आप मेरे ब्‍लाग तक आए और आपने प्रोत्‍साहित किया आपका आभार। आप बहुत अच्‍छा लिखती है पढ़ना अच्‍छा लगता है । आपको साधुवाद

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May 8, 2012 at 10:43 PM

छोटू की अपनी कोई दुकान नहीं है। वह तो हर दिन ठेले से चाय ले जाकर आस-पास के सरकारी, गैर सरकारी दफ्तरों में चाय पिलाने में मस्त रहता है। दफ्तरों में कौन क्या काम करता है, क्या सोचता-विचारता है, क्या क़ानून-कायदा बनाता बिगाड़ता रहता है, वह इन सबके तीन पांच में कभी नहीं पड़ता। वह इन दफ्तरों की भाषा शैली से भले वाकिफ न हो पाता हो लेकिन अपनी कट चाय, फुल चाय ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को पिलाने के लिए किस भाषा शैली का प्रयोग करना है, वह बखूबी जानता है। अपने काम में बंधे, जुटे कर्मचारी उसके लिए कभी सोचे-विचारे, किसी तरह की मदद करे, इसकी वह कोई अपेक्षा नहीं रखता. सबको वह खुशमिजाज दिखता है, सभी की जुबां पर उसका नाम है, बस यही सोच वह खुश हो लेता है।
______________________________________________________________________________________

हज़ारों छोटू ऐसे ही खुश रहते हैं। उनकी नियति यही है। और करें भी क्या? अपना और उससे ज़्यादा परिवार का पेट पालना है।

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May 11, 2012 at 6:17 PM

हज़ारों छोटू ऐसे ही खुश रहते हैं।
प्रभावशाली रचना.........

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May 17, 2012 at 5:26 PM

कविता जी,
पूर्व में हुई चर्चा के अनुसार आपके ब्लॉग से कुछ लेख को अपने दैनिक समचार पत्र भास्कर भूमि में प्रकाशित किया है। अखबार की प्रतियां आप तक भेजना चाहते है। आप अपने घर की पता भेजने की कृपा करे.......bhaskhar.bhumi.rjn@gmail.com
भास्कर भूमि का ई पेपर देखे......www.bhaskarbhumi.com

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May 19, 2012 at 7:27 PM

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