प्यार का ककहरा !

थोड़ी सी बात हुई
चंद मुलाकात हुई
वे अपना मान बैठे
जाने क्‍या बात हुई
देखते आये थे जिसे
करने लगे ‘प्यार’ उसे
वे इसे ही समझ बैठे
जग समझे चाहे जिसे
प्यार में सिमटने लगे
दूर सबसे छिटकने लगे
आंखों में सपने लिए
रात भर जगने लगे
दिखते न थे जो आसपास
डालते नहीं थे सूखी घास
उनकी नज़र में आने लगे
वही अब बन खासमखास
पर जब लंबे अरसे बाद
उनसे हुई एक मुलाकात
न थी आंखों में रौनक
न होंठों पे पहले जैसी बात
मुर्दानी सूरत नज़र आई
चेहरे पर उड़ती थी हवाई
कसम खाते थे जिस प्यार की
उसी से थी अब रुसवाई
प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे


    ..कविता रावत 

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May 20, 2012 at 10:08 AM

आदरणीय कविता जी
नमस्कार !
खूबसूरत अह्साशों से भरी बेहतरीन कविता प्रस्तुत की है आपने ....बहुत ही प्यारी रचना !

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May 20, 2012 at 10:42 AM

sahi bat ....piyar karna to sabhi chahte hain par use nibhana ????? koi virla hi ye kar sakta hai..

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May 20, 2012 at 10:43 AM

वाह ,,,, बहुत सुंदर रचना,,,अच्छी प्रस्तुति

RECENT POST काव्यान्जलि ...: किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

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May 20, 2012 at 10:45 AM

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
_
सीधे रस्ते चलने वाले भी कब इस प्यार के चक्कर में घनचक्कर बन जाते है ये उन्हें बहुत बाद में पता चलता है
बहुत खूब अनुभव परिलक्षित होता है कविता में..
बधाई

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May 20, 2012 at 10:59 AM

प्यार का ककहरा सीखना सबके बस की बात नहीं .....

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May 20, 2012 at 1:06 PM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे...बहुत ही बढ़िया

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May 20, 2012 at 1:34 PM

ककहरे के बाद का व्याकरण कठिन हो जाता है प्यार में..

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May 20, 2012 at 2:39 PM

सार्थक प्रस्तुति ...
निभाना ही तो मुश्किल है ...!!

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May 20, 2012 at 2:42 PM

खुबसूरत एहसास ,सुक्ष्म विवेचन ,सरल विश्लेषण के साथ प्यार का ककहरा .

इस एहसास के गुप्त जी की दो लाइन

प्रणय और बिना झुके ,चलना जैसे रुके रुके

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May 20, 2012 at 6:07 PM

बहुत ही बेहतरीन जो प्यार को समझते ही नहीं है..
वो क्या जाने इसकी गहराई..
कुछ दिन का बुखार है फिर उतर जाता है...
अति उत्तम रचना....
:-)

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May 20, 2012 at 6:11 PM

क्या बात है!!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 21-05-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-886 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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May 20, 2012 at 7:14 PM

क्या करें कविता जी प्यार का दस्तूर ही कुछ ऐसा है... बहुत ही बढ़िया रचना

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May 20, 2012 at 8:11 PM

प्यार को प्यार ही ना जाने ......ना जाने ऐसा क्यूँ होता हैं ...

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May 20, 2012 at 8:12 PM

प्यार को प्यार ही ना जाने ...ऐसा क्यूँ होता हैं ?

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May 20, 2012 at 8:21 PM

बहुत सुंदर......
प्यार को ना समझे वो नासमझ हैं.......

सादर.

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May 20, 2012 at 10:22 PM

प्यार का ककहरा बिना पढ़े जीवन आधा है...पढ़ने के बाद कुछ पास होते हैं कुछ फेल...पर कम से कम ख़ुदा के घर जब जायेंगे तो ये तो नहीं कहेंगे कि आपकी नियामत के लिए हमने ट्राई नहीं किया...

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RAJ
May 21, 2012 at 10:29 AM

प्यार को जो लोग हल्का लेते हैं उनकी क्या गत होती है इसको बड़ी खूबसूरती से पेश किया है आपने ..बहुत अच्छा उदाहरण है ..बहुत सुन्दर रचना

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May 21, 2012 at 12:54 PM

बेहद खूबसूरत एहसास ..........

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May 21, 2012 at 1:01 PM

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता

प्यार की अजब-गजब दास्ताँ का ककहरा बड़ा उलझा सुलझा है ...सुन्दर रचना

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May 21, 2012 at 2:09 PM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

यही तो बड़ी मुसीबत है ..प्यार हुआ तो उसी की सुनते चले जाते है फिर आफत सबके ऊपर ...
बहुत प्रेरक कविता है ...

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May 21, 2012 at 2:23 PM

ये पढाई हर किसी के बस की बात नहीं
सुन्दर रचना.

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May 21, 2012 at 2:43 PM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

कोमल रचना....

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May 21, 2012 at 3:33 PM

बहुत खूब....
सादर।

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May 21, 2012 at 3:51 PM

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
Kya baat kahee hai aapne!

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May 21, 2012 at 5:03 PM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
बहुत खूब कहा है आपने ... आभार।

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May 21, 2012 at 6:31 PM

कौन पढ़ता है ककहरे और व्याकरण को प्यार में

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May 22, 2012 at 7:46 AM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे...अब तो प्यार कोई एक खेल भर बनता जा रहा है..
बड़ी अच्छी कविता लिखी है ..

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May 22, 2012 at 9:07 AM

कोमल भाव सुन्दर रचना....

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May 22, 2012 at 3:23 PM

कल 23/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


... तू हो गई है कितनी पराई ...

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May 22, 2012 at 3:27 PM

सुंदर भाव संयोजन से सजी भावपूर्ण अभिव्यक्ति....

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May 22, 2012 at 5:02 PM

ककहरा समझ में आया . सुँदर रचना .

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May 22, 2012 at 5:52 PM

सच कहा है .. प्रेम हर किसी के बस में नहीं होता ... पर क्या करें इसपे बस भी तो नहीं होता ...
न चाहते हुवे भी ये रोग दबोच लेता है ...

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May 22, 2012 at 8:49 PM

वाह ! बहुत भावपूर्ण रचना...प्रेम करना या न करना कहाँ अपने हाथ में है...

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May 23, 2012 at 8:22 PM

बहुत ही प्रभावित करती पक्तियां । मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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May 24, 2012 at 4:17 PM

यह पोएट्री बहुत ही अछी हे
आपको इससे सम्बंदित
एक बुक लेखनी चहिये
मेरी सुभ कम्नाये आपके साथ है

मे पहली बार हिंदी मे कमेन्ट लिख रहा हु पता नहीं अछी हिंदी लेखी है के नहीं मालूम नहीं जो भी हो इस कची हिंदी के लिये माफ्फ़ करना

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May 24, 2012 at 4:21 PM

पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
मे इसका मतलब नहीं समझा जो आपने लास्ट मे लिखा है

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May 24, 2012 at 4:22 PM

kkhare ka matlab nahi samjha mai

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May 24, 2012 at 6:21 PM

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता

अजीब दास्तां है ये...!

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May 26, 2012 at 6:10 PM

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

वाह! आपने तो प्यार का क ख ग अच्छी तरह से समझा दिया ...बहुत सुँदर अभिव्यक्ति....

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May 27, 2012 at 3:07 PM

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


हैल्थ इज वैल्थ
पर पधारेँ।

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May 27, 2012 at 4:46 PM

बहुत ही बढिया लिखा है आपने ............जितनी प्रशंसा हो कम है और ऐसा ही लिखते रहिये

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May 27, 2012 at 11:44 PM

इतना आसान नहीं है प्यार का ककहरा सीखना, सुन्दर रचना, बधाई.

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May 28, 2012 at 7:07 AM

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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May 30, 2012 at 1:43 PM

हम भी समझ लिए प्यार के ककहरे को ....
आपने बहुत ही बढिया लिखा है ..

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May 31, 2012 at 12:37 AM

ककहरे किस भाषा का शब्द है और इसका अर्थ क्या है ?

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May 31, 2012 at 10:06 AM

इस ककहरे से शुरू हुई गाथा सबके बस की बात नहीं।

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May 31, 2012 at 12:46 PM

हम भी पढ़ चले प्यार का ककहरा!

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May 31, 2012 at 6:15 PM

बहुत रूचिकर पोस्ट । मेरे नए पोस्ट "बिहार की स्थापना का 100 वां वर्ष" पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी ।
धन्यवाद ।

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May 31, 2012 at 6:23 PM

ककहरा का मतलब वर्णमाला

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May 31, 2012 at 6:24 PM

ककहरा हिंदी का ही शब्द है जिसका मतलब वर्णमाला है .

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May 31, 2012 at 11:28 PM

प्यार के ककहरे .....पढ़कर मन फिर से न जाने किस दिशा में जाने लगा है
बेहद असरदार
बाकी रचनायें कल पढ़ेगें मैम
आभार

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June 1, 2012 at 6:02 PM

कुछ ही शब्दों में फैला ये कैसा संसार..

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June 12, 2012 at 2:09 AM This comment has been removed by the author.
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June 12, 2012 at 2:11 AM This comment has been removed by the author.
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June 12, 2012 at 2:13 AM

बहुत ही सुन्दर रचना.....अभिनन्दन-

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July 8, 2012 at 8:23 PM

पहला पहला प्यार है.
स्मृतियाँ हजार हैं

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August 11, 2012 at 1:00 AM

हृदय स्पर्शी पंक्तिया..सुन्दर रचना ..

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